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अर्थात- यथार्थ

हाय! इस बार कितनी गर्मी है

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अनूप मणि त्रिपाठी

सो हाॅट यार! उफ ये गर्मी! हाय कितनी गर्मी है! आजकल सबकी जुबान से यही सब निकल रहा। मैं खुद यही सब दूसरों को सुनाता फिर रहा हूं। गर्मी ने तो बुरा हाल कर रखा है। समझ में नहीं आता कहां जाकर छुप जाएं! किस बिल में घुस जाएं! इस गर्मी से कुछ राहत तो मिले। कभी-कभी ख्याल आता है कि मैं भैंसा ही होता। हंसें मत! सच्ची! कम से कम किसी तालाब में छई-छप-छई तो कर रहा होता। साथ में निर्बाध रूप से कई भैंसियों का सानिध्य भी मिलता। वैसे अपने इस खयाल पर हंसी भी आती है! जहां दसवें माले पर स्विमिंग पूल देख कर हमें आश्चर्य होता है, मगर किसी तालाब को सूखा देख हमें कोई अजरच नहीं होता, यहां ऐसे में ऐसी विश का क्या मतलब! वैसे, अब क्या-क्या विश किया जाए!
सूरज महाराज कुछ ज्यादा ही ईमानदारी से अपने काम में लगे हुए हैं। वो धूप के रूप में आग बरसा रहे हैं। इधर रेडियों पर गाना आ रहा है – आज मौसम बेईमान है बड़ा… जिसे सुनकर हम जले-भूने जा रहे हैं। सोच रहे हैं कि ये रुड मौसम कब बेईमान होगा! बेचारे कूलर चल-चलकर हाॅट हो जा रहे हैं। एसी दिन-रात काम करते-करते सी-सी करने लगे हैं। फ्रिज का भी हाल बुरा है। बोतले ठंडी ही नहीं होने पाती। ठंडी होने से पहले ही कोई उन्हें निकाल लेता है। इधर बोतल में पानी भरने को लेकर लड़ाई हो रही है तो देश के कई हिस्सों में कोई पानी न भर पाए इसलिए पोखरों और तालाबों की पहरेदारी हो रही है। सड़क गर्म तवे की मानिंद हो गई हैं और दोपहर गर्म भट्टी की तरह। छाँह ढूंढता फिर रहा मासूम दिल। मगर शहरों में अब छाँह कहाँ नसीब! कंक्रीट के जंगल देख तड़पकर राही यही कहता है कि दिल ढूंढता फिर वही दरख्तों की छाँव, चलते रहे चलते रहे धूप का पता न चले…
हर साल गर्मी की तपन का ग्राफ ऊपर की ओर बढ़ता जा रहा। इसी तरह से गर्मी जवान होती गई तो ये लैंड नो मैन्स लैंड में बदल जाएगी! इस गर्मी से बचने के लिए क्या-क्या जतन नहीं करते! किलो-किलोभर पाउडर लगाया, मगर घमौरियों ने बदन को अपना घर बनाया। इसके अलावा गर्मी कुछ अपने दूसरे उपहार भी बाँटने में लगी हुई है, जैसे दाद-खाज। वो भी मुक्तहस्त से। जिसको ये उपहार मिला है, जरा उससे पूछिए कि गर्मी के विषय में वो क्या सोचता है! पागलों की तरह ढेला चलाएगा आप पर। गलती से भी मत पूछिएगा! और उन प्रेमियों के बारे में सोचा है कभी, जिनका काम डबल हो गया है। पहले सन्सक्रीम लगाएं या फेयर क्रीम!!!!
इस हाॅट वैदर में मैं हाॅटडाॅग जैसा आदमी हो गया है! मारे गर्मी के जीभ लपलपा रही है। अगर ऐसी ही गर्मी पड़ती रही तो वो दिन दूर नहीं जब मानव हाॅटडाॅग से बुलडाॅग बन जाएगा! लीजिए! आप दबी जुबां से अभी से ही मानने लगे!
देखिए न! इस गर्मी ने हमारे दिमाग को कितना फ्यूज और कितना कन्फ्यूज कर दिया है। हम अपनी वसुंधरा को भूल कर स्वयं को तरह-तरह से कूल करने के लिए दिन-रात पसीना बहा रहे हैं। तो फिर इस सड़ी गर्मी से कैसे बचा जा सकता है? आप ही कहें मेरे प्रिय गर्मी के मारो!

अर्थात- यथार्थ

जब भी ईद आती है तो जाने क्यों हामिद की याद आ जाती है!

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अनूप मणि त्रिपाठी

हामिद वो मासूम बालक दादी का चहेता अभावों से घिरा पर साहस और संवेदना से पगा, त्यागी, विवेकी ईद की सेवइयों में मिठास बहुत है, पर यह मिठास हामिद जैसों के जीवन में रस घोलती है क्या! हामिद की दादी की उंगलियां क्या आज भी जलती नहीं हैं! रोजे बड़े -बूढ़ों के लिए हैं ,मगर बच्चों के लिए ईद होती है सिर्फ ईद।

हामिद क्या किसी कहानी का पात्र है या हमारे जीवन में वह अकसर दिखता है! हम जरा अपने आसपास देखने की जहमत उठाएं और देखें कहीं ‘छोटू’ नाम से अपना ईदगाह वाला वो हामिद तो नहीं! अमीनाबाद की किसी दुकान में अपनी बूढ़ी अमीना ‘दादी जिसकी उंगलियां रोटी सेंकते वक्त जल जाती हैं, के लिए बूढ़े हामिद का पार्ट खेल रहा हो! यह कहते हुए ,’ खाएं मिठाइयां, आप मुंह सड़ेगा, फोड़े-फुंसियां निकलेंगी, आप ही जबान चटोरी हो जायेगी। तब घर से पैसे चुराएंगे और मार खाएंगे। किताब में झूठी बाते थोड़े ही लिखी हैं।’
हो सकता है कि हामिद छोटू बन कर किसी खिलौने की दुकान में बूढ़े का पार्ट अदा कर रहा हो! मिट्टी ही के तो हैं, गिरें तो चकनाचूर हो जाएं। हामिद के पास बस तीन पैसे हैं। वह उससे शौक-आराम की चीज नहीं ले सकता। वह इन पैसों से केवल और केवल काम की ही चीज ले सकता है। क्योंकि ‘घर में एक काम चीज हो जाएगी। लेकिन आशंका ये है कि ये खेला उसका प्रारब्ध न हो !

काश ! लेखक कोई ऐसी कहानी लिखता जो पूर्ण काल्पनिक होती या उसकी कहानी फकत कहानी ही होती, जो हमारे जीवन का हिस्सा न होती! मुंशी जी कहते भी हैं कि कहानी को जीवन का यथार्थ चित्र समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। कहानी कहानी है, यथार्थ नहीं हो सकती। अब इसमें लेखक का क्या दोष! उसने अपने समय को पकड़ किस्से में उतार दिया और वह समय अब भी धड़क रहा हो! इसके लिए लेखक की तारीफ करनी चाहिए या अपने वर्तमान समय को कोसा जाना चाहिए !!!

रौनकें हैं। मेले आज भी लगते हैं। आज भी आमजन ‘अपनी विपन्नता से बेखबर, संतोष और धैर्य में मगन’ खुशी ढूंढने जाते हैं तो संम्पन तबका खरीदारी करने। आजादी से पहले ‘चौधरी साहब ‘ ने जिन्नात काबू में कर रखा था, अब ‘तंत्र’ को । ये बिला वजह नहीं है कि जब ईद आती है तो अमीना का दिल कचोटता है। चांद तो दिख जाता है, पर घर में अन्न का दाना नहीं। ऐसे में ‘किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को?’ यह बिला वजह नहीं है कि दुकान पर सजी मनों मिठाइयां हामिद जैसों के हिस्से नहीं आतीं , उन्हें जिन्नात आ कर खरीद लेते हैं।

हामिद जिसके पांव में जूते नहीं, मगर जरूरत पर पर लग जाते हैं। हामिद ‘ जिसके अंदर प्रकाश है, बाहर आशा।’ तीस रोजों के बाद ईद आ जाती है, मगर फाके साल भर डेरा जमाए रहते हैं.. ऐसे में भी हामिद उस जिजीविषा का नाम है जिससे बड़े से बड़े फन्ने खां लोहा नहीं ले सकते। क्योंकि हामिद जैसे रोज अपने जीवन से लोहा लेते हैं। मोहसिन का मामा जो पुलिस है, उन जैसों का जीवन ‘हम तो इतना लेते हैं, जिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाए।’ इसी में गुजर जाता है। वे क्या लोहा लेंगे! तब हराम के माल के लिए अल्लाह सजा देता तो घर मे आग लग जाती थी,जैसे मोहसिन के मामा के साथ हुआ। अब ऐसे लोगों की सजा का तो पता नहीं, हां मगर सरकारी फाइलों में आग जरूर लग जाती है!

जब भी ईद आती है तो जाने क्यों हामिद की याद आ जाती है!

आज भी हामिद मोटर के नीचे आते-आते बचा। नगर की सभी चीजें आज भी अनोखी हैं उसके लिए। जिस चीज को ताकता है, ताकता ही रह जाता है। स्मार्ट सिटी के स्मार्ट शहरी ऐसे लोगों को गंवार कहते हैं। क्योंकि हामिद जैसे ताकते रहते हैं, उनमें खरीदने की ताकत नहीं। और यह खरीदने की ताकत कहां से लाएं! इन्हें तो चौधरी साहब , मोहसिन के मामू की तरह बिकना आता नहीं! मगर हामिद आज भी इतना भोला है ,’ कोई मुझे यह मंतर बता दे एक जिन्न को खुश कर लूं।’ उसे कल जितना विश्वास था उतना आज भी है कि बड़ों की दुआएं सीधे अल्लाह के दरबार में पहुंचती हैं और तुरंत सुनी जाती हैं।

इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं । सरकार की नजरों में भी सब बराबर हैं। मगर ‘हामिद बिरादरी से पृथक है। अभागे के पास तीन पैसे हैं।’ जबकि मोहसिन के पास पन्द्रह पैसे और महमूद के पास बारह। हामिद अगर अपनी दादी के बटुए में सहेजे पांच पैसे भी जोड़ ले तो भी कोई बराबरी नहीं। मगर इसके बावजूद सबसे ज्यादा हामिद ही प्रसन्न है। क्योंकि वह बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है। वह अपने लिए ऐशोआराम की चीजें भले न खरीद पाए, मगर वह ‘तीन पैसे में रंग जमाना जानता है। हामिद की बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती है। हामिद को अपने से हारने वालों के आसूं पोंछना आता है। हामिद जीना जानता है। उसके (मरहूम) अब्बाजान-अम्मां जब कभी आएंगे और वो साधन संपन्न हो जाएगा तब ‘एक-एक को टोकरियाँ भर खिलौने दूं और दिखा दूं कि दोस्तों के साथ इस तरह सलूक किया जाता है।’ हामिद अपनी हसरतों को तो मरना जानता है, मगर दूसरों के हक को नहीं।

योजनाओं की रौनकों के बीच, सभ्यताओं के शीर्ष पर, आधुनिकता के हिंडोले पर, आज भी हामिद का चिमटा नहीं हामिद का मुंह रोज आग में जलता है। जबकि उसके पास न्याय का बल और नीति की शक्ति है।, मगर इसके लिए हामिद को किसी से सहानुभूति या कोई खैरात नहीं चाहिए। वह तो रुस्तमे हिन्द है। वह कलेजा मजबूत कर सकता है। वह आंधियों से लड़ सकता है। आग में कूद सकता है। जहां नफरत की आग पर अपनी रोटियां सेंकने का चलन हो, वहां पर वह इतना ही चाहता है कि उसकी बूढ़ी दादी के तवे पर रोटियां सेंकते वक्त हाथ न जले!!! और उसकी दादी की तरह किसी को भी ईद के लिए,खुशियों के लिए ‘अठन्नी को ईमान की तरह’ बचाने की जुगत न करनी पड़े! ‘बस्स!!!http://www.satyodaya.com

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अर्थात- यथार्थ

दर्शन देते देवता

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अनूप मणि त्रिपाठी

हर्षित, मुदित नाच रही है देह, थिरक, फुदक रहा मन। वाणी गई कहीं खो, नैन गये फैल, पलकें हुईं र्निनिमेष। कैसे… कैसे बखान करें देवता के रूप का ! कैसे बखान करे उसकी लीलाओं का! सुधबुध खो गई है हमारी। कैसे आज देवता ने ली हम जैसों की सुध! कैसे देवता प्रकट हुए आज हमारे दर! न कोई यज्ञ। न कोई तप। न कोई अनुष्ठान। न कोई आह्नवान। न कोई करूण क्रंदन। न कोई याचना। न कोई विनती। फिर कैसे देवता हुए प्रकट! देकर अपना दर्शन कर रहे हैं हमें कृतार्थ। यह कैसी अनभूती ! यह कैसा दृश्य! ओहो! हमारे घर की चौखट पर अपादमस्तक दर्शन दे रहे भगवन। दर्शन लाभ हमें हो रहा, परन्तु सिर देवता का झुका। देवता का यह कैसा चमत्कार !

मात्र दर्शन ही नहीं, बहुत कुछ दे रहे हैं देवता। दर्शन के साथ मुस्कुराहट, मुस्कुराहट के साथ अपनी उर की गर्माहट, उर की गर्माहट के साथ अपने करकमल की कोमल छुवन, करकमलों की कोमल छुवन के अतिरिक्त करकमलों का हार, करकमलों का हार ही नहीं अपने वचनों की लंबी माला, वचनों की लंबी माला ही नहीं, हमारे सभी कष्ट हरने का ठोस आश्वासन। वाकई बहुत कुछ दे रहे हैं। वे दे कहां रहे, वे तो लुटा रहे हैं। इतना कुछ लुटाने के बाद भी और बहुत कुछ लुटाने की चाह रखते हैं। वे बहुत कुछ लुटाने के बाद भी कितने धनवान दिख रहे हैं। इतना कुछ देने के बाद भी वे याचक लग रहे हैं। देवता का यह कैसा रूप!

क्या दिव्य रूप है देवता का! दिव्य रूप आप है कि दिव्य रूप धरे हैं ! जो भी हो देवता देवता जैसे ही लग रहे हैं। उन्होंने धवल वस्त्र ऐसे धारण किए हुए हैं जिसकी धवलता के सामने बगुले के परों के रंग भी फीके लगे। बगुला यदि यह धवलता देख ले, किंचित हीन भावना का शिकार हो जाए। वात्सल्य का भाव उनकी आंखों में छप छप छप तैर रहा है। उनके श्रीमुख से टप टप टप शहद टपक रहा है। उनका सिर सर सर सर गेंहू की बालियों की तरह लहरा रहा है। उनके चरण रज फर्र फर्र फर्र उड़ कर बादल बन रहे हैं। यह हमारी नजरों का धोखा है या देवता का कोई नया अवतार!

आज ऐसा लग रहा है कि वह केवल एक को नहीं, सबको वर देने के मूड में है। और केवल एक वर ही क्यों! वे थोक में वर देने के मूड हैं। आज, आज वे किसी को निराश नहीं कर रहे। हाथ मिलाओे तो हाथ मिलाएगे। गले लगाओ तो गले लगेगे। सिर झुकाओ तो नत हो जाएगें। पैर छुओ तो आशीर्वाद देगे। भेंट करोगे तो भेंट देगे। जो मांगो वो मिलेगा। ओहो, कितना विशाल नरम ह्नदय लेकर प्रकट हुए हैं देवता । 

दर्शन दुलर्भ थे जिनके, आज वे बहुत आराम से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। वे सामने ही हमारे। बिल्कुल सामने। इतने निकट कि हम उन्हें छू सकते हैं। इतने सटे कि हम उन्हें महसूस कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि उनका यहां से जाने का मन नहीं हैं। उनकी देह भाषा कहती है कि वे हमारी बस्ती में ही अपना आसन जमा देंगे! परंतु देवता गंदगी में कहां रहते हैं! वे जहां से आए हैं, वहीं चले जाएंगे। किसी निरापद जगह पर । देवता का काम भी यही है कि दर्शन दे और चला जाए। पंरतु आज वे बहुत देर से हमारी गंदी बस्ती में जमे हुए हैं। कितने धैर्यवान हैं देवता!

आज जो साक्षात दर्शन दे रहे हैं, कल तक उन्हीं के दर्शन हेतु हमें तप करना पड़ता था। एक झलक के लिए दौड़-दौड़ कर दधीची की भांति अपनी हड्डियों को गलाना पड़ता था। यहां तक कि हमारी आशाएं वास्तविकता की अग्नि में स्वाहा हो कर धूम में बदल जाती थीं, तब भी वे हमारे सामने प्रकट नहीं होते थे। हम चाहते थे कि वे हम पर ध्यान दें, परन्तु वे अंतर्ध्यान रहते थे । इतनी जल्दी दर्शन देते तो देते कैसे, क्योंकि वे देवता थे। और देवता इतनी आसानी से प्रसन्न कहां होते हैं। वे तो कठोर से कठोर तप की चाह रखते हैं। पंरतु कालचक्र कैसे उल्टा घूमा कि देवता यकायक प्रकट होकर अपने दुर्लभ दर्शन को सरल-सुलभ कर दिया। यह भी देवता की कोई लीला होगी!

कहां हम मात्र देवता की कामना करते थे, पंरतु आज मात्र देवता ही नहीं प्रकट हुए, साथ उनके प्रकट हुई है यक्ष, गंधर्व की टोली भी। देवता अकेले नहीं आए हैं। क्या बहुत अधिक प्रतीक्षा कराने की परीक्षा का यह अतिरिक्त फल है! क्या उनके मन में कहीं किसी प्रकार का कोई खटका है! क्या उन्हें अपने भक्तों की नीयत में खोट दिखा है! क्या वे किसी असुरक्षा भाव से घिरे हुए हैं? क्या उन्हें अपने पुजारियों की निष्ठा डगमगाती हुई दिखी! नहीं… नहीं… देवता को किसका डर? देवता को कैसा डर? पुजारी पूजा न करे तो काहे का देवता! भक्त अगर सुमिरन न करे तो देवता का कैसा प्रताप! कैसी उसकी सत्ता!

आज देवता स्वयं मझधार में हैं। देवता का देवत्व आज चुनाव की धार में है, उन्हें डर है कहीं उनका देवत्व इस धार में बह न जाए। हर पांच साल बाद ऐसी घड़ी आती है, जब देवता बिन बुलाए ही प्रकट होते हैं। देवता जानता है कि लोकतंत्र के मंदिर में अगर उसे पुनः शोभायमान होना है, तो उसे चुनाव का चक्रव्यूह भेदना होगा। देवता जानता है कि इसके लिए उसके कवच-कुंडल प्रर्याप्त नहीं। यह चक्रव्यूह तो भिदेगा वोटरूपी तीरों से। और वे तीर रखे हैं हम जैसे वंचितों के कुटिया में । वे एक-एक कुटिया खंगालने निकले हैं, इसलिए देवता दर्शन देने के लिए श्रम कर रहे हैं। देवता स्वयं दया का पात्र दिख रहा है। सुविधाभोगी देवता आज श्रमजीवी बन गया है। हाय!

कहीं देवताओं के दर्शन सुलभ हो रहे हैं, या यूं कहें कि वे मनुष्यता ग्रहण करने लगे हैं, वहीं कहीं कोई मनुष्यता छोड़कर देवत्व पाने की ओर अग्रसर होना चाह रहा है। लोकतंत्र में चुनाव की बेला भी क्या बेला है!http://www.satyodaya.com

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अर्थात- यथार्थ

जनता का जायका

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– अनूप मणि त्रिपाठी

देखा गया, उठाया गया, छुआ गया, फिर रख दिया गया। और ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ! उसका धैर्य अब जवाब दे चुका है। वह दारूण स्वर में बोला, ‘हे ईश्वर और कितना अपमानित करवाएगा!’ जिसे सुनकर पास पड़ा हुआ आलू कसमसाया। लगे हाथों आपको बताते चलें कि अभी-अभी जिसने ऊपर वाले से फरियाद की है, वह टमाटर है। टमाटर के बरअक्स आलू शांतचित्त है। जबकि ऐसा ही व्यवहार उसके साथ भी हो रहा है। उसे भी कई बार देखा-परखा-जांचा गया और वहीं धम्म से छोड़ दिया गया। वह भी टमाटर की तरह कब से प्रतीक्षारत है कि कोई उसे चुन ले। फिर भी आलू को किसी से कोई शिकायत नहीं। उसका कारण यह है कि वह अनुभवी हो चला है। लगातार तीन-चार दिनों से मंडी में वह आया-लाया जा रहा है। पहले-पहल उसे भी अपने साथ किया गया ऐसा व्यवहार ऐसे ही अखरा था, जैसे इस समय टमाटर को अखर रहा है। लेकिन अब उसके लिए यह सब सामान्य-सी बात हो गयी है। वैसे ही, जैसे पेट्रोल के दाम जब बढ़ते हैं तो लोेग बहुत आक्रोशित होते हैं, मगर कुछ दिन बाद बढे़ हुए दाम और न बढे़ कि खैर मांगते हुए पूर्ववत मात्रा में ही तेल भरवाने लगते हैं।

वो सब तो ठीक है भाईसाहब! मगर आलू और टमाटर के साथ ऐसा व्यवहार क्योंकर हो रहा! कहीं इसकी वजह मंहगाई तो नहीं!

नहीं-नहीं, फिलवक्त मंहगाई की वजह से नहीं भई।

       फिर ऐसा क्यों भाईसाहब!

भाईजान,माजरा यह है कि सारा किया-धरा निगोड़े मौसम का है। मौसम ने जरा-सी करवट क्या ली, कि दोनों की नींदे उड़ गईं। खुद खराब हुआ कमबख्त और दाग लगा गया दोनों पर। इसलिए कोई इन्हें चुन नहीं रहा।

  बेचारे! अच्छा फिर क्या हुआ इनके साथ भाईसाहब ! 

चलिए,सब्जीमंडी चल कर देखते हैं कि क्या हुआ!

टमाटर का एक बार फिर अपमान हुआ। उसके बार-बार अपमानित होने का एक कारण और भी है। टमाटर की जब-जब अवहेलना होती, तो लाल टमाटर गुस्से से और लाल हो जाता। लिहाजा लोग उसके प्रति और आकर्षित होते। मगर जब पास जाकर उसको उठाते और देखते कि वह दागी है, तो उनका आकर्षण उंहू… कहते हुए तिरस्कार में बदल जाता। उसके लाल होने और उपेक्षित होने का क्रम न जाने कब से चल रहा है और न जाने कब तक चलेगा! मगर अब टमाटर की लालीमा कम होती जा रही थी,क्योंकि उसका गुस्सा अब उदासी का रूप लेती जा रही है।

    और आलू! आलू के क्या हाल हैं भाईसाहब!

अनुभवी आलू मस्त,मलंग है। फिर भी टमाटर का दुःख उससे देखा नहीं जा रहा है। उसने तो अपने को किसी तरह से समझा-बहला लिया है, मगर वह टमाटर को कैसे समझाए! वह मन ही मन टमाटर की तबीयत हरी करने की युक्ति सोच रहा है। कुछ देर सोचने के बाद वह बोला,‘मेरे प्यारे, गोलू-मोलू, भोले टमाटर ताजी-ताजी एक गजल सुन!’ टमाटर कुछ न बोला। आलू उसकी प्रतिक्रिया से बेखबर शुरू हो गया ,‘दियासलाई और पानी साथ-साथ रखते हैं/ सियासत में वे ऊंचा मुकाम रखते हैं।’ मतला कैसा लगा!’ ‘सुनकर मतली आ रही है।’ टमाटर मुंह बनाते हुए बोला। ‘अब शेर सुन शेर’ आलू अपना सीना फुलाते हुए शेर कहा,‘ लंबी होती ही जा रही है यहां पतझड़ों की मियाद/ हमारी खाली सुब्हों में वे अपनी रंगीन शाम रखते हैं।’ ‘यह शेर नहीं चूहा है…’ टमाटर छूटते बोला। ‘अबे! सब्जीधर्म निभाते हुए कम से कम सियार कह देता मेरे निर्दयी बालमा…’ यह कहकर आलू एक सांस में अपनी तथाकथित अधूरी गजल को पूरी सुनाने लगा,‘ फासला हो गया कितना अमीरी और गरीबी में/ अपने काम से वे बस अपना काम रखते हैं।। सूखे में उजड़ गए गांव कई सारे/तकिये के पास वे छलकता जाम रखते हैं। बिलबिला कर भूख से मर गया किसान कोई/ मरने वाले का वे अन्नदाता नाम रखते हैं।’ इस बार टमाटर कुछ नहीं बोला, तो आलू बोला,‘बता न मेरी गजल तुझे कैसी लगी! बता न मेरे लालू टमाटर!’ टमाटर तमतमाते हुए बोला,‘दो कौड़ी की’ आलू हंसा। चलो, दो कौड़ी की तो है। यह क्या कम है! यहां तो अपन की इतनी भी वैल्यू नहीं है!’ ‘फिजूल में उड़ मत! यह गजल नहीं है समझे तुम! सारे शेर बहर से खारिज..’ ‘तो नज्म समझ ले न! क्या फर्क पड़ता है! बस भावनाओं को समझ!’ टमाटर कुछ नहीं बोला। बोलता भी क्या। उसकी भावनाओं को यहां कौन समझ रहा था, सिवाय आलू के। आलू ने फिर एक नयी तान छेड़ी,‘अच्छा बताओ! नेता और जनता में मूलभूत क्या अंतर है?’ टमाटर चुप रहा। पूर्व की भांति। आलू खुद ही बोला,‘जनता देश की खाती है और नेता देश को खाता है।’ यह कहकर आलू फीः फीः फीः करके जोर से हंसा। मगर उसकी हंसी टमाटर की उदासी की दीवार में सेंध नहीं लगा सकी। उसका यह वार भी खाली गया।

     अब आलू क्या करेगा भाई साहब!

आलू! आलू ने जैसे हार न मानने की ठान रखी हो! टमाटर की टीस को कम करने की उसने एक बार फिर कोशिश की। ‘अच्छा अपने देश का सबसे बड़ा मजाक-लतीफा कौन-सा है?’ आलू ने पूछा। टमाटर चुप रहा। इसका उत्तर भी आलू ने ही दिया।,‘हमारे यहां जब कोई नेता नैतिकता के नाम पर दूसरे नेता का इस्तीफा मांगता है, तो मोही सुन-सुन आवत हंसी।’ मगर इस बार भी आलू की युक्ति काम न आयी। टमाटर पर इसका कोई असर न हुआ।

      तो अब भाईसाहब!

आलू ने एक बार फिर कोशिश की। ‘अच्छा बताओ मेरे नादान पिया, दुनिया का सबसे बड़ा अचरज क्या?’ जैसा की आलू को भी उम्मीद थी। टमाटर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इसी बीच बारी-बारी से कई हाथों ने आलू और टमाटर को टटोला और रख दिया। लोगों उन्हें उठा तो लेते थे, मगर जैसे पता चलता कि वे दागी हैं, तो फौरन उनसे अपना पीछा छुड़ाने में ही भलाई समझते।

बहुत हो चुकी आलू-टमाटर की कहानी! आप तो उत्तर बताओ बस! 

उत्तर मैं क्यों बताऊं। जिसने पूछा है,वही बताएं।

      अच्छा तो आलू से ही कहलवा दीजिए न भाईसाहब!

आलू ने उत्तर दिया,‘दुनिया का सबसे बड़ा अचरज यह है कि कोई भारतीय नेता जब नैतिकता के नाम पर इस्तीफा दे।’ मगर टमाटर का मूड अब भी उखड़ा-उखड़ा रहा। उसके मूड को ठीक करने की कोई तरकीब-तजबीज ठीक नहीं बैठ रही थी। आलू सोच में पड़ गया। गहन सोच में। इसी बीच एक बात हुई।

    वह क्या भाईसाहब!

टमाटर बस चुने जाने वाला ही था, दुकानदार ने उसे तौल भी दिया था। कई बेदाग टमाटरों के बीच वह छुप-सा गया था। मगर देखो तो उसकी किस्मत! जैसे ही वह झोले में जाने वाला था कि उसके दागी होने का पता चल गया,और एक झटके से उसे बाहर पटक दिया गया। टमाटर फिर वहीं आ गिरा, जहां से उसे उठाया गया था।

अरे..रेरे... बहुत बुरा हुआ। अब टमाटर क्या होगा! और आलू अब क्या करेगा भाईसाहब!

लाल दिखने वाला टमाटर अब पीला दिखने लगा है। हताशा और हीनताबोध के पाताल में समा चुका है वह। उसे देखकर भी यह साफ पता चलता है। अब आलू के लिए भी असहनीय है यह सब कुछ। अपने पड़ोसी टमाटर की दयनीय हालत देख उसका कलेजा मुंह को आता । मगर इस बार आलू ने टमाटर से दो टूक बोलने की ठानी। उसने सोचा कि उसे ऐसा करने से भले ही टमाटर का दिल टूट जाए, मगर इस तरह से उसके घुट-घुट के जीने से तो निजात मिलेगी। आलू अपने कलेजे को मजबूत करके हौल जमाते हुए टमाटर से बोला,‘देख,चुने जाने की अपनी टेक अब तू छोड़! जो हमें-तुम्हें चुनने में सौ नखरे कर रहे हैं न, इनकी सच्चाई मैं तुझे बताता हूं। जो जनता घंटों बाद भी अपने और अपने घर वालों के लिए दागी फल-सब्जी तक नहीं चुनती, वही जनता यहां अपने और अपने देश के लिए…’ ‘जिंदाबाद! जिंदाबाद!’ ‘जीत गया भाई जीत गया’ के नारों ने उसके बोलने की रफ्तार को यकायक रोक दिया। ‘कैसा हो-हल्ला है!’ टमाटर बोला। ‘अरे कुछ नहीं चुनाव जीत गया है…बहन का टका!’ आलू ने टका सा जवाब दिया। ‘कौन जीत गया!’ टमाटर ने उत्सुकता से पूछा। उसकी उत्सुकता से परिलक्षित था कि हाल-फिलहाल के लिए वह अपना दुख-दर्द भूल गया है। ‘जो जीता है बहुत छंटा हुआ इंसान है… एक नंबर का कमीना है… दंगा-फसाद करता है…इससे ज्यादा और न जान! समझा!’ आलू के स्वर में कुछ ज्यादा ही तल्खी थी। आलू के व्यवहार में अचानक से आया यह बदलाव, टमाटर की समझ से परे था, मगर इसकी वजह पूछने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। वह मन ही मन कयास लगाने लगा। वह कयास लगाते हुए सामने की छटा देखने लगा। वह देख रहा था कि उसके सामने से हवा में असलहे लहराते हुए ‘जिंदाबाद!’ ‘जिंदाबाद!’ के नारे लगाते हुए आदमियों और गाड़ियों का जत्था गुजर रहा था, जो खत्म होने का नाम ही न लेता था। इस दृश्य को टमाटर उत्सुकता से देख रहा था, और उसे देखकर आलू मायूस हो रहा था।

     क्यों! वो क्यों भाई साहब! मस्त,मलंग आलू मायूस क्यों हो गया! यह उल्टबांसी क्यों!

अनुभवी आलू समझ रहा है कि अभी-अभी जो कुछ टमाटर ने देखा है, उसे देखकर टमाटर की बुझती उम्मीद की लौ यकीनन एक बार फिर से रौशन हो गई है। इस दृश्य को देखने के बाद अब तोे उसकी उम्मीद अपेक्षया और बढ़ गई है कि एक दिन उसे भी चुना जाएगा…

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