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अर्थात- यथार्थ

चुनाव की जुबानी कहानियां

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-अनूप मणि त्रिपाठी

1

नेता जी कुछ सहमे-सहमे से जा रहे थे कि उनकी पत्नी ने आवाज लगाई। ‘बीस बार कहा है कि पीछे से मत टोका करो!’ नेता जी कुछ झुंझलाते हुए बोले। उनकी पत्नी उनके कहे को अनसुना करते हुए आरती की थाल उनके मुखारबिंब के सामने गोल-गोल घुमाने लगी। ‘आज आपका चुनाव प्रचार का पहला दिन है, बिना रस्म के चले जाइगा! अशुभ होता!’ नेता जी की आरती उतारते हुए बोलीं। जब आरती पूरी हो गई। नेता जी जाने को हुए तब उनकी पत्नी ने फिर टोका,‘अभी एक सबसे जरूरी रस्म तो बाकी है! ऐसे ही चले जाएंगे!!!’  ‘ओह! मैं यह कैसेे भूल गया!’ नेता जी ने मन में सोचा। नेता जी फौरन अपनी जुबान बाहर निकाली। उनकी जुबान बाहर आते ही उनकी पत्नी ने उस पर तिलक लगा दिया। तिलक लगते ही नेता जी बहुत आत्मविश्वास के साथ दनदनाते हुए बाहर निकल गए।

2

आज नेता जी सपत्निक चिकित्सक के पास पहुंचे हुए है, जो उनका मित्र भी है। कुछ दिनों से तबीयत नासाज चल रही थी। कुछ भी खाते स्वाद न मिलता। चिकित्सक मित्र ने उनका मुआयना किया। मुंह खोलने को कहा। फिर जुबान बाहर निकालाने को कहा। नेता जी ने जैसे ही अपनी जुबान बाहर निकाली। चिकित्सक मित्र चैंक कर बोला,‘ ओ माइ गाॅड!!!’ ‘क्या हुआ भईया!! सब ठीक तो है न!’ नेता जी की पत्नी चितिंत हो कर बोली। ‘अरे! भाभी इतने सालों से प्रैक्टिस कर रहा हूं,मगर ऐसा तो पहली बार देख रहा हूं!’ चिकित्सक मित्र बोला। ‘क्या हुआ भईया! प्लीज बताइए न!’ नेता जी की पत्नी घबराकर बोलीं। ‘अरे भाभी! इसकी जुबान पर बैक्टीरिया से ज्यादा तो गालियां हैं!’ यह कहकर चिकित्सक मित्र जोर से हंस पड़ा। इतना सुनते ही नेता जी की जुबान हरकत में आई और उसमें से एक भारी-भरकम गाली बाहर निकल पड़ी।

(नेता जी की पत्नी भी बिना हंसे न रह सकी मानो कि वह उनकी बात से पूर्ण सहमत हो!)

3

पत्रकार जैसे ही नेता जी के घर में घुसा तो वहां का दृश्य देखकर दंग रह गया। उसने देखा कि नेता जी एक चाकू पर अपनी जुबान फेर रहे हैं। यह देखकर वह अंदर से काफी डर गया। वह वहां से उल्टे पांव लौटा। बाहर निकलते ही नेता जी के निकटस्थ सहयोगी ने शंकित हो कर पूछा,‘हो गया इंटरव्यू!’ पत्रकार ने एक सांस में अंदर देखी हुई सारी आप बीती बता दी। यह सुनकर नेता जी का निकटस्थ सहयोगी जोर से हंसा और बोला,‘ अरे कुछ नहीं! कई दिनों से भाभी जी उलहाना दे रही थीं, सो आज फुर्सत में थे, तो वह चाकू में धार लगा रहे थे…’

4

रात को देर से आए थे और सुबह जल्दी जाना था। सुबह उठ कर नेता जी ने जल्दी जल्दी ब्रश किया, फिर लगे जीभ साफ करने। ये देख कर उनकी धर्मपत्नी आग बबूला हो गईं। बोलीं,’ये क्या कर रहे हैं जी!’
‘जुबान साफ कर रहा हूं…’ नेता जी हड़बड़ाते हुए बोले।
‘तो आज प्रचार के लिए नहीं जाइयेगा!! क्या!!!’

5

नेता जी जब बोल रहे थे तब भीड़ में एक ने नेता जी का गला पकड़ लिया। यहां गला पकड़ना मुहावरा तक सीमित था, न की क्रिया। ‘पिछली बार आप जुबान दिए थे, मगर काम नहीं हुआ!’ वह आदमी बोला। ‘ऐ भाई! अगर हम  तुमको जुबान दे दिए थे तो अभी हम बोल कैसे रहे थे!’ नेता जी के यह कहते ही वहां एक जोरदार ठहाका लगा। सब नेता जी की वाक्पटुता के कायल हो गए और एक जोर का नारा लगा,‘हमारा नेता कैसा हो!’

6

तू झूठी है!

तू मक्कार है!

तू गद्दार है!

तू बदलचलन है!

तू आवारा है!

और तू…तू तो आग लगाती है!

हूंउ…तू किए कराए पर पानी फेर देती है!

और तू ऐसा करती है कि सिर फूट जाते हैं!

तू न हो न…तेरे मालिक को कोई न पूछे!

अरे तू है तो तेरे मालिक की पूछ है!

एक बात तो बता!

क्या!

हम आपस में लड़ क्यों रहे हैं!

क्योंकि हम दोनों नेता की जुबानें जो हैं!

7

चुनाव आ गए थे। नेता जी चुनाव में खडे़ हुए मगर उनका गला बैठ गया।

गला बैठते ही नेता जी का दिल बैठ गया। चुनाव सिर पर है अब क्या किया जाए! वह बोलने की पूरी कोशिश करते तो सरसराती सी आवाज निकलती, जैसे कोई सांप फुफकार रहा हो! डाक्टर का कहना है कम से कम पंद्ररह दिन लगेंगे। साथ में सख्त हिदायत भी दी है कि गले पर जरा भी जोर नहीं देना है। अब क्या किया जाए! इतना पैसा खर्च करके को पार्टी का टिकट मिला! क्या सब यूं ही बेकार चला जाएगा! अगर वो बोलेंगे नहीं तो चुनाव कैसे जीतेगे!‘जब जवाब देने का समय आया तो नेता जी की बोलती बंद हो गई’ कह कर विरोधी उनका मजाक उड़ाएंगे, वह अलग! क्या किया जाए! नेता जी यही सब सोच-सोच कर बेदम हुए जा रहे थे। बहुत सोच विचार के बाद दो उपाय निकाले गए।

पहला, जनता में उनकी पत्नी द्वारा यह कहा जाएगा कि पांच साल से जनता की आवाज उठाते-उठाते नेता जी की खुद की आवाज बैठ गई।

दूसरा, रैली-जनसभा में उनके पुराने भाषण के पुराने रिकार्ड बजा दिए जाएं!

8

रात के एक बजे फोन घनघनाया। डाक्टर साहब ने आंखें मींचते हुए फोन उठाया। ‘डाक्टर साहब! फौरन नेता जी के घर चले आइए! इमरजेंसी है!’ उधर से एक घबराती हुई आवाज आई। ‘हां…हां… क्या हुआ नेता जी को!’ डाक्टर  धीरे से बोला। ‘अरे डाक्टर साहब क्या बताए! नेता जी अभी खाना खा रहे थे कि….’ ‘हां हैल्लो!’ डाक्टर साहब ने पूछा। नेटवर्क के चलते उसकी आवाज बीच में चली गई थी। ‘हां हेल्लो! क्या हुआ नेता जी को  खाना खाते समय!’ डाक्टर साहब  थोडे़ से सावधान हुए। ‘क्या बताएं डाक्टर साहब! नेता जी ने अभी दूसरा कौर मुंह में डाला ही था कि खाते वक्त उनकी जुबान कट गई! आपको फौरन बुलाया है! नेता जी कह रहे हैं जरा भी रिस्क नहीं ले सकते!!!’ ‘हां भई! चुनाव का टाइम जो है!’ डाक्टर जम्हाई लेता हुआ बोला।

9

तुमको 13 का पहाड़ा याद नहीं हुआ!
बच्चा चुप रहा।
इतनी देर से बैठे हो,फिर भी!
बच्चा कुछ न बोला।
हद है महाराज! तुमको दिक़्क़त क्या है!
अब नेता जी से रहा नहीं गया। वह पत्नी को डांटते हुए बोले,’ ई पहाड़ा है पहाड़ा… कौनो गाली नहीं कि एके सांस में सब सुना दे!!!’

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अर्थात- यथार्थ

दर्शन देते देवता

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अनूप मणि त्रिपाठी

हर्षित, मुदित नाच रही है देह, थिरक, फुदक रहा मन। वाणी गई कहीं खो, नैन गये फैल, पलकें हुईं र्निनिमेष। कैसे… कैसे बखान करें देवता के रूप का ! कैसे बखान करे उसकी लीलाओं का! सुधबुध खो गई है हमारी। कैसे आज देवता ने ली हम जैसों की सुध! कैसे देवता प्रकट हुए आज हमारे दर! न कोई यज्ञ। न कोई तप। न कोई अनुष्ठान। न कोई आह्नवान। न कोई करूण क्रंदन। न कोई याचना। न कोई विनती। फिर कैसे देवता हुए प्रकट! देकर अपना दर्शन कर रहे हैं हमें कृतार्थ। यह कैसी अनभूती ! यह कैसा दृश्य! ओहो! हमारे घर की चौखट पर अपादमस्तक दर्शन दे रहे भगवन। दर्शन लाभ हमें हो रहा, परन्तु सिर देवता का झुका। देवता का यह कैसा चमत्कार !

मात्र दर्शन ही नहीं, बहुत कुछ दे रहे हैं देवता। दर्शन के साथ मुस्कुराहट, मुस्कुराहट के साथ अपनी उर की गर्माहट, उर की गर्माहट के साथ अपने करकमल की कोमल छुवन, करकमलों की कोमल छुवन के अतिरिक्त करकमलों का हार, करकमलों का हार ही नहीं अपने वचनों की लंबी माला, वचनों की लंबी माला ही नहीं, हमारे सभी कष्ट हरने का ठोस आश्वासन। वाकई बहुत कुछ दे रहे हैं। वे दे कहां रहे, वे तो लुटा रहे हैं। इतना कुछ लुटाने के बाद भी और बहुत कुछ लुटाने की चाह रखते हैं। वे बहुत कुछ लुटाने के बाद भी कितने धनवान दिख रहे हैं। इतना कुछ देने के बाद भी वे याचक लग रहे हैं। देवता का यह कैसा रूप!

क्या दिव्य रूप है देवता का! दिव्य रूप आप है कि दिव्य रूप धरे हैं ! जो भी हो देवता देवता जैसे ही लग रहे हैं। उन्होंने धवल वस्त्र ऐसे धारण किए हुए हैं जिसकी धवलता के सामने बगुले के परों के रंग भी फीके लगे। बगुला यदि यह धवलता देख ले, किंचित हीन भावना का शिकार हो जाए। वात्सल्य का भाव उनकी आंखों में छप छप छप तैर रहा है। उनके श्रीमुख से टप टप टप शहद टपक रहा है। उनका सिर सर सर सर गेंहू की बालियों की तरह लहरा रहा है। उनके चरण रज फर्र फर्र फर्र उड़ कर बादल बन रहे हैं। यह हमारी नजरों का धोखा है या देवता का कोई नया अवतार!

आज ऐसा लग रहा है कि वह केवल एक को नहीं, सबको वर देने के मूड में है। और केवल एक वर ही क्यों! वे थोक में वर देने के मूड हैं। आज, आज वे किसी को निराश नहीं कर रहे। हाथ मिलाओे तो हाथ मिलाएगे। गले लगाओ तो गले लगेगे। सिर झुकाओ तो नत हो जाएगें। पैर छुओ तो आशीर्वाद देगे। भेंट करोगे तो भेंट देगे। जो मांगो वो मिलेगा। ओहो, कितना विशाल नरम ह्नदय लेकर प्रकट हुए हैं देवता । 

दर्शन दुलर्भ थे जिनके, आज वे बहुत आराम से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। वे सामने ही हमारे। बिल्कुल सामने। इतने निकट कि हम उन्हें छू सकते हैं। इतने सटे कि हम उन्हें महसूस कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि उनका यहां से जाने का मन नहीं हैं। उनकी देह भाषा कहती है कि वे हमारी बस्ती में ही अपना आसन जमा देंगे! परंतु देवता गंदगी में कहां रहते हैं! वे जहां से आए हैं, वहीं चले जाएंगे। किसी निरापद जगह पर । देवता का काम भी यही है कि दर्शन दे और चला जाए। पंरतु आज वे बहुत देर से हमारी गंदी बस्ती में जमे हुए हैं। कितने धैर्यवान हैं देवता!

आज जो साक्षात दर्शन दे रहे हैं, कल तक उन्हीं के दर्शन हेतु हमें तप करना पड़ता था। एक झलक के लिए दौड़-दौड़ कर दधीची की भांति अपनी हड्डियों को गलाना पड़ता था। यहां तक कि हमारी आशाएं वास्तविकता की अग्नि में स्वाहा हो कर धूम में बदल जाती थीं, तब भी वे हमारे सामने प्रकट नहीं होते थे। हम चाहते थे कि वे हम पर ध्यान दें, परन्तु वे अंतर्ध्यान रहते थे । इतनी जल्दी दर्शन देते तो देते कैसे, क्योंकि वे देवता थे। और देवता इतनी आसानी से प्रसन्न कहां होते हैं। वे तो कठोर से कठोर तप की चाह रखते हैं। पंरतु कालचक्र कैसे उल्टा घूमा कि देवता यकायक प्रकट होकर अपने दुर्लभ दर्शन को सरल-सुलभ कर दिया। यह भी देवता की कोई लीला होगी!

कहां हम मात्र देवता की कामना करते थे, पंरतु आज मात्र देवता ही नहीं प्रकट हुए, साथ उनके प्रकट हुई है यक्ष, गंधर्व की टोली भी। देवता अकेले नहीं आए हैं। क्या बहुत अधिक प्रतीक्षा कराने की परीक्षा का यह अतिरिक्त फल है! क्या उनके मन में कहीं किसी प्रकार का कोई खटका है! क्या उन्हें अपने भक्तों की नीयत में खोट दिखा है! क्या वे किसी असुरक्षा भाव से घिरे हुए हैं? क्या उन्हें अपने पुजारियों की निष्ठा डगमगाती हुई दिखी! नहीं… नहीं… देवता को किसका डर? देवता को कैसा डर? पुजारी पूजा न करे तो काहे का देवता! भक्त अगर सुमिरन न करे तो देवता का कैसा प्रताप! कैसी उसकी सत्ता!

आज देवता स्वयं मझधार में हैं। देवता का देवत्व आज चुनाव की धार में है, उन्हें डर है कहीं उनका देवत्व इस धार में बह न जाए। हर पांच साल बाद ऐसी घड़ी आती है, जब देवता बिन बुलाए ही प्रकट होते हैं। देवता जानता है कि लोकतंत्र के मंदिर में अगर उसे पुनः शोभायमान होना है, तो उसे चुनाव का चक्रव्यूह भेदना होगा। देवता जानता है कि इसके लिए उसके कवच-कुंडल प्रर्याप्त नहीं। यह चक्रव्यूह तो भिदेगा वोटरूपी तीरों से। और वे तीर रखे हैं हम जैसे वंचितों के कुटिया में । वे एक-एक कुटिया खंगालने निकले हैं, इसलिए देवता दर्शन देने के लिए श्रम कर रहे हैं। देवता स्वयं दया का पात्र दिख रहा है। सुविधाभोगी देवता आज श्रमजीवी बन गया है। हाय!

कहीं देवताओं के दर्शन सुलभ हो रहे हैं, या यूं कहें कि वे मनुष्यता ग्रहण करने लगे हैं, वहीं कहीं कोई मनुष्यता छोड़कर देवत्व पाने की ओर अग्रसर होना चाह रहा है। लोकतंत्र में चुनाव की बेला भी क्या बेला है!http://www.satyodaya.com

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अर्थात- यथार्थ

जनता का जायका

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– अनूप मणि त्रिपाठी

देखा गया, उठाया गया, छुआ गया, फिर रख दिया गया। और ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ! उसका धैर्य अब जवाब दे चुका है। वह दारूण स्वर में बोला, ‘हे ईश्वर और कितना अपमानित करवाएगा!’ जिसे सुनकर पास पड़ा हुआ आलू कसमसाया। लगे हाथों आपको बताते चलें कि अभी-अभी जिसने ऊपर वाले से फरियाद की है, वह टमाटर है। टमाटर के बरअक्स आलू शांतचित्त है। जबकि ऐसा ही व्यवहार उसके साथ भी हो रहा है। उसे भी कई बार देखा-परखा-जांचा गया और वहीं धम्म से छोड़ दिया गया। वह भी टमाटर की तरह कब से प्रतीक्षारत है कि कोई उसे चुन ले। फिर भी आलू को किसी से कोई शिकायत नहीं। उसका कारण यह है कि वह अनुभवी हो चला है। लगातार तीन-चार दिनों से मंडी में वह आया-लाया जा रहा है। पहले-पहल उसे भी अपने साथ किया गया ऐसा व्यवहार ऐसे ही अखरा था, जैसे इस समय टमाटर को अखर रहा है। लेकिन अब उसके लिए यह सब सामान्य-सी बात हो गयी है। वैसे ही, जैसे पेट्रोल के दाम जब बढ़ते हैं तो लोेग बहुत आक्रोशित होते हैं, मगर कुछ दिन बाद बढे़ हुए दाम और न बढे़ कि खैर मांगते हुए पूर्ववत मात्रा में ही तेल भरवाने लगते हैं।

वो सब तो ठीक है भाईसाहब! मगर आलू और टमाटर के साथ ऐसा व्यवहार क्योंकर हो रहा! कहीं इसकी वजह मंहगाई तो नहीं!

नहीं-नहीं, फिलवक्त मंहगाई की वजह से नहीं भई।

       फिर ऐसा क्यों भाईसाहब!

भाईजान,माजरा यह है कि सारा किया-धरा निगोड़े मौसम का है। मौसम ने जरा-सी करवट क्या ली, कि दोनों की नींदे उड़ गईं। खुद खराब हुआ कमबख्त और दाग लगा गया दोनों पर। इसलिए कोई इन्हें चुन नहीं रहा।

  बेचारे! अच्छा फिर क्या हुआ इनके साथ भाईसाहब ! 

चलिए,सब्जीमंडी चल कर देखते हैं कि क्या हुआ!

टमाटर का एक बार फिर अपमान हुआ। उसके बार-बार अपमानित होने का एक कारण और भी है। टमाटर की जब-जब अवहेलना होती, तो लाल टमाटर गुस्से से और लाल हो जाता। लिहाजा लोग उसके प्रति और आकर्षित होते। मगर जब पास जाकर उसको उठाते और देखते कि वह दागी है, तो उनका आकर्षण उंहू… कहते हुए तिरस्कार में बदल जाता। उसके लाल होने और उपेक्षित होने का क्रम न जाने कब से चल रहा है और न जाने कब तक चलेगा! मगर अब टमाटर की लालीमा कम होती जा रही थी,क्योंकि उसका गुस्सा अब उदासी का रूप लेती जा रही है।

    और आलू! आलू के क्या हाल हैं भाईसाहब!

अनुभवी आलू मस्त,मलंग है। फिर भी टमाटर का दुःख उससे देखा नहीं जा रहा है। उसने तो अपने को किसी तरह से समझा-बहला लिया है, मगर वह टमाटर को कैसे समझाए! वह मन ही मन टमाटर की तबीयत हरी करने की युक्ति सोच रहा है। कुछ देर सोचने के बाद वह बोला,‘मेरे प्यारे, गोलू-मोलू, भोले टमाटर ताजी-ताजी एक गजल सुन!’ टमाटर कुछ न बोला। आलू उसकी प्रतिक्रिया से बेखबर शुरू हो गया ,‘दियासलाई और पानी साथ-साथ रखते हैं/ सियासत में वे ऊंचा मुकाम रखते हैं।’ मतला कैसा लगा!’ ‘सुनकर मतली आ रही है।’ टमाटर मुंह बनाते हुए बोला। ‘अब शेर सुन शेर’ आलू अपना सीना फुलाते हुए शेर कहा,‘ लंबी होती ही जा रही है यहां पतझड़ों की मियाद/ हमारी खाली सुब्हों में वे अपनी रंगीन शाम रखते हैं।’ ‘यह शेर नहीं चूहा है…’ टमाटर छूटते बोला। ‘अबे! सब्जीधर्म निभाते हुए कम से कम सियार कह देता मेरे निर्दयी बालमा…’ यह कहकर आलू एक सांस में अपनी तथाकथित अधूरी गजल को पूरी सुनाने लगा,‘ फासला हो गया कितना अमीरी और गरीबी में/ अपने काम से वे बस अपना काम रखते हैं।। सूखे में उजड़ गए गांव कई सारे/तकिये के पास वे छलकता जाम रखते हैं। बिलबिला कर भूख से मर गया किसान कोई/ मरने वाले का वे अन्नदाता नाम रखते हैं।’ इस बार टमाटर कुछ नहीं बोला, तो आलू बोला,‘बता न मेरी गजल तुझे कैसी लगी! बता न मेरे लालू टमाटर!’ टमाटर तमतमाते हुए बोला,‘दो कौड़ी की’ आलू हंसा। चलो, दो कौड़ी की तो है। यह क्या कम है! यहां तो अपन की इतनी भी वैल्यू नहीं है!’ ‘फिजूल में उड़ मत! यह गजल नहीं है समझे तुम! सारे शेर बहर से खारिज..’ ‘तो नज्म समझ ले न! क्या फर्क पड़ता है! बस भावनाओं को समझ!’ टमाटर कुछ नहीं बोला। बोलता भी क्या। उसकी भावनाओं को यहां कौन समझ रहा था, सिवाय आलू के। आलू ने फिर एक नयी तान छेड़ी,‘अच्छा बताओ! नेता और जनता में मूलभूत क्या अंतर है?’ टमाटर चुप रहा। पूर्व की भांति। आलू खुद ही बोला,‘जनता देश की खाती है और नेता देश को खाता है।’ यह कहकर आलू फीः फीः फीः करके जोर से हंसा। मगर उसकी हंसी टमाटर की उदासी की दीवार में सेंध नहीं लगा सकी। उसका यह वार भी खाली गया।

     अब आलू क्या करेगा भाई साहब!

आलू! आलू ने जैसे हार न मानने की ठान रखी हो! टमाटर की टीस को कम करने की उसने एक बार फिर कोशिश की। ‘अच्छा अपने देश का सबसे बड़ा मजाक-लतीफा कौन-सा है?’ आलू ने पूछा। टमाटर चुप रहा। इसका उत्तर भी आलू ने ही दिया।,‘हमारे यहां जब कोई नेता नैतिकता के नाम पर दूसरे नेता का इस्तीफा मांगता है, तो मोही सुन-सुन आवत हंसी।’ मगर इस बार भी आलू की युक्ति काम न आयी। टमाटर पर इसका कोई असर न हुआ।

      तो अब भाईसाहब!

आलू ने एक बार फिर कोशिश की। ‘अच्छा बताओ मेरे नादान पिया, दुनिया का सबसे बड़ा अचरज क्या?’ जैसा की आलू को भी उम्मीद थी। टमाटर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इसी बीच बारी-बारी से कई हाथों ने आलू और टमाटर को टटोला और रख दिया। लोगों उन्हें उठा तो लेते थे, मगर जैसे पता चलता कि वे दागी हैं, तो फौरन उनसे अपना पीछा छुड़ाने में ही भलाई समझते।

बहुत हो चुकी आलू-टमाटर की कहानी! आप तो उत्तर बताओ बस! 

उत्तर मैं क्यों बताऊं। जिसने पूछा है,वही बताएं।

      अच्छा तो आलू से ही कहलवा दीजिए न भाईसाहब!

आलू ने उत्तर दिया,‘दुनिया का सबसे बड़ा अचरज यह है कि कोई भारतीय नेता जब नैतिकता के नाम पर इस्तीफा दे।’ मगर टमाटर का मूड अब भी उखड़ा-उखड़ा रहा। उसके मूड को ठीक करने की कोई तरकीब-तजबीज ठीक नहीं बैठ रही थी। आलू सोच में पड़ गया। गहन सोच में। इसी बीच एक बात हुई।

    वह क्या भाईसाहब!

टमाटर बस चुने जाने वाला ही था, दुकानदार ने उसे तौल भी दिया था। कई बेदाग टमाटरों के बीच वह छुप-सा गया था। मगर देखो तो उसकी किस्मत! जैसे ही वह झोले में जाने वाला था कि उसके दागी होने का पता चल गया,और एक झटके से उसे बाहर पटक दिया गया। टमाटर फिर वहीं आ गिरा, जहां से उसे उठाया गया था।

अरे..रेरे... बहुत बुरा हुआ। अब टमाटर क्या होगा! और आलू अब क्या करेगा भाईसाहब!

लाल दिखने वाला टमाटर अब पीला दिखने लगा है। हताशा और हीनताबोध के पाताल में समा चुका है वह। उसे देखकर भी यह साफ पता चलता है। अब आलू के लिए भी असहनीय है यह सब कुछ। अपने पड़ोसी टमाटर की दयनीय हालत देख उसका कलेजा मुंह को आता । मगर इस बार आलू ने टमाटर से दो टूक बोलने की ठानी। उसने सोचा कि उसे ऐसा करने से भले ही टमाटर का दिल टूट जाए, मगर इस तरह से उसके घुट-घुट के जीने से तो निजात मिलेगी। आलू अपने कलेजे को मजबूत करके हौल जमाते हुए टमाटर से बोला,‘देख,चुने जाने की अपनी टेक अब तू छोड़! जो हमें-तुम्हें चुनने में सौ नखरे कर रहे हैं न, इनकी सच्चाई मैं तुझे बताता हूं। जो जनता घंटों बाद भी अपने और अपने घर वालों के लिए दागी फल-सब्जी तक नहीं चुनती, वही जनता यहां अपने और अपने देश के लिए…’ ‘जिंदाबाद! जिंदाबाद!’ ‘जीत गया भाई जीत गया’ के नारों ने उसके बोलने की रफ्तार को यकायक रोक दिया। ‘कैसा हो-हल्ला है!’ टमाटर बोला। ‘अरे कुछ नहीं चुनाव जीत गया है…बहन का टका!’ आलू ने टका सा जवाब दिया। ‘कौन जीत गया!’ टमाटर ने उत्सुकता से पूछा। उसकी उत्सुकता से परिलक्षित था कि हाल-फिलहाल के लिए वह अपना दुख-दर्द भूल गया है। ‘जो जीता है बहुत छंटा हुआ इंसान है… एक नंबर का कमीना है… दंगा-फसाद करता है…इससे ज्यादा और न जान! समझा!’ आलू के स्वर में कुछ ज्यादा ही तल्खी थी। आलू के व्यवहार में अचानक से आया यह बदलाव, टमाटर की समझ से परे था, मगर इसकी वजह पूछने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। वह मन ही मन कयास लगाने लगा। वह कयास लगाते हुए सामने की छटा देखने लगा। वह देख रहा था कि उसके सामने से हवा में असलहे लहराते हुए ‘जिंदाबाद!’ ‘जिंदाबाद!’ के नारे लगाते हुए आदमियों और गाड़ियों का जत्था गुजर रहा था, जो खत्म होने का नाम ही न लेता था। इस दृश्य को टमाटर उत्सुकता से देख रहा था, और उसे देखकर आलू मायूस हो रहा था।

     क्यों! वो क्यों भाई साहब! मस्त,मलंग आलू मायूस क्यों हो गया! यह उल्टबांसी क्यों!

अनुभवी आलू समझ रहा है कि अभी-अभी जो कुछ टमाटर ने देखा है, उसे देखकर टमाटर की बुझती उम्मीद की लौ यकीनन एक बार फिर से रौशन हो गई है। इस दृश्य को देखने के बाद अब तोे उसकी उम्मीद अपेक्षया और बढ़ गई है कि एक दिन उसे भी चुना जाएगा…

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अर्थात- यथार्थ

शतप्रतिशत सच बोलते एक नेता की कहानी

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– अनूप मणि त्रिपाठी

एक नेता से जब पूछा गया कि उसने देश को क्या दिया? आप कहेंगे कि सवाल ही गलत पूछा गया है। चलिए मान लेते हैं कि सवाल गलत था,मगर नेता ने जो जवाब दिया वह सब सच-सच दिया। शतप्रतिशत सत्य। कसम से! जानता था आप नहीं मानेगे। चलिए सीधे आप को वहीं ले चलता हूं,जहां यह आश्चर्यजनक बात हुई है। मेरे साथ-साथ आप भी दुनिया का आठवां अजूबा घटते हुए देखिए …

क्या दिया आप ने इस देश को?
भाषण… और क्या दिया?
भाषण…
और?
भाषण…
अरे बाबा! इसके अलावा और क्या दिया है आप ने देश को?
आश्वासन…
और क्या?
बयान… और?
सफाई…
और क्या दिया?
आदेश…
और?
निर्देश…
जी और क्या?
उपदेश…
और?
राष्ट्र के नाम संदेश…
और?
त्योहारों पर शुभकामनाएं…
और क्या दिया? बताइए! बताइए!
साक्षात्कार…
और?
लंबा साक्षात्कार…
और?
रैली…
अच्छा,इसके अलावा और क्या?
धरना…
और?
वादा…
और क्या दिया आप ने देश को?
दंगा…
और?
घोटाला…
और?
आयोग…
और क्या-क्या?
धरना स्थल…
और क्या दिया?
महापुरूषों की मूर्तियां…
और क्या?
महापुरूषों के नाम से पार्क…
और?
पुराने जिलों को नया नाम…
और?…बताइए! और क्या दिया?…और क्या दिया आप ने?
बेटा…
बेटा!
हां, बेटा…
और? और क्या?
और -और क्या! अब क्या जान भी दे दूं…

एक-दो अपवादों को छोड़ देश के लिए नेता ने कब जान दी है! हमारे देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि इस देश का नेता देश के लिए नहीं कुर्सी के लिए जान देता है। बहरहाल,जवाब देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!

मित्रों!अब आप बताइए। नेता झूठ बोल रहा था कि सच! मैंने तो पहले ही आप से कहा था, आप मानते ही न थे। जानता हूं नेता की साफगोई,सच्चाई देखकर आप ने अपने दांतों तले अंगुली दबा ली होगी। और जब मैं आप से यह कहूंगा कि नेता ने द्वारा सच बोलने पर अचरज कैसा, तो मुझे डर है कि कहीं आप अंगुली के साथ अपना पूरा हाथ न चबा लें। इससे पहले मेरा डर यकीन में बदल जाए, उससे पहले ही मैं, ‘आखिर माजरा क्या है’ बताए देता हूं।
दरअसल,नेता का नार्काेटेस्ट चल रहा था,इसलिए वह सब सच-सच बोल रहा था। वरना ऐसा कही होता है! धत्! http://www.satyodaya.com

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