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सत्योदय विशेष

Happy Daughters day 2019: ‘जुन्को ताबेई’ ने हिमालय का नहीं पुरुषवादी मानसिकता का गुरूर तोड़ा था

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लखनऊ। दिन रविवार, तरीख 22 सितंबर। बेटियों का दिन है। पूरी दुनिया इसे सेलिब्रेट भी कर रही है और करना भी चाहिए। सदियों तक जिन बेटियों को अनाम रखा गया उनके लिए एक दिन तो होना ही चाहिए। ये बात अलग है कि एक समय था जब बेटियां किसी भी छोरे से कम नहीं थीं। अनेक ऋषिकाएं हैं जिन्होंने वेद मंत्रों की रचना की है – अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति- दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी आदि। हालांकि फिर पुरुषवादी मानसिकता ने अचानक से महिलाओं को नाकाबिल घोषित कर दिया। चाहारदीवारी तक सीमित रखा और उनके काम को औरतों वाला काम बताकर खींसे निपोर दीं। न्यूटन भाईसाहब ने भी आने में देर कर दी थी। उनके तीसरे नियम के अनुसार किसी भी वस्तु पर जब आप बल लगाते हैं तो उतना ही बल वो वस्तु भी आप पर लगाती है जैसे कि स्प्रिंग। बचपन में कभी आपने दबा के देखा ही होगा। दबा के छोड़ने पर फटाक से ऊपर को उछलती थी। बेटियों के साथ भी कुछ ऐसा ही रहा। हजारों सालों तक जो बल उनको दबाने के लिए लगाया गया वो अब विपरीत दिशा में उतनी ही ताकत के साथ उछाल मार रहा है। इस उछाल में इतनी ताकत है कि हिमालय की चोटी भी इसके आगे बौनी नजर आती है।

ऐसी ही एक बेटी ‘जुन्को ताबेई’ का जन्म 20 सितंबर 1939 को जापान के मिहारू, फुकुशिमा में हुआ था। सात बहनों में पांचवे नंबर पर पैदा हुईं ताबेई की परवरिश बेहद सामान्य परिवार में हुई। उन्होंने ऐसे समाज में जन्म लिया था, जहां महिलाओं की जगह घर के अंदर मानी जाती थी। मगर फिर वही न्यूटन भाईसाहब का खेला भी तो था। ताबेई ने महज 10 साल की उम्र में पहली बार माउंट नासू के पास चढ़ाई की। हालांकि, पारिवारिक स्थिति की वजह से वो आगे इसे जारी नहीं रख सकीं। लेकिन बारूद में चिंगारी तो लग ही चुकी थी बस अब धमाका होना बाकी था। ताबेई ने मासानोबू ताबेई से शादी की जो एक माउंट क्लाइंबर थे और 1965 में जापान में पर्वतारोहण के समय दोनों की मुलाकात हुई थी।

एवरेस्ट फतह करने वाली पहली महिला बनीं

साल था 1975, यह वही साल है जब जुन्को ताबेई नाम का बारूद फटा और ऐसा धमाका हुआ कि लोगों के कान से रूढ़िवादिता की रूई निकल कर उनके खुद के कदमों पर गिर गई। दरअसल, ताबेई ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट को फतह कर लिया था। ऐसा करने वाली वो विश्व की पहली महिला थीं। ताबेई 36 साल की उम्र में 16 मई, 1975 को ऑल फीमेल कलाइंबिंग पार्टी की नेता के तौर पर एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचीं।

जब समाज न दबा सका तो बर्फ की क्या बिसात

कुछ बड़ा करने की कीमत भी बड़ी होती है। कभी-कभी जिंदगी का मूल्य भी सस्ता हो जाता है। ऐसा ही हुआ था Junko Tabei के साथ भी। Mount Everest पर पहुंचने के 12 दिन पहले वो बर्फीले तूफान की चपेट में आ गई थीं। उनके एक गाइड ने उन्हें बर्फ से बाहर निकाला। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने चढ़ाई जारी रखी। उनकी इस उपलब्धि के लिए जापान के सम्राट, क्राउन प्रिंस और राजकुमारी द्वारा सम्मानित किया गया।

कोई शिखर नहीं बचा जो ताबेई से ऊंचा हो

Junko Tabei न सिर्फ एवरेस्ट फतह करने वाली पहली महिला बनीं बल्कि 1992 में वह ‘सेवन समिट्स’ को पूरा करने वाली पहली महिला बनीं, जो सात महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियां हैं। इसके साथ ही 76 अलग-अलग देशों में पर्वतों पर पहुंचने वाली एकमात्र महिला बनी थीं। एवरेस्ट फतह करने के 16 वर्ष बाद 1991 में उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था, ‘मैं और भी पर्वत फतह करना चाहती हूं।’

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गूगल ने भी डूडल बनाकर किया याद

Junko Tabei का रविवार को जन्मदिवस है। इस मौके पर गूगल ने डूडल बनाकर उन्हें याद किया है। दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत शिखर माउंट एवरेस्ट पर पहुंचने वाली पहली महिला जुन्को ताबेई (Junko Tabei) पर बनाया गया गूगल का डूडल बड़ा ही खास है। इसमें जुन्को का एनीमेशन बनाया गया है जिसमें वो माउंट एवरेस्ट पर चढ़ती नजर आ रही हैं। बता दें, जुन्को का निधन 20 अक्टूबर 2016 को पेट के कैंसर की वजह से हुआ था। उस वक्त वह 77 साल की थीं। कैंसर के इलाज के दौरान भी उन्होंने चढ़ाई जारी रखी थीं।http://www.satyodaya.com

देश

11 दिसंबर को शुरू हुआ था प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध

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लखनऊ: प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध पंजाब के सिख राज्य तथा अंग्रेजों के बीच 1845-46 के बीच लड़ा गया था। इसके परिणाम स्वरूप सिख राज्य का कुछ हिस्सा अंग्रेजी राज का हिस्सा बन गया। प्रथम सिक्ख युद्ध का प्रथम रण (18 दिसम्बर 1845) मुदकी में हुआ। प्रधानमंत्री लालसिंह के रणक्षेत्र से पलायन के कारण सिक्ख सेना की पराजय निश्चित हो गई। दूसरा मोर्चा (21 दिसंबर) फिरोजशाह में हुआ। अंग्रेजी सेना की भारी क्षति के बावजूद, रात में लालसिंह, तथा प्रात: प्रधान सेनापति तेजासिंह के पलायन के कारण सिक्ख सेना पुन: पराजित हुई। तीसरा मोर्चा (21 जनवरी 1846) बद्दोवाल में हुआ। रणजीतसिंह तथा अजीतसिंह के नायकत्व में सिक्ख सेना ने हैरी स्मिथ को पराजित किया; यद्यपि ब्रिगेडियर क्योरेटन द्वारा सामयिक सहायता पहुँचने के कारण अंग्रेजी सेना की परिस्थिति कुछ सँभल गई। चौथा मोर्चा (28 जनवरी) अलीवाल में हुआ, जहाँ अंग्रेजों का सिक्खों से अव्यवस्थित संघर्ष हुआ।

अंतिम रण (10 फरवरी) स्व्रोओं में हुआ। तीन घंटे की गोलाबारी के बाद, प्रधान अंग्रेजी सेनापति लार्ड गफ ने सतलुज के बाएँ तट पर स्थित सुदृढ़ सिक्ख मोर्चे पर आक्रमण कर दिया। प्रथमत: गुलाब सिंह ने सिक्ख सेना को रसद पहुँचाने में जान-बूझकर ढील दी। दूसरे, लाल सिंह ने युद्ध में सामयिक सहायता प्रदान नहीं की। तीसरे, प्रधान सेनापति तेजासिंह ने युद्ध के चरम बिंदु पर पहुँचने के समय मैदान ही नहीं छोड़ा, बल्कि सिक्ख सेना की पीठ की ओर स्थित नाव के पुल को भी तोड़ दिया। चतुर्दिक घिरकर भी सिक्ख सिपाहियों ने अंतिम मोर्चे तक युद्ध किया, किंतु, अंतत:, उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा।

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20 फ़रवरी 1846 , को विजयी अंग्रेज सेना लाहौर पहुँची। लाहौर (9 मार्च) तथा भैरोवाल (16 दिसंबर) की संधियों के अनुसार पंजाब पर अंग्रेजी प्रभुत्व की स्थापना हो गई। लारेंस को ब्रिटिश रेजिडेंट नियुक्त कर विस्तृत प्रशासकीय अधिकार सौंप दिए गए। अल्प वयस्क महाराजा दिलीप सिंह की माता तथा अभिभावक रानी जिंदाँ को पेंशन बाँध दी गई। अब पंजाब का अधिकृत होना शेष रहा जो डलहौजी द्वारा संपन्न हुआ।

आंग्ल-सिक्ख संघर्ष का बीजारोपण तभी हो गया जब सतलज पर अंग्रेजी सीमांत रेखा के निर्धारण के साथ पूर्वी सिक्ख रियासतों पर अंग्रेजी अभिभावकत्व की स्थापना हुई। सिक्ख राजधानी, लाहौर, के निकट फिरोजपुर का अंग्रेजी छावनी में परिवर्तित होना (1838) भी सिक्खों के लिए भावी आशंका का कारण बना। गवर्नर जनरल एलनबरा और उसके उत्तराधिकारी हार्डिंज अनुगामी नीति के समर्थक थे। (23 अक्टूबर 1845) को हार्डिज ने एलेनबरा को लिखा था कि पंजाब या तो सिक्खों का होगा, या अंग्रेजों का; तथा, विलंब केवल इसलिए था कि अभी तक युद्ध का कारण अप्राप्त था। वह कारण भी उपलब्ध हो गया जब प्रबल किंतु अनियंत्रित सिक्ख सेना, अंग्रेजों के उत्तेजनात्मक कार्यों से उद्वेलित हो, तथा पारस्परिक वैमनस्य और षड्यंत्रों से अव्यवस्थित लाहौर दरबार के स्वार्थ लोलुप प्रमुख अधिकारियों द्वारा भड़काए जाने पर, संघर्ष के लिए उद्यत हो गई। सिक्ख सेना के सतलुज पार करते ही (13 दिसम्बर 1845) हार्डिज ने युद्ध की घोषणा कर दी।

1 जनवरी 1845 के अपने एक पत्र में लॉर्ड हार्डिंग में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि वह युद्ध करने के लिए तत्पर है लेकिन अपनी कठिनाइयों को स्पष्ट करते हुए उसने यह भी लिखा है कि किस बहाने सिखों पर आक्रमण किया जाए क्योंकि सिखों के साथ अंग्रेजों केेे अच्छे संबंध हैैै अब तमाम मुश्किलों मेंं सिखों ने अंग्रेजों का साथ दिया है।http://www.satyodaya.com

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अर्थात- यथार्थ

विश्व एंटीबायोटिक जागरूकता सप्ताह, लाखों लोगों की मौत ले रही है एंटीबायोटिक

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नई दिल्ली। एंटीबायोटिक दवाओं से आप सभी भलीभांति परिचित होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि रोगों को सही करने वाली ये दवा आपको गंभीर परेशानी में भी डाल सकती है। एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल पूरी दुनिया में बड़ा खतरा बनता जा रहा है। यही वजह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), विश्व एंटीबायोटिक जागरूकता सप्ताह मनाता है। 18 से 24 नवंबर 2019 तक चलने वाले इस जागरूकता सप्ताह का मकसद लोगों को एंटीबायोटिक दवाओं के साइड इफेक्ट के प्रति जागरूक करना है। बता दें विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 13 नवंबर 2017 को विश्व एंटीबायोटिक जागरूकता सप्ताह का शुभारंभ किया था।

एंटीबायोटिक दवाओं का भविष्य और अपने स्वास्थ्य का भविष्य हम सभी पर निर्भर है। मानव और पशु स्वास्थ्य में एंटीबायोटिक दवाओं के लगातार अति प्रयोग और दुरुपयोग ने एंटीबायोटिक प्रतिरोध के उद्भव और प्रसार को प्रोत्साहित किया है। अगर भविष्य में एंटीबायोटिक काम नही करेगा तो स्वास्थ्य का क्या होगा?

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आज लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता हैं। इसलिए एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक उपयोग और दुरुपयोग को बंद कराने में अपना योगदान दें। कल्पना कीजिये उस महामारी का जब एंटीबायोटिक काम करना बंद कर देगी तो बुखार से लेकर बड़ी बीमारियों जो बैक्टीरिया के कारण होती हैं उनका उपचार कैसे होगा ?

क्या हैं एंटीबायोटिक्स…
एंटीबायोटिक्स दवाओं का उपयोग बैक्टीरिया के कारण होने वाले संक्रमण को उपचारित करने के लिए किया जाता है। एंटीबायोटिक प्रतिरोध, एंटीबायोटिक दवाओं के ख़िलाफ़ बैक्टीरिया द्वारा प्रतिरोध को विकसित या बैक्टीरिया की क्षमता में बदलाव या परिवर्तन द्वारा एंटीबायोटिक दवाओं के प्रभावित प्रतिरोध को संदर्भित करता है। एंटीबायोटिक्स निश्चित रूप से बैक्टीरिया संक्रमण के ख़िलाफ़ उपयोगी होते हैं।

ये है एंटीबायोटिक का खतरा…
एंटीबायोटिक के गलत इस्तेमाल से बैक्टीरिया प्रतिरोधी बन जाते हैं। ये बैक्टीरिया मनुष्यों और जानवरों को संक्रमित कर सकते हैं। गैर-प्रतिरोधी बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण से उनका इलाज कठिन हो जाता है। एंटीबायोटिक प्रतिरोध, इसके दुरुपयोग और बहुत ज्यादा उपयोग से भी तेज होता है।http://www.satyodaya.com

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सत्योदय विशेष

इस धनतेरस सोने चांदी की जगह घर लाए फूल झाड़ू, ऐसे होगी धन वर्षा

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करवा चौथ बीत गया, बहुत ही खूबसूरत और धूमधाम तरीके से मनाया गया। अब लोगों ने धनतेरस की तैयारियां शुरू कर दी है। कुछ न कुछ नया लेने के लिए सबने शुरू कर दिया है लेकिन क्या आपको पता है धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदने से घर में लक्ष्मी जी का वास होता है। बताया जाता है कि धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदने से घर में लक्ष्मी का वास बना रहता है। अगर आप आर्थिक तंगी से परेशान है तो इस धनतेरस झाड़ू को जरूर खरीदे और उससे जुड़ी इन मान्यताओं का भी रखें ध्यान।

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झाड़ू से होता है लक्ष्मी का वास

धनतेरस पर खरीदी गई झाड़ू से जुड़ा पहला नियम कहता है कि जब आप उसे खरीदकर अपने घर लाएं तो उसके हैंडल पर एक सफेद रंग का धागा बांध लें। ऐसा करने से मां लक्ष्मी आपके घर में स्थिर बनी रहती हैं। कहा जाता है कि झाड़ू में लक्ष्मी का वास होता है इसलिए कभी भी झाड़ू को पैर से न मारें। मंगलवार और रविवार को कभी भी झाड़ू नहीं खरीदना चाहिए। ऐसा करने से आपके घर में कलह का वातावरण बन सकता है।

धनतेरस के दिन एक साथ तीन झाड़ू खरीदने चाहिए। ऐसा करना एक अच्छा शगुन होता है। इस बात का ध्यान रखें कि कभी भी सम संख्या में झाड़ू न खरीदें।
दिवाली के दिन मंदिर में झाड़ू दान करने से घर में लक्ष्मी का निवास होता है। ऐसा तभी होता है जब आप झाड़ू को मंदिर में सूर्योदय से पहले दान करते हैं। ध्यान रखें दान किया जाने वाला झाड़ू धनतेरस के दिन के पहले से खरीदना होगा।

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