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आगरा के मेंटल हॉस्पिटल ने कृष्ण चंदर का ‘जामुन का पेड़’ दिलाया याद

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अभय सिन्हा

लखनऊ। आगरा के मेंटल हॉस्पिटल से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने कृष्ण चंदर के ‘जामुन का पेड़’ को फिर से जिंदा कर दिया है। जिनको नहीं पता उनको बता दें कि ‘जामुन का पेड़’ एक हास्य व्यंग है, जो लालफीताशाही पर तंज कसता है। पहले इसे स्कूल्स में 10वीं-11वीं में पढ़ाया भी जाता था लेकिन अब हटा लिया गया, वजह आप कुछ देर में समझ जाएंगे।

खैर यहां पूरी कहानी तो नहीं बता सकता हूं लेकिन संक्षेप में जिक्र करना जरूरी है। तब ही आप ताजा मामले यानि कि आगरा मेंटल हॉस्पिटल का प्रकरण समझ पाएंगे। 1961 का ये हास्य व्यंग कुछ यूं शुरू होता है कि एक सेक्रेटेरियेट में पेड़ होता है जामुन का जो गिर जाता है। माली को पता लगता है तो वो दौड़ा-दौड़ा पेड़ के पास आता है। देखता है कि पेड़ गिर गया है, वो तब चौंक जाता है जब देखता है कि पेड़ के नीचे एक शख्स दब गया है। पेड़ के नीचे एक आदमी दब गया है तो काफी लोग जमा हो जाते हैं। वहां चर्चा पहले पेड़ कि होती है कि कितना बढ़िया फलदार पेड़ था, क्या बढ़िया जामुन थे, वगैरह-वगैरह। बाद में ध्यान आदमी पर जाता है। अब वहां खड़े लोग सोचते हैं कि आदमी तो मर गया होगा लेकिन पता चलता है कि नहीं अभी जिंदा है। जिंदा है तो बाहर निकालो लेकिन समस्या यहीं तो होती है। कौन निकालेगा? वाणिज्य विभाग, वन विभाग, कृषि विभाग, हॉर्टिकल्चर विभाग, संस्कृति विभाग या विदेश विभाग। फाइल घूमना शुरू होती है। हर विभाग में पदानुक्रम का यानि कि जो पद की श्रंख्ला है उसका पूरा पालन करते हुए। दरअसल, मामला सरकारी था तो जूनियर क्लर्क से लेकर मुख्य सचिव तक फाइल घूमती है। हर विभाग अपना पल्ला झाड़ता है कि ये काम उसके विभाग का नहीं है। कुछ लोगों को गुस्सा भी आया, कोशिश हुई कि पेड़ को काटकर आदमी को बाहर निकाल लिया जाए। लेकिन उन्हें डांट लग गई। क्योंकि ये पेड़ कोई ऐसा-वैसा नहीं था बल्कि एक दूसरे देश के प्रधानमंत्री ने खुद लगाया था। गिरा हुआ पेड़ दोनों देशों के मजबूत संबधों की निशानी था। ऐसे में उन्होंने कहा कि एक आदमी की जिंदगी के लिए दो देशों के संबध नहीं खराब किये जा सकते।

ऐसा करते-करते दिन गुजरते जाते हैं और आदमी बेचारा पेड़ के नीचे दबा रहता है। जिंदा रहने के लिए आश्वासन मिलता रहता है। उम्मीद के सहारे वो पेड़ का भारी बोझ सहता रहता है। फाइल जब पूरी तरह घूमती है और सारे अधिकारियों और विभागों के चक्कर काट लेती है तो मामला प्रधानमंत्री तक पहुंच जाता है और फिर फैसला होता है कि हां पेड़ को काटना चाहिए। लेकिन तब तक पेड़ के नीचे दबे शख्स की जिंदगी की फाइल बंद हो चुकी थी।

कहानी स्कूल्स से क्यों हटाई गई है समझाने की जरूरत नहीं है लेकिन सवाल ये है कि आखिर इस कहानी का आगरा के मेंटल हॉस्पिटल से क्या संबध है? दरअसल, हुआ यूं कि आगरा के मानसिक अस्पताल में लगे सूखे और सड़े पेड़ों से मरीजों के स्वास्थ्य को खतरा है। अस्पताल के अधिकारी पेड़ों को काटना चाहते हैं। आप कहेंगे कि तो क्या समस्या है, पेड़ सूखे हैं और सड़े भी तो काट दीजिए लेकिन ऐसा नहीं हो सकता है। क्योंकि ये पेड़ टीटीजेड क्षेत्र में हैं। टीटीजेड यानि कि ताज ट्रेपेजियम क्षेत्र में हैं। यहां पेड़ काटने के लिए पहले सुप्रीम कोर्ट की अनुमति लेनी पड़ती है। यही कारण था कि वन विभाग ने पेड़ काटने की इजाजत नहीं दी। उसका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने टीटीजेड क्षेत्र में पेड़ काटने से मना किया है। फिर हॉस्पिटल के अधिकारी मजबूरी में सुप्रीम कोर्ट गए। CJI ने पहले कहा कि वे नगर निगम के पास आवेदन कर मृत पेड़ों को हटाने का अनुरोध करें। बाद में उन्होंने कहा कि वे इस मामले पर आगामी 2 सप्ताह के अंदर सुनवाई करेंगे।

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आगरा मेंटल हॉस्पिटल के वकील ने SC से कहा कि अस्पताल परिसर में सूखे और सड़ रहे पेड़ मानसिक रोगियों को डरा रहे हैं और रोगियों के स्वास्थ्य के साथ-साथ डॉक्टरों को भी प्रभावित करते हैं। लेकिन साहब काम सरकारी है, नियमों का पालन मानसिक रोगियों के स्वास्थ्य से ज्यादा जरूरी है। इसलिए पहले सुनवाई होगी, वो भी दो सप्ताह के अंदर।

जामुन का पेड़ होता तो शायद यही कहता कि साहब सूखे-सड़े पेड़ों पर फैसला हो इसके पहले सड़ी हुई इस व्यवस्था का कुछ कीजिए।

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो। ये कमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।

बाकी ये देश तो इंतजार करने में माहिर है। मरे हुए सिस्टम में लोकतंत्र की सांस चल रही हैं। लीजिये समय चाहे जितना हमें अहसास है।

जिस तरह चाहो बजाओ तुम हमें। हम नहीं हैं आदमी हम झुनझुने हैं।

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कैदी के खुद को गोली मारने के मामले में दस पुलिसकर्मी सस्पेंड, 7 को जेल

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सांकेतिक चित्र

लखनऊ: यूपी के मैनपुरी की जिला अदालत में पुलिस अभिरक्षा में कैदी द्वारा खुद को गोली मार कर घायल करने के मामले में 10 पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया।  साथ ही एक महिला व सात पुलिसकर्मियों के खिलाफ केस दर्ज करके जेल भेज दिया गया है।

जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने मंगलवार को एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा कि अपर जिला व सत्र न्यायाधीश चतुर्थ की अदालत में सोमवार को एक कैदी ने खुद को गोली मार ली थी। वहीं इस मामले में दो इंस्पेक्टर, एक सब इंस्पेक्टर और सात सिपाही समेत कुल 10 पुलिस कर्मी सस्पेंड किए गए हैं।  

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आगे बताया कि कैदी की पत्नी ने अदालत में तमंचा पहुंचाया था। फिलहाल पुलिस ने पत्नी को भी गिरफ्तार कर लिया है। वहीं इसमें  एक वकील की साजिश सामने आती दिख रही है।  जिसकी जांच कर उचित कार्रवाई की जाएगी। http://www.satyodaya.com

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प्राथमिक स्कूलों में नामी कंपनी के बांटे गए स्वेटर, क्वालिटी व साइज में मिली गड़बड़ी

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प्राथमिक स्कूलों

फाइल फोटो

लखनऊ। प्राथमिक स्कूलों में स्वेटर वितरण में गड़बड़ियां देखने को मिल रही हैं। जो स्वेटर स्कूल में बांटे जा रहे हैं उनकी क्वालिटी और साइज़ को लेकर कई सारी शिकायतें मिली हैं। इतना ही नहीं कई स्कूलों के छात्रों को जो स्वेटर बांटे गए हैं उनका लेबल भी बदल दिया गया है। हालांकि गड़बड़ी मिलने पर विभाग ने स्वेटर के नमूने को जांच के लिए भेज दिया है।

इसी तरह जिले में बेसिक के 1367 प्राथमिक और उच्च प्राथमिक के 472 विद्यालय हैं। इनमें करीब 1,87,000 छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। इन सभी को नि:शुल्क स्वेटर बांटा गया। इनकी गुणवत्ता को लेकर शिकायतें मिली हैं। कई विद्यालयों को जो स्वेटर दिए गए हैं, उनके लेबल भी बदल दिए  गए हैं।

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ऐसे में आरोप है कि जो लेबल लगा था उसे हटवाकर फेमस कंपनी का लेबल लगाया गया है।  यह लेबल हटाने के चक्कर में कई स्वेटरों की बुनाई भी खराब हो चुकी है। वहीं, स्वेटरों के साइज को लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं।  छात्र की लंबाई के अनुसार स्वेटर नहीं दिए गए हैं। कक्षा 6 से 8 तक के कई छात्रों को छोटे साइज के स्वेटर वितरित किए गए हैं।

शिकायतों के मुताबिक स्वेटरों को मानकों पर खरा नहीं बताया जा रहा है। स्वेटर उपलब्ध कराने के लिए शासन ने कुछ नियम लागू किए हैं। बीएसए डॉ अमर कांत सिंह ने बताया कि स्वेटर में 30 प्रतिशत ऊन और 70 फीसदी एक्रेलिक धागा होना जरूरी है। अगर स्वेटर में इससे कम मानक हुआ तो स्वेटर की गुणवत्ता खराब मानी जाएगी। http://www.satyodaya.com

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सीएम योगी की कैबिनेट बैठक में नियत यात्रा भत्ता बढ़ाने को मिली मंजूरी…

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कैबिनेट बैठक

फाइल फोटो

लखनऊ। यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में कैबिनेट बैठक संपन्न हुई है। इस कैबिनेट बैठक के दौरान सीएम योगी ने प्रदेश के 1.5 लाख कर्मचारियों को नियत यात्रा भत्ते की सौगात दी है। कैबिनेट ने 1 नवंबर 2012 से राजकीय क्रमिको को दिए जा रहे नियत यात्रा या वाहन भत्ते को 100 के स्थान पर 200, 200 को 300, 300 को 450 व 400 को 600 रुपये कर दिए जाने को मंजूरी दी गई है।

जानकारी के मुताबिक राज्य वेतन समिति ने अपनी सातवीं रिपोर्ट में स्थाई मासिक भत्ता (नियत यात्रा भत्ता) के संबंध में संस्तुतियां दी थी।  ऐसे में 14 मई, 2018 के अंक में वेतन समिति की इस संबंध में दी गई संस्तुति को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया था। इसमें कर्मियों को मिल रहे मौजूदा भत्ते में तीन गुना वृद्धि की संस्तुति की गई थी, जिस पर कैबिनेट ने मंगलवार को मंजूरी दे दी है।

नियत भत्ते के अलावा इन प्रस्तावों को भी मिली मंजूरी

उत्तर प्रदेश आबकारी भांग की फुटकर दुकानों की नियमावली 2019 के प्रस्ताव को मंजूरी। अब दुकानों का आवंटन ई-लॉटरी के माध्यम से किया जाएगा।

गोरखपुर में शहीद अशफाक उल्ला खान प्राणि उद्यान की तृतीय पुनरीक्षित लागत 234.36 करोड़ जीएसटी मिलाकर मंजूरी दी गई। यह 121.34 एकड़ क्षेत्रफल में बनेगा। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान के साथ ही वन्यजीवों के संरक्षण को बढ़ावा दिया जाएगा।

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प्रयागराज के बहादुरपुर ब्लॉक के कोटवा गांव में बंद पड़ी पीएचसी के स्थान पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बनाए जाने के लिए पुरानी जर्जर इमारत को गिराने के प्रस्ताव को मंजूरी।

जगदगुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय अधिनियम में बदलाव। विकलांग की जगह ‘दिव्यांग’ होगा। वहीं आईटी इलेक्ट्रॉनिक विभाग की जगह अब दिव्यांगजन विभाग के अधीन होगा। पहले सरकारी मदद नहीं मिल सकती थी, अब पूरी तरह से सरकारी मदद मिलेगी।http://www.satyodaya.com

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