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अर्थात- यथार्थ

रोचक चुनावी कथाएं!!

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-अनूप मणि त्रिपाठी 

(1)

ट्रेन आने वाली थी, जोकि पिछले चार घण्टे से आए जा रही थी। ऐसे में उसने टाइम पास की गरज से अपने को तौलने की सोची। वह खड़ा हो गया मशीन पर। उसमें से एक टिकट निकला। जिसमें एक तरफ उसका वजन पांच सौ किलो अंकित था और दूसरी तरफ ‘आप के अच्छे दिन आ गए हैं। आप का दिन शुभ हो!’ अंकित था।

उसे देखकर वो चौंका। वह मुश्किल से पचास किलो होगा और कहां ये मशीन पांच सौ बता रही है। न तो उसकी खुराक बढ़ी है, न तो उसकी तनख्वाह! कहीं थायराइड तो नहीं हो गया! उसे शंका हुई।

उसने फिर से सिक्का डाला और खुद को तौलने के लिए मशीन को समर्पित किया। नतीजा इस बार भी पांच सौ वाला ही निकला। इस बार वह मुस्कुराया। उसने सोचा कि मशीन भले ही खराब हो मगर परिणाम उसका एक ही आ रहा है।

उस का मन अभी भी नहीं माना। उसने एक बार खुद को तौला। मशीन से बाहर टिकट निकला जिस पर इस बार वजन के साथ कुछ और भी लिखा हुआ था,’ आप बार बार खुद को न तौले। आपका मौजूदा समय में वजन पांच सौ किलो ही है। आप का वजन दरसअल इसलिए बढ़ा गया है, क्योंकि देश में चुनाव चल रहा है। धन्यवाद।’

(2)

‘मां कर ली!’

‘रुक अभी!’

‘मां! मां!’

‘बोला न बैठा रह अभी!’

‘अब नहीं आ रही! हो चुकी है सारी…क्या करूं!’

‘अरे बेटा! बस थोड़ा सा सब्र कर!’

अब पति से नहीं रहा गया। वह गुस्से से बोल पड़ा,‘जब उसने कर ली है तो जा कर क्यों नहीं धुलवा देती हो!’

‘ वोट मांगते हुए अभी कोई न कोई नेता आ धमकता ही होगा!’

यह सुनते ही पति का गुस्सा शांत हो गया।

(3)

कल रात उसकी झोपड़ी में नेता जी ने खाना खाया। इतना ही नहीं बल्कि उसके साथ खाया। अगले दिन अखबार में उसकी फोटो छपी, जिसे देखकर वह गदगद हो गया। वह अखबार लेकर निकल पड़ा। उसे जो-जो मिलता उसे वह बहुत उत्साह के साथ दिखाता। अधिकांश लोगों की प्रतिक्रिया ‘वाह अपना जुमई बड़ा आदमी हो गया अब तो!’ रही।

वह अखबार दिखाते-दिखाते अपनी प्रंशसा पाते-पाते आखिकार उस जगह पर पहुंच गया जहां के लिए वह निकला था। लाला की दुकान पर पहुंचते ही उसने लाला के सामने अखबार बढ़ा दिया। लाला ने जिसे बहुत ध्यान से देखा। इसका परिणाम सुखद निकला। आज यह पहली बार हुआ था कि लाला ने बिना जली-कटी सुनाए हुए उधारी का राशन दे दिया था।

(4)

सभागार में नेता जी का धाराप्रवाह भाषण चल रहा था कि तभी भूकंप आ गया। सभी लोग आनन-फानन में सभागार के बाहर भागने लगे। कुछ ने भूंकप आने का कारण नेता जी के भाषण को दिया। लेकिन मन ही मन। नेता जी पूरी तेजी के साथ भागे। मगर उनके भागने में एक बात हो गई। मारे हड़बड़ी के वह कुर्सी उठाकर भागे।

खैर,कुछ देर बात खतरा टल गया। जान-माल का कोई नुकसान नहीं हुआ। जब सारी स्थिति समान्य हो गई तब नेता जी को सहसा एहसास हुआ कि वह गफलत में सभागार के बाहर अपने साथ कुर्सी ही उठा लाए। अब वह परेशान हो गए। चुनाव का समय। विरोधियों को अगर यह बात पता चल गई तो मजाक बनाएंगे और मीडिया की तो खैर पूछो मत! अब क्या किया जाए! नेता जी ने फौरन एक पहुंचे हुए ‘अपने आदमी’ को फोन मिलाया। जो उनकी सभी खबरों को मैनेज करता था और इसके साथ अन्य चैनल-अखबारों को भी। उसने नेता जी को बेफिक्र होने का इतना आश्वासन दिया, जितना नेता जी ने अभी तक जनता से वादा भी न किया होगा। नेता जी बहुत उलझनों के साथ घर पहुंचे। डरते हुए टीवी चलाया। वहां उनकी कोई खबर नहीं थी। अगली सुबह कुछ झिझकते हुए घर में आए हुए अखबारों को एक एक करके उठाया, वहां भी उनकी खबर नादारत थी। सिर्फ एक अखबार में इस घटना का जिक्र मात्र था जिसका शीर्षक इस प्रकार से दिया गया था…

‘भाषण के दौरान आया भूंकप, नेता जी जान हथेली पर लेकर भागे’

(5)

नेता जी पेट के बल लेटे हुए पीठ सहित कमर की मालिश करावा रहे थे तभी उनका साला आ गया। आते ही बोला,‘मिस्त्री कह रहा था कि गाड़ी के शॉकर बदलने पडे़ंगे…और कोई चारा नहीं है!’ नेता जी कछुए की तरह अपना सिर खींचते हुए बोले, ‘यार! तब तो लंबा खर्चा बैठेगा! अभी तो स्याला अपने निर्वाचन क्षेत्र में अपन लोग एक ही बार प्रचार करने गए हैं!!!’ उनका साला इस पर कुछ बोलता कि नेता जी के मुंह से जोर की एक ‘हाय!’ निकली। जिस वक्त नेता जी के मुंह से हाय निकली ठीक उसी वक्त मालिश वाले का हाथ पीठ से फिसल कर उनकी कमर पर आ गया था।  http://www.satyodaya.com

अर्थात- यथार्थ

कुछ प्याजू एसएमएस

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जानता हूं आजकल आपके खाने से प्याज ऐसे गायब है जैसे राजनीति से नैतिकता। जैसे दूध से कैल्शियम। जैसे पानी से शुद्धता। जैसे व्यवहार से शालीनता। जैसे बयान से बुद्धिमत्ता। जैसे शिक्षा से जीविका। कुछ वैसे ही…। तिस पर हमारे माननीय नेतागण कहते हैं कि प्याज को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए। सही कहते हैं वे। राजनीति से अलग कई विकल्प खुले हुए हैं आमजन के लिए। वह चाहे तो प्याज को लेकर चुटकुले बना सकते हैं। प्याज को देखकर मुंह में पानी ला सकते हैं। प्याज की फोटू अपने सीने से चिपका कर आहें भर सकते हैं। प्याज की याद में आंसू बहा सकते हैं। प्याज पर कविता लिख सकते हैं।

कविता लिखने का मन न हो तो कहानी या गीत लिख सकते हैं। बाजार जाकर प्याज के नित दर्शन कर सकते हैं। प्याज के बदले सेब खाने पर विचार कर सकते हैं। बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद जैसे मुहावरे को यों बदल सकते है-बंदर क्या जाने प्याज का स्वाद। आप तब तक ये सब करते रहिए, जब तक प्याज आप की पहुंच से दूर है। ऊपर बैठने वाले भले न कुछ ठीक कर पाएं, मगर एक न एक दिन ऊपर वाला सब ठीक कर देगा। सब्र रखिए। जैसे आजादी के इत्ते वर्षों से रखते आए हैं। अब देखिए न, इन दिनों प्याज के मुताल्लिक मेरे मोबाइल पर एसएमएस की बाढ़ आई हुई है। प्याज खाकर नहीं, इन्हें पढ़कर ही सही, मेरी तरह आप भी अपना दिल हल्का करें।

मुलाइजा फरमाइए कुछ प्याजू (धांसू) एसएमएस-

(1)
श्रोता- रेडियो जॉकी से- जी मैं एक गाना सुनना चाहता हूं।
रेडियो- जॉकी- कौन सा!
श्रोता- आशिकी टू का वो गाना ‘सुन रहा है न तू,रो रहा हूं मैं…
रेडियो- जॉकी-जी बहुत अच्छा! यह गाना आप किसको डैडिकेट करना चाहेंगे!’
श्रोता- जी, प्याज को!’

(2)
बहुत ही अच्छा रिश्ता लाया हूं जजमान!
अच्छा!
जी हां!
लड़का क्या करता है पंडित जी!
अरे वो सब छोड़िए! आप तो बस यह जानिए की वह प्याज नहीं खाता है।

(3)
संताः प्याज दाल फ्राई के काम में नहीं आ रहा है आजकल।
बंताः किस काम में आ रहा है फिर!
संताः भेजाफ्राई के काम में।

(4) चलो कोई तो है जो मेरी बीवी को रुला सकता है। मैं समझता था कि उसे रुलाने वाला आज तक कोई पैदा ही नहीं हुआ।

(5) ‘तुम्हारी कोई अंतिम इच्छा?’ फांसी की सजा पाए व्यक्ति से जेलर ने पूछा।
‘जी, बस प्याज की पकौड़ी खाना चाहता हूं।’

(6) ‘इस बार का चुनाव कैसे जीता जाएगा सरकार!’ चमचे ने कहा।
‘इस बार दारु के साथ प्याज भी बंटवा देंगे।’ नेता ने निश्चिंतभाव से कहा।

(7) ‘बाबूजी यह वाला ले जाइए! नया आइटम है।’
‘अच्छा, इसमें क्या खास बात है भई!’
‘यह प्याज बम है! प्याज बम!’
‘धमाका करेगा!’
‘इतनी तेज कि सरकार गिर जाए!’
‘कितने का है!’
दाम सुनकर फिलहाल खरीददार गिरा पड़ा है।

(8) चलते-चलते एक आदमी का संतुलन बिगड़ा और उसके झोले से निकल कर प्याज यहां-वहां बिखर गई। यह दृश्य देखकर वहां खड़े तमाशबीनों ने उसकी जमकर पिटाई कर दी। जब उसने अपना गुनाह पूछा, तो पीटने वालों में से एक बोला,‘साले प्याज चुराता है ।

(9) ब्रेकिंग न्यूजः बाजार में जल्द ही एक ऐसा परफ्यूम आने वाला है जिसकी महक प्याज की तरह होगी। आप चाहें तो उसे अपने कपड़े पर लगा सकेंगे या अपनी जुबान पर।

अनूप मणि त्रिपाठी

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अर्थात- यथार्थ

रुपया तुम कितना भी गिरो !

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‘रुपया गिरा’ ‘रुपया गिरा’ रुपया गिर कैसे सकता है! चलते-चलते किसी का तो गिर सकता है, मगर खुद ही कैसे गिर सकता है। कहावत है कि फलां के नाम का सिक्का चलना। जब सिक्का चलता है, तो वह चलते-चलते कभी-कभार गिर भी सकता है। मगर रुपये को क्या होता है कि जब देखो तब वह गिर जाता है! उसे कोई धक्का देता है या कोई लंगड़ी मार देता है! बैठे-ठाढ़े रुपये का गिरना समझ से परे है।
रुपये के गिरने की खबर खूब सुनने को मिलती है, जबकि सिक्के के गिरने की नहीं। बड़ी धांधली है साहब! मेरा निजी अनुभव है कि सड़क पर मैंने सिक्के गिरे हुए ज्यादा देखे हैं। गोल-गोल चिकने-चिकने सिक्कों के गिरने के चांस भी बहुत होते हैं। मगर रुपया गिरा-रुपया गिरा का शोर ही सुनाई देता है, जिसके गिरने पर तनिक आवाज भी न होगी। ‘सिक्का गिरा’ की खबर सुनने को तो कान तरस गए हैं। हां, यह जरूर है कि बाजार से फलां-फलां मूल्य के सिक्कों के गायब होने की खबर गाहे-बगाहे आ जाती है, मगर मेरी याददाश्त में मैंने कभी नहीं सुना कि सिक्का गिरा।
कभी-कभी पढ़ने-सुनने को मिलता है- रुपया टूटा। अब बताइए कागज का रुपया टूट कैसे सकता है। वह फट तो सकता है, मगर टूट नहीं सकता है। मगर गैरजिम्मेदार लोगों का क्या है, कुछ भी लिख देंगे, कुछ भी बोल देंगेे। चलो माना, रुपया गिर गया, तो गिर कर जाता कहां है। जहां गिर गया है, वहीं से उठा लो न। समस्या क्या है। इतना शोर क्यों मचाते हो भई? अपन को समझ नहीं आता कि रुपया गिरता कैसे है!
अभी मैं इससे ज्यादा कुछ और सोचता-विचारता कि मेरे सामने रुपया आकर खड़ा हो गया। फिर बातों का क्रम कुछ इस तरह चला-

‘क्या तुम रुपया हो?’
‘हां’
‘कुछ लिबलिबे से लग रहे हो!’
‘लिबलिबे!’
‘मतलब, तुम्हारे अंदर की कड़क गायब है।’
‘मत पूछो, आजकल अपनी हालत पतली है।’
‘तुम जनता तो हो नहीं!’
‘जानता हूं…’
‘मगर यहां कैसे!’
‘बस आ गया…’
‘बताओ, मैं क्या कर सकता हूं तुम्हारे लिए!’
‘मैं लगातार गिर रहा हूं…’
‘तुम तो खड़े हो!मेरे सामने!’
‘बेवकूफ! कहने का मतलब मेरे मूल्य में गिरावट हो रही है…’
‘तुम्हारा तो अभी भी बहुत मूल्य है,घबराते क्यों हो?’
‘इसी तरह से गिरता रहा तो मैं रसातल में पहुंच जाऊंगा!’
‘चिंता न करो,सब ठीक हो जाएगा।’
‘तुम ऐसा कैसे कह सकते हो?’
‘यहां ऐसा ही कहा जाता है। बड़ी से बड़ी मुसीबतों से पार पाने का यह हम आम भारतीयों का सूत्रवाक्य है।’
‘हूं..मैं ऐसे ही गिरता रहा तो मुझे कौन पूछेगा!’
‘नहीं, ऐसी बात नहीं है। सब पूछेंगे।’
‘मैं अब और गिरना नहीं चाहता।’
‘देखते नहीं, वित्तमंत्री, प्रधानमंत्री, अर्थशास्त्री सब मिलककर तुम्हें उठाने का प्रयास कर रहे हैं!’
‘मगर फायदा क्या! मैं तो गिर रहा हूं।’
‘तब से देख रहा हूं कि जब से तुम आए हो अपने बारे में बात कर रहे होे!’
‘नहीं पूरी तरह से नहीं, मैं तुम सब के बारे में भी सोच रहा हूं…’
‘वो कैसे!’
‘मेरे गिरने से महंगाई बढे़गी।’
‘मंहगाई तो वैसे भी बढ़ रही है।’
‘मेरे गिरने से और बढे़गी और उसका असर तुम जैसों पर ही पडे़गा।’
‘कमाल है! यहां कुछ भी हो उसका असर आम आदमी पर ही पड़ता है। यहां तक नेता जी को नजला हो, तो वो भी जनता पर ही उतरता है।’
‘कुछ करो, वरना मंहगाई तुम सब को जीने नहीं देगी।’
‘वैसे ही कौन सा जीने दे रही है सरकार।’
‘क्या कहा!’
‘खैर छोड़ो!’
‘मै यूं ही गिरता तो ‘बाप बड़ा न भईया,सबसे बड़ा रुपया/ माना मैं खुदा नहीं मगर खुदा की कसम खुदा से कम भी नहीं…वाले दिन कहीं लद न जाए!’
‘अब आए न असल मुद्दे पर।’
‘बोलो न,मेरा क्या होगा!’
‘अरे, तुम चिंता मत करो। तुम्हारा मूल्य कितना भी कम हो जाए, मगर तुम्हारेे भाव का सेंसेक्स सदा ऊपर ही रहेगा। तथास्तु!’
‘खीसे मत निपोरो! लेखक हो न, बातें बनाना खूब जानते हो!’
‘क्यों लेखक को ही बदनाम करते हो! पार्टी प्रवक्ता, रिस्पेसनिस्ट, कस्टमर केयर, सेल्समैन के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है! बकवास करता है…’
‘नाराज मत हो, मेरी दशा पर तो तरस खाओ!’
‘बहुत हुआ! मेरा सिर न खाओ। मुझे लिखना है अब यहां से जाओ!’
‘अच्छा, मेरे बारे में ही लिखो।’
तुम्हारे बारे में तो बहुत कुछ लिखा जा चुका है, लिखा जा रहा है। ऐसे में मैं भला क्या लिखूंगा, अगर लिखूंगा भी तो नया क्या लिखूंगा!’
‘तुम नया यह लिखो कि अगर रुपया ऐसे ही गिरता रहा तो उसे कोई नहीं पूछेगा।’
‘मैं झूठ नहीं लिखता।’
‘इसमें झूठ क्या है? ठीक तो कह रहा हूं। मेरा मूल्य डाॅलर के मुकाबले गिरता रहेगा, तो मुझे कौन पूछेगा!’
‘इसमे तुम्हारा कोई दोष नहीं है। तुमने अर्थशास्त्र ही पढ़ा है, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र नहीं।’
‘क्या मतलब!’
‘मतलब यह कि तुम जितना भी गिर जाओ, तुम्हारे पीछे आदमी गिरना नहीं छोडे़गा, मेरे बाप!’ ‘तुम्हारे पास सिर्फ लच्छेदार बातें हैं, समाधान नहीं।’

यह कहते हुए रुपया तुनक कर जाने लगा। यह क्या! वह मेरे सामने ही मेरे घर से जा रहा था। घर आए रुपये को ऐसे-कैसे जाने देता! मैंने लपकर उसे अपने हाथों में जकड़ लिया। जैसे लपक कर हम सड़क पर गिरे हुए रुपये को उठाते हैं। उसी तेजी के साथ। वह ‘छोड़ो!’ ‘छोड़ो!’ चिल्लाने लगा। बिना मेहनत के आए हुए रुपये को मैं हस्तगत करने का अभयस्त नहीं था, सो घबराहट में पकड़ ढीली हो गई और रुपया मेरे हाथों से आजाद हो गया। आजाद होते ही, वह तेजी से बाजार की ओर लपका। जाते-जाते बोला, ‘मैं तो अपने गिरने कोे लेकर व्यर्थ ही चिंतित हो रहा था…तुमने ठीक ही कहा था कलमघीसू!’’

अनूप मणि त्रिपाठी

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अर्थात- यथार्थ

कितने मील मिड-डे मील

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आओ नौनिहालो आओ! बैठो धरा पर! टाटपट्टी पर! स्वागत है तुम्हारा। बच्चों, मालूम है कि तुम सब यहां क्यों आए हो। यह बात आइने की तरह साफ है। इस वक्त तुम सब मिड-डे मील के लिए मीलों चल कर यहां पहुंचे हो। देखो भगवन् देखो! मिड-डे मील के चक्कर में हमारे देश का भूखा भविष्य मीलों चलता है। भूखा होने के बाद भी मीलों चल लेता है। शायद ही किसी देश का बचपन इतना कठोर और मजबूत होता हो। इतनी दूर चलने के बाद ये न तो मरते हैं न तो थकते हैं। बज्र से कठोर तन वाले इस देश के नौनिहालों को हृदय से प्रणाम करने का मन करता है।
मिड-डे मिल से कुछ हो या न हो, दो बातें तो जरूर हुई हैं। एक, मास्टरसाब की जिम्मेदारी बढ़ गई। मास्टसाब पढ़ाएंगे और खिलाएंगे! दूसरे, स्कूल की उपयोगिता में श्रीवृद्वि हो गई। स्कूल में ज्ञान ही नहीं अन्न भी बंटेगा! दो बातें और भी हुई हैं। स्कूल में पढ़ाई नहीं हुई तो, खाना तो मिलेगा, सयानों को इस बात का संतोष है। अनाड़ियों को इस बात का संतोष है कि अब पढ़ाई के साथ-साथ खाना भी मिलेगा।
बच्चे जब से स्कूल आए हैं, बस उन्हें एक ही बात की प्रतीक्षा है। खाने की अपनी बारी आने की। खाना उनके लिए ज्यादा मायने रखता है। उनकेे बाप के लिए भी पढ़ाई बहुत मायने नहीं रखती जितनी की भूख। हांलाकि वे यह नहीं जानते कि पढ़ाई न करने के चलते ही उन्हें भूख की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। मगर वे मजबूर कर भी क्या सकते हैं, जब वे पैदा हुए, तो उनके बाप के सामने भी भूख ही सबसे आसन्न और सबसे विकट समस्या थी। एक जमाने से वंश की यह पंरपरा चली आ रही है। उसी की ताजी कड़ी ये बच्चे हैं, जो इस वक्त मिड-डे मील के चक्कर में नीचे बैठे हुए सुस्वादु भोजन की कल्पना में लार टपका रहे हैं।
भूखे पेट न होत भजन गोपाला, बहुत कहा जाता है। जबकि व्यवहारिक अनुभव यह कहता है कि भूखे पेट पढ़ाई भी नहीं होती। भूखा पेट या तो मिन्नतें करवाता है या तो अपराध के मार्ग की ओर प्रवत्त करता है। ऐसा मानने में कोई हर्ज नहीं कि मिड-डे मील को लेने के बाद बच्चों का पढ़ाई में भी मन लगेगा। मगर हमारे यहां के नौनिहालों का भाग्य इतना चमकदार कहां! चूंकि मिड डे मील योजना स्कूलों में चल रही है, तो वहां के वातावरण का प्रभाव डे के मील पर पड़ना स्वभाविक है। यह तो सांइस भी मानता है। क्यों मास्साब! शिक्षा की गुणवत्ता की तरह से ही मीड डे मील की गुणवत्ता(?) भी आज बहस का एक नया विषय बन कर उभरा है। इस देश का बुद्धिजीवी कभी खाली नहीं बैठेगा ! प्रधान जी, प्रधानाचार्य महोदय, मास्टर साहब सारे भ्रष्टाचार के पाठ का स्कूल में अनुश्रवण कर रहे हंै। और उसी स्कूल में बच्चों से पूछे गए नैतिक शास्त्र विषय के प्रश्न का उत्तर न देने पर बच्चों को मुर्गा बनाया जा रहा है। अहा! कैसा मनमोहक दृश्य बन पड़ा है। मुर्गें बने बच्चे दलिया की प्रतीक्षा में!
यह तो सर्वविदित है कि हमारे बच्चों में पोषण की भारी कमी है। प्रोटीन की कमी से होने वाले रोग भी प्रायः देखने को मिलते हैं। यह देखना संतोषप्रद है कि इस बाबत भविष्य के निर्माता भविष्य के प्रति गंभीर दिख रहे हैं। इसलिए अक्सर मिड-डे मील के बीच में मेंढ़क या छिपकली मिले होने की खबर आती है। घासफूस खाने से प्रोटीन कहां मिलता। जानवर प्रोटीन के रिच सोर्स होते हंै। कई बार तो मिड-डे मील में प्रोटीन की इतनी ज्यादा मात्रा हो गई है कि जिसके सेवन से हमारे नौनिहाल बीमार तक पड़ गए हैं, लेकिन मजाल है उसके बाद भी मिड-डे बनाने वालों ने अपने इस कर्तव्य के प्रति अधिक दिनों तक कोताही बरती हो! जिसकी तस्दीक भी गाहे-बगाहे अखबारों में छपने वाले समाचार कर ही देतेे हैं।
इतना ही नहीं, ऐसा लगता है कि मिड-डे मील से मिलती पोषकता के चलते अपरिपक्व नन्हें-मुन्हें बड़ी तेजी से परिपक्व हो रहे हैं। उनकी परिपक्वता का प्रमाण कई जगह देखने-सुनने को मिल रहा कि बच्चे मिड-डे मील खाने से ही मना कर दे रहे हैं। कारण? डे का मील बनाने वाले रसोइए दलित हैं! बच्चे खाने से मना कर रहे हैं! ताज्जुब है! इस देश की कैसी तस्वीर बन रही है! जिस देश का नेता कभी खाने से मना नहीं करता, उस देश के भूखे बच्चे खाना खाने से मना कर रहे हैं। ऐसे विरोधों से एक बात स्पष्ट है कि हमारे मास्साब बच्चों को क्या पढ़ा रहे हैं! बेचारे मास्साहब को ही क्यों दोष दिया जाए। दोषी तो नौनिहालों के मां-बाप हैं। मां-बाप को भी दोष क्यों दिया जाए! दोष है इस तथाकथित आधुनिक समाज का। सामाजिक अध्ययन का पाठ नौनिहाल के इस वय अवस्था में कराना प्रगतिशील समाज की अतिशीध्रता और उन्हें आधुनिक बनाने की अधीरता ही कहलाएगी। प्रगतिशील समाज धैर्य रखे, स्कूल से निकलने के बाद ये नौनिहाल उनके समाज में ही पांव जमाएंगे, तब वे अपने खूब अरमान निकाल सकते हैं। आधुनिक इतिहास का विषय भी इनके हक में जाता दिखता है। उसका उद्धहरण लेते हुए यह कहा जा सकता है कि इन्हें नन्हें-मुन्नों को समाजिक विज्ञान पढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं है। वयस्क होने पर ये समाजिक विज्ञान का व्यवहारिक सबक अच्छे से सीख लेंगे। कुछ तो आप लोगों की चेष्टा से, कुछ आपकी छत्रछाया में रहकर, कुछ आपकी प्रेरणा से, कुछ आपके उदाहरण से, कुछ आपकी धमकियों से, कुछ आप से डर कर। आपको तो इनके स्कूल से निकलने की प्रतिक्षा करनी है बस।
बहरहाल, मिड-डे मील! क्या खूब! नाम सोचने वाले ने क्या नाम सोचा है! मन करता है कि ऐसा नाम सोचने वाले का मूंह चूम लिया जाए। यहां के मौजूदा देसी माहौल में पूरी तरह से सूट करता है योजना का यह अंग्रेजी नाम। भारतीय संदर्भ में मिड-डे मील का कितना गहरा अर्थ है। एक मील का मतलब खाना। एक दूसरे मील का मतलब दूरी के मात्रक से है। मिड का एक मतलब बीच से है, तो दूसरा मतलब अधर से है। डे का एक मतलब दिन से है तो दूसरा प्रहर या साइत से है। भारतीय संदर्भ में जैसा कि योजनाओं के साथ होता रहा है, वैसे ही मिड-डे मील योजना के साथ भी हो रहा है। यह योजना अपने नाम के अनुकूल ही चल रही है। स्कूल की ओर नंगे पांव चलने वाले नौनिहाल के मन में यह सवाल चला करता है, मीलों चलने के बाद आज दिन के प्रहर भूख से कुलबुलाते उदर को उसका मील यानी खाना मिलेगा, कि खाने की मात्र खानापूर्ति की जाएगी? इस देश का नौनिहाल इस दुविधा के साथ स्कूल आ रहा है और इसी दुविधा के साथ स्कूल से जा भी रहा है। क्योंकि जिनके पास अपने बस्ते तक नहीं है, वे इतने अबोध नहीं, वे जानते है कि जिम्मेदारों के पास ठंडे बस्ते होते हैं! नन्ही सी जान कैसी दुविधा में फंसी! देख रहे हैं न, डीएम सर, ग्राम प्रधान जी, प्रधानाचार्य महोदय, मास्साब!
अनूप मणि त्रिपाठी

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