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सत्योदय विशेष

सिर्फ लखनऊ में ही क्यों मनाए जाते हैं जेठ के बड़े मंगल, जानें कब-कैसे चल निकली परंपरा…

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लखनऊ। को नहि जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो….अर्थात अपने भक्तों के संकटों को पल भर में हरने वाले हनुमान जी को संकट मोचन के नाम से भी जाना जाता है। भगवान राम के अनन्य भक्त बजरंग बली शरण में आए भक्त के दुख पल भर में हर लेते हैं, शर्त यह है कि श्रद्धा, भक्ति और विश्वास वैसा ही होना चाहिए जैसा हनुमान जी को अपने आराध्य श्रीराम पर था।
संकटमोचन के भक्तों के लिए वैसे तो हर मंगलवार का बड़ा महत्व है लेकिन जेठ के महीने में पड़ने वाले बड.े मंगल बेहद खास होते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान हनुमान भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं। माना जाता है कि भगवान श्रीराम से हनुमान जी की पहली मुलाकात जेठ माह के मंगल के दिन ही हुई थी इसीलिए बड़ा मंगल मनाया जाता है।
भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण द्वारा बसाई गई नगरी लखनपुरी जो अब लखनऊ में बदल चुकी है, यहां जेठ माह में अलग ही भक्ति भाव की छटा दिखती है। हर बड़ा मंगल यहां महापर्व की तरह मनाया जाता है। अपनी गंगा-जमुनी तहजीब के लिए प्रसिद्ध लखनऊ इस दिन बजरंग बली के रंग में रंगा नजर आता है। नवाबी दौर में अवध के नवाब भी ऐसे आयोजनों में बढ.-चढ.कर हिस्सा लेते थे। इस माह में पड़ने वाले सभी बड़े मंगल नवाबी शहर लखनऊ के लिए किसी महापर्व से कम नहीं है। इस बार जेठ माह की शुरूआत 19 मई से हो रही है और पहला बड़ा मंगल 21 मई को पड़ रहा है। जेठ माह में पड.ने वाले हर बड़ा मंगल पर जो भक्ति भाव की लहर लखनऊ में उठती है वैसी देश भर में अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलती। महीने भर पहले ही की इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हैं जैसे मंदिरों की रंगाई-पुताई साफ-सफाई आदि। बड.े मंगल पर विशेष पूजन और हनुमान जी के विशेष श्रृंगार के लिए श्रद्धालुओं में होड. लगती है जिसके चलते महीने भर पहले ही बुकिंग शुरू हो जाती है। बड.ा मंगल आते ही मंदिरों की कौन कहे….हर गली और चैराहे पर सब्जी पूड़ी, शर्बत, बूंदी, हलवा आदि के स्टाॅलों की भरमार हो जाती है। हर ओर बस जय हनुमान…जय हनुमान का शोर और लोग पेट भर-भर कर प्रसाद पाते हैं।

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कृपा ऐसी कि साधारण कारीगरों द्वारा बनाई सब्जी और पूड.ी में ऐसा स्वाद आ जाता है कि लोग प्रसाद से ही पेट भर लेते हैं। जेठ की तपती दोपहरी में जेठ के बड.े मंगल गरीब, रिक्शा चालकों और यहां के नौकरीपेशा बाहरी लोगों के लिए किसी निमंत्रण से कम नहीं होते। जहां चाहें और जितना चाहें छक कर प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं। यह क्रम सुबह से लेकर शाम तक चलता है। बड़ा मंगल सिर्फ हिन्दू धर्म की आस्था का प्रतीक ही नहीं है बल्कि विभिन्न धर्मों के लोगों की भी इसमें आस्था है। इस आयोजन में हिन्दू, मुस्लिम, सिख व ईसाई आदि सभी धर्मो के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यह त्यौहार लखनऊ के धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक मान्यताओं का सबसे बड़ा उदाहरण है। इस शहर गंगा जमुनी की तहजीब को बखूबी देखा जा सकता है, जहां एक मुसलामन मंदिर का निर्माण कराता है, हिन्दू भाई मस्जिद का निर्माण कराते हैं। आज तक के इतिहास में लखनऊ एक शांतिपूर्ण शहर रहा है, जहां कभी धर्म को लेकर कोई हिंसा और असहिष्णुता नहीं हुई है। # Intolerance

इस बार जेठ के बड़े मंगल की शुरूआत कृष्ण तृतीया से हो रही है। इस दिन चन्द्रमा धनु राशि में रहेगा, धनु मंगल की मित्र राशि है। सिद्ध योग होने के कारण हर कार्य में सफलता मिलेगी। इसलिए जेठ माह की शुरूआत काफी शुभ और सफलतादायक सिद्ध होगी। इस बार चार मंगल है। जिसमें 21, 28 मई और 4 व 11 जून को पड़ेगा। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक बड़े मंगल पर हनुमान जी के दर्शन, पूजन व चोला चढ़ाने से काफी लाभ मिलेगा। राजधानी के प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों में बड़ा मंगल को लेकर तैयारियां युद्धस्तर पर चल रही हैं। यहां भक्तों की भीड़ और गर्मी को देखते हुए काफी व्यस्थाएं की गयी गई हैं।
अलीगंज का नया हनुमान मंदिर टस्ट के व्यवस्थापक राकेश दीक्षित ने बताया कि जेठ महीने के मंगल को लेकर यहां चल रहीं तैयारियां अंतिम चरण में हैं। मंदिर के आस-पास साफ सफाई से लेकर श्रद्धालुओं को धूप व गर्मी से बचाने के लिए विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं। मंदिर में व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस प्रशासन के साथ एनसीसी सहित अन्य स्थानीय संगठन व सेवादार अपनी सेवाएं देंगे। श्रद्धालुओं को गर्मी से बचाने के लिए पानी वाले पंखों की व्यवस्था की गयी है। श्री दीक्षित ने बताया कि जेठ माह के पहले बड़े मंगल पर पांच कुंतल फूलों से बाबा का श्रृंगार होगा और तीन कुंतल लड्डुओं का भोग लगेगा। यहां जेठ के चारों बड़े मंगल पर बाबा का विशेष श्रृंगार करने के लिए अभी तक 1000 से ज्यादा श्रद्धालु बुकिंग करा चुके हैं।# AliganjNewHanuman Temple शहर प्रसिद्ध मंदिरों में से एक हनुमान सेतु मन्दिर में भी बड़े मंगल की तैयारियों जोरों पर हैं। गोमती के किनारे स्थिति यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। बड़े मंगल पर यहां भी भक्तों का तांता लगा रहता है। यहां हर बार जेठ के बड़े मंगल पर किसी एक भक्त को ही बाबा के श्रृंगार का सौभाग्य मिलता था लेकिल इस बार 5 से 6 भक्तों को हनुमान जी के शृंगार का मौका मिलेगा। यहां हर दो घण्टे पर हनुमान जी का श्रृंगार बदला जाएगा। जेठ के सभी मंगल पर मन्दिर परिसर को एयरकंडीशन किया जायेगा। जिससे भक्तों को गर्मी में काफी राहत मिलेगी। मन्दिर के बाहर कई समाजसेवियों द्वारा भण्डारे और प्याऊ की व्यवस्था की जाएगी। मंगल के दिन लखनऊ विश्वविद्यालय मार्ग स्थित मन्दिर का द्वार बन्द रहेगा। उस दिन बंधा मार्ग के गणेश द्वार से ही दर्शन होंगे। इसी तरह चैक स्थित मनकामेश्वर मंदिर, पंचमुखी हनुमान मंदिर और लेते हुए हनुमान मंदिर सहित शहर के अन्य मंदिरों में बड़े मंगल की तैयारियां चल रही हैं।

कैसे और कब चल निकली परंपरा

लोगों के मन में यह जाने का कौतूहल अवश्य होता है कि आखिर नवाबी शहर में हिन्दुओं के ईष्टदेव हनुमान जी के इस त्यौहार को इतनी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाने की परंपरा कब और कैसे चल निकली। तो बता दें कि इसके पीछे कई कहानियां हैं…

मान्यता है कि इस परम्परा की शुरुआत लगभग 400 वर्ष पूर्व मुगलशासक ने की थी। नवाब मोहमद अली शाह का बेटा एक बार गंभीर रूप से बीमार हुआ। उनकी बेगम रूबिया ने उसका कई जगह इलाज कराया लेकिन वह ठीक नहीं हुआ। बेटे की सलामती की मन्नत मांगने वह अलीगंज के पुराने हनुमान मंदिर आयी। पुजारी नेबेटे को मंदिर में ही छोड़ देने कहा बेगमरूबिया रात में बेटे को मंदिर में ही छोड़ गयीं। दूसरे दिन रूबिया को बेटा पूरी तरह स्वस्थ मिला। तबरूबियाने इस पुराने हनुमान मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।जीर्णोद्धार के समय लगाया गया प्रतीक चांदतारा का चिन्ह आज भी मंदिर के गुंबद पर चमक रहा है। मंदिर के जीर्णोद्धार के साथ ही मुगल शासक ने उस समय ज्येष्ठ माह में पड.ने वाले मंगल को पूरे नगर में गुडधनिया (भुने हुए गेहूं में गुड मिलाकर बनाया जाने वाला प्रसाद) बंटवाया और प्याऊ लगवाये थे। तभी से इस बडे मंगल की पर परा की नींव पडी।बडा मंगल मनाने के पीछे एक और कहानी है। नवाब सुजा-उद-दौला की दूसरी पत्नी जनाब-ए-आलिया को स्वप्न आया कि उसे हनुमान मंदिर का निर्माण कराना है। सपने में मिले आदेश को पूरा करने के लिये आलिया ने हनुमान जी की मूर्ति मंगवाई। हनुमान जी की मूर्ति हाथी पर लाई जा रही थी। मूर्ति को लेकर आता हुआ हाथी अलीगंज के एक स्थान पर बैठ गया और फिर उस स्थान से नहीं उठा।आलिया ने उसी स्थान पर मंदिर बनवाना शरू कर दिया जो आज नया हनुमान मंदिर कहा जाता है। मंदिर का निर्माण ज्येष्ठ महीने में पूरा हुआ। मंदिर बनने पर मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करायी गयी और बड़ा भंडारा हुआ।

तभी से जेठ महीने का हर मंगलवार बड़ा मंगल के रूप में मनाने की पर परा चल पड़ी। चार सौ साल पुरानी इस परंपरा ने इतना वृहद रूप ले लिया है कि अब पूरे लखनऊ के हर चैराहे व हर गली पर भंडारा चलता है।
वहीं दूसरी ओर पौराणिक कथाओं की मानें तो ज्येष्ठ के पहले मंगल के दिन ही भगवान लक्ष्मण ने लखनऊ शहर को बसाया था। तब उन्होंने पहली बार बड़ा मंगल मनाने की परंपरा की शुरुआत की थी। उसके बाद से आज तक लखनऊ में बड़ा मंगल मानने की परंपरा चलती आ रही है। खास बात यह कि, पूरे भारत में सिर्फ उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ही बड़े मंगल का आयोजन किया जाता है, जिसमे बड़े धूमधाम भंडारे आयोजित होते हैं और हनुमान मंदिरों में सुंदरकांड का पाठ आयोजित किया जाता है।

एक और किवदंति है कि नवाब वाजिद अली शाह के समय में केसर-कस्तूरी का एक मारवाड़ी व्यापारी जटमल लखनऊ आया और चैक के निकट की तत्कालीन सबसे बड़ी सआदतगंज की मंडी में कई दिन तक पड़ा रहा, किन्तु अधिक मँहगी होने के कारण उसके दर्जनों ऊँटों पर लदी केसर ज्यों-की-त्यों पड़ी रह गयी, कोई खरीददार भी नहीं मिला। ज्ञातव्य है कि इस मंडी की प्रशंसा बड़ी दूर-दूर तक थी। फारस, अफगानिस्तान तथा कश्मीर आदि से मेवों, फलों तथा जेवरात आदि के बड़े-बड़े व्यापारी वहाँ आते थे। मारवाड़ी व्यापारी बड़ा निराश हुआ और लोगों से कहने लगा कि श्अवध के नवाबों का मैंने बड़ा नाम सुना था, किंतु वह सब झूठ निकला।श् इतनी दूर आकर भी खाली हाथ लौटने के विचारमात्र से वह बड़ा दुरूखी हुआ और अयोध्या की ओर चल दिया। रास्ते में इसी नये मन्दिर के पास आकर जब वह विश्राम के लिये रूका, तब लोगों के कहने से उसने हनुमान जी से अपने माल की बिक्री के लिए मनौती मानी।
संयोगवश उन्हीं दिनों नवाब वाजिद अली शाह अपनी कैसर बेगम के नाम पर कैसरबाग का निर्माण करा रहे थे। किसी ने उनको राय दी कि यदि इस कैसरबाग की इमारत को केसर-कस्तूरी से पुतवा दिया जाये तो सारा इलाका ही अत्यंत सुवासित हो जायेगा। और जटमल की सारी कस्तूरी उसके मुँहमाँगे दाम पर खरीद ली गयी। जटमल के हर्ष का काई ठिकाना नहीं रहा, उसने हृदय खोलकर मन्दिर के लिए खर्च किया। आज भी मन्दिर के भीतर मूर्ति पर जो छत्र लगा है, वह इसी व्यापारी का बनवाया हुआ है। उसने पूरे मन्दिर को ही नये सिरे से बनवाया। वर्तमान स्तूप (गुंबद) भी तभी का है। तभी से यहाँ मेली भी लगने लगा।http://www.satyodaya.com

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सत्योदय विशेष

चार साल बाद फिर आया क्रिकेट का महापर्व…जानें कब और कहां से हुई इसकी शुरूआत….

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लखनऊ। टेस्ट…वन डे…और टी-20…क्रिकेट के चाहने वालों के लिए खेल के यह प्रारूप किसी पर्व से कम नहीं हैं। खासकर जब उनके देश की टीम या पसंदीदा खिलाड़ी ऐसे आयोजनों का हिस्सा हों तो बात ही अलग होती है। लेकिन जब बात इस खेल के सबसे बड़े आयोजन… क्रिकेट विश्व कप… की हो तो कहना ही क्या। पूरी दुनिया कुछ एकड. के स्टेडियम की दर्शक दीर्घा बन जाती है और करोड.ों आंखें उस 22 गज की पिच पर जम जाती हैं। कुल 100 ओवर के दो पारियों की हर बाल पर रोमांच का पारावार…हर चैका और छक्का पड.ने पर वाह…और कैच छूटने पर धत तेरे की…जैसे शब्दों और भावनाओं की अभिव्यक्ति…यही तो है क्रिकेट का महापर्व…क्रिकेट विश्व कप…एक बार फिर से चार साल बाद क्रिकेट महाकुम्भ का मैदान सज चुके हैं। 30 मई से शुरू हो रहे विश्व कप की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है साथ ही प्रशंसकों की बेसब्री भी बढ.ती जा रही है।
तो आइए जानते हैं इस खेल की शुरूआत कहां से हुई और कब हुई…साथ ही भारत में यह खेल किस तरह से सबसे लोकप्रिय हो गया। क्रिकेट की शुरूआत इंग्लैड से हुई है। सबसे पहले इस खेल का निश्चित प्रमाण 1598 के आस-पास मिलता है। अंग्रेजों के द्वारा शुरू हुआ यह खेल धीरे-धीरे पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया। भारत में यह 18वीं सदी में यूरोपीय नाविकों और व्यापारियों द्वारा लाया गया। अपने शासन के दौरान अंग्रेजों ने भी भारत को इस खेल से रू-ब-रू करवाया और भारत में भी अभिजात्य और संभ्रांत लोगों द्वारा यह खेल खेला जाने लगा। आज हालत यह है कि प्रदर्शन और लोकप्रियता के मामले में खुद का इसका खोजकर्ता देश इंग्लैंड भारत से पिछड. चुका है। क्रिकेट की दुनिया में आस्टेलिया के सर ब्रैन मैन आज भी अपने सर्वश्रेष्ठ रिकार्डों के साथ शिखर पर विराजमान हैं।# SirBranMan

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भारत में पहले क्रिकेट क्लब की स्थापना 1792 में कलकत्ता हुई। लेकिन राष्ट्रीय क्रिकेट टीम ने अपना पहला मैच लॉर्ड्स में 25 जून 1932 को खेला। अपने पहले टेस्ट मैच खेलने के साथ ही विश्व में टेस्ट टीम की हैसियत पाने वाली दुनिया की छठवी टीम बन गयी। अपने पहले 50 वर्षों में टीम ने बहुत ही कमजोर प्रदर्शन किया। 196 टेस्ट मैचों में से केवल 35 मैच में ही जीत दर्ज करा पाई। 1970 के दशक से भारतीय क्रिकेट टीम एक शक्तिशाली टीम बनकर उभरी। 1983 में कपिल देव के नेतृत्व में भारतीयों ने इतिहास रचते हुए वेस्टइंडीज को हराकर विश्वकप अपने नाम किया। इसके बाद क्रिकेट की दुनिया में भारतीय प्रतिभा सूर्य बनकर उभरी। सौरव गांगुली की कप्तानी में भारतीय टीम एक से बढ.कर एक खिताब अपने नाम किए। हालांकि 2003 के विश्व कप में टीम उपविजेता रही। लेकिन 2011 में महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में भारत ने दूसरी बार विश्वकप जीता।#CricketWorldCup

भारतीय क्रिकेट टीम में लगभग 28 कप्तान हो चुके है जिन्होंने कम से कम एक टेस्ट क्रिकेट में कप्तानी की हो। भारतीय क्रिकेट टीम के सबसे पहले कप्तान सीके नायडू थे जिन्होंने पहला मैच इंग्लैंड क्रिकेट टीम के खिलाफ खेला था। लाला अमरनाथ भारत के चैथे कप्तान थे इन्होंने पहला मैच भारतीय स्वतंत्रता के पश्चात खेला था। लाला अमरनाथ की कप्तानी में ही भारत ने पहला टेस्ट मैच और पहली टेस्ट श्रृंखला जीती थी जो 1952-53 में पाकिस्तान के खिलाफ खेलने गए थे।
भातीय टीम में समय-समय पर कोहिनूर चमकते रहे हैं, कपिल देव, लाला अमरनाथ, सौरव गांगुली, सचिन तेंदुलकर, अनिल कुंबले, विराट कोहली जैसे अनगिनत प्रतिभासंपन्न खिलाडि.यों ने भारतीय क्रिकेट को नई बुलंदियों पर पहुंचाया। #Kapil Dev

विश्व कप की शुरूआत

आईसीसी क्रिकेट विश्व कप एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट की अंतरराष्ट्रीय चैम्पियनशिप है। हर चार साल के अंतराल पर आयोजित किया जाता है। यह टूर्नामेंट दुनिया में सबसे ज्यादा देखी गयी खेल स्पर्धाओं में से एक है, यह केवल फीफा विश्व कप और ओलंपिक पीछे है। पहली बार विश्व कप 1975 में इंग्लैंड में आयोजित किया गया था। पहले तीन विश्व कप इंग्लैंड में मेजबानी किए गए थे लेकिन 1987 टूर्नामेंट के बाद से विश्व कप हर चार साल मेें दूसरे देश में आयोजित किया जाता है। सबसे हाल ही मेें यह टूर्नामेंट 2015 में आयोजित की गई थी। इसकी मेजबानी ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने की थी और इसे ऑस्ट्रेलिया ने जीता। # Lala Amarnath ऑस्ट्रेलिया ने सबसे अधिक पांच बार यह खिताब अपने नाम किया है। भारत और वेस्टइंडीज ने दो-दो बार जबकि पाकिस्तान और श्रीलंका ने एक-एक बार विश्व चैम्पियन रह चुके हैं। इस बार इसका आयोजन 30 मई से हो रहा है जिसकी मेजबानी इंग्लैंड के पास है। इसका आगाज क्रिकेट के सबसे बेहतरीन स्टेडियमों में से एक ओवल में होगा। इसके बाद 2023 में होने वाले विश्व कप की मेजबानी भारत करेगा।http://www.satyodaya.com

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पुलिस के जवानों का ‘दर्द’ भी समझिए साहब…

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काम के बढ़ते बोझ ने पुलिस वालों में ’इंसान’ होने के भाव को ही खो दिया है

आखिर सत्ता पुलिस वालों को इंसान से ’हिंसक’ जानवर बनाने में क्यों तुली है और इसके पीछे उसका असल मकसद क्या है?

अभी कुछ दिन पहले की बात है जब मेरा एक पुलिस स्टेशन (थाना) पर एक काम के सिलसिले में जाना हुआ। भरी दोपहरी में जब मैं पुलिस स्टेशन पहुंचा तो वहां पर मुझे केवल तीन व्यक्ति मौजूद मिले। पहिला एक होमगार्ड का जवान,जो कि वहां पर संतरी ड्यूटी कर रहा था। दूसरा एक मुंशी (पुलिस स्टेशन का लिपिक),जो कि थाने में बैठा कुछ लिखा पढ़ी में व्यस्त था। उसकी मेज पर फाइलों का ढेर लगा हुआ था। इन सबसे इतर तीसरे व्यक्ति थाना प्रभारी थे। वे अपने विश्राम कक्ष में सो रहे थे। जब मैंने मुंशी से पूछा कि थाना प्रभारी कहां हैं? मुझे उनसे मुलाकात करनी है? इस पर मुंशी ने मुझसे जो कुछ कहा वह अपने आप में चैंकाने वाला था। उसने बताया कि पिछले तीन दिन से एक जरूरी काम के कारण साहब बहुत व्यस्त थे। वे अभी सो रहे हैं और मैं उनको ’डिस्टर्ब’ नहीं कर सकता। आपको अगर उनसे मिलना है तो फिर कल सुबह आइए या फिर एक चिट्ठी में लिख दीजिए। उनके जगने पर दे दूंगा। हलांकि, बाद में आस-पास की चाय की दुकानों पर चर्चा में मुझे यह पता चला कि हाई प्रोफाइल हत्या के एक मामले में स्थानीय पुलिस पर आरोपियों को पकड़ने का काफी दबाव था। इसी वजह से रात-रात भर छापेमारी करने के कारण दो रात थाना प्रभारी सो नहीं पाए थे। अब जबकि आरोपी पकड़ लिया गया था तो वो आराम कर रहे थे।

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गौरतलब है कि ऐसी दबाव भरी दिनचर्या एक दिन का मामला नहीं है। पुलिस वालों का जीवन तकरीबन ऐसे ही हर दिन चलता है। एक बार सुबह नहाने के बाद शरीर पर टंगी वर्दी रात के दो बजे के बाद ही बदन से उतर पाती है। यही नहीं, अगले दिन दस बजे उन्हें कार्यालय में समय से उपस्थित होना होता है। सप्ताह में चैबीस घंटे का सामान्य ’रूटीन’ यही होता है। अब जबकि पुलिस के कार्यक्षेत्र लगातार व्यापक होते जा रहे हैं, उनके ऊपर काम का बोझ भी लगातार बढ़ा है। इस काम के बोझ के दौरान उनके दुख दर्द से किसी को कोई मतलब नहीं होता। काम के दबाव में भले ही पुलिस वाले मानसिक स्तर पर टूट जाएं, लेकिन पुलिस विभाग को उनसे कोई हमदर्दी नहीं होती है। पुलिस अधिकारियों के स्तर पर एक सामान्य समझ विकसित कर ली गयी है कि विभाग में सब कुछ ’ठीक’ है और उसे किसी तरह के सुधार की जरूरत नहीं है। पुलिस के अफसर जवानों की बेहतरी पर बात करना अपनी ’तौहीन’ समझते हैं। उनका वर्ग चरित्र शासक वर्ग का होता है जो जवानों को महज एक ’गुलाम’ भर समझता है।

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दरअसल, उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था का सवाल पिछले कई सालों से विधानसभा चुनाव में राजनैतिक बहस का मुद्दा बनता रहा है। लेकिन, इस बात पर राजनीति में कभी कोई बहस नहीं होती कि आखिर कानून का शासन स्थापित करने में लगे लोगों-खासकर ’पुलिस’ के सिपाहियों-दारोगाओं की मानवीय गरिमा को सुनिश्चित कैसे रखा जाए? कानून व्यवस्था के खात्मे का रोना सभी दल भले ही रोते हों, लेकिन कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाने वाले पुलिस के इन सबसे निचले स्तर के जवानों के दुख दर्द उनकी बहस का हिस्सा नहीं होते हैं। पुलिस के कर्मचारी चाहे जितने जोखिम और तनाव में काम करें लेकिन उन्हें इंसान समझने और उसकी इंसानी गरिमा सुनिश्चित करने की ’भूल’ कोई भी राजनैतिक दल नहीं करना चाहता है।

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गौरतलब है कि अन्य राज्यों के मुकाबले उत्तर प्रदेश में प्रति पुलिसकर्मी सबसे ज्यादा आबादी रहती है। जहां तक इसके संख्या बल का सवाल है-यह रिक्तियों की भीषण कमी से साल दर साल लगातार जूझ रही है। पुलिस थानों का हाल यह है कि कई थाने अपनी कुल स्वीकृत पुलिस बल के आधे से भी कम संख्या पर किसी तरह से अपना काम चला रहे हैं। पुलिस के पास आने वाली शिकायतों की जांच के लिए दारोगा की जगह सिपाही भेजकर काम चलाया जा रहा है। यह सब पुलिस के प्रोफेशनलिज्म का न केवल मजाक है बल्कि कानून सम्मत भी नहीं है। जाहिर है इससे पीड़ित के लिए इंसाफ पाने की प्रक्रिया भी गंभीर तौर पर बाधित होती है यही नहीं, साल दर साल जिस तरह से पुलिस की जिम्मेदारियां और कार्यक्षेत्र बढ़ रहा हैं, ठीक उसी अनुपात में उसका संख्या बल लगातार घटता जा रहा है। कार्य बल में लगातार हो रही कमी पुलिस की कार्यक्षमता पर बहुत ही नकारात्मक असर डाल रही है। इससे एक तरफ अपराध नियंत्रण में मुश्किल तो होती ही है, पुलिस के कर्मचारियों पर काम का दबाव भी काफी बढ़ जाता है। काम के इसी दबाव के कारण पुलिस वाले आज अपनी मानवीय गरिमा को ’भूल’ चुके हैं और शारीरिक तथा दिमागी रूप से बीमार होते हुए लगातार ’हिंसक’ हो रहे हैं। बिना अवकाश के लगातार ’ड्यूटी’ करने वाले पुलिस वालों को मैंने बहुत नजदीक से देखा है। वे सब गंभीर रूप से ’अवसाद’ का शिकार हो रहे हैं।

बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है

पुलिस महकमे में सब इंस्पेक्टर का पद बहुत ही जिम्मेदारी भरा होता है। इस समय जो हालात हैं उसमें एक सब इंस्पेक्टर के पास औसत दस से ग्यारह मुकदमों की विवेचना लंबित है। यह सब पुलिस वालों में अपने कर्तव्य पालन को लेकर एक गंभीर ’तनाव’ पैदा करता है। जाहिर है काम के बढ़ते बोझ ने पुलिस वालों में ’इंसान’ होने के भाव को ही खो दिया है। हर वर्ष लगभग चार प्रतिशत कार्यबल पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त और बर्खास्तगी इत्यादि कारणों से स्टाफ से हट जाता है। लेकिन इसकी भरपायी के बतौर नयी भर्तियां नहीं की जाती हैं। इससे मौजूदा स्टाॅफ पर और ज्यादा बोझ बढ़ जाता है जो कि ’तनाव’ पैदा करता है। इस तनाव का असर जवानों की जीवनशैली में भी साफ देखा जाता है। डिप्रेशन और अथाह काम के इस बोझ ने पुलिसकर्मियों को ’बीमार’ बना दिया है। बस वे बोझ ढोने वाले ’गधों’ में तब्दील हो गए हैं।

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों है

जिम्मेदार इस समस्या पर बात क्यों नहीं करना चाहते? आखिर पुलिस वालों में इंसान होने के स्वाभाविक गुणों के विकास की जगह उनका खात्मा करने में तंत्र इतना ’तत्पर’ क्यों है? आखिर पुलिस के जवानों के सामाजिक और मानवीय ’गुण’ को प्रायोजित तरीके से सत्ता खत्म करने पर क्यों जुटी है? आखिर उसे क्यों केवल एक डंडाधारी आज्ञापालक जवान ही चाहिए, बिल्कुल मशीन की तरह से कमांड लेने वाला?

आखिर सत्ता पुलिस वालों को इंसान से ’हिंसक’ जानवर बनाने में क्यों तुली है और इसके पीछे उसका असल मकसद क्या है

दरअसल किसी समाज में हो रहे अपराध के कारणों में एक बड़ा हिस्सा तंत्र की संरचना, समाज और तत्कालीन आर्थिक परिवेश होता है। कोई व्यक्ति पैदायशी अपराधी नहीं होता। चूंकि मौजूदा तंत्र में व्यक्ति अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहा है और जीवन जीना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। इसलिए अपराधों में बढ़ोत्तरी भी लगातार हो रही है। अब चूंकि राजनैतिक तंत्र अपराधों के मूल कारणों पर बहस से डरता है इसलिए वह इसे डंडे और बंदूक के बल पर खत्म करने की वर्ग सापेक्ष और ’सतही’ व्याख्या करने की चालाकी करता है। वह इसी चालाकी के मूल में पुलिस के जवानों को ’आज्ञापालक’ मशीन में बदल देता है। इसीलिए जब जवान अपने मानव होने के अधिकारों की मांग करते हैं तब तंत्र डर जाता है। चूंकि यह व्यवस्था हिंसा के बल पर खड़ी है और अगर पुलिस के जवान में मानवोचित गुण आ जाएंगे तो वे अपने अधिकार और हक की मांग कर रहे निहत्थे नागरिकों पर लाठी और गोली कभी नहीं बरसाएंगे। इसके पीछे का मनोविज्ञान यही है। इसीलिए पुलिस के जवानों को हिंसक और बर्बर बनाए रखने का एक मैराथन लगातार चल रहा है।

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वहीं कुछ पुलिस के जवानों से इस विषय पर चर्चा की गई तो उनके द्वारा कहा गया कि पुलिस के जवानों की अमानवीय कार्य परिस्थितियां उनके मानवीय गर्व के खात्मे का एक कुचक्र हैं जिसके अपने वर्ग चरित्र हैं। हिंसक और बर्बर व्यवस्था को हिंसक सिपहसलार ही चाहिए। वहीं कुछ पुलिस कर्मी कहते हैं कि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में पुलिस बल की संख्या बढ़ाते हुए पुलिस में रिक्तियों को भरने का वादा भले ही किया हो लेकिन इससे पुलिस के जवानों को कुछ खास राहत नहीं मिलेगी। वर्तमान समय में कार्यस्थल पर जिस यंत्रणा पूर्ण हालात से पुलिस कर्मियों का सामना हो रहा है, उससे तत्काल निपटने की कोई ठोस रणनीति योगी सरकार के पास नहीं है। थकी हारी बीमार पुलिस एक स्वच्छ और न्यायपूर्ण प्रशासन नहीं दे सकती। साथ ही पुलिस कर्मियों का कहना है कि इसके लिए योगी सरकार को चाहिए कि वह पुलिस वालों की इंसानी गरिमा को सुनिश्चित करने की दिशा में पहल करें। इसके लिए सबसे पहले सप्ताह में एक दिन आवश्यक रूप से अवकाश देने की व्यवस्था को तत्काल लागू किया जाए। यह अवकाश सभी पुलिस कर्मियों के लिए अनिवार्य हो और इसे वे अपने परिवार और बच्चों के साथ अवश्य बिताएं। इससे इतर, उनके लिए काम के घंटे फिक्स किए जांए ताकि उनका व्यक्तिगत जीनव भी पटरी पर लौटे। यह सब पुलिस कर्मियों में काम के बोझ को हल्का करेगा और उनके काम को आनन्द दायक बनाएगा। सबसे बड़ी बात यह है कि योगी सरकार द्वारा कानून का राज स्थापित करने की बात के वाबजूद पुलिस वालों को संवेदना युक्त बनाने का कोई विचार नहीं दिख रहा है, जबकि जिम्मेदारी और जवाब देही के लिए यह बहुत जरूरी है। वक्त की मांग है कि अब इस पर तत्काल विचार किया जाए।http://www.satyodaya.com

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सत्योदय विशेष

महासागरों की गहराई से भी गहरा और पर्वतों से भी ऊंचा होता है मां का दर्जा

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मदर्स डे पर विशेषः

मां…इस एक शब्द में पूरी दुनिया का आदि और अंत छिपा है…इस एक शब्द का कद विशाल पर्वत से भी ऊंचा है…धरती से भी ज्यादा अडिग है, आकाश से भी ज्यादा विशाल है, महासागरों की गहराइयों से भी गहरा है और गंगाजल से भी ज्यादा पवित्र है। इंसान अपनी भाषा में शायद इतना ही कह सकता है लेकिन वास्तव मां की महिमा में यह उपमाएं भी तुच्छ हैं। क्योंकि इस सृष्टि का भाग्य विधाता भगवान भी मां के बिना कुछ नहीं है। इंसान तो इंसान जानवरों में भी मां और उसकी संतान के बीच अगाध प्रेम और श्रद्धा होती है। एक मां अपने बेटे के लिए दुनिया की हर मुसीबत को हंसते हुए झेल जाती है और एक इंसान अपने हर सुख और दुख के समय में मां को ही अपने सबसे करीब पाता है। इस रिश्ते की शुरूआत एक अहसास से होती है लेकिन समय के साथ यह अमिट पहचान बन जाती है। गर्भ में आते ही मां अपने बच्चे के साथ ऐसे जुड. जाती है कि फिर उसे दुनिया की सुध नहीं रह जाती। नौ महीने तक गर्भ में रखकर अपने खून से उसके प्राणों को सींचती है और हर दर्द को सहती है। ममता, त्याग, तपस्या और बलिदान का दूसरा नाम मां ही है।

बेटा चाहे जितना बड़ा हो जाए, मां के लिए वह बच्चा ही रहता है, चाहे जितना बुद्धिमान हो जाए, मां के सामने नादान ही होता है और चाहे जितना धनवान हो जाए लेकिन मां का कर्ज कभी नहीं उतार सकता। इसीलिए मां को भगवान से भी बड़ा दर्जा दिया गया है। मां की महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भगवान ने भी जब धरती पर अवतार लिया तो उन्हें भी मां का सहारा लेना पड.ा। कहा जाता है कि अगर भगवान नाराज हो जाए तो मां का आर्शीवाद ढाल बन जाता है लेकिन अगर मां की बद दुआएं लग जाएं तो इंसान का साथ देना वाला कोई नहीं होता। इसीलिए मां का दर्जा भगवान से भी ऊंचा है। सदियां बीत गईं, दुनिया बदल गई, इतिहास बदल गए लेकिन नहीं बदली तो मां की ममता और उसका निश्छल प्रेम। #Mothers
मां के त्याग बलिदान का बखान करते हुए कवियों की कलम कभी नहीं थकी, किताबें भरी पड.ी हैं, फिल्म जगत ने न जाने कितनी फिल्में बनाईं लेकिन आज भी मां के बारे में सम्पूर्ण रूप से कुछ नहीं कहा जा सका है। मां और बेटे का यह पवित्र और अटूट रिश्ता तो सदियों से चला आ रहा है लेकिन आधुनिक काल में मां के त्याग और बलिदान को रेखांकित करने के लिए मदर्स डे (मातृ दिवस) के रूप में बनाने की परंपरा शुरू हो गयी है। दुनिया के कई देशों में हर वर्ष मई महीने का दूसरा रविवार मां के लिए समर्पित किया गया है। इस दिन सभी बच्चे (छोटे हों या बड़े ) अपनी मां के प्रति अपना प्यार और सम्मान प्रदर्शित करते हैं और उनके साथ समय बिताते हैं।

यह भी पड़ें-सिर्फ एक दिन नहीं, हर दिन अपनी मां के लिए कुछ समय निकालें बच्चे : संयुक्ता भाटिया

माना जाता है कि माना जाता है कि अमेरिका की एक सामाजिक कार्यकर्ता एना जार्विस ने मदर्स डे मनाए जाने की नींव डाली। एना जार्विस अपनी मां से बहुत प्यार करती थीं और उन्होंने न कभी शादी की और न कोई बच्चा था। वो हमेशा अपनी मां के साथ रहीं। मां की मौत के बाद एना ने उनके प्रति प्यार जताने के लिए मदर्स डे की शुरुआत की। धीरे-धीरे कई देशों में मदर्स डे मनाया जाने लगा। इसके बाद 9 मई 1914 को अमेरिकी राष्टपति वुड्रो विल्सन ने एक कानून पास किया था जिसमें लिखा था कि मई महीने के हर दूसरे रविवार को मदर्ड डे मनाया जाएगा। इसी के बाद भारत और कई देशों में मई महीने के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाने लगा। इस बार मदर्स डे की थीम प्री स्कूल रखी गई है। मदर्स डे पर हर उम्र के लोग अपनी मां को तरह तरह के गिफ्ट व सरप्राइज देकर मदर्स डे विश देते हैं और मां के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं। लेकिन बदले हुए परिवेश का एक कटु पहलू यह भी है बचपन में जो मां के बिना एक दिन भी नहीं रह पाते वही बच्चे बड़े होते ही मां बाप के पास एक घण्टे भी बैठना समय की बर्बादी समझने लगे हैं।

आज की युवा पीढ़ी अपने बुजुर्ग माता-पिता से प्रेम तो करती है लेकिन भौतिकता के बंधन इतने मजबूत हो गए हैं कि प्रेम और वात्सल्य का बंधन कमजोर होने लगा है। लेकिन एक मां के लिए उसके बच्चे हमेशा प्रिय होते हैं, वह उन्हें प्यार और दुलार करना चाहती है और उनसे बात करना चाहती है लेकिन घर के एक कोने में पड़े माता-पिता को बच्चे आते-जाते देखते तो हैं, कभी उनके समीप बैठते नहीं। माता और पिता के महान त्याग, प्यार और बलिदान का कुछ कर्ज उतारने का जब समय आता है तो बच्चे अपनी दुनिया में उलझ चुके होते हैं। इसलिए किसी एक दिन के बजाय अपनी मां के लिए हर दिन कुछ समय अवश्य निकालें और उनसे बात करें। यकीन मानें उनकी वृद्धावस्था उनके लिए वरदान बन जाएगी और बच्चों का जीवन धन्य हो जाएगा।

उर्दू के महान शायर मुनव्वर राना ने मां की महिमा का बखान करते हुए लिखा है-
मेरी ख्वाहिश है कि मैं फिर से फरिश्ता हो जाऊँ।
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ।।
लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती।
बस एक माँ है जो मुझसे खफा नहीं होती।।
मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू।
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना।।
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई।
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई।।
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