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अर्थात- यथार्थ

उन्हें पता है इस बार कुर्सी पर कौन बैठेगा…

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अनूप मणि त्रिपाठी

‘काफी नाम सुना है तुम्हारा…’ उनकी आवाज गरजदार थी।

‘जी, शुक्रिया!’

‘बता रहे थे तुम काफी अच्छा लिखते हो!’

‘अब मैं क्या बोलूं सर!’ उसे समझ में नहीं आया कि वह इसका क्या जवाब दिया जाए।

‘तुम्हें मालूम है न तुम्हें किस लिए बुलाया गया है!’ उन्होंने उसकी आंखों में झांका।
‘जी कुछ कुछ…’ यह सुनकर वे मुस्कुराए।

‘तुम्हें हमारी पार्टी के लिए काम करना होगा!’ उन्होंने अपने इरादे स्पष्ट किए।
‘जी!’

‘कर लोगे!’ वे शंकालू भाव से बोले।

‘जी पूरी कोशिश करूंगा!’ उसने उन्हें आश्वस्त किया।

‘पिछली बार हम इसी वजह से हारे हैं’ फिर एक अल्पविराम के बाद बोले,’ दूसरी पार्टी ने अच्छा आदमी पकड़ा था।

उसे लगा कि वे लेखक या राइटर बोलेंगे!
‘सर, मुझे क्या करना होगा!’

‘करना क्या होगा…लिखना होगा… वो भी शानदार!’ उनकी गरजदार आवाज गूंजी।

‘क्या सर!’

‘अरे! नारे, गीत , भाषण वगैरह…’

उसे अपने सवाल पर पछतावा हुआ। उसे लगा कि हड़बड़ी में वह एक गैरवाजिब सवाल कर बैठा।

‘पेमेंट का कोई इशू नहीं…’ उसको असहज देख वे बोले।

‘नहीं सर ..ऐसी कोई बात नहीं..’

उन्होंने उसकी बात पर कान न धरा। वे बोले,’ देखो!! पिछली बार उनकी सरकार

इस लिये बनी कि उनके नारे अच्छे थे…इनफैक्ट बहुत अच्छे!’
‘जी!’

‘इस बार हम जीते तो जानते हो कुर्सी पर कौन बैठेगा!’

‘सर आप!’

‘नहीं , तुम्हारा लिखा हुआ नारा…’

यह सुनकर उसके सीने में न जाने कितनी वायु भर गई। इतनी कि प्राण वायु निकल भी सकती थी!

‘यहां नारे ही चलते हैं, वही राजनीति चलाते हैं और वही लोकतंत्र की कुर्सी पर बिराजते हैं.. आजादी के कुछेक दशक के बाद से ही आज तक कोई नेता नारों से बड़ा नहीं हुआ। बल्कि नारों ने ही बड़े नेता बनाए हैं.. सत्ता का सार यही है और विस्तार यही है..” वे बहते पानी की तरह बोलते गए।

‘राइट सर!’

‘यह सब मैं तुम्हें इस लिए बता रहा हूं कि तुम अपने काम के इम्पोर्टेंस के बारे में जान सको। ये बहुत ही जिम्मेवारी वाला काम है! समझे!’ यह कहकर उन्होंने अपनी अनुभवी आंखों से उसको अंदर तक टटोला।

‘समझ गया सर! आप चिंता न करें!’

‘अच्छा, ये तुम्हारे पास घोषणापत्र के लिए कोई नया शब्द है!’
वह समझ गया कि उनके इस सवाल पर ही मेरा चयन निर्भर करता है।

‘इस बार चुनाव में उतरे तो कुछ नया हो! देखो, पिछली बार सभी पार्टियों ने घोषणापत्र को घोषणापत्र ही कहा, मगर एक पार्टी ने अपने घोषणा पत्र को सर्वथा अलग नाम दिया। सिर्फ नाम बदलने से ही वह अलग दिखने लगी। यहां तो किसी चीज का नाम बदल दो आधी जनता को तो ऐसे ही लगता है कि विकास हो गया…’ बोलते हुए वे अचानक से रुक गए।

‘जी सर!’

‘कुछ सोचा!’तुम चाहो तो दूसरे कमरे में चले जाओ! वहां आराम से सोच कर बताओ!’

‘बस एक मिनट सर!’

‘चाय-कॉफी कुछ लोगे!’

‘थैंक्यू सर! सर…घोषणा पत्र की जगह उद्धार प्रपत्र या पत्र कहा जाए!’

‘उहुं! कुछ ज्यादा ही गूढ़ हो गया!’ वे मुंह बिचकाते हुए बोले।

‘फिर सर ये कैसा रहेगा! कायाकल्प पत्र..’

‘वंडरफुल!!’ यह बोलते हुए उनकी आंखें चमक उठीं। और उनकी आंखों की चमक देखते ही बनती थी। उन्होंने मेज पर रखी हुई घण्टी बजाई। सफारी सूट पहने एक आदमी फौरन हाजिर हुआ।

‘इनको अग्रिम धनराशि दे दी जाए!’ उसको देखते हुए वे बोले।

‘यस सर! ‘ ‘आइए!’ सफारी सूट वाले आदमी ने उसकी ओर देखा।

‘थैंक्यू सर!’ बोल कर उसने कुर्सी छोड़ दी।

जब वह कमरे से बाहर था तो उनकी आवाज आई।

‘आप तो कह रहे थे लेखक है !’

फिर इसके बाद उनकी एक जोरदार हंसी…

यह भी पढ़ें- विधायक जी के ‘चांद’ को चूम चुके ‘जूते’ की डायरी

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अर्थात- यथार्थ

चुनाव की जुबानी कहानियां

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-अनूप मणि त्रिपाठी

1

नेता जी कुछ सहमे-सहमे से जा रहे थे कि उनकी पत्नी ने आवाज लगाई। ‘बीस बार कहा है कि पीछे से मत टोका करो!’ नेता जी कुछ झुंझलाते हुए बोले। उनकी पत्नी उनके कहे को अनसुना करते हुए आरती की थाल उनके मुखारबिंब के सामने गोल-गोल घुमाने लगी। ‘आज आपका चुनाव प्रचार का पहला दिन है, बिना रस्म के चले जाइगा! अशुभ होता!’ नेता जी की आरती उतारते हुए बोलीं। जब आरती पूरी हो गई। नेता जी जाने को हुए तब उनकी पत्नी ने फिर टोका,‘अभी एक सबसे जरूरी रस्म तो बाकी है! ऐसे ही चले जाएंगे!!!’  ‘ओह! मैं यह कैसेे भूल गया!’ नेता जी ने मन में सोचा। नेता जी फौरन अपनी जुबान बाहर निकाली। उनकी जुबान बाहर आते ही उनकी पत्नी ने उस पर तिलक लगा दिया। तिलक लगते ही नेता जी बहुत आत्मविश्वास के साथ दनदनाते हुए बाहर निकल गए।

2

आज नेता जी सपत्निक चिकित्सक के पास पहुंचे हुए है, जो उनका मित्र भी है। कुछ दिनों से तबीयत नासाज चल रही थी। कुछ भी खाते स्वाद न मिलता। चिकित्सक मित्र ने उनका मुआयना किया। मुंह खोलने को कहा। फिर जुबान बाहर निकालाने को कहा। नेता जी ने जैसे ही अपनी जुबान बाहर निकाली। चिकित्सक मित्र चैंक कर बोला,‘ ओ माइ गाॅड!!!’ ‘क्या हुआ भईया!! सब ठीक तो है न!’ नेता जी की पत्नी चितिंत हो कर बोली। ‘अरे! भाभी इतने सालों से प्रैक्टिस कर रहा हूं,मगर ऐसा तो पहली बार देख रहा हूं!’ चिकित्सक मित्र बोला। ‘क्या हुआ भईया! प्लीज बताइए न!’ नेता जी की पत्नी घबराकर बोलीं। ‘अरे भाभी! इसकी जुबान पर बैक्टीरिया से ज्यादा तो गालियां हैं!’ यह कहकर चिकित्सक मित्र जोर से हंस पड़ा। इतना सुनते ही नेता जी की जुबान हरकत में आई और उसमें से एक भारी-भरकम गाली बाहर निकल पड़ी।

(नेता जी की पत्नी भी बिना हंसे न रह सकी मानो कि वह उनकी बात से पूर्ण सहमत हो!)

3

पत्रकार जैसे ही नेता जी के घर में घुसा तो वहां का दृश्य देखकर दंग रह गया। उसने देखा कि नेता जी एक चाकू पर अपनी जुबान फेर रहे हैं। यह देखकर वह अंदर से काफी डर गया। वह वहां से उल्टे पांव लौटा। बाहर निकलते ही नेता जी के निकटस्थ सहयोगी ने शंकित हो कर पूछा,‘हो गया इंटरव्यू!’ पत्रकार ने एक सांस में अंदर देखी हुई सारी आप बीती बता दी। यह सुनकर नेता जी का निकटस्थ सहयोगी जोर से हंसा और बोला,‘ अरे कुछ नहीं! कई दिनों से भाभी जी उलहाना दे रही थीं, सो आज फुर्सत में थे, तो वह चाकू में धार लगा रहे थे…’

4

रात को देर से आए थे और सुबह जल्दी जाना था। सुबह उठ कर नेता जी ने जल्दी जल्दी ब्रश किया, फिर लगे जीभ साफ करने। ये देख कर उनकी धर्मपत्नी आग बबूला हो गईं। बोलीं,’ये क्या कर रहे हैं जी!’
‘जुबान साफ कर रहा हूं…’ नेता जी हड़बड़ाते हुए बोले।
‘तो आज प्रचार के लिए नहीं जाइयेगा!! क्या!!!’

5

नेता जी जब बोल रहे थे तब भीड़ में एक ने नेता जी का गला पकड़ लिया। यहां गला पकड़ना मुहावरा तक सीमित था, न की क्रिया। ‘पिछली बार आप जुबान दिए थे, मगर काम नहीं हुआ!’ वह आदमी बोला। ‘ऐ भाई! अगर हम  तुमको जुबान दे दिए थे तो अभी हम बोल कैसे रहे थे!’ नेता जी के यह कहते ही वहां एक जोरदार ठहाका लगा। सब नेता जी की वाक्पटुता के कायल हो गए और एक जोर का नारा लगा,‘हमारा नेता कैसा हो!’

6

तू झूठी है!

तू मक्कार है!

तू गद्दार है!

तू बदलचलन है!

तू आवारा है!

और तू…तू तो आग लगाती है!

हूंउ…तू किए कराए पर पानी फेर देती है!

और तू ऐसा करती है कि सिर फूट जाते हैं!

तू न हो न…तेरे मालिक को कोई न पूछे!

अरे तू है तो तेरे मालिक की पूछ है!

एक बात तो बता!

क्या!

हम आपस में लड़ क्यों रहे हैं!

क्योंकि हम दोनों नेता की जुबानें जो हैं!

7

चुनाव आ गए थे। नेता जी चुनाव में खडे़ हुए मगर उनका गला बैठ गया।

गला बैठते ही नेता जी का दिल बैठ गया। चुनाव सिर पर है अब क्या किया जाए! वह बोलने की पूरी कोशिश करते तो सरसराती सी आवाज निकलती, जैसे कोई सांप फुफकार रहा हो! डाक्टर का कहना है कम से कम पंद्ररह दिन लगेंगे। साथ में सख्त हिदायत भी दी है कि गले पर जरा भी जोर नहीं देना है। अब क्या किया जाए! इतना पैसा खर्च करके को पार्टी का टिकट मिला! क्या सब यूं ही बेकार चला जाएगा! अगर वो बोलेंगे नहीं तो चुनाव कैसे जीतेगे!‘जब जवाब देने का समय आया तो नेता जी की बोलती बंद हो गई’ कह कर विरोधी उनका मजाक उड़ाएंगे, वह अलग! क्या किया जाए! नेता जी यही सब सोच-सोच कर बेदम हुए जा रहे थे। बहुत सोच विचार के बाद दो उपाय निकाले गए।

पहला, जनता में उनकी पत्नी द्वारा यह कहा जाएगा कि पांच साल से जनता की आवाज उठाते-उठाते नेता जी की खुद की आवाज बैठ गई।

दूसरा, रैली-जनसभा में उनके पुराने भाषण के पुराने रिकार्ड बजा दिए जाएं!

8

रात के एक बजे फोन घनघनाया। डाक्टर साहब ने आंखें मींचते हुए फोन उठाया। ‘डाक्टर साहब! फौरन नेता जी के घर चले आइए! इमरजेंसी है!’ उधर से एक घबराती हुई आवाज आई। ‘हां…हां… क्या हुआ नेता जी को!’ डाक्टर  धीरे से बोला। ‘अरे डाक्टर साहब क्या बताए! नेता जी अभी खाना खा रहे थे कि….’ ‘हां हैल्लो!’ डाक्टर साहब ने पूछा। नेटवर्क के चलते उसकी आवाज बीच में चली गई थी। ‘हां हेल्लो! क्या हुआ नेता जी को  खाना खाते समय!’ डाक्टर साहब  थोडे़ से सावधान हुए। ‘क्या बताएं डाक्टर साहब! नेता जी ने अभी दूसरा कौर मुंह में डाला ही था कि खाते वक्त उनकी जुबान कट गई! आपको फौरन बुलाया है! नेता जी कह रहे हैं जरा भी रिस्क नहीं ले सकते!!!’ ‘हां भई! चुनाव का टाइम जो है!’ डाक्टर जम्हाई लेता हुआ बोला।

9

तुमको 13 का पहाड़ा याद नहीं हुआ!
बच्चा चुप रहा।
इतनी देर से बैठे हो,फिर भी!
बच्चा कुछ न बोला।
हद है महाराज! तुमको दिक़्क़त क्या है!
अब नेता जी से रहा नहीं गया। वह पत्नी को डांटते हुए बोले,’ ई पहाड़ा है पहाड़ा… कौनो गाली नहीं कि एके सांस में सब सुना दे!!!’

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अर्थात- यथार्थ

रोचक चुनावी कथाएं!!

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-अनूप मणि त्रिपाठी 

(1)

ट्रेन आने वाली थी, जोकि पिछले चार घण्टे से आए जा रही थी। ऐसे में उसने टाइम पास की गरज से अपने को तौलने की सोची। वह खड़ा हो गया मशीन पर। उसमें से एक टिकट निकला। जिसमें एक तरफ उसका वजन पांच सौ किलो अंकित था और दूसरी तरफ ‘आप के अच्छे दिन आ गए हैं। आप का दिन शुभ हो!’ अंकित था।

उसे देखकर वो चौंका। वह मुश्किल से पचास किलो होगा और कहां ये मशीन पांच सौ बता रही है। न तो उसकी खुराक बढ़ी है, न तो उसकी तनख्वाह! कहीं थायराइड तो नहीं हो गया! उसे शंका हुई।

उसने फिर से सिक्का डाला और खुद को तौलने के लिए मशीन को समर्पित किया। नतीजा इस बार भी पांच सौ वाला ही निकला। इस बार वह मुस्कुराया। उसने सोचा कि मशीन भले ही खराब हो मगर परिणाम उसका एक ही आ रहा है।

उस का मन अभी भी नहीं माना। उसने एक बार खुद को तौला। मशीन से बाहर टिकट निकला जिस पर इस बार वजन के साथ कुछ और भी लिखा हुआ था,’ आप बार बार खुद को न तौले। आपका मौजूदा समय में वजन पांच सौ किलो ही है। आप का वजन दरसअल इसलिए बढ़ा गया है, क्योंकि देश में चुनाव चल रहा है। धन्यवाद।’

(2)

‘मां कर ली!’

‘रुक अभी!’

‘मां! मां!’

‘बोला न बैठा रह अभी!’

‘अब नहीं आ रही! हो चुकी है सारी…क्या करूं!’

‘अरे बेटा! बस थोड़ा सा सब्र कर!’

अब पति से नहीं रहा गया। वह गुस्से से बोल पड़ा,‘जब उसने कर ली है तो जा कर क्यों नहीं धुलवा देती हो!’

‘ वोट मांगते हुए अभी कोई न कोई नेता आ धमकता ही होगा!’

यह सुनते ही पति का गुस्सा शांत हो गया।

(3)

कल रात उसकी झोपड़ी में नेता जी ने खाना खाया। इतना ही नहीं बल्कि उसके साथ खाया। अगले दिन अखबार में उसकी फोटो छपी, जिसे देखकर वह गदगद हो गया। वह अखबार लेकर निकल पड़ा। उसे जो-जो मिलता उसे वह बहुत उत्साह के साथ दिखाता। अधिकांश लोगों की प्रतिक्रिया ‘वाह अपना जुमई बड़ा आदमी हो गया अब तो!’ रही।

वह अखबार दिखाते-दिखाते अपनी प्रंशसा पाते-पाते आखिकार उस जगह पर पहुंच गया जहां के लिए वह निकला था। लाला की दुकान पर पहुंचते ही उसने लाला के सामने अखबार बढ़ा दिया। लाला ने जिसे बहुत ध्यान से देखा। इसका परिणाम सुखद निकला। आज यह पहली बार हुआ था कि लाला ने बिना जली-कटी सुनाए हुए उधारी का राशन दे दिया था।

(4)

सभागार में नेता जी का धाराप्रवाह भाषण चल रहा था कि तभी भूकंप आ गया। सभी लोग आनन-फानन में सभागार के बाहर भागने लगे। कुछ ने भूंकप आने का कारण नेता जी के भाषण को दिया। लेकिन मन ही मन। नेता जी पूरी तेजी के साथ भागे। मगर उनके भागने में एक बात हो गई। मारे हड़बड़ी के वह कुर्सी उठाकर भागे।

खैर,कुछ देर बात खतरा टल गया। जान-माल का कोई नुकसान नहीं हुआ। जब सारी स्थिति समान्य हो गई तब नेता जी को सहसा एहसास हुआ कि वह गफलत में सभागार के बाहर अपने साथ कुर्सी ही उठा लाए। अब वह परेशान हो गए। चुनाव का समय। विरोधियों को अगर यह बात पता चल गई तो मजाक बनाएंगे और मीडिया की तो खैर पूछो मत! अब क्या किया जाए! नेता जी ने फौरन एक पहुंचे हुए ‘अपने आदमी’ को फोन मिलाया। जो उनकी सभी खबरों को मैनेज करता था और इसके साथ अन्य चैनल-अखबारों को भी। उसने नेता जी को बेफिक्र होने का इतना आश्वासन दिया, जितना नेता जी ने अभी तक जनता से वादा भी न किया होगा। नेता जी बहुत उलझनों के साथ घर पहुंचे। डरते हुए टीवी चलाया। वहां उनकी कोई खबर नहीं थी। अगली सुबह कुछ झिझकते हुए घर में आए हुए अखबारों को एक एक करके उठाया, वहां भी उनकी खबर नादारत थी। सिर्फ एक अखबार में इस घटना का जिक्र मात्र था जिसका शीर्षक इस प्रकार से दिया गया था…

‘भाषण के दौरान आया भूंकप, नेता जी जान हथेली पर लेकर भागे’

(5)

नेता जी पेट के बल लेटे हुए पीठ सहित कमर की मालिश करावा रहे थे तभी उनका साला आ गया। आते ही बोला,‘मिस्त्री कह रहा था कि गाड़ी के शॉकर बदलने पडे़ंगे…और कोई चारा नहीं है!’ नेता जी कछुए की तरह अपना सिर खींचते हुए बोले, ‘यार! तब तो लंबा खर्चा बैठेगा! अभी तो स्याला अपने निर्वाचन क्षेत्र में अपन लोग एक ही बार प्रचार करने गए हैं!!!’ उनका साला इस पर कुछ बोलता कि नेता जी के मुंह से जोर की एक ‘हाय!’ निकली। जिस वक्त नेता जी के मुंह से हाय निकली ठीक उसी वक्त मालिश वाले का हाथ पीठ से फिसल कर उनकी कमर पर आ गया था।  http://www.satyodaya.com

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अर्थात- यथार्थ

पेश है चुनावी मौसम का हाल

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-अनूप मणि त्रिपाठी

जैसा आप सब जानते हैं कि अभी-अभी चैत की आमद हुई है और इसी बीच इसमें चुनाव भी पड़ गया है। कुल मिलाकर यह मौसम चुनावी मौसम में तब्दील हो गया है। इस मौसम का हाल बताने में मौसम विभाग को पसीने आ रहे हैं। अंदरखाने की बात तो यह है कि इस मौसम की जानकारी देने में मौसम विभाग का मिजाज पूरी तरह से बिगड़ गया है। फिर भी पेश है चुनावी मौसम का हाल-

आसमान आशकिंत है, बादल बदहवास हैं, बिजली की बत्ती गुल है, क्योंकि वे सर्वथा अप्रत्याशित देख रहे हैं। वे देख रहे हैं कि प्रत्याशी गरज रहे हैं। कड़क रहे हैं। बरस रहे हैं। अजब छटा छाई है।

इस चुनावी मौसम में सूरज की घिघी बंध गई है। उसके तेवर उम्मीदवारों की त्यौरियों के सामने ढिले हैं। सूरज की किरणें बस्तियों में बाद में पहुंच पाती हैं उससे पहले नेता की टोली आ जाती है। सूरज से ज्यादा बाई गॉड! नेताओं के कुर्ते चमक रहे हैं। चिड़ियों से ज्यादा उनके चमचे चहक रहे हैं। वोऽ वोऽ वोऽ टऽ टऽ टऽ…

इस सर्दी के मौसम में अचानक से गर्मी में आर्श्चजनक उछाल देखा जा रहा है। दिनोंदिन गर्मी बढ़ती ही जा रही है। इसमें देश की भौगोलिक स्थिती का कोई हाथ नहीं है। बकौल विशेषज्ञ इस स्थिती के लिए जिम्मेदार चुनाव में खडे़ होने वाले नेताओं के मुख हैं। जो आजकल हर पल वोटरों के उन्मुख हैं। अब तो दिन और रात दोनों तप रहे हैं। आम गर्मी के कारण नहीं नेताओं के भाषण के कारण पक रहे हैं।

आरोपों की आंधियां प्रचंड चल रही हैं। रुक रुक कर नहीं लगातार चल रही हैं। जो रह-रहकर आचार संहिता के तम्बू उखाड़े जा रही हैं। चुनाव आयोग अधिकतम और न्यूनतम वेग दर्ज करने में अपने को असमर्थ पा रहा है क्योंकि हर क्षण आंधियों का वेग एक नया रिकार्ड बना रहा है।

जगह-जगह आश्वासनोंं का भारी वायुदाब देखने को मिल रहा है। जिसे हवाई पुल बहुत आसानी से झेल ले जा रहे हैं। कहीं कहीं शिकायतों के निम्नवायुदाब के क्षेत्र भी बन रहे हैं। जिसके चलते हवा का रूख अचानक से बदल सकता है। जुबानी पारा तेजी से ऊपर चढ़ रहा है, मर्यादा का पारा उतनी ही तेजी से लुढ़क रहा है।

घर से बाहर निकलने वालों के लिए चेतावनी-

अगर अतिआवश्यक न हो तो घर से बाहर न निकलें। अगर बाहर निकलना ही पडे़ तो मुंह और आंख ढक कर निकालें, क्योंकि रैलियों के कारण धूल उड़ रही है। जो आजकल मतदाताओं के आंखों में पड़ रही है। ज्यादा आंखें मिचने से कान में तेल डालना अच्छा है। बाहर धूल फांकने से घर में पड़ा रहना अच्छा है।

मौसम का पूर्वानुमान-

अगले कुछ दिनों तक मौसम जैसा है वैसा ही बना रहेगा। अभी वादों के बादल आंशिकरूप से छाए रहेंगे। झूठ की उमस और बढे़गी, मतदाताओं के आंखों की नमी और बढे़गी। नमी बढ़ने से गर्मी का एहसास ज्यादा होगा। प्रचार थमने के बाद ही राहत मिलने के आसार हैं। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद मौसम अचानक से करवट बदलेगा। मौसम सामान्य हो जाएगा। आज जो नेता जगराते कर रहे हैं वे चादर तान कर सोएंगे। आज जो मतदाता पूजे जा रहे हैं, वे करवट बदलकर रोएंगे। अगले पांच सालों के मौसम का पूर्वानुमान अभी से लगाना जितना मुश्किल है, जनता की हालत का पूर्वानुमान लगाना उतना ही आसान है।

चुनावी मौसम आते हैं चले जाते है, मगर देश का मिजाज बदलता ही नहीं! कमबख्त!

यह भी पढ़ें : ‘लोकतंत्र का मनभावन दृश्य’ जो नजर आने वाला है!

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