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एक बार फिर मायावती के निशाने पर योगी सरकार, कानून व्यवस्था व बिजली के दरों में बढ़ोतरी पर लिए आड़े हाथ

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फाइल फोटो

लखनऊ । बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने उत्तर प्रदेश में बिगड़ती कानून व्यवस्था और बिजली की दरों में बढ़ोतरी के दायरे में निम्न आय वर्ग के लोगों को शामिल किए जाने पर चिंता जताते हुए कहा है कि उत्तर प्रदेश की जनता त्रस्त है ।

मायावती ने आज ट्वीट कर कहा कि उत्तर प्रदेश में अपराध नियंत्रण और कानून-व्यवस्था की बिगड़ी स्थिति के साथ-साथ सर्वसमाज की बहन- बेटियों की जान व आबरू के सम्बंध में अराजकता जैसी स्थिति अति-दुःखद और अति-चिन्ता का विषय है । उन्होंने कहा, “सरकारी दावों के विपरीत पूरे प्रदेश में हर प्रकार के जघन्य अपराधों की बाढ़ से जनता में त्राहि-त्राहि है।

मायावती ने राज्य सरकार को निशाने पर लेते हुए कहा है कि लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा सरकार इसी रूप में उत्तर प्रदेश की 20 करोड़ जनता को आघात पहुँचाएगी? क्या यह वृद्धि सौभाग्य को दुर्भाग्य योजना में नहीं बदल देगी । इससे पहले बिजली की दरों में वृद्धि के प्रस्ताव की सपा मुखिया अखिलेश यादव ने भी निंदा की है।

आपको बता दें कि प्रस्ताव के मुताबिक, बीपीएल की बिजली दर में तकरीबन 53 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी करने का इरादा है। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने प्रस्तावित बिजली दर पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा है कि गरीब बीपीएल परिवार को एक बार फिर से लालटेन युग में धकेलने की साजिश है।


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वर्ष 2018-19 में ग्रामीण अनमीटर्ड घरेलू विद्युत उपभोक्ताओं की दरों में बढ़ोतरी की गई थी
।तो पॉवर कारपोरेशन प्रबंधन ने कहा था कि अक्तूबर-2018 से ग्रामीण उपभोक्ताओं को भी 24 घंटे बिजली उपलब्ध कराई जाएगी। इसलिए 1 अप्रैल 2019 से ग्रामीणों की अनमीटर्ड दरों को 300 से बढ़ाकर 400 रुपये प्रतिमाह किया गया है। लेकिन वास्तविकता यह है कि ग्रामीणों को 24 घंटे बिजली तो मिली नहीं और बढ़ा हुआ दर देना पड़ रहा है। अब एक बार फिर उनके बिजली दर को 400 से बढ़ाकर 500 रुपये प्रतिमाह किए जाने का प्रस्ताव देकर गांव के गरीब उपभोक्ताओं को बिजली दर का बोझ बढ़ाने की तैयारी है। http://www.satyodaya.com

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भाकपा मार्क्सवादी ने पराली जलाने के आरोप में किसानों की गिरफ्तारी पर की निंदा

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लखनऊ। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी उत्तर प्रदेश राज्य सचिव मंडल ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके पराली जलाने के आरोप में किसानों की गिरफ्तारी, उन पर भारी जुर्माना लगाए जाने और उन्हें जेल भेजे जाने पर गहरा आक्रोश व्यक्त करते हुए इसकी निंदा की है।

सीपीआईएम राज्य सचिव मंडल ने भाजपा सरकार पर किसान विरोधी होने का आरोप लगाते हुए कहा कि, वह एक तरफा किसानों को लक्ष्य करके उन पर हमले कर रही है। पर्यावरण के लिए नुकसानदेह दूसरे तमाम कारणों को नजर अंदाज करके योगी सरकार ने किसानों पर हमला बोल दिया है। उन्हें अपमानित किया जा रहा है। घरों से घसीट कर उन्हें जेलों में बंद किया जा रहा है। दूसरी तरफ यह सरकार किसानों के हमदर्द होने का नाटक भी कर रही है।

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वहीं उन्होंने कहा है उधर उन्नाव में मुआवजा मांग रहे किसानों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया और उन्हें उत्पीड़ित किया जा रहा है। सीपीआईएम राज्य सचिव मंडल ने मांग की है कि पराली जलाने के आरोप में गिरफ्तार किए गए किसानों को फौरन रिहा किया जाए। किसी भी सूरत में उन पर उत्पीड़न की कार्रवाई न की जाए। http://www.satyodaya.com

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आजम, तंजीन और अब्दुल्ला के खिलाफ अदालत ने जारी किया गैर जमानती वारंट

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लखनऊ। समाजवादी पार्टी के सासंद आजम खान उनकी पत्नी विधायक तंजीन फातिमा और पुत्र विधायक अब्दुल्ला की एक बार फिर मुश्किलें बढ़ गई है। अदालत ने उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया है। यह वारंट फर्जी जन्म प्रमाण पत्र से जुड़ा हुआ है।

अदालत ने फर्जी जन्म प्रमाण पत्र को लेकर आजम उनकी पत्नी और पुत्र के खिलाफ पहले संमन जारी हुआ था। दरअसल उन्हें बुधवार तीनों सदस्यों को इस मामले में अदालत में हाजिर होना था। लेकिन वह शाम तक कोर्ट में पेश नहीं हुए। इस पर अदालत ने इसके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया है। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी।

बीजेपी नेता आकाश सक्सेना ने धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत आजम खान और उनके पूरे परिवार के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। एडीजे कोर्ट में सुनवाई के दौरान आजम खान और उनके परिवार को कोर्ट में अनुपस्थित पाया गया। इसके बाद तीनों के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया गया। इसमें एक मामला 2019 लोकसभा चुनाव में आचार सहिंता उल्लंघन का और दूसरा पड़ोसी से मारपीट करने के आरोप का है।

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यह है मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट में आजम और अब्दुल्ला के खिलाफ दायर याचिका में कहा गया है कि सीबीएसई की 10वीं की मार्क्सशीट में उनकी जन्मतिथि 1 जनवरी 1993 दर्ज है। जबकि क्वीन मैरी अस्पताल में उनका जन्म हुआ और वहां उनकी जन्म तिथि 30 सितंबर 1990 दर्ज है।http://www.satyodaya.com

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आगरा के मेंटल हॉस्पिटल ने कृष्ण चंदर का ‘जामुन का पेड़’ दिलाया याद

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अभय सिन्हा

लखनऊ। आगरा के मेंटल हॉस्पिटल से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने कृष्ण चंदर के ‘जामुन का पेड़’ को फिर से जिंदा कर दिया है। जिनको नहीं पता उनको बता दें कि ‘जामुन का पेड़’ एक हास्य व्यंग है, जो लालफीताशाही पर तंज कसता है। पहले इसे स्कूल्स में 10वीं-11वीं में पढ़ाया भी जाता था लेकिन अब हटा लिया गया, वजह आप कुछ देर में समझ जाएंगे।

खैर यहां पूरी कहानी तो नहीं बता सकता हूं लेकिन संक्षेप में जिक्र करना जरूरी है। तब ही आप ताजा मामले यानि कि आगरा मेंटल हॉस्पिटल का प्रकरण समझ पाएंगे। 1961 का ये हास्य व्यंग कुछ यूं शुरू होता है कि एक सेक्रेटेरियेट में पेड़ होता है जामुन का जो गिर जाता है। माली को पता लगता है तो वो दौड़ा-दौड़ा पेड़ के पास आता है। देखता है कि पेड़ गिर गया है, वो तब चौंक जाता है जब देखता है कि पेड़ के नीचे एक शख्स दब गया है। पेड़ के नीचे एक आदमी दब गया है तो काफी लोग जमा हो जाते हैं। वहां चर्चा पहले पेड़ कि होती है कि कितना बढ़िया फलदार पेड़ था, क्या बढ़िया जामुन थे, वगैरह-वगैरह। बाद में ध्यान आदमी पर जाता है। अब वहां खड़े लोग सोचते हैं कि आदमी तो मर गया होगा लेकिन पता चलता है कि नहीं अभी जिंदा है। जिंदा है तो बाहर निकालो लेकिन समस्या यहीं तो होती है। कौन निकालेगा? वाणिज्य विभाग, वन विभाग, कृषि विभाग, हॉर्टिकल्चर विभाग, संस्कृति विभाग या विदेश विभाग। फाइल घूमना शुरू होती है। हर विभाग में पदानुक्रम का यानि कि जो पद की श्रंख्ला है उसका पूरा पालन करते हुए। दरअसल, मामला सरकारी था तो जूनियर क्लर्क से लेकर मुख्य सचिव तक फाइल घूमती है। हर विभाग अपना पल्ला झाड़ता है कि ये काम उसके विभाग का नहीं है। कुछ लोगों को गुस्सा भी आया, कोशिश हुई कि पेड़ को काटकर आदमी को बाहर निकाल लिया जाए। लेकिन उन्हें डांट लग गई। क्योंकि ये पेड़ कोई ऐसा-वैसा नहीं था बल्कि एक दूसरे देश के प्रधानमंत्री ने खुद लगाया था। गिरा हुआ पेड़ दोनों देशों के मजबूत संबधों की निशानी था। ऐसे में उन्होंने कहा कि एक आदमी की जिंदगी के लिए दो देशों के संबध नहीं खराब किये जा सकते।

ऐसा करते-करते दिन गुजरते जाते हैं और आदमी बेचारा पेड़ के नीचे दबा रहता है। जिंदा रहने के लिए आश्वासन मिलता रहता है। उम्मीद के सहारे वो पेड़ का भारी बोझ सहता रहता है। फाइल जब पूरी तरह घूमती है और सारे अधिकारियों और विभागों के चक्कर काट लेती है तो मामला प्रधानमंत्री तक पहुंच जाता है और फिर फैसला होता है कि हां पेड़ को काटना चाहिए। लेकिन तब तक पेड़ के नीचे दबे शख्स की जिंदगी की फाइल बंद हो चुकी थी।

कहानी स्कूल्स से क्यों हटाई गई है समझाने की जरूरत नहीं है लेकिन सवाल ये है कि आखिर इस कहानी का आगरा के मेंटल हॉस्पिटल से क्या संबध है? दरअसल, हुआ यूं कि आगरा के मानसिक अस्पताल में लगे सूखे और सड़े पेड़ों से मरीजों के स्वास्थ्य को खतरा है। अस्पताल के अधिकारी पेड़ों को काटना चाहते हैं। आप कहेंगे कि तो क्या समस्या है, पेड़ सूखे हैं और सड़े भी तो काट दीजिए लेकिन ऐसा नहीं हो सकता है। क्योंकि ये पेड़ टीटीजेड क्षेत्र में हैं। टीटीजेड यानि कि ताज ट्रेपेजियम क्षेत्र में हैं। यहां पेड़ काटने के लिए पहले सुप्रीम कोर्ट की अनुमति लेनी पड़ती है। यही कारण था कि वन विभाग ने पेड़ काटने की इजाजत नहीं दी। उसका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने टीटीजेड क्षेत्र में पेड़ काटने से मना किया है। फिर हॉस्पिटल के अधिकारी मजबूरी में सुप्रीम कोर्ट गए। CJI ने पहले कहा कि वे नगर निगम के पास आवेदन कर मृत पेड़ों को हटाने का अनुरोध करें। बाद में उन्होंने कहा कि वे इस मामले पर आगामी 2 सप्ताह के अंदर सुनवाई करेंगे।

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आगरा मेंटल हॉस्पिटल के वकील ने SC से कहा कि अस्पताल परिसर में सूखे और सड़ रहे पेड़ मानसिक रोगियों को डरा रहे हैं और रोगियों के स्वास्थ्य के साथ-साथ डॉक्टरों को भी प्रभावित करते हैं। लेकिन साहब काम सरकारी है, नियमों का पालन मानसिक रोगियों के स्वास्थ्य से ज्यादा जरूरी है। इसलिए पहले सुनवाई होगी, वो भी दो सप्ताह के अंदर।

जामुन का पेड़ होता तो शायद यही कहता कि साहब सूखे-सड़े पेड़ों पर फैसला हो इसके पहले सड़ी हुई इस व्यवस्था का कुछ कीजिए।

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो। ये कमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।

बाकी ये देश तो इंतजार करने में माहिर है। मरे हुए सिस्टम में लोकतंत्र की सांस चल रही हैं। लीजिये समय चाहे जितना हमें अहसास है।

जिस तरह चाहो बजाओ तुम हमें। हम नहीं हैं आदमी हम झुनझुने हैं।

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