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सत्योदय विशेष

Happy Daughters day 2019: ‘जुन्को ताबेई’ ने हिमालय का नहीं पुरुषवादी मानसिकता का गुरूर तोड़ा था

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लखनऊ। दिन रविवार, तरीख 22 सितंबर। बेटियों का दिन है। पूरी दुनिया इसे सेलिब्रेट भी कर रही है और करना भी चाहिए। सदियों तक जिन बेटियों को अनाम रखा गया उनके लिए एक दिन तो होना ही चाहिए। ये बात अलग है कि एक समय था जब बेटियां किसी भी छोरे से कम नहीं थीं। अनेक ऋषिकाएं हैं जिन्होंने वेद मंत्रों की रचना की है – अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति- दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी आदि। हालांकि फिर पुरुषवादी मानसिकता ने अचानक से महिलाओं को नाकाबिल घोषित कर दिया। चाहारदीवारी तक सीमित रखा और उनके काम को औरतों वाला काम बताकर खींसे निपोर दीं। न्यूटन भाईसाहब ने भी आने में देर कर दी थी। उनके तीसरे नियम के अनुसार किसी भी वस्तु पर जब आप बल लगाते हैं तो उतना ही बल वो वस्तु भी आप पर लगाती है जैसे कि स्प्रिंग। बचपन में कभी आपने दबा के देखा ही होगा। दबा के छोड़ने पर फटाक से ऊपर को उछलती थी। बेटियों के साथ भी कुछ ऐसा ही रहा। हजारों सालों तक जो बल उनको दबाने के लिए लगाया गया वो अब विपरीत दिशा में उतनी ही ताकत के साथ उछाल मार रहा है। इस उछाल में इतनी ताकत है कि हिमालय की चोटी भी इसके आगे बौनी नजर आती है।

ऐसी ही एक बेटी ‘जुन्को ताबेई’ का जन्म 20 सितंबर 1939 को जापान के मिहारू, फुकुशिमा में हुआ था। सात बहनों में पांचवे नंबर पर पैदा हुईं ताबेई की परवरिश बेहद सामान्य परिवार में हुई। उन्होंने ऐसे समाज में जन्म लिया था, जहां महिलाओं की जगह घर के अंदर मानी जाती थी। मगर फिर वही न्यूटन भाईसाहब का खेला भी तो था। ताबेई ने महज 10 साल की उम्र में पहली बार माउंट नासू के पास चढ़ाई की। हालांकि, पारिवारिक स्थिति की वजह से वो आगे इसे जारी नहीं रख सकीं। लेकिन बारूद में चिंगारी तो लग ही चुकी थी बस अब धमाका होना बाकी था। ताबेई ने मासानोबू ताबेई से शादी की जो एक माउंट क्लाइंबर थे और 1965 में जापान में पर्वतारोहण के समय दोनों की मुलाकात हुई थी।

एवरेस्ट फतह करने वाली पहली महिला बनीं

साल था 1975, यह वही साल है जब जुन्को ताबेई नाम का बारूद फटा और ऐसा धमाका हुआ कि लोगों के कान से रूढ़िवादिता की रूई निकल कर उनके खुद के कदमों पर गिर गई। दरअसल, ताबेई ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट को फतह कर लिया था। ऐसा करने वाली वो विश्व की पहली महिला थीं। ताबेई 36 साल की उम्र में 16 मई, 1975 को ऑल फीमेल कलाइंबिंग पार्टी की नेता के तौर पर एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचीं।

जब समाज न दबा सका तो बर्फ की क्या बिसात

कुछ बड़ा करने की कीमत भी बड़ी होती है। कभी-कभी जिंदगी का मूल्य भी सस्ता हो जाता है। ऐसा ही हुआ था Junko Tabei के साथ भी। Mount Everest पर पहुंचने के 12 दिन पहले वो बर्फीले तूफान की चपेट में आ गई थीं। उनके एक गाइड ने उन्हें बर्फ से बाहर निकाला। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने चढ़ाई जारी रखी। उनकी इस उपलब्धि के लिए जापान के सम्राट, क्राउन प्रिंस और राजकुमारी द्वारा सम्मानित किया गया।

कोई शिखर नहीं बचा जो ताबेई से ऊंचा हो

Junko Tabei न सिर्फ एवरेस्ट फतह करने वाली पहली महिला बनीं बल्कि 1992 में वह ‘सेवन समिट्स’ को पूरा करने वाली पहली महिला बनीं, जो सात महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियां हैं। इसके साथ ही 76 अलग-अलग देशों में पर्वतों पर पहुंचने वाली एकमात्र महिला बनी थीं। एवरेस्ट फतह करने के 16 वर्ष बाद 1991 में उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था, ‘मैं और भी पर्वत फतह करना चाहती हूं।’

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गूगल ने भी डूडल बनाकर किया याद

Junko Tabei का रविवार को जन्मदिवस है। इस मौके पर गूगल ने डूडल बनाकर उन्हें याद किया है। दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत शिखर माउंट एवरेस्ट पर पहुंचने वाली पहली महिला जुन्को ताबेई (Junko Tabei) पर बनाया गया गूगल का डूडल बड़ा ही खास है। इसमें जुन्को का एनीमेशन बनाया गया है जिसमें वो माउंट एवरेस्ट पर चढ़ती नजर आ रही हैं। बता दें, जुन्को का निधन 20 अक्टूबर 2016 को पेट के कैंसर की वजह से हुआ था। उस वक्त वह 77 साल की थीं। कैंसर के इलाज के दौरान भी उन्होंने चढ़ाई जारी रखी थीं।http://www.satyodaya.com

देश

आरे: कैसे बचेगा पर्यावरण? विकास से पहले ही हो जाता है विनाश

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लखनऊ। मुंबई मेंट्रो के लिए आरे कॉलोनी में पेड़ों की कटाई को लेकर सरकार और पर्यावरण प्रेमी आमने-सामने हैं। सैकड़ों लोग पेड़ों को बचाने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। विरोध प्रदर्शन के बीच पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प भी हो गई जिसके बाद कुछ लोगों को हिरासत में भी लिया गया। हालात बिगड़ते देख धारा 144 लगा दी गई है।

यह सब तब शुरू हुआ जब बॉम्बे हाईकोर्ट ने इससे जुड़ी याचिकाओं को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला पहले की सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के सामने लंबित है, इसलिए हाई कोर्ट इसमें फैसला नहीं दे सकता। कोर्ट का फैसला हुआ और बीएमसी ने मेट्रो कार शेड के लिए आरे के करीब 2700 पेड़ों को काटना शुरू कर दिया।

पेड़ों की कटाई की खबर पर्यावरण प्रेमियों को लगी। एक वीडियो भी वायरल हुआ। सूचना मिली कि करीब 200 पेड़ काट दिए गए हैं। बस उसके बाद वहां लोगों को ताता लगना शुरू हो गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक 300 से भी ज्यादा लोगों ने वहां पहुंचकर मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन की बैरिकेडिंग तोड़ी और पेड़ों को कटने से बचाया। आरोप है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज कर दिया। यह भी सूचना मिली कि अब तक 60-70 लोग हिरासत में भी लिए गए हैं।

बात विकास की, काम विनाश का

दुनियाभर में ग्लोबल वार्मिंग बड़ी चिंता का विषय है। तमाम नेता बड़े-बड़े भाषण भी पर्यावरण को बचाने के देते रहते हैं। भारत में भी ऐसे नेताओं की कमी नहीं है। इसके लिए वो भारतीय संस्कृति का हवाला भी देते हैं। आजकल तो फाइलों में पेड़ लगाओ प्रतियोगिता भी छिड़ी हुई है। सरकारें पेड़ लगाने का गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड बना रही हैं। हालही में उत्तर प्रदेश में तो ‘पौधारोपण कुंभ’ भी आयोजित हुआ, जिसके तहत 22 करोड़ पौधे लगाए गए (विद सेल्फी)। लेकिन हकीकत में कितने पेड़ अपनी जड़े मिट्टी में बचा पाते हैं शायद ही इसका कभी ऑडिट हुआ हो। वहीं, हर साल विकास के नाम पर पेड़ों को काटकर पर्यावरण के विनाश के लिए तो ऑडिट की भी जरूरत नहीं है। ग्लोबल वार्मिंग खुद ही इसकी गवाह है। तापमान में लागातार वृद्धि इस बात का सबूत है।

पिछले 100 वर्षों में दुनिया भर में औसत तापमान 0.75 डिग्री सेल्सियस (1.4 डिग्री फारेनहाइट) बढ़ गया है, इस वृद्धि का दो तिहाई 1975 के बाद से हुआ है। भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी के तापमान में भी छोटी वृद्धि गंभीर प्रभाव डाल रही हैं। पिछली शताब्दी में पृथ्वी का औसत तापमान 1.4 डिग्री फ़ारेनहाइट तक बढ़ गया है और अगले में 11.5 डिग्री फारेनहाइट बढ़ने की उम्मीद है। यह समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है कि इसका हल कैसे निकाला जाए। बस करना इतना है कि पेड़ लगाइये और सतत विकास अपनाइए।
सतत विकास का मतलब है कि ऐसा विकास जिसमें प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल भावी पीढ़ी को ध्यान में रख कर किया जाए, ताकि उनके प्रयोग के लिए भी संसाधन बचे रहें। ऐसा नहीं है कि सरकार सतत विकास पर बात नहीं करती है। संयुक्त राष्ट्र ने जो सतत विकास के लक्ष्य रखें हैं उनकी तो नेता भर-भर के बाते करते हैं लेकिन बस समस्या यही है कि वो सिर्फ बाते करते हैं, लक्ष्य हासिल करने का प्रयास नहीं।

लोग जागरूक लेकिन सरकार नहीं

दुनियाभर में यह समस्या है कि लोगों को अपने पर्यावरण के संरक्षण के लिए कैसे जागरूक किया जाए। लेकिन ये वही बात है कि बीमार गुलाबों हैं और इलाज सिताबों का किया जा रहा हो। दुनिया का सबसे विकसित राष्ट्र अमेरिका के सबसे ताकतवर लीडर डॉनल्ड ट्रंप को ही देख लीजिए। उन्होंने तो ग्लोबल वार्मिंग जैसी कोई चीज है इसी को मानने से इंकार कर दिया था। लोगों की जागरूकता देखनी है तो आरे कॉलोनी में पेड़ों की कटाई रोकने आए लोगों को देखिए। पेड़ों को बचाने के लिए वो लाठी तक खाने के लिए तैयार हैं। वहीं, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर का कहना है कि मजबूरी में पेड़ काटे जाते हैं तो उसकी भरपाई भी की जाती है। जावडेकर ने कहा कि यूं भी बॉम्बे हाई कोर्ट ने आरे को जंगल नहीं माना है। उन्होंने दिल्ली मेट्रो के पहले स्टेशन के निर्माण के वक्त इसी तरह के विरोध की याद दिलाते हुए कहा कि पेड़ सिर्फ काटे ही नहीं जाते हैं, लगाए भी जाते हैं। पर्यावरण मंत्री ने कहा, ‘बॉम्बे हाई कोर्ट ने आदेश में कहा है कि यह जंगल नहीं है। पहला दिल्ली मेट्रो स्टेशन बनाने के लिए भी 20-25 पेड़ काटे जाने थे। लोगों ने तब भी विरोध किया था, लेकिन काटे गए हरेक पेड़ के बदले पांच पौधे लगाए गए थे।’

एक पेड़ की कीमत तुम क्या जानो सरकार बाबू

पर्यावरण मंत्री का ये कहना कि पेड़ों को मजबूरी में काटना पड़ता है यह बहुत ही डरावना है। लगता है कि सरकार खुद ही नहीं जानती है कि एक पेड़ जिंदगी के लिए कितना महत्व रखता है। आपको बता दें, एक स्वस्थ पेड़ हर दिन लगभग 230 लीटर ऑक्सीजन छोड़ता है, जिससे सात लोगों को प्राण वायु मिल पाती है। यानि जब हम एक पेड़ को काटते हैं तो इसका मतलब है कि सात लोगों की हत्या कर रहे हैं। फिर तो ये सवाल उठना लाजमी है कि ऐसा कौन सा विकास है जो सात लोगों की हत्या की कीमत पर भी किया जाना चाहिए?

वायु प्रदूषण के कारण भारतीयों की आयु 2.6 वर्ष घटी

सेंटर फॉर साइंस ऐंड इनवायरन्मेंट (सीएसई) पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाला एक संगठन है। सीएसई की रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि घर से बाहर का वातावरण और घर के अंदर का वातावरण दोनों ही जगह वायु प्रदूषण जानलेवा बीमारियों को न्योता दे रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, ‘वायु प्रदूषण भारत में स्वास्थ्य संबंधी सभी खतरों में मौत का अब तीसरा सबसे बड़ा कारण हो गया है। यह बाहरी पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) 2.5, ओजोन और घर के अंदर के वायु प्रदूषण का सामूहिक प्रभाव है।’ यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि वायु प्रदूषण के सामूहिक प्रभाव की वजह से भारतीयों समेत दक्षिण एशियाई लोगों की औसत आयु 2.6 साल कम हो गयी है।

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भारत में वनों की स्थिति

राष्ट्रीय वन नीति 1988 के अनुसार देश के कुल क्षेत्रफल का कम से कम एक तिहाई क्षेत्रफल वनों व वृक्षों से आच्छादित करने का लक्ष्य होना चाहिए जिसमें पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में यह दो तिहाई से कम नहीं होना चाहिये। लेकिन वर्तमान में भारत में वन स्थित रिपोर्ट 2017 के अनुसार देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का कुल वन और वृक्ष आच्छादन 24.39 प्रतिशत है। इसमें भी जो कुल वनावरण है वो 21.54 प्रतिशत है। अभय सिन्हा

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पुण्यतिथि विशेष: ‘आबिदा सुल्तान’ यह नाम नहीं बल्कि महिलाओं की उड़ान का ऐलान है…

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लखनऊ। साल 1913, तारीख 28 अगस्त। देश में स्वदेशी की भावना जाग्रत हो चुकी थी। यह वह दौर था जब तमाम तरह के आंदोलन आजादी के साथ-साथ समाज सुधार के लिए भी चल रहे थे। ऐसे समय भोपाल रियासत के अंतिम नवाब हमीदुल्लाह खान के घर पहली संतान आबिदा सुल्तान का जन्म होता है। जब देश कई प्रकार की रूढ़ियों में जकड़ा हुआ था। स्त्री शिक्षा के प्रयास चल रहे थे उस वक्त आबिदा की परवरिश उनकी दादी सुल्तान जहां बेगम ने बिल्कुल ही खुले माहौल में की थी। बहुत कम उम्र में ही उन्हें कार ड्राइविंग, घोड़े और पालतू चीतल जैसे जानवरों की सवारी और शुटिंग कौशल में महारत हासिल हो गई थी। उस जमाने में भी वो बिना नकाब गाड़ी चलाती थीं।

भारत की पहली महिला पायलट

आबिदा सुल्तान सही मायनों में बहुमुखी प्रतिभा की धनी थीं। उन्होंने हर क्षेत्र में पुरूषों से दो कदम आगे बढ़कर ही काम किया था। उन्होंने 25 जनवरी 1942 को पायलट लाइसेंस प्राप्त किया और भारत की पहली महिला पायलट बनने का गौरव हासिल किया। आबिदा की यह उपलब्धि आने वाले दिनों में हजारों-लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा साबित हुई।

राजनीति में भी रहीं सक्रिय

आबिदा सुल्तान ने उपमहाद्वीप के मुस्लिम राजनीति में बेहद अहम भूमिका निभाई। उन्होंन अपने पिता हमीदुल्लाह खान की कैबिनेट में अध्यक्ष और मुख्य सचिव की जिम्मेदारी संभाली थी। पोलो और स्क्वेश जैसे खेलों में आबिदा 1949 में अखिल भारतीय महिला स्क्वैश की चैंपियन रहीं। उनका निकाह 18 जून, 1926 को कुरवाई के नवाब सरवर अली खान के साथ हुआ। पोती आबिदा पहली बार पिता के उत्तराधिकारी का अनुमोदन प्राप्त करने के लिए अपनी दादी नवाब सुल्तान जहां बेगम के साथ 1926 में लंदन गईं थीं।

पाकिस्तान में भी बंदिशे की अस्वीकार

देश आजाद तो हो गया लेकिन दो मुल्कों में बंट भी गया। एक भारत बना और दूसरा पाकिस्तान। उथल-पुथल के बीच 1949 में आबिदा सुल्तान ने पाकिस्तान जाने का निर्णय किया और कराची में जाकर बस गईं। धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में विश्वास रखने वाली आबिदा के हौसले को पाकिस्तान की सड़ी-गली कट्टर मानसिकता भी नहीं डिगा पाई। वहां वह राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय रहीं। उन्होंने 1954 में संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व और 1956 में चीन का दौरा किया। आबिदा ने 1960 में मार्शल कानून के विरोध में मोहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना समर्थन में अपनी आवाज बुलंद की। वे महिला अधिकारों की पक्षधर थीं। जनवरी 1954 में उनकके पिता पिता ने उनसे भोपाल वापस लौटने की पेशकश की थी लेकिन उन्होंने आना स्वीकार नहीं किया। आबिदा पिता से 12 वर्षों तक दूर रहीं लेकिन उनकी मृत्यु के समय वे भोपाल आईं।

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आबिदा सुल्तान अक्टूबर 2001 तक अनेक रोगों से ग्रस्त हो गईं। 27 अप्रैल, 2002 को कार्डियक ऑपरेशन के लिए उन्हें शौकत उमर मेमोरियल अस्पताल करांची में भर्ती कराया गया, जहां 11 मई, 2002 को उनका निधन हो गया। उनके पुत्र शहरयार मोहम्मद खान पाकिस्तान में विदेश सचिव रहे हैं।

बता दें, आबिदा सुल्तान की बहन साजिदा सुल्तान का निकाह नवाब इफ्तेखार अली खान पटौदी से हुआ था। जिनके बेटे मंसूर अली खान थे, जो सैफ अली खान के पिता थे।http://www.satyodaya.com

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मोदी सरकार-2 में आधा दर्जन महिलाओं को भी मिली जगह, जानिए उनका अब तक का राजनीतिक सफर…

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30 मई को केन्द्र में एक बार फिर से पीएम मोदी की अगुवाई में एनडीए की सरकार बन गयी। पीएम मोदी के 57 सहयोगियों में आधा दर्जन महिलाओं को भी जगह मिली हैं। आइए जानते हैं मोदी मंत्रिमंडल में शामिल इन महिला शक्तिओं के बारे में…

निर्मला सीतारमण: मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में निर्मला सीतारमण सितंबर 2017 में रक्षा मंत्री बनने से पहले वह भारत की वाणिज्य और उद्योग तथा वित्त व कारपोरेट मामलों की राज्य मंत्री रह चुकी हैं। अब उनके कंधों पर वित्त मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया है। जैसा की सबको पता है कि सीतरमण ने मंत्री के रूप में अपने काम से सबको प्रभावित किया है, लेकिन वित्त मंत्री के रूप में उनकी असली अब परीक्षा होगी। निर्मला सीतारमण भाजपा से संबद्ध हैं और पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता भी रह चुकी हैं। बता दें कि निर्मला सीतारमन भारत की पहली पूर्णकालिक महिला रक्षा मंत्री रह चुकी हैं। इन्होने ही इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए अतिरिक्त कार्यभार के रूप में यह मंत्रालय संभाला था। निर्मला सीतारमन 2003 से 2005 तक राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य भी रह चुकी हैं। वह सितंबर 2003-2017 तक भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्ता के साथ ही भारत की वाणिज्य और उद्योग तथा वित्त व कारपोरेट मामलों की राज्य मंत्री रहीं हैं और सितंबर 03-2017 को पीएम नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार में उन्हें रक्षा मंत्री बनाया गया।

स्मृति ईरानी: मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में स्मृति इरानी को इस बार भी अहम जिम्मेदारी दी गई है। इससे पहले स्मृ ति ईरानी पूर्ववर्ती एनडीए सरकार में भी दो अलग-अलग मंत्रालयों की जिम्मे दारी संभाल चुकीं है। स्मृति इरानी को इस बार भी महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के साथ-साथ कपड़ा मंत्रालय की जिम्मे दारी भी दी गई है। बता दें कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की जिम्मेमदारी एनडीए-1 सरकार में मेनका गांधी के पास थी।

वहीं मेनका गांधी को नई मोदी कैबिनेट में जगह नहीं दी गई है। उन्हें प्रोटेम स्पीमकर बनाए जाने की चर्चा है। स्मृोति ईरानी पीएम मोदी की अगुवाई वाली नई मंत्रिमंडल में वह सबसे कम उम्र की मंत्री हैं। स्मृनति साल 2014 से ही अमेठी में सक्रिय रहीं है, वहीं 43 साल की उम्र में स्मृ ति लोकसभा चुनाव में गांधी परिवार के गढ़ माने जाने वाले अमेठी से कांग्रेस अध्य क्ष राहुल गांधी को पूरे 55000 वोटों से हरा दिया है। स्मृति ने अपनी जीत से खूब सुर्खियां बटोरीं और उसके साथ ही राजनीति में इतिहास भी रच दिया है। साल 2003 से भाजपा से जुड़ी स्मृति बहुत ही सहनशील और अपने कार्य के प्रति लगन दिखाकर उन्होंने अपनी जीत हासिल करी है। इस जीत को पाने के लिए स्मृति ने अपने जीवन में कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। बता दें कि इससे पहले स्मृति मोदी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की जिम्मेकदारी दी गई थी। राजनीति में आने से पहले स्मृेति ईरानी लोगों के बीच टीवी एक का चर्चित चेहरा भी रह चुकी हैं। एकता कपूर के धारावाहिक श्क्योंयकि सास भी कभी बहू थीश् से घर-घर में पहचान बनाने वालीं स्मृति ईरानी के आज भी उनसे अच्छे संबंध हैं।

हरसिमरत कौर बादल: मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में पंजाब के बठिंडा से शिरोमणि अकाली दल की सांसद हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्री के रूप में शपथ ली है। इससे पहले हरसिमरत पीएम नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में भी कैबिनेट मंत्री थीं। बता दें कि हरसिमरत पंजाब की राजनीति में सबसे ताकतवर बादल परिवार से ताल्लुक रखती हैं। हरसिमरत कौर बादल के पति सुखबीर सिंह बादल पंजाब के उप मुख्यमंत्री रह चुके हैं। सुखबीर बादल शिरोमणि अकाली दल के प्रधान भी हैं और वहीं पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और अकाली दल के मुखिया प्रकाश सिंह बादल की बहू हैं।

हरसिमरत 2014 में अपने देवर मनप्रीत सिंह बादल को बठिंडा संसदीय सीट से कड़े मुकाबले में करीब 19 हजार मतों से पराजित कर संसद पहुंची थीं। जिसके बाद 2014 में मोदी सरकार में हरसिमरत कौर बादल को मोदी कैबिनेट में खाद्य प्रसंस्करण मंत्री बनाया गया था। खाद्य प्रसंस्करण मंत्री के पद पर किए गए कार्य की काफी सरहना भी हुई है । वहीं पिछली उपलब्धियों की वजह से बठिंडा की जनता ने हरसिमरत पर दोबारा से भरोसा जताकर कांग्रेस प्रत्यासशी अमरिंदर राजा वड़िंग को 21772 वोटों से मात दे दी है । बता दें कि हरसिमरत कौर सदैव ही दिल्ली की राजनीति में अकाली दल का चेहरा रही हैं। उन्होंने कभी पंजाब की राजनीति में इतनी सक्रियता नहीं दिखाई है।

रेणुका सिंह: लोकसभा चुनाव 2019 में छत्तीसगढ़ से सरगुजा फतेह करने वाली रेणुका सिंह (सुरता) को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की टीम इंडिया में शामिल किया गया है। रेणुका सिंह को जनजातीय (आदिवासी) मामलों के मंत्रालय में केन्द्रीय राज्य मंत्री की जिम्मेदारी मिली हैद्य आजादी के बाद यह दूसरा मौका है, जब भारत सरकार में छत्तीसगढ़ के सरगुजा से कोई मंत्री बना है। सांसद रेणुका से पहले मोरारजी देसाई की सरकार में सरगुजा से लरंग साय रेल राज्य मंत्री थे । इतना ही नहीं छत्तीसगढ़ निर्माण के बाद रेणुका सिंह पहली महिला सांसद हैं, जिन्हें केन्द्र सरकार में राज्य मंत्री बनाया गया है। लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस प्रत्याशी को 1 लाख 57 हजार से अधिक वोटों से हराने वाली रेणुका सिंह पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री रही चुकी हैं । वो अनुसूचित जनजाति की तेजतर्रार नेत्री के तौर पर भी जानी जाती हैं। रेणुका सिंह प्रेमनगर से दो बार विधायक निर्वाचित हुई हैं. 2003 से 2005 तक महिला बाल विकास मंत्री रही हैं। वे 2005 से 2013 तक सरगुजा विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष भी थीं । वर्ष 2002 से 2004 तक भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश मंत्री रहीं।

देबाश्री चौधरी: मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में देबाश्री को मोदी कैबिनेट में महिला बाल विकास मंत्री का पद मिला हैद्य बता दें कि बंगाल के रायगंज की नवनिर्वाचित सासंद देबाश्री चैधरी मोदी सरकार पार्ट-2 में पहली बार मंत्री पद की शपथ लेने वाले सांसदों की लिस्ट में शामिल हुई हैंद्य देबाश्री चैधरी ने टीएमसी के कन्हैयालाल अग्रवाल को 60,574 मतों से हराया हैद्य देबाश्री चैधरी की शैक्षिक योग्यता स्नातकोत्तर हैद्य उनको राजनीति में लगभग 20 साल से ज्यादा का अनुभव है । देबाश्री चैधरी का पैतृक घर-देबाश्री चौधरी भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के दक्षिण दिनाजपुर जिले में स्थित बालुरघाट की रहने वाली हैंद्य लेकिन उनका पैतृक घर खादिमपुर में हैद्य देवश्री ने अपनी पढ़ाई बर्दवान से की है लेकिन बीजेपी मुख्यालय से जुड़ने के बाद वो बागुइती में शिफ्ट हो गई थींद्य महिला मोर्चा से भी जुड़ी रही देबाश्री चैधरी-देबाश्री चैधरी ने कई साल तक अपनी पार्टी की युवा शाखा और महिला मोर्चे में काम भी कियाद्य पिछले कुछ साल से वो पार्टी की राज्य इकाई की महासचिव के रूप में भी कार्य कर रही हैं। साल 2014 में हुए चुनाव में उन्होंने बर्दवान-दुर्गापुर लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में आई है ।

साध्वी निरंजन: नरेंद्र मोदी की दूसरी सरकार में साध्वी निरंजन ज्योति को फिर से राज्य मंत्री बनाया गया है। 52 साल की साध्वी निरंजन ज्योति ने फतेहपुर लोकसभा सीट पर गठबंधन उम्मीदवार बसपा के सुखदेव प्रसाद वर्मा को हराया था। पिछली सरकार में वह केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री थीं। इनका मूसा नगर, कानपुर देहात में उनका आश्रम है। उमा भारती के बाद वह केंद्रीय मंत्री के पद तक पहुंचने वाली देश की दूसरी साध्वी हैं।

2014 में उत्तर प्रदेश की फतेहपुर सीट से जीतकर पहली बार सांसद बनी थीं। इससे पहले वह फतेहपुर से ही 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायक चुनी गई थीं। इस साल प्रयागराज कुंभ मेले में साध्वी निरंजन ज्योति को निरंजनी अखाड़े की महामंडलेश्वर की पदवी दी गई थी।साध्वी निरंजन ज्योति निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर परमानंद गिरी की शिष्या भी हैं। उत्तर प्रदेश से इस बार सिर्फ स्मृति ईरानी और साध्वी निरंजन ज्योति मंत्री बनाई गई हैं। पिछली बार उमा भारती, मेनका गांधी, साध्वी निरंजन ज्योति, कृष्णा राज, अनुप्रिया पटेल को मौका मिला था। पिछली दफा स्मृति अमेठी से चुनाव हार गई थीं और वह गुजरात से राज्यसभा सदस्य बनीं।http://www.satyodaya.com

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