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अर्थात- यथार्थ

दर्शन देते देवता

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अनूप मणि त्रिपाठी

हर्षित, मुदित नाच रही है देह, थिरक, फुदक रहा मन। वाणी गई कहीं खो, नैन गये फैल, पलकें हुईं र्निनिमेष। कैसे… कैसे बखान करें देवता के रूप का ! कैसे बखान करे उसकी लीलाओं का! सुधबुध खो गई है हमारी। कैसे आज देवता ने ली हम जैसों की सुध! कैसे देवता प्रकट हुए आज हमारे दर! न कोई यज्ञ। न कोई तप। न कोई अनुष्ठान। न कोई आह्नवान। न कोई करूण क्रंदन। न कोई याचना। न कोई विनती। फिर कैसे देवता हुए प्रकट! देकर अपना दर्शन कर रहे हैं हमें कृतार्थ। यह कैसी अनभूती ! यह कैसा दृश्य! ओहो! हमारे घर की चौखट पर अपादमस्तक दर्शन दे रहे भगवन। दर्शन लाभ हमें हो रहा, परन्तु सिर देवता का झुका। देवता का यह कैसा चमत्कार !

मात्र दर्शन ही नहीं, बहुत कुछ दे रहे हैं देवता। दर्शन के साथ मुस्कुराहट, मुस्कुराहट के साथ अपनी उर की गर्माहट, उर की गर्माहट के साथ अपने करकमल की कोमल छुवन, करकमलों की कोमल छुवन के अतिरिक्त करकमलों का हार, करकमलों का हार ही नहीं अपने वचनों की लंबी माला, वचनों की लंबी माला ही नहीं, हमारे सभी कष्ट हरने का ठोस आश्वासन। वाकई बहुत कुछ दे रहे हैं। वे दे कहां रहे, वे तो लुटा रहे हैं। इतना कुछ लुटाने के बाद भी और बहुत कुछ लुटाने की चाह रखते हैं। वे बहुत कुछ लुटाने के बाद भी कितने धनवान दिख रहे हैं। इतना कुछ देने के बाद भी वे याचक लग रहे हैं। देवता का यह कैसा रूप!

क्या दिव्य रूप है देवता का! दिव्य रूप आप है कि दिव्य रूप धरे हैं ! जो भी हो देवता देवता जैसे ही लग रहे हैं। उन्होंने धवल वस्त्र ऐसे धारण किए हुए हैं जिसकी धवलता के सामने बगुले के परों के रंग भी फीके लगे। बगुला यदि यह धवलता देख ले, किंचित हीन भावना का शिकार हो जाए। वात्सल्य का भाव उनकी आंखों में छप छप छप तैर रहा है। उनके श्रीमुख से टप टप टप शहद टपक रहा है। उनका सिर सर सर सर गेंहू की बालियों की तरह लहरा रहा है। उनके चरण रज फर्र फर्र फर्र उड़ कर बादल बन रहे हैं। यह हमारी नजरों का धोखा है या देवता का कोई नया अवतार!

आज ऐसा लग रहा है कि वह केवल एक को नहीं, सबको वर देने के मूड में है। और केवल एक वर ही क्यों! वे थोक में वर देने के मूड हैं। आज, आज वे किसी को निराश नहीं कर रहे। हाथ मिलाओे तो हाथ मिलाएगे। गले लगाओ तो गले लगेगे। सिर झुकाओ तो नत हो जाएगें। पैर छुओ तो आशीर्वाद देगे। भेंट करोगे तो भेंट देगे। जो मांगो वो मिलेगा। ओहो, कितना विशाल नरम ह्नदय लेकर प्रकट हुए हैं देवता । 

दर्शन दुलर्भ थे जिनके, आज वे बहुत आराम से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। वे सामने ही हमारे। बिल्कुल सामने। इतने निकट कि हम उन्हें छू सकते हैं। इतने सटे कि हम उन्हें महसूस कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि उनका यहां से जाने का मन नहीं हैं। उनकी देह भाषा कहती है कि वे हमारी बस्ती में ही अपना आसन जमा देंगे! परंतु देवता गंदगी में कहां रहते हैं! वे जहां से आए हैं, वहीं चले जाएंगे। किसी निरापद जगह पर । देवता का काम भी यही है कि दर्शन दे और चला जाए। पंरतु आज वे बहुत देर से हमारी गंदी बस्ती में जमे हुए हैं। कितने धैर्यवान हैं देवता!

आज जो साक्षात दर्शन दे रहे हैं, कल तक उन्हीं के दर्शन हेतु हमें तप करना पड़ता था। एक झलक के लिए दौड़-दौड़ कर दधीची की भांति अपनी हड्डियों को गलाना पड़ता था। यहां तक कि हमारी आशाएं वास्तविकता की अग्नि में स्वाहा हो कर धूम में बदल जाती थीं, तब भी वे हमारे सामने प्रकट नहीं होते थे। हम चाहते थे कि वे हम पर ध्यान दें, परन्तु वे अंतर्ध्यान रहते थे । इतनी जल्दी दर्शन देते तो देते कैसे, क्योंकि वे देवता थे। और देवता इतनी आसानी से प्रसन्न कहां होते हैं। वे तो कठोर से कठोर तप की चाह रखते हैं। पंरतु कालचक्र कैसे उल्टा घूमा कि देवता यकायक प्रकट होकर अपने दुर्लभ दर्शन को सरल-सुलभ कर दिया। यह भी देवता की कोई लीला होगी!

कहां हम मात्र देवता की कामना करते थे, पंरतु आज मात्र देवता ही नहीं प्रकट हुए, साथ उनके प्रकट हुई है यक्ष, गंधर्व की टोली भी। देवता अकेले नहीं आए हैं। क्या बहुत अधिक प्रतीक्षा कराने की परीक्षा का यह अतिरिक्त फल है! क्या उनके मन में कहीं किसी प्रकार का कोई खटका है! क्या उन्हें अपने भक्तों की नीयत में खोट दिखा है! क्या वे किसी असुरक्षा भाव से घिरे हुए हैं? क्या उन्हें अपने पुजारियों की निष्ठा डगमगाती हुई दिखी! नहीं… नहीं… देवता को किसका डर? देवता को कैसा डर? पुजारी पूजा न करे तो काहे का देवता! भक्त अगर सुमिरन न करे तो देवता का कैसा प्रताप! कैसी उसकी सत्ता!

आज देवता स्वयं मझधार में हैं। देवता का देवत्व आज चुनाव की धार में है, उन्हें डर है कहीं उनका देवत्व इस धार में बह न जाए। हर पांच साल बाद ऐसी घड़ी आती है, जब देवता बिन बुलाए ही प्रकट होते हैं। देवता जानता है कि लोकतंत्र के मंदिर में अगर उसे पुनः शोभायमान होना है, तो उसे चुनाव का चक्रव्यूह भेदना होगा। देवता जानता है कि इसके लिए उसके कवच-कुंडल प्रर्याप्त नहीं। यह चक्रव्यूह तो भिदेगा वोटरूपी तीरों से। और वे तीर रखे हैं हम जैसे वंचितों के कुटिया में । वे एक-एक कुटिया खंगालने निकले हैं, इसलिए देवता दर्शन देने के लिए श्रम कर रहे हैं। देवता स्वयं दया का पात्र दिख रहा है। सुविधाभोगी देवता आज श्रमजीवी बन गया है। हाय!

कहीं देवताओं के दर्शन सुलभ हो रहे हैं, या यूं कहें कि वे मनुष्यता ग्रहण करने लगे हैं, वहीं कहीं कोई मनुष्यता छोड़कर देवत्व पाने की ओर अग्रसर होना चाह रहा है। लोकतंत्र में चुनाव की बेला भी क्या बेला है!http://www.satyodaya.com

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अर्थात- यथार्थ

रुपया तुम कितना भी गिरो !

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‘रुपया गिरा’ ‘रुपया गिरा’ रुपया गिर कैसे सकता है! चलते-चलते किसी का तो गिर सकता है, मगर खुद ही कैसे गिर सकता है। कहावत है कि फलां के नाम का सिक्का चलना। जब सिक्का चलता है, तो वह चलते-चलते कभी-कभार गिर भी सकता है। मगर रुपये को क्या होता है कि जब देखो तब वह गिर जाता है! उसे कोई धक्का देता है या कोई लंगड़ी मार देता है! बैठे-ठाढ़े रुपये का गिरना समझ से परे है।
रुपये के गिरने की खबर खूब सुनने को मिलती है, जबकि सिक्के के गिरने की नहीं। बड़ी धांधली है साहब! मेरा निजी अनुभव है कि सड़क पर मैंने सिक्के गिरे हुए ज्यादा देखे हैं। गोल-गोल चिकने-चिकने सिक्कों के गिरने के चांस भी बहुत होते हैं। मगर रुपया गिरा-रुपया गिरा का शोर ही सुनाई देता है, जिसके गिरने पर तनिक आवाज भी न होगी। ‘सिक्का गिरा’ की खबर सुनने को तो कान तरस गए हैं। हां, यह जरूर है कि बाजार से फलां-फलां मूल्य के सिक्कों के गायब होने की खबर गाहे-बगाहे आ जाती है, मगर मेरी याददाश्त में मैंने कभी नहीं सुना कि सिक्का गिरा।
कभी-कभी पढ़ने-सुनने को मिलता है- रुपया टूटा। अब बताइए कागज का रुपया टूट कैसे सकता है। वह फट तो सकता है, मगर टूट नहीं सकता है। मगर गैरजिम्मेदार लोगों का क्या है, कुछ भी लिख देंगे, कुछ भी बोल देंगेे। चलो माना, रुपया गिर गया, तो गिर कर जाता कहां है। जहां गिर गया है, वहीं से उठा लो न। समस्या क्या है। इतना शोर क्यों मचाते हो भई? अपन को समझ नहीं आता कि रुपया गिरता कैसे है!
अभी मैं इससे ज्यादा कुछ और सोचता-विचारता कि मेरे सामने रुपया आकर खड़ा हो गया। फिर बातों का क्रम कुछ इस तरह चला-

‘क्या तुम रुपया हो?’
‘हां’
‘कुछ लिबलिबे से लग रहे हो!’
‘लिबलिबे!’
‘मतलब, तुम्हारे अंदर की कड़क गायब है।’
‘मत पूछो, आजकल अपनी हालत पतली है।’
‘तुम जनता तो हो नहीं!’
‘जानता हूं…’
‘मगर यहां कैसे!’
‘बस आ गया…’
‘बताओ, मैं क्या कर सकता हूं तुम्हारे लिए!’
‘मैं लगातार गिर रहा हूं…’
‘तुम तो खड़े हो!मेरे सामने!’
‘बेवकूफ! कहने का मतलब मेरे मूल्य में गिरावट हो रही है…’
‘तुम्हारा तो अभी भी बहुत मूल्य है,घबराते क्यों हो?’
‘इसी तरह से गिरता रहा तो मैं रसातल में पहुंच जाऊंगा!’
‘चिंता न करो,सब ठीक हो जाएगा।’
‘तुम ऐसा कैसे कह सकते हो?’
‘यहां ऐसा ही कहा जाता है। बड़ी से बड़ी मुसीबतों से पार पाने का यह हम आम भारतीयों का सूत्रवाक्य है।’
‘हूं..मैं ऐसे ही गिरता रहा तो मुझे कौन पूछेगा!’
‘नहीं, ऐसी बात नहीं है। सब पूछेंगे।’
‘मैं अब और गिरना नहीं चाहता।’
‘देखते नहीं, वित्तमंत्री, प्रधानमंत्री, अर्थशास्त्री सब मिलककर तुम्हें उठाने का प्रयास कर रहे हैं!’
‘मगर फायदा क्या! मैं तो गिर रहा हूं।’
‘तब से देख रहा हूं कि जब से तुम आए हो अपने बारे में बात कर रहे होे!’
‘नहीं पूरी तरह से नहीं, मैं तुम सब के बारे में भी सोच रहा हूं…’
‘वो कैसे!’
‘मेरे गिरने से महंगाई बढे़गी।’
‘मंहगाई तो वैसे भी बढ़ रही है।’
‘मेरे गिरने से और बढे़गी और उसका असर तुम जैसों पर ही पडे़गा।’
‘कमाल है! यहां कुछ भी हो उसका असर आम आदमी पर ही पड़ता है। यहां तक नेता जी को नजला हो, तो वो भी जनता पर ही उतरता है।’
‘कुछ करो, वरना मंहगाई तुम सब को जीने नहीं देगी।’
‘वैसे ही कौन सा जीने दे रही है सरकार।’
‘क्या कहा!’
‘खैर छोड़ो!’
‘मै यूं ही गिरता तो ‘बाप बड़ा न भईया,सबसे बड़ा रुपया/ माना मैं खुदा नहीं मगर खुदा की कसम खुदा से कम भी नहीं…वाले दिन कहीं लद न जाए!’
‘अब आए न असल मुद्दे पर।’
‘बोलो न,मेरा क्या होगा!’
‘अरे, तुम चिंता मत करो। तुम्हारा मूल्य कितना भी कम हो जाए, मगर तुम्हारेे भाव का सेंसेक्स सदा ऊपर ही रहेगा। तथास्तु!’
‘खीसे मत निपोरो! लेखक हो न, बातें बनाना खूब जानते हो!’
‘क्यों लेखक को ही बदनाम करते हो! पार्टी प्रवक्ता, रिस्पेसनिस्ट, कस्टमर केयर, सेल्समैन के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है! बकवास करता है…’
‘नाराज मत हो, मेरी दशा पर तो तरस खाओ!’
‘बहुत हुआ! मेरा सिर न खाओ। मुझे लिखना है अब यहां से जाओ!’
‘अच्छा, मेरे बारे में ही लिखो।’
तुम्हारे बारे में तो बहुत कुछ लिखा जा चुका है, लिखा जा रहा है। ऐसे में मैं भला क्या लिखूंगा, अगर लिखूंगा भी तो नया क्या लिखूंगा!’
‘तुम नया यह लिखो कि अगर रुपया ऐसे ही गिरता रहा तो उसे कोई नहीं पूछेगा।’
‘मैं झूठ नहीं लिखता।’
‘इसमें झूठ क्या है? ठीक तो कह रहा हूं। मेरा मूल्य डाॅलर के मुकाबले गिरता रहेगा, तो मुझे कौन पूछेगा!’
‘इसमे तुम्हारा कोई दोष नहीं है। तुमने अर्थशास्त्र ही पढ़ा है, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र नहीं।’
‘क्या मतलब!’
‘मतलब यह कि तुम जितना भी गिर जाओ, तुम्हारे पीछे आदमी गिरना नहीं छोडे़गा, मेरे बाप!’ ‘तुम्हारे पास सिर्फ लच्छेदार बातें हैं, समाधान नहीं।’

यह कहते हुए रुपया तुनक कर जाने लगा। यह क्या! वह मेरे सामने ही मेरे घर से जा रहा था। घर आए रुपये को ऐसे-कैसे जाने देता! मैंने लपकर उसे अपने हाथों में जकड़ लिया। जैसे लपक कर हम सड़क पर गिरे हुए रुपये को उठाते हैं। उसी तेजी के साथ। वह ‘छोड़ो!’ ‘छोड़ो!’ चिल्लाने लगा। बिना मेहनत के आए हुए रुपये को मैं हस्तगत करने का अभयस्त नहीं था, सो घबराहट में पकड़ ढीली हो गई और रुपया मेरे हाथों से आजाद हो गया। आजाद होते ही, वह तेजी से बाजार की ओर लपका। जाते-जाते बोला, ‘मैं तो अपने गिरने कोे लेकर व्यर्थ ही चिंतित हो रहा था…तुमने ठीक ही कहा था कलमघीसू!’’

अनूप मणि त्रिपाठी

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अर्थात- यथार्थ

कितने मील मिड-डे मील

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आओ नौनिहालो आओ! बैठो धरा पर! टाटपट्टी पर! स्वागत है तुम्हारा। बच्चों, मालूम है कि तुम सब यहां क्यों आए हो। यह बात आइने की तरह साफ है। इस वक्त तुम सब मिड-डे मील के लिए मीलों चल कर यहां पहुंचे हो। देखो भगवन् देखो! मिड-डे मील के चक्कर में हमारे देश का भूखा भविष्य मीलों चलता है। भूखा होने के बाद भी मीलों चल लेता है। शायद ही किसी देश का बचपन इतना कठोर और मजबूत होता हो। इतनी दूर चलने के बाद ये न तो मरते हैं न तो थकते हैं। बज्र से कठोर तन वाले इस देश के नौनिहालों को हृदय से प्रणाम करने का मन करता है।
मिड-डे मिल से कुछ हो या न हो, दो बातें तो जरूर हुई हैं। एक, मास्टरसाब की जिम्मेदारी बढ़ गई। मास्टसाब पढ़ाएंगे और खिलाएंगे! दूसरे, स्कूल की उपयोगिता में श्रीवृद्वि हो गई। स्कूल में ज्ञान ही नहीं अन्न भी बंटेगा! दो बातें और भी हुई हैं। स्कूल में पढ़ाई नहीं हुई तो, खाना तो मिलेगा, सयानों को इस बात का संतोष है। अनाड़ियों को इस बात का संतोष है कि अब पढ़ाई के साथ-साथ खाना भी मिलेगा।
बच्चे जब से स्कूल आए हैं, बस उन्हें एक ही बात की प्रतीक्षा है। खाने की अपनी बारी आने की। खाना उनके लिए ज्यादा मायने रखता है। उनकेे बाप के लिए भी पढ़ाई बहुत मायने नहीं रखती जितनी की भूख। हांलाकि वे यह नहीं जानते कि पढ़ाई न करने के चलते ही उन्हें भूख की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। मगर वे मजबूर कर भी क्या सकते हैं, जब वे पैदा हुए, तो उनके बाप के सामने भी भूख ही सबसे आसन्न और सबसे विकट समस्या थी। एक जमाने से वंश की यह पंरपरा चली आ रही है। उसी की ताजी कड़ी ये बच्चे हैं, जो इस वक्त मिड-डे मील के चक्कर में नीचे बैठे हुए सुस्वादु भोजन की कल्पना में लार टपका रहे हैं।
भूखे पेट न होत भजन गोपाला, बहुत कहा जाता है। जबकि व्यवहारिक अनुभव यह कहता है कि भूखे पेट पढ़ाई भी नहीं होती। भूखा पेट या तो मिन्नतें करवाता है या तो अपराध के मार्ग की ओर प्रवत्त करता है। ऐसा मानने में कोई हर्ज नहीं कि मिड-डे मील को लेने के बाद बच्चों का पढ़ाई में भी मन लगेगा। मगर हमारे यहां के नौनिहालों का भाग्य इतना चमकदार कहां! चूंकि मिड डे मील योजना स्कूलों में चल रही है, तो वहां के वातावरण का प्रभाव डे के मील पर पड़ना स्वभाविक है। यह तो सांइस भी मानता है। क्यों मास्साब! शिक्षा की गुणवत्ता की तरह से ही मीड डे मील की गुणवत्ता(?) भी आज बहस का एक नया विषय बन कर उभरा है। इस देश का बुद्धिजीवी कभी खाली नहीं बैठेगा ! प्रधान जी, प्रधानाचार्य महोदय, मास्टर साहब सारे भ्रष्टाचार के पाठ का स्कूल में अनुश्रवण कर रहे हंै। और उसी स्कूल में बच्चों से पूछे गए नैतिक शास्त्र विषय के प्रश्न का उत्तर न देने पर बच्चों को मुर्गा बनाया जा रहा है। अहा! कैसा मनमोहक दृश्य बन पड़ा है। मुर्गें बने बच्चे दलिया की प्रतीक्षा में!
यह तो सर्वविदित है कि हमारे बच्चों में पोषण की भारी कमी है। प्रोटीन की कमी से होने वाले रोग भी प्रायः देखने को मिलते हैं। यह देखना संतोषप्रद है कि इस बाबत भविष्य के निर्माता भविष्य के प्रति गंभीर दिख रहे हैं। इसलिए अक्सर मिड-डे मील के बीच में मेंढ़क या छिपकली मिले होने की खबर आती है। घासफूस खाने से प्रोटीन कहां मिलता। जानवर प्रोटीन के रिच सोर्स होते हंै। कई बार तो मिड-डे मील में प्रोटीन की इतनी ज्यादा मात्रा हो गई है कि जिसके सेवन से हमारे नौनिहाल बीमार तक पड़ गए हैं, लेकिन मजाल है उसके बाद भी मिड-डे बनाने वालों ने अपने इस कर्तव्य के प्रति अधिक दिनों तक कोताही बरती हो! जिसकी तस्दीक भी गाहे-बगाहे अखबारों में छपने वाले समाचार कर ही देतेे हैं।
इतना ही नहीं, ऐसा लगता है कि मिड-डे मील से मिलती पोषकता के चलते अपरिपक्व नन्हें-मुन्हें बड़ी तेजी से परिपक्व हो रहे हैं। उनकी परिपक्वता का प्रमाण कई जगह देखने-सुनने को मिल रहा कि बच्चे मिड-डे मील खाने से ही मना कर दे रहे हैं। कारण? डे का मील बनाने वाले रसोइए दलित हैं! बच्चे खाने से मना कर रहे हैं! ताज्जुब है! इस देश की कैसी तस्वीर बन रही है! जिस देश का नेता कभी खाने से मना नहीं करता, उस देश के भूखे बच्चे खाना खाने से मना कर रहे हैं। ऐसे विरोधों से एक बात स्पष्ट है कि हमारे मास्साब बच्चों को क्या पढ़ा रहे हैं! बेचारे मास्साहब को ही क्यों दोष दिया जाए। दोषी तो नौनिहालों के मां-बाप हैं। मां-बाप को भी दोष क्यों दिया जाए! दोष है इस तथाकथित आधुनिक समाज का। सामाजिक अध्ययन का पाठ नौनिहाल के इस वय अवस्था में कराना प्रगतिशील समाज की अतिशीध्रता और उन्हें आधुनिक बनाने की अधीरता ही कहलाएगी। प्रगतिशील समाज धैर्य रखे, स्कूल से निकलने के बाद ये नौनिहाल उनके समाज में ही पांव जमाएंगे, तब वे अपने खूब अरमान निकाल सकते हैं। आधुनिक इतिहास का विषय भी इनके हक में जाता दिखता है। उसका उद्धहरण लेते हुए यह कहा जा सकता है कि इन्हें नन्हें-मुन्नों को समाजिक विज्ञान पढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं है। वयस्क होने पर ये समाजिक विज्ञान का व्यवहारिक सबक अच्छे से सीख लेंगे। कुछ तो आप लोगों की चेष्टा से, कुछ आपकी छत्रछाया में रहकर, कुछ आपकी प्रेरणा से, कुछ आपके उदाहरण से, कुछ आपकी धमकियों से, कुछ आप से डर कर। आपको तो इनके स्कूल से निकलने की प्रतिक्षा करनी है बस।
बहरहाल, मिड-डे मील! क्या खूब! नाम सोचने वाले ने क्या नाम सोचा है! मन करता है कि ऐसा नाम सोचने वाले का मूंह चूम लिया जाए। यहां के मौजूदा देसी माहौल में पूरी तरह से सूट करता है योजना का यह अंग्रेजी नाम। भारतीय संदर्भ में मिड-डे मील का कितना गहरा अर्थ है। एक मील का मतलब खाना। एक दूसरे मील का मतलब दूरी के मात्रक से है। मिड का एक मतलब बीच से है, तो दूसरा मतलब अधर से है। डे का एक मतलब दिन से है तो दूसरा प्रहर या साइत से है। भारतीय संदर्भ में जैसा कि योजनाओं के साथ होता रहा है, वैसे ही मिड-डे मील योजना के साथ भी हो रहा है। यह योजना अपने नाम के अनुकूल ही चल रही है। स्कूल की ओर नंगे पांव चलने वाले नौनिहाल के मन में यह सवाल चला करता है, मीलों चलने के बाद आज दिन के प्रहर भूख से कुलबुलाते उदर को उसका मील यानी खाना मिलेगा, कि खाने की मात्र खानापूर्ति की जाएगी? इस देश का नौनिहाल इस दुविधा के साथ स्कूल आ रहा है और इसी दुविधा के साथ स्कूल से जा भी रहा है। क्योंकि जिनके पास अपने बस्ते तक नहीं है, वे इतने अबोध नहीं, वे जानते है कि जिम्मेदारों के पास ठंडे बस्ते होते हैं! नन्ही सी जान कैसी दुविधा में फंसी! देख रहे हैं न, डीएम सर, ग्राम प्रधान जी, प्रधानाचार्य महोदय, मास्साब!
अनूप मणि त्रिपाठी

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अर्थात- यथार्थ

यह कैसी हरकत है सरकार!

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अनूप मणि त्रिपाठी

एक खबर- सरकार हरकत में आई।

 हरकत… शब्द बहुत दिलचस्प है। जब यह सरकार के साथ जुड़ता है, तो दूसरा अर्थ होता है और जब आम आदमी के साथ जुड़ता है, तो दूसरा। भला यह कैसी हरकत! बचपन में जब कभी हम हरकत करते थे मास्साब की छड़ी बोलती थी। हरकत करने से पहले कान गरम होने का खटका लगा रहा था। वो अलग बात है कि बिना हरकत किए हुए हम तभी न मानते थे। मगर यहां क्या हो रहा है! अभी तो सरकार विधिवतरूप से हरकत कर भी नहीं रही है, अभी तो हरकत में बस आई है कि पहले पेज की खबर बन गई। उसके हरकत में आने का स्वागत हो रहा है। खबर सुनकर एकबारगी ऐसा लगता है जैसे सरकार आइसीयू में भर्ती हो, उसके बदन में हरकत हुई हो। लोग खुश। देखो! देखो! हरकत कर रही है! नहीं, नहीं, अभी मरी नहीं, अभी जिंदा है हमारी सरकार। आपकी चुनी हुई सरकार!

सरकार हरकत में आई! जाहिर सी बात है, सरकार निष्क्रिय थी। अगर सरकार सोई हुई होती, तो कहा जाता सरकार जागी। मगर प्रायः यह बोला-सुना जाता है कि सरकार हरकत में आई। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार सब देखती-समझती है, मगर हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है। ठीक महाभारत के भीष्म की तरह। दौपद्री का वसन जब उतारा जा रहा था, वह चुपचाप बैठे हुए थे। ऐसा कुछ सरकार के साथ होता है। भीष्म तो अपनी प्रतिज्ञा से बंधे हुए थे, मगर सरकार के हाथ-पांव कौन बांधे रहता है कि हरकत ही नहीं करती। हरकत से पहले किस बात का इंतजार करती है वह। वास्तव में सरकार कुछ न करके तभी हरकत ही कर रही होती है। वह सरकार जो है।

प्रायः सरकार के ऊपर यह आरोप लगता है कि सही समय पर हरकत में नहीं आती है। मगर ऐसा नहीं है। सरकार प्रायः हरकत में आने की सोचती रहती है। सरकार सोचती रहती है कि हरकत की जाए कि नहीं। जैसे हनुमान जी को याद दिलाना पड़ता था कि उनके अंदर अपार शक्ति है, उसी तरह से सरकार को याद दिलाना पड़ता है कि वह सरकार है। उसकी कुछ जिम्मेदारी है। सरकार बनने के बाद जिम्मेदारियां भी बनती हैं! पॉवर में आने के बाद तो पॉवर आ ही जाता है। इत्ती सी बात याद दिलाने के लिए बस जलाना, ट्रेन रोकना, भारत बंद जैसे पावन कार्य निष्पादित करने पड़ते हैं। तब सरकार हरकत में आते हुए अपने मातहतों से मशवरा करती है, क्यों भई हरकत में आया जाए कि नहीं! कोई हरकत की जाए कि नहीं! क्या कहते हो! तब मातहत जबाव देते हैं, लेट्स वेट एंड सी। अभी देखते हैं और प्रतिक्षा करते हैं। अभी राजनीतिक रूप से नफा-नुकसान का आंकलन कर लेने दीजिए। वैसे भी अभी कौन सी जल्दी है, माना स्थिति तनावपूर्ण है, मगर है तो नियंत्रण में।

इतने दिनों में सरकार की एक पुख्ता पहचान बन गई है। वो क्या? वह यह कि वो लगातार हरकत करने में असमर्थ रहती है। उल्टे चौबीसों घंटें अपने बदन में हरारत की शिकायत रहती है उसे। तब सरकार हरकत में कब आती है!  किसान मर जाते हैं। मजदूर का पूरा परिवार आत्महत्या कर लेता है। बस्तियां जला दी जाती है। तभी नहीं! तब सरकार हरकत में कब आती है! शायद जब,वोटबैंक में से उसे अपना खाता बंद होने की आंशका घेरती है। तब। निश्चित रूप से फिर भी कुछ कह नहीं सकते। फिर भी मोटेतौर पर यह कहा जा सकता है कि सरकार ‘का वर्षा जब कृषि सुखानी’ जैसी स्थिती में हरकत में आती है। फिर हरकत में आने का क्या लाभ! वो कहावत तो आप ने सुनी ही होगी न सरकार-देर आए दुरस्त आए। शायद इसलिए सरकार बिगड़े कार्यों को दुरस्त करने के लिए देर से हरकत में आती हो!

लोग कहते हैं कि सरकार तुरत-फुरत हरकत में क्यों नहीं आती! देखा जाए तो इसमें सरकार को कोई दोष नहीं। वह करे भी तो क्या करे। अब इतनी बड़ी सरकार। उसके इतने हाथ तो इतने पैर। इनको हिलाने-डुलाने में काफी ऊर्जा खर्च करनी पड़ती होगी, लिहाजा समय भी लगता होगा इसलिए सरकार लेटी रहती है। बर्फ की सिल्ली की तरह। ठंडी। भावविहीन। सरकार बहुत ठस्स चीज होती है। भारी भरकम। कितने तो पुर्ज उसके, कितने तो जोड़ उसके। वह एकदम से हरकत में आ भी जाए तो कैसे। सरकार की मजबूरी है। कुछ तो मजबूरी है, कुछ उसकी रूढ़ हो चुकी छवि का भी सवाल है। बात-बात पर हरकत में आ जाएगी, जरूरत के वक्त हरकत में आ जाएगी, तो उसे सरकार कहेगा कौन! आखिर उसे अपना इकबाल भी तो बुलंद रखना है।

अब यह हरकत देखिए! सरकार के चलते रहने को हरकत नहीं माना जाता। न ही तो सरकार के गिरने ही को। जबकि ये दोनों भी क्रियाएं हैं। इसे हरकत न मानिए, जैसी आपकी मर्जी। मानिए, सरकार किसी भी तरह से हरकत में आ गई तो! तो अब हरकत के बाद क्या होगा! उसकी हरकत कैसी होगी! पहले पहल तो विपक्ष के ऊपर ठीकरा फोड़ती है। जब इस हरकत से बात नहीं बनती तो सरकार और हरकत करती है और उसके बदन से आयोग, बयान, जांच कमीशन! पैकेज! झड़ते हैं। फिर सरकार शांत, ठस्स, क्रियाविहीन, लगभग मरणासन्न हो जाती है। तब तक, जब तक कोई होनी अनहोनी में, घटना दुर्घटना में, खबर त्रासदी में न बदल जाए!http://www.satyodaya.com

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