Connect with us

अर्थात- यथार्थ

पेश है चुनावी मौसम का हाल

Published

on

-अनूप मणि त्रिपाठी

जैसा आप सब जानते हैं कि अभी-अभी चैत की आमद हुई है और इसी बीच इसमें चुनाव भी पड़ गया है। कुल मिलाकर यह मौसम चुनावी मौसम में तब्दील हो गया है। इस मौसम का हाल बताने में मौसम विभाग को पसीने आ रहे हैं। अंदरखाने की बात तो यह है कि इस मौसम की जानकारी देने में मौसम विभाग का मिजाज पूरी तरह से बिगड़ गया है। फिर भी पेश है चुनावी मौसम का हाल-

आसमान आशकिंत है, बादल बदहवास हैं, बिजली की बत्ती गुल है, क्योंकि वे सर्वथा अप्रत्याशित देख रहे हैं। वे देख रहे हैं कि प्रत्याशी गरज रहे हैं। कड़क रहे हैं। बरस रहे हैं। अजब छटा छाई है।

इस चुनावी मौसम में सूरज की घिघी बंध गई है। उसके तेवर उम्मीदवारों की त्यौरियों के सामने ढिले हैं। सूरज की किरणें बस्तियों में बाद में पहुंच पाती हैं उससे पहले नेता की टोली आ जाती है। सूरज से ज्यादा बाई गॉड! नेताओं के कुर्ते चमक रहे हैं। चिड़ियों से ज्यादा उनके चमचे चहक रहे हैं। वोऽ वोऽ वोऽ टऽ टऽ टऽ…

इस सर्दी के मौसम में अचानक से गर्मी में आर्श्चजनक उछाल देखा जा रहा है। दिनोंदिन गर्मी बढ़ती ही जा रही है। इसमें देश की भौगोलिक स्थिती का कोई हाथ नहीं है। बकौल विशेषज्ञ इस स्थिती के लिए जिम्मेदार चुनाव में खडे़ होने वाले नेताओं के मुख हैं। जो आजकल हर पल वोटरों के उन्मुख हैं। अब तो दिन और रात दोनों तप रहे हैं। आम गर्मी के कारण नहीं नेताओं के भाषण के कारण पक रहे हैं।

आरोपों की आंधियां प्रचंड चल रही हैं। रुक रुक कर नहीं लगातार चल रही हैं। जो रह-रहकर आचार संहिता के तम्बू उखाड़े जा रही हैं। चुनाव आयोग अधिकतम और न्यूनतम वेग दर्ज करने में अपने को असमर्थ पा रहा है क्योंकि हर क्षण आंधियों का वेग एक नया रिकार्ड बना रहा है।

जगह-जगह आश्वासनोंं का भारी वायुदाब देखने को मिल रहा है। जिसे हवाई पुल बहुत आसानी से झेल ले जा रहे हैं। कहीं कहीं शिकायतों के निम्नवायुदाब के क्षेत्र भी बन रहे हैं। जिसके चलते हवा का रूख अचानक से बदल सकता है। जुबानी पारा तेजी से ऊपर चढ़ रहा है, मर्यादा का पारा उतनी ही तेजी से लुढ़क रहा है।

घर से बाहर निकलने वालों के लिए चेतावनी-

अगर अतिआवश्यक न हो तो घर से बाहर न निकलें। अगर बाहर निकलना ही पडे़ तो मुंह और आंख ढक कर निकालें, क्योंकि रैलियों के कारण धूल उड़ रही है। जो आजकल मतदाताओं के आंखों में पड़ रही है। ज्यादा आंखें मिचने से कान में तेल डालना अच्छा है। बाहर धूल फांकने से घर में पड़ा रहना अच्छा है।

मौसम का पूर्वानुमान-

अगले कुछ दिनों तक मौसम जैसा है वैसा ही बना रहेगा। अभी वादों के बादल आंशिकरूप से छाए रहेंगे। झूठ की उमस और बढे़गी, मतदाताओं के आंखों की नमी और बढे़गी। नमी बढ़ने से गर्मी का एहसास ज्यादा होगा। प्रचार थमने के बाद ही राहत मिलने के आसार हैं। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद मौसम अचानक से करवट बदलेगा। मौसम सामान्य हो जाएगा। आज जो नेता जगराते कर रहे हैं वे चादर तान कर सोएंगे। आज जो मतदाता पूजे जा रहे हैं, वे करवट बदलकर रोएंगे। अगले पांच सालों के मौसम का पूर्वानुमान अभी से लगाना जितना मुश्किल है, जनता की हालत का पूर्वानुमान लगाना उतना ही आसान है।

चुनावी मौसम आते हैं चले जाते है, मगर देश का मिजाज बदलता ही नहीं! कमबख्त!

यह भी पढ़ें : ‘लोकतंत्र का मनभावन दृश्य’ जो नजर आने वाला है!

http://www.satyodaya.com

अर्थात- यथार्थ

यह कैसी हरकत है सरकार!

Published

on

अनूप मणि त्रिपाठी

एक खबर- सरकार हरकत में आई।

 हरकत… शब्द बहुत दिलचस्प है। जब यह सरकार के साथ जुड़ता है, तो दूसरा अर्थ होता है और जब आम आदमी के साथ जुड़ता है, तो दूसरा। भला यह कैसी हरकत! बचपन में जब कभी हम हरकत करते थे मास्साब की छड़ी बोलती थी। हरकत करने से पहले कान गरम होने का खटका लगा रहा था। वो अलग बात है कि बिना हरकत किए हुए हम तभी न मानते थे। मगर यहां क्या हो रहा है! अभी तो सरकार विधिवतरूप से हरकत कर भी नहीं रही है, अभी तो हरकत में बस आई है कि पहले पेज की खबर बन गई। उसके हरकत में आने का स्वागत हो रहा है। खबर सुनकर एकबारगी ऐसा लगता है जैसे सरकार आइसीयू में भर्ती हो, उसके बदन में हरकत हुई हो। लोग खुश। देखो! देखो! हरकत कर रही है! नहीं, नहीं, अभी मरी नहीं, अभी जिंदा है हमारी सरकार। आपकी चुनी हुई सरकार!

सरकार हरकत में आई! जाहिर सी बात है, सरकार निष्क्रिय थी। अगर सरकार सोई हुई होती, तो कहा जाता सरकार जागी। मगर प्रायः यह बोला-सुना जाता है कि सरकार हरकत में आई। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार सब देखती-समझती है, मगर हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है। ठीक महाभारत के भीष्म की तरह। दौपद्री का वसन जब उतारा जा रहा था, वह चुपचाप बैठे हुए थे। ऐसा कुछ सरकार के साथ होता है। भीष्म तो अपनी प्रतिज्ञा से बंधे हुए थे, मगर सरकार के हाथ-पांव कौन बांधे रहता है कि हरकत ही नहीं करती। हरकत से पहले किस बात का इंतजार करती है वह। वास्तव में सरकार कुछ न करके तभी हरकत ही कर रही होती है। वह सरकार जो है।

प्रायः सरकार के ऊपर यह आरोप लगता है कि सही समय पर हरकत में नहीं आती है। मगर ऐसा नहीं है। सरकार प्रायः हरकत में आने की सोचती रहती है। सरकार सोचती रहती है कि हरकत की जाए कि नहीं। जैसे हनुमान जी को याद दिलाना पड़ता था कि उनके अंदर अपार शक्ति है, उसी तरह से सरकार को याद दिलाना पड़ता है कि वह सरकार है। उसकी कुछ जिम्मेदारी है। सरकार बनने के बाद जिम्मेदारियां भी बनती हैं! पॉवर में आने के बाद तो पॉवर आ ही जाता है। इत्ती सी बात याद दिलाने के लिए बस जलाना, ट्रेन रोकना, भारत बंद जैसे पावन कार्य निष्पादित करने पड़ते हैं। तब सरकार हरकत में आते हुए अपने मातहतों से मशवरा करती है, क्यों भई हरकत में आया जाए कि नहीं! कोई हरकत की जाए कि नहीं! क्या कहते हो! तब मातहत जबाव देते हैं, लेट्स वेट एंड सी। अभी देखते हैं और प्रतिक्षा करते हैं। अभी राजनीतिक रूप से नफा-नुकसान का आंकलन कर लेने दीजिए। वैसे भी अभी कौन सी जल्दी है, माना स्थिति तनावपूर्ण है, मगर है तो नियंत्रण में।

इतने दिनों में सरकार की एक पुख्ता पहचान बन गई है। वो क्या? वह यह कि वो लगातार हरकत करने में असमर्थ रहती है। उल्टे चौबीसों घंटें अपने बदन में हरारत की शिकायत रहती है उसे। तब सरकार हरकत में कब आती है!  किसान मर जाते हैं। मजदूर का पूरा परिवार आत्महत्या कर लेता है। बस्तियां जला दी जाती है। तभी नहीं! तब सरकार हरकत में कब आती है! शायद जब,वोटबैंक में से उसे अपना खाता बंद होने की आंशका घेरती है। तब। निश्चित रूप से फिर भी कुछ कह नहीं सकते। फिर भी मोटेतौर पर यह कहा जा सकता है कि सरकार ‘का वर्षा जब कृषि सुखानी’ जैसी स्थिती में हरकत में आती है। फिर हरकत में आने का क्या लाभ! वो कहावत तो आप ने सुनी ही होगी न सरकार-देर आए दुरस्त आए। शायद इसलिए सरकार बिगड़े कार्यों को दुरस्त करने के लिए देर से हरकत में आती हो!

लोग कहते हैं कि सरकार तुरत-फुरत हरकत में क्यों नहीं आती! देखा जाए तो इसमें सरकार को कोई दोष नहीं। वह करे भी तो क्या करे। अब इतनी बड़ी सरकार। उसके इतने हाथ तो इतने पैर। इनको हिलाने-डुलाने में काफी ऊर्जा खर्च करनी पड़ती होगी, लिहाजा समय भी लगता होगा इसलिए सरकार लेटी रहती है। बर्फ की सिल्ली की तरह। ठंडी। भावविहीन। सरकार बहुत ठस्स चीज होती है। भारी भरकम। कितने तो पुर्ज उसके, कितने तो जोड़ उसके। वह एकदम से हरकत में आ भी जाए तो कैसे। सरकार की मजबूरी है। कुछ तो मजबूरी है, कुछ उसकी रूढ़ हो चुकी छवि का भी सवाल है। बात-बात पर हरकत में आ जाएगी, जरूरत के वक्त हरकत में आ जाएगी, तो उसे सरकार कहेगा कौन! आखिर उसे अपना इकबाल भी तो बुलंद रखना है।

अब यह हरकत देखिए! सरकार के चलते रहने को हरकत नहीं माना जाता। न ही तो सरकार के गिरने ही को। जबकि ये दोनों भी क्रियाएं हैं। इसे हरकत न मानिए, जैसी आपकी मर्जी। मानिए, सरकार किसी भी तरह से हरकत में आ गई तो! तो अब हरकत के बाद क्या होगा! उसकी हरकत कैसी होगी! पहले पहल तो विपक्ष के ऊपर ठीकरा फोड़ती है। जब इस हरकत से बात नहीं बनती तो सरकार और हरकत करती है और उसके बदन से आयोग, बयान, जांच कमीशन! पैकेज! झड़ते हैं। फिर सरकार शांत, ठस्स, क्रियाविहीन, लगभग मरणासन्न हो जाती है। तब तक, जब तक कोई होनी अनहोनी में, घटना दुर्घटना में, खबर त्रासदी में न बदल जाए!http://www.satyodaya.com

Continue Reading

अर्थात- यथार्थ

राग दरबारी का नहीं पर ट्रक पूरा राग दरबारी है

Published

on

एक ट्रक सड़क पर खड़ा है। नंबर प्लेट पर कालिख पुती हुई है। यह रागदरबारी वाला ट्रक नहीं है। क्योंकि इसकी स्थिति को लेकर कोई भरम नहीं है। इसको किसी भी एंगल से देखें तो साफ पता चलता है कि इसका जन्म सड़कों के बलात्कार करने के साथ सत्ता की सेवा करने के लिये हुआ है। अर्थात किसी आम आदमी को मारने के लिये हुआ है, जो इत्तफाक से अभी तक जीता जागता गवाह था, किसी रसूखदार बलात्कारी के खिलाफ। तो स्पष्ट है कि यह ट्रक राग दरबारी वाला नहीं है। संक्षेप में उसका जन्म सड़कों के बलात्कार के लिए हुआ था और इसका बलात्कारियों को बचाने के लिये हुआ है।
भाई साहब आप से निवेदन हैं उस ट्रक को कुछ देर देखें!

हम देखते हैं, मगर हम कुछ नहीं कह सकते! हम जानते हैं, बोलकर भी हम कुछ नहीं कर सकते! सब जानते हैं, मगर कुछ हो नहीं सकता! कितना कुछ है जो ऐसे ही हो रहा है! इस लोकतंत्र में आम आदमी के साथ एक अंदेशा चलता है। वह अकेला नहीं है इस विराट तंत्र के बावजूद भी। और यह अंदेशा जो कब दुर्घटना में बदल जाये कहा नहीं जा सकता! बड़े लोगों के पास शंका होती है और वह इतनी विकट स्वामीभक्त होती है कि वह अपना लाभ उन बड़े लोगों को ही देती है, मजाल है किसी गरीब को मिल जाये! जिसका मुजाहरा न्याय की मूर्ति के साथ हम आये दिन कोरट-कचहरी में देखते हैं। साक्ष्य चीखते -चीखते गूंगे हो जाते हैं या वे लावारिस की तरह दर-ब-दर भटकते हुये कहीं गुम हो जाते हैं। ऐसी व्यवस्था में आज आम आदमी डरा सहमा तो रहता है, मगर वह पागल नहीं हुआ है। व्यवस्था इसे अपनी उपलब्धि मान कर अपनी पीठ आप थपथपाती हुई चलती है!

उस ट्रक को देख रहे हैं न भाई साहब!

खुला रहस्य जितना खुला आज है, उतना कभी नहीं था!

मगर आज आम आदमी के पास इतना अधिकार भी नहीं, इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के बावजूद भी वह साधिकार मर सके। विकासातुर सभ्यता ने इस मामले में बहुत विकास किया है।निःसंदेह। कत्ल करना, वह भी निरपराध आम आदमी का अब बहुत आसान हुआ है। उसको कैसे रोज मारा जाये! इसके लिए व्यवस्था अपने सतत प्रयासों में लगी हुई है। और इसके लिये नये- नये हथियार दत्तचित्त होकर ईजाद किये जा रहे हैं। उसको कभी आश्वसन से, कभी आंकड़ों की बौछारों से मारा जायेगा। कुछ ऐसे हथियारों से भी जिसकी वह कल्पना भी नहीं कर सकता। उसे कोई ट्रक कभी भी रौंद सकता है सड़क पर चलते हुए। अचानक। दिनदहाड़े। या रात को। यह उस ट्रक के मूड पर निर्भर करता है।

उस ट्रक को देख रहे हैं न भाई साहब!

जैसा कि होता है कि बड़े से बड़ा जल्लाद भी कभी न कभी पिंघलता है। फिर सत्ता की व्यवस्था क्यों नहीं! यह भी पिंघलती है। बिना चुनाव के भी। यह आम आदमी को विकल्प देती है । मुआवजा और जांच का। यह मेहरबानी क्या किसी नियामत से कम है! जाने वाला तो चला गया। और जैसा कि विदित है कि जाने वालों के साथ जाया नहीं करते। इस परम्परा का सम्मान करते हुए आम आदमी उसे स्वीकार कर लेता है। जैसा पहले ही कहा जा चुका है कि आम आदमी इस व्यवस्था में डरा- सहमा चलता है, जिसे यह व्यवस्था उसकी इस अवस्था को अपनी उपलब्धि मान, कानून-व्यवस्था कहती हुई फूली नहीं समाती!

उस ट्रक को देख रहे हैं न भाई साहब!

जी वह अभी भी खड़ा है। गौर से देखेंगे तो उसी के पास जांच भी बैठी हुई दिखेगी आपको। व्यवस्था सतर्क ही नहीं चौकस भी है। पीड़ित के खून के धब्बों वाली सड़क गन्दी नहीं रहने दी जायेगी। दावा है। साफ-सुथरी सड़क आधुनिक विकास का द्योतक है। इस पर वारदात कितनी भी हों पर गंदगी नहीं दीखनी चाहिये। ऐसी व्यवस्था को देखकर ही तो विदेशी निवेश आने को लपलपायेगा! इसीलिये यह सड़क जल्द से जल्द साफ कर दी जायेगी। इस तत्परता की एक ओर वजह भी है भाईसाहब!
ताकि अगली वारदात को उसका पूरा यथोचित सम्मान दिया जा सके! पहले से पड़े हुये खून के धब्बों से अगली वारदात के शान में कुछ गुस्ताखी टाइप होगी। अब देश को एक नये वारदात की प्रतीक्षा करनी होगी! व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए ऐसे वारदात का होते रहना जरूरी है! आज के लोकतंत्र की भाईसाहब यह मजबूरी है!सफेद कॉलर में खून के धब्बों से जिसकी रंगत बढ़ती है !

उस ट्रक को देख रहे हैं न भाई साहब !

देखिये नहीं! भागिये! हमारे साथ!

भागिये! क्योंकि उसने हमें देख लिया है!

वह ट्रक तेजी से हमारी तरफ भागाआ रहा है भाईसाहब!

सोचने का समय नहीं है! भागिये! मुझे साक्षी खुद को साक्ष्य समझ कर भागिये! ट्रक की रफ्तार काफी तेज है। अब मैं और नहीं भाग सकता। सारी जिंदगी भागते रहने के बावजूद भी। अब आंखें मूंदीये और मरने के लिए तैयार हो जाइये! मेरे साथ हाथ उठाकर ऊपरवाले से क्षमायाचना करिये!क्योंकि हमारे मरने का ऑर्डर ऊपर से ही आया है। यह ट्रक तभी रुकेगा जब किसी के हाथ ऊपर वाले के कॉलर तक पहुंचे! ऐसी ही कोशिश उस मरहूम ने की थी, जिसे इस ट्रक ने कुचला है। अगर भूल कर या हिम्मत कर हमने भी कुछ ऐसा करने की कोशिश की सफेद कॉलर तक पहुंचने की, तो कानून के हाथ हम तक पहुंच जाएंगे। मालूम है न आपको! क्योंकि वे लंबे होते हैं।इसलिये अब हमें मरना ही होगा! देखिये!हमें मरते हुयेे ऊपर वाला सब देख रहा है! उससे मुझे कोई शिकायत नहीं! उसे ऊपर ही रहने दिया जाए! क्यों भाई साहब! आखिर व्यवस्था तो नीचे से बदली जाती है! वैसे भी ऊपर वाले की आदत होती है,वरदान या शाप देना।
ताकि यथास्थिति का लोलक इन दो पाटों के बीच डोलता रहे और जो होता आ रहा है होता रहे। अब कुछ सोचने-समझने का समय नहीं! अभी वह ट्रक ‘बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला’ का स्टीकर लगाए हमारी ओर बिल्कुल पास आ गया है। मगर यह क्या! ट्रक केे पीछे लोकतंत्र की लाल बत्ती वाली कार मुझे दीख रही है। जो श्जनता का,जनता के लिए, जनता के द्वाराश्का तेजी से हॉर्न बजा रही है। शायद अब हम बच जायें भाईसाहब! क्यों भाई साहब! !
अब क्यों भाग रहे हैं !

खुद को इस ट्रक से बचाना जारी रखो!रुको मत!

क्यों भाई साहब!

इस भारी भरकम ट्रक के पीछे यह भी तो लिखा हो सकता है ‘जगह मिलने पर पास दिया जायेगा’
लोकतंत्र की कार का ट्रक को ओवरटेक करने का इंतजार है मुझे ! फिलहाल हमारी ओर ट्रक बढ़ा चला आ रहा है !..

अनूप मणि त्रिपाठी

Continue Reading

अर्थात- यथार्थ

पुरानी कहानी का पुनर्पाठ

Published

on

हम किस शहर में रहते हैं?
सवाल ही गलत है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हम किस शहर में रहते हैं। सवाल यह होना चाहिए कि हम कैसे शहर में रहते हैं। आज हमारे शहर की पहचान क्या है? क्या यह कि जहां शोर इस कदर बढ़ गया है कि सन्नाटे रात को भी नहीं आते! या यह कि यहां का रहवासी इतना सभ्य हुआ या यूं कहें कि शहर ही जंगल हुआ कि जंगल से अब आदमखोर नहीं आते! या फिर यह कि यहां कई अट्टालिकाएं गंगनचुंबी हुईं कि कई छतों पर रवि महाराज नहीं विराजते। कुछ पल के लिए भी नहीं। या कुछ ऐसा कि शहर एक ऐसा कुंआ जहां प्यास बुझाने दूर-दूर से लोग आते हैं, मगर जब पानी पीने कुंए में झांकते हैं तो…तो पानी इतने नीचे दिखता है कि उसे पीने के लिए उन्हें गहरे उतरना पड़ता है। इतने गहरे कि कई बार यह अनंत की यात्रा सिद्ध होती है…
क्या इसी शहर पर हम इतारते हैं! क्या कभी ऐसे ही शहर की कल्पना की थी हमने! स्टेशन से बाहर निकले हुए जब कोई शहरी किसी गांववाले को कुरता-धोती पहने, कंधे पर गमछा डाले देखता है, तो सोचता है कि यह भी आ गए यहां मरने। भीड़ बढ़ाने को। ठीक वैसे ही, जैसे कभी किसी शहरी ने इस वाले शहरी को स्टेशन से बाहर निकलते देख कभी सोचा था। अभी इन्हीं ख्यालों में डूबता-उतराता था कि शहर को मैंने अपने सामने से जाते देखा। सहसा विश्वास न हुआ। यह तो वही बात हो गई कि शैतान का नाम लो और शैतान हाजिर। मैंने शहर को रोककर यह वाली कहावत उसे सुना दी। शहर ठठा कर हंसा। मगर मैं गंभीर रहा। वजह थी अखबार में छपी एक खबर। उस खबर का हवाला अब हमारे बीच होने वाले संवादों में आने वाला था।
मैंने शहर से पूछा, ‘कल रात फुटपाथ पर बच्चा भूख से रोता रहा और तू घोड़ा बेचकर सोता रहा!’ शहर मुझे घूरने लगा। संकेत साफ थे। उसे इस बाबत कुछ भी पता नहीं। मैंने अखबार उसके आगे बढ़ा दिया। शहर ने उड़ती नजरों से वह खबर पढ़ी। अखबार मुझे थमाते हुए लापरवाही से बोला, ‘यार, दिन भर का थका था। बिस्तर पर एक बार जो गिरा तो गिरा, फिर कुछ नहीं पता था। तू यह समझ जैसे की मैं मरा था।’ ‘मैं जानता हूं कि कल रात भी तूने पी रखी होगी, नहीं तो मासूम का रोना सुनकर झट खिड़कियां बंद कर ली होगीं।’ मेरी इस बात में दम था। वरना शहर अभी तक शोर मचाने लगता। शहर कुछ पल को शांत रहा। यकीन नहीं होता न! मगर वह शांत था, जैसे किसी भयानक विस्फोट के बाद कुछ पल की खमोशी। शहर के शांत होने की वजह भी मुझे जल्द ही समझ आ गई। शहर बोला, ‘मुझे ऐसी नजरों से मत देखो। मेरा इसमें कोई कसूर नहीं। मुझे नींद से अगर जगाना ही था, तो उस भूखे बच्चे को जोर से चिखना-चिल्लाना था न!’ शहर की सफाई सुनकर मैं सोच में पड़ गया। यह इसकी क्रूरता कही जाए या उसका भोलापन या हाजिरजवाबी! मैं अभी सोच ही रहा था कि शहर चलने को हुआ। शहर के पास इतना समय कहां! मैंने उसे रुकने का इशारा किया, मगर वह नहीं रुका। वह जितना भी रुक गया, वही बहुत था मेरे लिए, वरना शहर हम जैसों के लिए रुकता ही कहां है! जाते हुए शहर को मैंने जोर से कहा, ‘अरे पगले, जोर लगाने के लिए भी तो जोर चाहिए। मैं समझ गया, तुझे सिसकियां की जगह शोर चाहिए।’
कह नहीं सकता शहर मेरी बात सुन पाया कि नहीं,क्योंकि मेरे देखते ही देखते शहर भागने लगा था।
मित्रों, शहर की यह कहानी आज की नहीं, कल की नहीं बरसों पुरानी है। फुटपाथ पर भूख से व्याकुल बच्चा रोता है और शहर आराम से सोता है। मासूमों-मजलूमों की सिसकियां शहर के तेज खर्राटों में खो जाती हैं। अगली सुबह शहर जगता है, काम पे चलता है, दिन ढलता है, शाम होती है, रात आ जाती है और वही पुरानी कहानी एक बार फिर ताजातरीन होकर हमारे सामने आ जाती है।
जानते हैं कल रात शहर में क्या हुआ?
कल रात भी भूख से व्याकुल बच्चा रोता रहा… रोता रहा… रोता रहा… और शहर सोता रहा…सोता रहा… सोता रहा…

अनूप मणि त्रिपाठी

Continue Reading

Category

Weather Forecast

August 20, 2019, 1:59 am
Fog
Fog
28°C
real feel: 35°C
current pressure: 1000 mb
humidity: 94%
wind speed: 0 m/s N
wind gusts: 0 m/s
UV-Index: 0
sunrise: 5:10 am
sunset: 6:09 pm
 

Recent Posts

Top Posts & Pages

Subscribe to Blog via Email

Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.

Join 9 other subscribers

Trending