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उन्नाव रेप केस: ज्यादा खून बहने से कोमा में पहुंची पीडि़ता…

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उन्नाव रेप पीड़िता के फेफड़े से निकाला डेढ़ सौ मिली लीटर खून

लखनऊ। केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर के तीसरे तल पर वेंटिलेटर यूनिट में उन्नाव रेप पीड़ित व उसके वकील का इलाज चल रहा है। पीड़ित की जान बचाने के लिए डॉक्टरों ने फेफड़े में जमा खून ट्यूब डालकर निकाला। इससे करीब डेढ़ सौ मिली लीटर खून निकाला गया। वहीं डॉक्टरों का कहना है कि पीड़ित के दाहिनी तरफ के अंगों में चोटे आयी हैं। इसमें करीब ढाई लीटर खून बह गया था। इस वजह से पीड़िता कोमा में पहुंची। वेंटिलेटर पर इलाज चल रहा है। वहीं घायल वकील का वेंटिलेटर हटा दिया गया है।

ट्रॉमा प्रवक्ता डॉ. संदीप तिवारी ने बताया कि चोट की वजह से पीड़िता के फेफड़े में खून जम गया था। ट्यूब डालकर जमे खून को बाहर निकाल दिया गया है। इससे फेफड़े के संक्रमण के खतरों को टालने में काफी मदद मिली है। पीड़िता को चार यूनिट खून चढ़ाया जा चुका है। चार यूनिट प्लॉज्मा और दो यूनिट प्लेटलेट्स चढ़ाया गया है। दाहिने तरफ के जबड़ा, पसलियां, कंधे की हड्डी (कॉलर बोन), हाथ और जांघ की हड्डी में फ्रैक्चर है।आर्थोपैडिक्टस विभाग की टीम ने दाहिनी जांघ की हड्डी में कच्चा प्लॉस्टर बांधा है। हाथ के फ्रैक्चर का इलाज किया है।ईएनटी विशेषज्ञों ने गले में चीरा लगाकर सीटी लगा दी है। इससे वेंटिलेटर जोड़ दिया गया है। इससे मरीज को सांस लेने में आसानी होगी। संक्रमण का खतरा भी कम होगा। जबड़े के फ्रैक्चर का इलाज नहीं किया जा सका है। वेंटिलेटर लगा होने से इलाज कठिन है।

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ट्रॉमा प्रवक्ता ने बताया कि पीड़िता के बेहोशी का कारणों का पता नहीं चला है। सिटी स्कैन जांच में सिर में कोई भी गहरी चोट नहीं मिली है। अत्याधिक खून बहने से मरीज शॉक में जा सकता है। वहीं बेहोशी का एक और कारण डिफ्यूज एक्जोनल इंजरी भी हो सकती है। यह बीमारी सिटी स्कैन में पकड़ में नहीं आती है। न्यूरो सर्जरी व न्यूरोलॉजी विभाग के डॉक्टर सिर की छुपी बीमारी का पता लगाने में जुटे हैं।

हादसे में घायल की तबीयत का अंदाजा ग्लासगो कोमा स्कैल (जीसीएस) के आधार पर किया जाता है। रेप पीड़िता के सेहत का आंकलन भी इसी आधार पर चार विभाग के विशेषज्ञों ने किया है। इनमें ट्रॉमा सर्जरी, न्यूरो सर्जरी, हड्डी और एनस्थीसिया विभाग के विशेषज्ञों ने किया है। जीसीएस तीन पैमाने पर तय किया जाता है। प्रवक्ता ने बताया कि पीड़िता की हालत गंभीर है लेकिन स्थिर बनी हुई है। दो बार कुछ देर के लिए वेंटिलेटर हटाने का भी प्रयास किया गया है।

डॉ. संदीप तिवारी ने बताया कि पीड़िता का जीसीएस स्टेज सात है। पीड़िता के हाथ पैरों में हल्की हरकत हो रही है। आंखे व बोलने से पीड़िता की सेहत का अंदाजा लगाया गया है। इसी आधार पर उसे स्टेज सात पर रखा गया है। उसी आधार पर इलाज किया जा रहा है। सामान्य लोगों का जीसीएस 15 होता है। जिन मरीजों को जीसीएस तीन की श्रेणी में रखा जाता है उनकी हालत बेहद नाजुक मानी जाती है।http://www.satyodaya.com

अपना शहर

अस्पतालों में बने रैनबसेरों में तीमारदार ठिठुरने को मजबूर, ज़िम्मेदार लापरवाह

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लखनऊ। राजधानी में ठंड ने दस्तक दे दी है। सर्दी इस कदर है कि शाम होते ही लोग घरों में कैद हो जाते हैं। शाम होते ही चौराहों पर सन्नाटा पसरने लगता है। लेकिन अस्पतालों के रैन बसेरे अपनी बदहाल व्यवस्था का रोना रो रहे है। अस्पतालों में मरीजों के तीमारदार ठंड से ठिठुर रहे हैं तो वहीं ज़िम्मेदार घर पर बैठे रजाई का मजा ले रहे है। लापरवाही का आलम ये है केजीएमयू बना रैन बसेरा करीब एक साल होने के बाद भी नहीं शुरू हो पाया है।

केजीएमयू….

केजीएमयू शताब्दी के पास 7.60 करोड़ की लागत से 210 बेड के रैन बसेरा बने एक साल से ज्यादा हो जाने के बाद भी शुरू नहीं हो पाया है। तत्कालीन गृहमंत्री लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह द्वारा उद्घाटन किया था। लेकिन अभी भी तीमारदार खुले वाले रैन बसेरे पर रात गुजारने को मजबूर हैं। पीपीपी मॉडल पर संचालित किए जाने वाले रैन बसेरे के लिए केजीएमयू ने टेंडर जारी किया था। लेकिन अभी तक टेंडर नहीं हो पाया है। वहीं केजीएमयू प्रवक्ता डॉ. सुधीर सिंह का कहना है कि टेंडर प्रकिर्या चल रही है पूरी होते ही तीमारदारों को इसका लाभ मिलने लगेगा।

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बलरामपुर अस्पताल

बलरामपुर अस्पताल में न्यू बिल्डिंग के सामने बने रैन बसेरे को तोड़ दिया गया है। अस्पताल की न्यू बिल्डिंग के नीचे एक कमरे को रैन बसेरा बना दिया गया है उस कमरे की हालत यह है कि संक्रमण को दावत दे रहा है। अस्पताल में आ रहे तीमारदार मजबूरन खुले में सोने पर मजबूर हैं। बलरामपुर अस्पताल के प्रवक्ता एसएन त्रिपाठी का कहना है कि नगर निगम द्वारा स्मार्ट सिटी के तहत दिन बसेरा बन रहा है और जल्दी से बनवा कर मरीजों को सेवा दी जाएगी।http://www.satyodaya.com

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ख़ैरियत

नवजात को जन्म के तुरंत बाद नहलाएं नहीं

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लखनऊ। नवजात को जन्म के तुरंत बाद नहीं नहलाना चाहिए। माँ के दूध के अलावा उसे कुछ भी नहीं देना चाहिए। यहां तक कि 6 माह तक पानी भी नहीं देना चाहिए क्योंकि माँ के दूध में पर्याप्त मात्रा में पानी होता है। नवजात की नाल पर भी कुछ न लगाएं। उसे सूखने देना चाहिए।

रानी अवन्तीबाई जिला महिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सलमान बताते हैं कि नाल जितनी सूखी रहेगी उतनी जल्दी गिरेगी। अगर नवजात का जन्म समय से हुआ हो तो नाल गिरने के बाद और यदि समय से पहले जन्म हुआ हो तो जब तक नवजात का वजन 2.5 किलो न हो जाये तब तक उसे नहीं नहलाना चाहिए। यदि नवजात का वजन 1800 किग्रा से कम है तो खतरे की संभावना अधिक होती है। ऐसे में नवजात को जिला अस्पताल के सिक न्यूबोर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) में भर्ती करवाना चाहिए।

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आगे उन्होंने बताया कि नवजात को खीस या कोलोस्ट्रम अवश्य देना चाहिए क्योंकि इसमें नवजात के लिए आवश्यक पोषक तत्व व एंटीबोडीस होते हैं। जिनमें बीमारियों से लड़ने की क्षमता होती है। नवजात को 6 माह तक सिर्फ माँ का दूध ही देना चाहिये क्योंकि इसमें सभी आवश्यक पोषक तत्व होते हैं जिनकी बच्चे को आवश्यकता होती है। इससे डायरिया व निमोनिया का खतरा भी कम होता है।http://www.satyodaya.com

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प्रसव केन्द्रों पर प्रशिक्षित नर्स मेंटर की होगी तैनाती…

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लखनऊ। प्रदेश के सभी सामुदायिक व प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर गुणवत्तापरक सामान्य प्रसव की सुविधा सरकार देगी। इसके साथ ही प्रसव के दौरान और उसके बाद किसी भी मातृ एवं नवजात संबंधी जटिलताओं के निदान, प्रबंधन और संदर्भन पर भी फोकस किया जा रहा है। इन सारी व्यवस्थाओं को सही मायने में व्यवस्थित करने के लिए प्रसव केन्द्रों पर विशेष रूप से प्रशिक्षित नर्स मेंटर को तैनात किया जा रहा है। इसके तहत नर्स मेंटर को छह दिवसीय दक्ष प्रशिक्षण नोएडा में टीएनएआई द्वारा, तीन दिवसीय मण्डल स्तरीय दक्षता प्रशिक्षण और पाँच दिवसीय प्रशिक्षण मेंटरिंग कौशल पर लखनऊ में उत्तर प्रदेश तकनीकी सहयोग इकाई (यूपीटीएसयू) द्वारा प्रदान किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन-उत्तर प्रदेश के मिशन निदेशक की तरफ से अपर मिशन निदेशक जसजीत कौर ने प्रदेश के सभी मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को पत्र जारी कर नर्स मेंटर के संबंध में दिये गए दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराने को कहा है।

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प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद नव चयनित नर्स मेंटर ब्लाक मुख्यालय पर स्थित सामुदायिक/प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर कार्यरत स्टाफ नर्स और एएनएम की विधिवत मेंटरिंग और उनका आस्की आधारित योग्यता का मूल्यांकन करेंगे। प्रसव केन्द्रों पर गुणवत्तापरक सेवाएं प्रदान करने के लिए नर्स मेंटर द्वारा लक्ष्य चेक लिस्ट आधारित गैप-एनालिसिस और कार्य योजना तैयार करने में प्रभारी चिकित्सा अधिकारी का सहयोग भी किया जाएगा।http://www.satyodaya.com

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November 18, 2019, 11:16 pm
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