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अर्थात- यथार्थ

चुनाव की जुबानी कहानियां

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-अनूप मणि त्रिपाठी

1

नेता जी कुछ सहमे-सहमे से जा रहे थे कि उनकी पत्नी ने आवाज लगाई। ‘बीस बार कहा है कि पीछे से मत टोका करो!’ नेता जी कुछ झुंझलाते हुए बोले। उनकी पत्नी उनके कहे को अनसुना करते हुए आरती की थाल उनके मुखारबिंब के सामने गोल-गोल घुमाने लगी। ‘आज आपका चुनाव प्रचार का पहला दिन है, बिना रस्म के चले जाइगा! अशुभ होता!’ नेता जी की आरती उतारते हुए बोलीं। जब आरती पूरी हो गई। नेता जी जाने को हुए तब उनकी पत्नी ने फिर टोका,‘अभी एक सबसे जरूरी रस्म तो बाकी है! ऐसे ही चले जाएंगे!!!’  ‘ओह! मैं यह कैसेे भूल गया!’ नेता जी ने मन में सोचा। नेता जी फौरन अपनी जुबान बाहर निकाली। उनकी जुबान बाहर आते ही उनकी पत्नी ने उस पर तिलक लगा दिया। तिलक लगते ही नेता जी बहुत आत्मविश्वास के साथ दनदनाते हुए बाहर निकल गए।

2

आज नेता जी सपत्निक चिकित्सक के पास पहुंचे हुए है, जो उनका मित्र भी है। कुछ दिनों से तबीयत नासाज चल रही थी। कुछ भी खाते स्वाद न मिलता। चिकित्सक मित्र ने उनका मुआयना किया। मुंह खोलने को कहा। फिर जुबान बाहर निकालाने को कहा। नेता जी ने जैसे ही अपनी जुबान बाहर निकाली। चिकित्सक मित्र चैंक कर बोला,‘ ओ माइ गाॅड!!!’ ‘क्या हुआ भईया!! सब ठीक तो है न!’ नेता जी की पत्नी चितिंत हो कर बोली। ‘अरे! भाभी इतने सालों से प्रैक्टिस कर रहा हूं,मगर ऐसा तो पहली बार देख रहा हूं!’ चिकित्सक मित्र बोला। ‘क्या हुआ भईया! प्लीज बताइए न!’ नेता जी की पत्नी घबराकर बोलीं। ‘अरे भाभी! इसकी जुबान पर बैक्टीरिया से ज्यादा तो गालियां हैं!’ यह कहकर चिकित्सक मित्र जोर से हंस पड़ा। इतना सुनते ही नेता जी की जुबान हरकत में आई और उसमें से एक भारी-भरकम गाली बाहर निकल पड़ी।

(नेता जी की पत्नी भी बिना हंसे न रह सकी मानो कि वह उनकी बात से पूर्ण सहमत हो!)

3

पत्रकार जैसे ही नेता जी के घर में घुसा तो वहां का दृश्य देखकर दंग रह गया। उसने देखा कि नेता जी एक चाकू पर अपनी जुबान फेर रहे हैं। यह देखकर वह अंदर से काफी डर गया। वह वहां से उल्टे पांव लौटा। बाहर निकलते ही नेता जी के निकटस्थ सहयोगी ने शंकित हो कर पूछा,‘हो गया इंटरव्यू!’ पत्रकार ने एक सांस में अंदर देखी हुई सारी आप बीती बता दी। यह सुनकर नेता जी का निकटस्थ सहयोगी जोर से हंसा और बोला,‘ अरे कुछ नहीं! कई दिनों से भाभी जी उलहाना दे रही थीं, सो आज फुर्सत में थे, तो वह चाकू में धार लगा रहे थे…’

4

रात को देर से आए थे और सुबह जल्दी जाना था। सुबह उठ कर नेता जी ने जल्दी जल्दी ब्रश किया, फिर लगे जीभ साफ करने। ये देख कर उनकी धर्मपत्नी आग बबूला हो गईं। बोलीं,’ये क्या कर रहे हैं जी!’
‘जुबान साफ कर रहा हूं…’ नेता जी हड़बड़ाते हुए बोले।
‘तो आज प्रचार के लिए नहीं जाइयेगा!! क्या!!!’

5

नेता जी जब बोल रहे थे तब भीड़ में एक ने नेता जी का गला पकड़ लिया। यहां गला पकड़ना मुहावरा तक सीमित था, न की क्रिया। ‘पिछली बार आप जुबान दिए थे, मगर काम नहीं हुआ!’ वह आदमी बोला। ‘ऐ भाई! अगर हम  तुमको जुबान दे दिए थे तो अभी हम बोल कैसे रहे थे!’ नेता जी के यह कहते ही वहां एक जोरदार ठहाका लगा। सब नेता जी की वाक्पटुता के कायल हो गए और एक जोर का नारा लगा,‘हमारा नेता कैसा हो!’

6

तू झूठी है!

तू मक्कार है!

तू गद्दार है!

तू बदलचलन है!

तू आवारा है!

और तू…तू तो आग लगाती है!

हूंउ…तू किए कराए पर पानी फेर देती है!

और तू ऐसा करती है कि सिर फूट जाते हैं!

तू न हो न…तेरे मालिक को कोई न पूछे!

अरे तू है तो तेरे मालिक की पूछ है!

एक बात तो बता!

क्या!

हम आपस में लड़ क्यों रहे हैं!

क्योंकि हम दोनों नेता की जुबानें जो हैं!

7

चुनाव आ गए थे। नेता जी चुनाव में खडे़ हुए मगर उनका गला बैठ गया।

गला बैठते ही नेता जी का दिल बैठ गया। चुनाव सिर पर है अब क्या किया जाए! वह बोलने की पूरी कोशिश करते तो सरसराती सी आवाज निकलती, जैसे कोई सांप फुफकार रहा हो! डाक्टर का कहना है कम से कम पंद्ररह दिन लगेंगे। साथ में सख्त हिदायत भी दी है कि गले पर जरा भी जोर नहीं देना है। अब क्या किया जाए! इतना पैसा खर्च करके को पार्टी का टिकट मिला! क्या सब यूं ही बेकार चला जाएगा! अगर वो बोलेंगे नहीं तो चुनाव कैसे जीतेगे!‘जब जवाब देने का समय आया तो नेता जी की बोलती बंद हो गई’ कह कर विरोधी उनका मजाक उड़ाएंगे, वह अलग! क्या किया जाए! नेता जी यही सब सोच-सोच कर बेदम हुए जा रहे थे। बहुत सोच विचार के बाद दो उपाय निकाले गए।

पहला, जनता में उनकी पत्नी द्वारा यह कहा जाएगा कि पांच साल से जनता की आवाज उठाते-उठाते नेता जी की खुद की आवाज बैठ गई।

दूसरा, रैली-जनसभा में उनके पुराने भाषण के पुराने रिकार्ड बजा दिए जाएं!

8

रात के एक बजे फोन घनघनाया। डाक्टर साहब ने आंखें मींचते हुए फोन उठाया। ‘डाक्टर साहब! फौरन नेता जी के घर चले आइए! इमरजेंसी है!’ उधर से एक घबराती हुई आवाज आई। ‘हां…हां… क्या हुआ नेता जी को!’ डाक्टर  धीरे से बोला। ‘अरे डाक्टर साहब क्या बताए! नेता जी अभी खाना खा रहे थे कि….’ ‘हां हैल्लो!’ डाक्टर साहब ने पूछा। नेटवर्क के चलते उसकी आवाज बीच में चली गई थी। ‘हां हेल्लो! क्या हुआ नेता जी को  खाना खाते समय!’ डाक्टर साहब  थोडे़ से सावधान हुए। ‘क्या बताएं डाक्टर साहब! नेता जी ने अभी दूसरा कौर मुंह में डाला ही था कि खाते वक्त उनकी जुबान कट गई! आपको फौरन बुलाया है! नेता जी कह रहे हैं जरा भी रिस्क नहीं ले सकते!!!’ ‘हां भई! चुनाव का टाइम जो है!’ डाक्टर जम्हाई लेता हुआ बोला।

9

तुमको 13 का पहाड़ा याद नहीं हुआ!
बच्चा चुप रहा।
इतनी देर से बैठे हो,फिर भी!
बच्चा कुछ न बोला।
हद है महाराज! तुमको दिक़्क़त क्या है!
अब नेता जी से रहा नहीं गया। वह पत्नी को डांटते हुए बोले,’ ई पहाड़ा है पहाड़ा… कौनो गाली नहीं कि एके सांस में सब सुना दे!!!’

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अर्थात- यथार्थ

रावण को देखना तो चाहता हूं, मगर…

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आज विजय दशमी है… देख रहा हूं अपने शहर को। महसूस कर रहा हूं उसके जोश को। जगह-जगह होती रामलीला। जगह-जगह लगे मेले। मेले में जाते लोगों का रेला। रह-रह कर सुनाई देता रावण का अट्टहास। कहीं सुनाई देता ‘मेरी मानो कहूं मैं भइया, वे तो हैं रघुबीर’ तो कहीं ‘सठ मेघनाद तोहे मारूं, तेरे तन से शीश उतारू..’ रावण को लेकर क्या बच्चे-क्या बड़े सभी उत्साहित दिख रह। हर गली में रावण! हर मोहल्ले में रावण! न जाने कितने रावण को देख रहा हूं मैं…
आज विजय दशमी है… पर न जाने क्यों रावण पर दया आ रही है मुझे! उसके लिए ‘बेचारा’ शब्द निकल रहा है मेरे मुंह से। आज विज्ञापनों में प्रोडक्ट बेचने का जरिया बना है रावण। बाजार जानता है ऐब को खूबी में बदलना। खूब लतीफे बनाए जा रहे हैं इस पर । आज भी मोबाइल पर दो-तीन मजेदार लतीफे रावण पर ही आए हैं। आज त्रेतायुग के रावण की यही हैसियत है कि मजेदार लतीफों-विज्ञापनों और स्वाहा हो कर हमारा मनोरंजन करे!
आज विजय दशमी है… देश में न जाने कितने रावण जलाए जाएंगे। उनमें से न जाने कितने तो मेरे शहर में ही। लोग ताली पीट-पीटकर जलते हुए रावण को देखेंगे। आसमान में आतिशबाजी होगी। शानदार। नयनाभिराम। लोग लुत्फ लेकर घरों को वापस लौट जाएंगे। लौटगें इसलिए, ताकि अगले साल आकर रावण को देखने का मजा फिर ले सके। सालांे से रावण को जलाया जा रहा है। इस बार भी जलाया जाएगा। हर साल इसको जलते हुए देखकर ऐसा लगता है कि मानो पिछली बार वाला रावण ही जलाया जा रहा है!
आज विजय दशमी है… मेरे मोहल्ले में भी रावण खड़ा हो रहा है। कल बच्चे चंदा मांगने आए थे। सारे बच्चे ऐसे उत्साहित थे, जैसे स्कूल में छुट्टी का घंटा बजने पर होते हंै। बच्चों को चंदा देने से मना करने पर मेरी माता जी मुझ पर भड़क गईं। बोली, ‘चंदा दे दो… बीस रुपये की ही तो बात है।’ माता जी मुझे फटकार न लगाती, तब भी मैं बच्चों को चंदा दे ही देता। वो तो जरा मैं बच्चों के धैर्य की परीक्षा ले रहा था। राम जी में बड़ा धैर्य था। चैदह वर्ष बनवास के काटे… फिर अपने किए पर पछतावा होने लगा। बच्चे और धैर्य! बाबा तुलसीदास ने कहा भी है कि बालक और वानर एक समान…धैर्य तो इस देश की जनता में है अथाह,अपरिमित…
आज विजय दशमी है… बच्चे बहुत मन से रावण को बना रहे हैं। बांस की फट्टी पर अखबार लपेट कर रावण का ढांचा खड़ा कर रहे हंै। एक बच्चा अपने पिता से डांट खा रहा है। कारण! वह उत्साह के अतिरेक में आज का अखबार उठा लाया है और उसके पिता जी के तेवरों से साफ पता चलता है कि उन्होंने वह अखबार अभी तक पढ़ा नहीं है। अचानक मुझे याद आया कि अरे आज का अखबार तो मैंने भी नहीं पढ़ा! मैंने वह अखबार अपने हाथों में ले लिया है। पहला पेज ही अपराध,धोखाधड़ी की खबरों से भरा था। उसकी कुछ हेंडिग थीं- मंत्री के ऊपर भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरूपयोग का गंभीर आरोप। गुस्साए चालक ने यात्रियों पर बस चढ़ाई,7 की मौत! शौच को जाती महिला से बलात्कार!अब आगे अखबार क्या पढ़ता! मन उचट गया। अखबार एक किनारे रख दिया और बच्चों को रावण बनाते हुए देखने लगा। तभी सहसा एक ख्याल ने जन्म ले लिया। पहले तो ये बुराई के प्रतीक रावण को बनाएंगे फिर जलाएंगे। अरे भाई ,जब बाद में मारना है, तो रावण को पैदा ही क्योंकर किया जाए?
आज विजय दशमी है… ऐसी ही पिछले साल विजय दशमी को, पहुंचा था शहर के मुख्य अधिकारिक रावण को देखने। देखा था पार्क में रावण उसके बेटे मेघनाद और उसके भाई कुंभकरण के विशाल पुतले। रावण इतना ऊंचा दिख रहा था कि इसके आगे हम सभी बौने नजर आ रहे थे। मंहगाई की मार रावण पर पड़ते हुए नहीं दिख रही थी। और जिन पर पड़ रही थी,वे रावण देखने आए थे। रावण को महंगाई क्या चिंता! जब रावण और उसके संबधी धूं धूं कर के जल रहे थे, उसी बीच शोर सुनाई दिया था। किसी की जेब कट गयी थी। जिसकी जेब कटी थी, वो व्याकुल दिख रहा था, शायद उसी तरह जैसे रावण अपनी बहन की नाक कटने पर हुआ होगा। लगता था, अगर कहीं जेब कतरा उसके हाथ लग जाए, तो वो उसे मार ही डालेगा। तभी भीड़ में एक महिला ने कुछ प्रतिकार किया था। शायद उसे कोई छेड़ रहा था। भीड़ का फायदा लेना तो कोई कामी, नेता या जेबकतरों से सीखे! नेता नामक प्रजाति ने तो इसमें इतना सिद्धहस्त हो चला है कि भीड़तंत्र को वह अकसर लोकतंत्र मंे बदल देता है…
‘आज विजयदश्मी है’ यह कहता हुआ वह अखबार अभी मेरे पास ही पड़ा है। उसके पन्ने फड़फड़ा रहें। जैसे कह रहे हों कि मुझे आगे भी तो पढ़ो! अब आगे क्या पढूं! अखबार में जो हमारे ‘सभ्य’ समाज की खबरें प्रकाशित हुई हैं, उन्हें पढ़ कर रावण के प्रति वितिष्णा कम-सी होने लगती है। सोचता हूं, आज मैं भी रावण दहन देखने जाऊं,पर सोचता हूं,क्या मुंह ले कर जाऊं, रावण के तो केवल दस शीश थे! ऐसी सूरत में जब मैं अपने गिरेबान में झांकता हूं, तो मेरा मुंह लटक जाता है, और रावण को देखने का ख्याल एक सिरे से गायब हो जाता है… फिलहाल, आप सबको विजय दशमी की शुभकामनाएं!!

अनूप मणि त्रिपाठी

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अर्थात- यथार्थ

कुछ प्याजू एसएमएस

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जानता हूं आजकल आपके खाने से प्याज ऐसे गायब है जैसे राजनीति से नैतिकता। जैसे दूध से कैल्शियम। जैसे पानी से शुद्धता। जैसे व्यवहार से शालीनता। जैसे बयान से बुद्धिमत्ता। जैसे शिक्षा से जीविका। कुछ वैसे ही…। तिस पर हमारे माननीय नेतागण कहते हैं कि प्याज को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए। सही कहते हैं वे। राजनीति से अलग कई विकल्प खुले हुए हैं आमजन के लिए। वह चाहे तो प्याज को लेकर चुटकुले बना सकते हैं। प्याज को देखकर मुंह में पानी ला सकते हैं। प्याज की फोटू अपने सीने से चिपका कर आहें भर सकते हैं। प्याज की याद में आंसू बहा सकते हैं। प्याज पर कविता लिख सकते हैं।

कविता लिखने का मन न हो तो कहानी या गीत लिख सकते हैं। बाजार जाकर प्याज के नित दर्शन कर सकते हैं। प्याज के बदले सेब खाने पर विचार कर सकते हैं। बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद जैसे मुहावरे को यों बदल सकते है-बंदर क्या जाने प्याज का स्वाद। आप तब तक ये सब करते रहिए, जब तक प्याज आप की पहुंच से दूर है। ऊपर बैठने वाले भले न कुछ ठीक कर पाएं, मगर एक न एक दिन ऊपर वाला सब ठीक कर देगा। सब्र रखिए। जैसे आजादी के इत्ते वर्षों से रखते आए हैं। अब देखिए न, इन दिनों प्याज के मुताल्लिक मेरे मोबाइल पर एसएमएस की बाढ़ आई हुई है। प्याज खाकर नहीं, इन्हें पढ़कर ही सही, मेरी तरह आप भी अपना दिल हल्का करें।

मुलाइजा फरमाइए कुछ प्याजू (धांसू) एसएमएस-

(1)
श्रोता- रेडियो जॉकी से- जी मैं एक गाना सुनना चाहता हूं।
रेडियो- जॉकी- कौन सा!
श्रोता- आशिकी टू का वो गाना ‘सुन रहा है न तू,रो रहा हूं मैं…
रेडियो- जॉकी-जी बहुत अच्छा! यह गाना आप किसको डैडिकेट करना चाहेंगे!’
श्रोता- जी, प्याज को!’

(2)
बहुत ही अच्छा रिश्ता लाया हूं जजमान!
अच्छा!
जी हां!
लड़का क्या करता है पंडित जी!
अरे वो सब छोड़िए! आप तो बस यह जानिए की वह प्याज नहीं खाता है।

(3)
संताः प्याज दाल फ्राई के काम में नहीं आ रहा है आजकल।
बंताः किस काम में आ रहा है फिर!
संताः भेजाफ्राई के काम में।

(4) चलो कोई तो है जो मेरी बीवी को रुला सकता है। मैं समझता था कि उसे रुलाने वाला आज तक कोई पैदा ही नहीं हुआ।

(5) ‘तुम्हारी कोई अंतिम इच्छा?’ फांसी की सजा पाए व्यक्ति से जेलर ने पूछा।
‘जी, बस प्याज की पकौड़ी खाना चाहता हूं।’

(6) ‘इस बार का चुनाव कैसे जीता जाएगा सरकार!’ चमचे ने कहा।
‘इस बार दारु के साथ प्याज भी बंटवा देंगे।’ नेता ने निश्चिंतभाव से कहा।

(7) ‘बाबूजी यह वाला ले जाइए! नया आइटम है।’
‘अच्छा, इसमें क्या खास बात है भई!’
‘यह प्याज बम है! प्याज बम!’
‘धमाका करेगा!’
‘इतनी तेज कि सरकार गिर जाए!’
‘कितने का है!’
दाम सुनकर फिलहाल खरीददार गिरा पड़ा है।

(8) चलते-चलते एक आदमी का संतुलन बिगड़ा और उसके झोले से निकल कर प्याज यहां-वहां बिखर गई। यह दृश्य देखकर वहां खड़े तमाशबीनों ने उसकी जमकर पिटाई कर दी। जब उसने अपना गुनाह पूछा, तो पीटने वालों में से एक बोला,‘साले प्याज चुराता है ।

(9) ब्रेकिंग न्यूजः बाजार में जल्द ही एक ऐसा परफ्यूम आने वाला है जिसकी महक प्याज की तरह होगी। आप चाहें तो उसे अपने कपड़े पर लगा सकेंगे या अपनी जुबान पर।

अनूप मणि त्रिपाठी

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अर्थात- यथार्थ

रुपया तुम कितना भी गिरो !

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‘रुपया गिरा’ ‘रुपया गिरा’ रुपया गिर कैसे सकता है! चलते-चलते किसी का तो गिर सकता है, मगर खुद ही कैसे गिर सकता है। कहावत है कि फलां के नाम का सिक्का चलना। जब सिक्का चलता है, तो वह चलते-चलते कभी-कभार गिर भी सकता है। मगर रुपये को क्या होता है कि जब देखो तब वह गिर जाता है! उसे कोई धक्का देता है या कोई लंगड़ी मार देता है! बैठे-ठाढ़े रुपये का गिरना समझ से परे है।
रुपये के गिरने की खबर खूब सुनने को मिलती है, जबकि सिक्के के गिरने की नहीं। बड़ी धांधली है साहब! मेरा निजी अनुभव है कि सड़क पर मैंने सिक्के गिरे हुए ज्यादा देखे हैं। गोल-गोल चिकने-चिकने सिक्कों के गिरने के चांस भी बहुत होते हैं। मगर रुपया गिरा-रुपया गिरा का शोर ही सुनाई देता है, जिसके गिरने पर तनिक आवाज भी न होगी। ‘सिक्का गिरा’ की खबर सुनने को तो कान तरस गए हैं। हां, यह जरूर है कि बाजार से फलां-फलां मूल्य के सिक्कों के गायब होने की खबर गाहे-बगाहे आ जाती है, मगर मेरी याददाश्त में मैंने कभी नहीं सुना कि सिक्का गिरा।
कभी-कभी पढ़ने-सुनने को मिलता है- रुपया टूटा। अब बताइए कागज का रुपया टूट कैसे सकता है। वह फट तो सकता है, मगर टूट नहीं सकता है। मगर गैरजिम्मेदार लोगों का क्या है, कुछ भी लिख देंगे, कुछ भी बोल देंगेे। चलो माना, रुपया गिर गया, तो गिर कर जाता कहां है। जहां गिर गया है, वहीं से उठा लो न। समस्या क्या है। इतना शोर क्यों मचाते हो भई? अपन को समझ नहीं आता कि रुपया गिरता कैसे है!
अभी मैं इससे ज्यादा कुछ और सोचता-विचारता कि मेरे सामने रुपया आकर खड़ा हो गया। फिर बातों का क्रम कुछ इस तरह चला-

‘क्या तुम रुपया हो?’
‘हां’
‘कुछ लिबलिबे से लग रहे हो!’
‘लिबलिबे!’
‘मतलब, तुम्हारे अंदर की कड़क गायब है।’
‘मत पूछो, आजकल अपनी हालत पतली है।’
‘तुम जनता तो हो नहीं!’
‘जानता हूं…’
‘मगर यहां कैसे!’
‘बस आ गया…’
‘बताओ, मैं क्या कर सकता हूं तुम्हारे लिए!’
‘मैं लगातार गिर रहा हूं…’
‘तुम तो खड़े हो!मेरे सामने!’
‘बेवकूफ! कहने का मतलब मेरे मूल्य में गिरावट हो रही है…’
‘तुम्हारा तो अभी भी बहुत मूल्य है,घबराते क्यों हो?’
‘इसी तरह से गिरता रहा तो मैं रसातल में पहुंच जाऊंगा!’
‘चिंता न करो,सब ठीक हो जाएगा।’
‘तुम ऐसा कैसे कह सकते हो?’
‘यहां ऐसा ही कहा जाता है। बड़ी से बड़ी मुसीबतों से पार पाने का यह हम आम भारतीयों का सूत्रवाक्य है।’
‘हूं..मैं ऐसे ही गिरता रहा तो मुझे कौन पूछेगा!’
‘नहीं, ऐसी बात नहीं है। सब पूछेंगे।’
‘मैं अब और गिरना नहीं चाहता।’
‘देखते नहीं, वित्तमंत्री, प्रधानमंत्री, अर्थशास्त्री सब मिलककर तुम्हें उठाने का प्रयास कर रहे हैं!’
‘मगर फायदा क्या! मैं तो गिर रहा हूं।’
‘तब से देख रहा हूं कि जब से तुम आए हो अपने बारे में बात कर रहे होे!’
‘नहीं पूरी तरह से नहीं, मैं तुम सब के बारे में भी सोच रहा हूं…’
‘वो कैसे!’
‘मेरे गिरने से महंगाई बढे़गी।’
‘मंहगाई तो वैसे भी बढ़ रही है।’
‘मेरे गिरने से और बढे़गी और उसका असर तुम जैसों पर ही पडे़गा।’
‘कमाल है! यहां कुछ भी हो उसका असर आम आदमी पर ही पड़ता है। यहां तक नेता जी को नजला हो, तो वो भी जनता पर ही उतरता है।’
‘कुछ करो, वरना मंहगाई तुम सब को जीने नहीं देगी।’
‘वैसे ही कौन सा जीने दे रही है सरकार।’
‘क्या कहा!’
‘खैर छोड़ो!’
‘मै यूं ही गिरता तो ‘बाप बड़ा न भईया,सबसे बड़ा रुपया/ माना मैं खुदा नहीं मगर खुदा की कसम खुदा से कम भी नहीं…वाले दिन कहीं लद न जाए!’
‘अब आए न असल मुद्दे पर।’
‘बोलो न,मेरा क्या होगा!’
‘अरे, तुम चिंता मत करो। तुम्हारा मूल्य कितना भी कम हो जाए, मगर तुम्हारेे भाव का सेंसेक्स सदा ऊपर ही रहेगा। तथास्तु!’
‘खीसे मत निपोरो! लेखक हो न, बातें बनाना खूब जानते हो!’
‘क्यों लेखक को ही बदनाम करते हो! पार्टी प्रवक्ता, रिस्पेसनिस्ट, कस्टमर केयर, सेल्समैन के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है! बकवास करता है…’
‘नाराज मत हो, मेरी दशा पर तो तरस खाओ!’
‘बहुत हुआ! मेरा सिर न खाओ। मुझे लिखना है अब यहां से जाओ!’
‘अच्छा, मेरे बारे में ही लिखो।’
तुम्हारे बारे में तो बहुत कुछ लिखा जा चुका है, लिखा जा रहा है। ऐसे में मैं भला क्या लिखूंगा, अगर लिखूंगा भी तो नया क्या लिखूंगा!’
‘तुम नया यह लिखो कि अगर रुपया ऐसे ही गिरता रहा तो उसे कोई नहीं पूछेगा।’
‘मैं झूठ नहीं लिखता।’
‘इसमें झूठ क्या है? ठीक तो कह रहा हूं। मेरा मूल्य डाॅलर के मुकाबले गिरता रहेगा, तो मुझे कौन पूछेगा!’
‘इसमे तुम्हारा कोई दोष नहीं है। तुमने अर्थशास्त्र ही पढ़ा है, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र नहीं।’
‘क्या मतलब!’
‘मतलब यह कि तुम जितना भी गिर जाओ, तुम्हारे पीछे आदमी गिरना नहीं छोडे़गा, मेरे बाप!’ ‘तुम्हारे पास सिर्फ लच्छेदार बातें हैं, समाधान नहीं।’

यह कहते हुए रुपया तुनक कर जाने लगा। यह क्या! वह मेरे सामने ही मेरे घर से जा रहा था। घर आए रुपये को ऐसे-कैसे जाने देता! मैंने लपकर उसे अपने हाथों में जकड़ लिया। जैसे लपक कर हम सड़क पर गिरे हुए रुपये को उठाते हैं। उसी तेजी के साथ। वह ‘छोड़ो!’ ‘छोड़ो!’ चिल्लाने लगा। बिना मेहनत के आए हुए रुपये को मैं हस्तगत करने का अभयस्त नहीं था, सो घबराहट में पकड़ ढीली हो गई और रुपया मेरे हाथों से आजाद हो गया। आजाद होते ही, वह तेजी से बाजार की ओर लपका। जाते-जाते बोला, ‘मैं तो अपने गिरने कोे लेकर व्यर्थ ही चिंतित हो रहा था…तुमने ठीक ही कहा था कलमघीसू!’’

अनूप मणि त्रिपाठी

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