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स्वास्थ्य मंत्री ने गोरखपुर में बच्चों की मौत के आकड़ों पर अखिलेश को दिया ये जवाब

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लखनऊ: सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रविवार को प्रदेश मुख्यालय पर प्रेस कांफ्रेंस कर कहा था कि जेएनयू में हुआ हमला एक सोची समझी साजिश थी, जिसे भाजपा ने करवाया था। साथ ही पुलिस बवाल और हिंसा करने वालों को शह दे रही थी। भाजपा ये नहीं चाहती है कि गरीब बच्चे जेएनयू पढ़े और पढ़ लिखकर कुछ बन सके। यूपी सरकार व प्रशासन पर कई सवाल उठ रहे हैं। किस तरह से मुंह छुपा कर कई लोग जेएनयू परिसर में घुसे और वहां तोड़फोड़ की।

जिसके बाद अखिलेश यादव ने इसी क्रम में कहा था कि जनवरी से अक्टूबर 2019 के बीच गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज (बीआरडी) में एक हजार से ज्यादा बच्चों की मौत हुई, लेकिन मृतकों की संख्या को सरकार के निर्देश पर कम दिखाया गया क्योंकि सरकार का कहना था कि आंकड़े ठीक रहने चाहिए। साथ ही कहा था इसकी जांच हाईकोर्ट के सिटिंग जज की अध्यक्षता में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम से करवाई जानी चाहिए।

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जिसके बाद आज मंगलवार को स्वास्थ्य मंत्री जयप्रकाश सिंह ने अखिलेश यादव के बच्चों की मौत वाले बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि अखिलेश यादव कहां से आंकड़े लाते हैं मुझे पता नहीं है।  अखिलेश यादव इस बात की जानकारी दें कि किस अस्पताल में किन परिस्थितियों में बच्चों की मौतें हुई।  आगे उन्होंने कहा कि अखिलेश को ऐसे आरोप लगाते हुए बिल्कुल भी शोभा नहीं देता है।  पूर्व मुख्यमंत्री होते हुए भी ऐसी नासमझी बातें करना और बचपने की बातें करना अखिलेश की बौखलाहट दिखा रहा है।  उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए हम संकल्पित है।  

यूपी के अस्पतालों में साल भर में 10 करोड़ मरीज जाते हैं और वहां  के जो भी आंकड़े आते हैं, वह हम जारी करते हैं।  ऐसे आंकड़ों की जानकारी सिर्फ अखिलेश यादव को है, उनको बताना चाहिए यह आंकड़े वह कहां से लाएं हैं।  इसी कड़ी में आगे कहा कि जनता जागरूक है डॉक्टर जानते हैं कौन सी बीमारी में क्या इलाज करना है? बुखार से पीड़ित हर व्यक्ति की मौत नहीं होती है।  अखिलेश यादव के आरोपों में कोई भी तथ्य नहीं है।  अखिलेश यादव बोले तो हम इस मामले की जांच कराने के लिए तैयार हैं।  http://www.satyodaya.com

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यूपी सहित 10 राज्यों में 3 नवंबर को होंगे उपचुनाव, 10 को आएगा परिणाम

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात सहित 10 राज्यों की 54 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के लिए 3 नवंबर को मतदान होगा। चुनाव आयोग ने मंगलवार को कुल 56 विधानसभा सीटों और एक लोकसभा सीट के लिए उपचुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया। बिहार की एक लोकसभा सीट और और केन्द्र शासित प्रदेश मणिपुर की दो विधानसभा सीट पर 7 नवंबर को वोट डाले जाएंगे। सभी सीटों पर चुनाव परिणाम 10 नवंबर को जारी किए जाएंगे। उत्तर प्रदेश की आठ सीटों पर उपचुनाव होने हैं।

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आयोग ने असम, केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की कुल सात विधानसभा सीटों पर उपचुनाव न कराने का फैसला किया है। चुनाव आयोग के अनुसार इन राज्यों में अभी उपचुनाव के लिए हालात सही नहीं है। इन राज्यों ने उपचुनाव कराने में मौजूदा हालात में असमर्थता जताई है।बता दें कि बिहार में 28 अक्टूबर से विधानसभा चुनाव भी शुरू हो रहे हैं। 243 सीटों के लिए यहां तीन चरणों में चुनाव होने हैं। 10 नवंबर को ही बिहार विधानसभा चुनाव के भी परिणाम सामने आएंगे।http://www.satyodaya.com

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शोध में हुआ चौंकाने वाला खुलासा, जेएनयू के 87 फीसदी स्कॉलर्स में मानसिक तनाव

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लखनऊ। कोरोना के चलते शिक्षण संस्थान बंद होने से एमफिल और पीएचडी स्कॉलर्स की दिक्कतों पर शोध में हुआ है। जिसमें चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के 87 फीसदी एमफिल और पीएचडी स्कॉलर्स मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। जबकि 64.7 फीसदी स्कॉलर्स की स्कॉलरशिप तक रूक गई हैं।

जेएनयू के इन तीन रिसर्च स्कॉलर्स अलामू आर, सोमाश्री दास और यांगचेन ने कोरोना काल के दौरान छात्रों की स्थिति पर एक ऑनलाइन सर्वे किया है। इसके लिए इन्होंने जेएनयू के ही करीब 530 शोद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। जिसमें से करीब 41.5 फीसदी छात्र और 58.1 फीसदी छात्राएं शामिल हैं। वहीं इस शोध में छात्रों को आ रही परेशानी और उनकी मनोदशा पर सवाल पूछे थे। जिसमें से ज्यादातर ने अपनी मानसिक परिशानियों का हवाला दिया है।

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सर्वे में सामने आया है कि करीब 87 फीसदी छात्र अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। शोध कार्य पूरा न होने से स्कॉलरशिप भी रूक गई है। ऐसे में वे अपने खर्चे तक  नहीं निकाल पा रहे हैं। एमफिल और पीएचडी की किताब बहुत महंगी मिलती है। ऐसे में वे उन्हें खरीद तक नहीं सकते हैं। क्योंकि घर में भी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है।

शोध में दावा किया गया है कि मार्च में ही अधिकतर स्कॉलर्स अपने गांवों को लौट गए थे। महज 13 से 14 फीसदी छात्र ही कैंपस में है। करीब 75.9 फीसदी स्कॉलर्स का कहना है कि वे डिजिटली अपनी थीसिस और शोधकार्य पूरा नहीं कर सकते हैं। करीब दस फीसदी छात्रों ने कहा कि उनके घर में 4 से 6 घंटे बिजली कट होती है। जबकि 38 फीसदी ने कहा कि वे लगातार बिजली कट से परेशान रहे हैं।http://www.satyodaya.com

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28 साल का इंतजार खत्म, बाबरी विध्वंस मामले में फैसले की घड़ी निकट

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लखनऊ। बाबरी विध्वंस मामले में 28 साल बाद आखिरकार फैसले की घड़ी निकट आ गई है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ की विशेष सीबीआई अदालत 30 सितंबर को इस केस में अपना फैसला सुनाएगी। इस केस में स्पेशल सीबीआई जज एसके यादव हैं। इसे देखते हुए मध्य प्रदेश के दो बड़े नेताओं पर सबकी निगाहें टिक गई हैं। इनमें से एक हैं पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती और दूसरे हैं बजरंग दल के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया है। ये दोनों भी बाबरी केस में आरोपी बनाए गए थे। लिहाजा 30 सितंबर को आने वाले फैसले में इनके भविष्य का भी फैसला होगा। फैसले को देखते हुए पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया ग्वालियर से लखनऊ के लिए रवाना हो गए हैं, जबकि कोरोना पॉजिटिव होने की वजह से ये माना जा रहा है कि उमा भारती वीसी के ज़रिए कोर्ट की कार्यवाही में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगी।

बता दें 12 जून को बजरंग दल के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और मध्य प्रदेश बीजेपी के कद्दावर नेता जयभान सिंह पवैया के अंतिम बयान दर्ज किए गए थे। ग्वालियर से लखनऊ पहुंचे जयभान सिंह पवैया ने सीबीआई कोर्ट में अपने बयान दर्ज कराए थे। 5 घंटे तक चली कार्यवाही के दौरान उनसे कुल 1050 सवाल किए गए थे। इनमें कुछ सवाल प्रश्नावली के तहत पूछे गए। जबकि कुछ सवाल जज की ओर से पूछे गए थे। जयभान सिंह ने इन सभी 1050 सवालों के जवाब दिए थे। सीबीआई की विशेष कोर्ट में बयान दर्ज कराने के बाद जयभान सिंह पवैया ने अपने बयान में कहा था कि अगर राम काज के लिए उन्हें कोई कुर्बानी देनी पड़ी तो वह इसके लिए तैयार हैं।

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क्या है मामला
6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरा दिया गया था। इस मामले में बीजेपी के कई दिग्गज नेताओं को आरोपी बनाया गया था। जिसमें लाल कृष्ण आडवाणी, उमा भारती, मुरली मनोहर जोशी, कल्‍याण सिंह, जयभान सिंह पवैया समेत कई और बड़े नेता शामिल थे। इन सभी ने अदालती कार्रवाई का सामना किया। कई साल से चल रहे इस केस में कुछ आरोपियों की मृत्यु भी हो चुकी है।http://satyodaya.com

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