Connect with us

सत्योदय विशेष

सिर्फ लखनऊ में ही क्यों मनाए जाते हैं जेठ के बड़े मंगल, जानें कब-कैसे चल निकली परंपरा…

Published

on

लखनऊ। को नहि जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो….अर्थात अपने भक्तों के संकटों को पल भर में हरने वाले हनुमान जी को संकट मोचन के नाम से भी जाना जाता है। भगवान राम के अनन्य भक्त बजरंग बली शरण में आए भक्त के दुख पल भर में हर लेते हैं, शर्त यह है कि श्रद्धा, भक्ति और विश्वास वैसा ही होना चाहिए जैसा हनुमान जी को अपने आराध्य श्रीराम पर था।
संकटमोचन के भक्तों के लिए वैसे तो हर मंगलवार का बड़ा महत्व है लेकिन जेठ के महीने में पड़ने वाले बड.े मंगल बेहद खास होते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान हनुमान भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं। माना जाता है कि भगवान श्रीराम से हनुमान जी की पहली मुलाकात जेठ माह के मंगल के दिन ही हुई थी इसीलिए बड़ा मंगल मनाया जाता है।
भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण द्वारा बसाई गई नगरी लखनपुरी जो अब लखनऊ में बदल चुकी है, यहां जेठ माह में अलग ही भक्ति भाव की छटा दिखती है। हर बड़ा मंगल यहां महापर्व की तरह मनाया जाता है। अपनी गंगा-जमुनी तहजीब के लिए प्रसिद्ध लखनऊ इस दिन बजरंग बली के रंग में रंगा नजर आता है। नवाबी दौर में अवध के नवाब भी ऐसे आयोजनों में बढ.-चढ.कर हिस्सा लेते थे। इस माह में पड़ने वाले सभी बड़े मंगल नवाबी शहर लखनऊ के लिए किसी महापर्व से कम नहीं है। इस बार जेठ माह की शुरूआत 19 मई से हो रही है और पहला बड़ा मंगल 21 मई को पड़ रहा है। जेठ माह में पड.ने वाले हर बड़ा मंगल पर जो भक्ति भाव की लहर लखनऊ में उठती है वैसी देश भर में अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलती। महीने भर पहले ही की इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हैं जैसे मंदिरों की रंगाई-पुताई साफ-सफाई आदि। बड.े मंगल पर विशेष पूजन और हनुमान जी के विशेष श्रृंगार के लिए श्रद्धालुओं में होड. लगती है जिसके चलते महीने भर पहले ही बुकिंग शुरू हो जाती है। बड.ा मंगल आते ही मंदिरों की कौन कहे….हर गली और चैराहे पर सब्जी पूड़ी, शर्बत, बूंदी, हलवा आदि के स्टाॅलों की भरमार हो जाती है। हर ओर बस जय हनुमान…जय हनुमान का शोर और लोग पेट भर-भर कर प्रसाद पाते हैं।

यह भी पढ़ें-अनियंत्रित खानपान और तनाव युवाओं को भी बना रहा है हाइपरटेंशन का शिकार…

कृपा ऐसी कि साधारण कारीगरों द्वारा बनाई सब्जी और पूड.ी में ऐसा स्वाद आ जाता है कि लोग प्रसाद से ही पेट भर लेते हैं। जेठ की तपती दोपहरी में जेठ के बड.े मंगल गरीब, रिक्शा चालकों और यहां के नौकरीपेशा बाहरी लोगों के लिए किसी निमंत्रण से कम नहीं होते। जहां चाहें और जितना चाहें छक कर प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं। यह क्रम सुबह से लेकर शाम तक चलता है। बड़ा मंगल सिर्फ हिन्दू धर्म की आस्था का प्रतीक ही नहीं है बल्कि विभिन्न धर्मों के लोगों की भी इसमें आस्था है। इस आयोजन में हिन्दू, मुस्लिम, सिख व ईसाई आदि सभी धर्मो के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यह त्यौहार लखनऊ के धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक मान्यताओं का सबसे बड़ा उदाहरण है। इस शहर गंगा जमुनी की तहजीब को बखूबी देखा जा सकता है, जहां एक मुसलामन मंदिर का निर्माण कराता है, हिन्दू भाई मस्जिद का निर्माण कराते हैं। आज तक के इतिहास में लखनऊ एक शांतिपूर्ण शहर रहा है, जहां कभी धर्म को लेकर कोई हिंसा और असहिष्णुता नहीं हुई है। # Intolerance

इस बार जेठ के बड़े मंगल की शुरूआत कृष्ण तृतीया से हो रही है। इस दिन चन्द्रमा धनु राशि में रहेगा, धनु मंगल की मित्र राशि है। सिद्ध योग होने के कारण हर कार्य में सफलता मिलेगी। इसलिए जेठ माह की शुरूआत काफी शुभ और सफलतादायक सिद्ध होगी। इस बार चार मंगल है। जिसमें 21, 28 मई और 4 व 11 जून को पड़ेगा। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक बड़े मंगल पर हनुमान जी के दर्शन, पूजन व चोला चढ़ाने से काफी लाभ मिलेगा। राजधानी के प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों में बड़ा मंगल को लेकर तैयारियां युद्धस्तर पर चल रही हैं। यहां भक्तों की भीड़ और गर्मी को देखते हुए काफी व्यस्थाएं की गयी गई हैं।
अलीगंज का नया हनुमान मंदिर टस्ट के व्यवस्थापक राकेश दीक्षित ने बताया कि जेठ महीने के मंगल को लेकर यहां चल रहीं तैयारियां अंतिम चरण में हैं। मंदिर के आस-पास साफ सफाई से लेकर श्रद्धालुओं को धूप व गर्मी से बचाने के लिए विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं। मंदिर में व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस प्रशासन के साथ एनसीसी सहित अन्य स्थानीय संगठन व सेवादार अपनी सेवाएं देंगे। श्रद्धालुओं को गर्मी से बचाने के लिए पानी वाले पंखों की व्यवस्था की गयी है। श्री दीक्षित ने बताया कि जेठ माह के पहले बड़े मंगल पर पांच कुंतल फूलों से बाबा का श्रृंगार होगा और तीन कुंतल लड्डुओं का भोग लगेगा। यहां जेठ के चारों बड़े मंगल पर बाबा का विशेष श्रृंगार करने के लिए अभी तक 1000 से ज्यादा श्रद्धालु बुकिंग करा चुके हैं।# AliganjNewHanuman Temple शहर प्रसिद्ध मंदिरों में से एक हनुमान सेतु मन्दिर में भी बड़े मंगल की तैयारियों जोरों पर हैं। गोमती के किनारे स्थिति यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। बड़े मंगल पर यहां भी भक्तों का तांता लगा रहता है। यहां हर बार जेठ के बड़े मंगल पर किसी एक भक्त को ही बाबा के श्रृंगार का सौभाग्य मिलता था लेकिल इस बार 5 से 6 भक्तों को हनुमान जी के शृंगार का मौका मिलेगा। यहां हर दो घण्टे पर हनुमान जी का श्रृंगार बदला जाएगा। जेठ के सभी मंगल पर मन्दिर परिसर को एयरकंडीशन किया जायेगा। जिससे भक्तों को गर्मी में काफी राहत मिलेगी। मन्दिर के बाहर कई समाजसेवियों द्वारा भण्डारे और प्याऊ की व्यवस्था की जाएगी। मंगल के दिन लखनऊ विश्वविद्यालय मार्ग स्थित मन्दिर का द्वार बन्द रहेगा। उस दिन बंधा मार्ग के गणेश द्वार से ही दर्शन होंगे। इसी तरह चैक स्थित मनकामेश्वर मंदिर, पंचमुखी हनुमान मंदिर और लेते हुए हनुमान मंदिर सहित शहर के अन्य मंदिरों में बड़े मंगल की तैयारियां चल रही हैं।

कैसे और कब चल निकली परंपरा

लोगों के मन में यह जाने का कौतूहल अवश्य होता है कि आखिर नवाबी शहर में हिन्दुओं के ईष्टदेव हनुमान जी के इस त्यौहार को इतनी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाने की परंपरा कब और कैसे चल निकली। तो बता दें कि इसके पीछे कई कहानियां हैं…

मान्यता है कि इस परम्परा की शुरुआत लगभग 400 वर्ष पूर्व मुगलशासक ने की थी। नवाब मोहमद अली शाह का बेटा एक बार गंभीर रूप से बीमार हुआ। उनकी बेगम रूबिया ने उसका कई जगह इलाज कराया लेकिन वह ठीक नहीं हुआ। बेटे की सलामती की मन्नत मांगने वह अलीगंज के पुराने हनुमान मंदिर आयी। पुजारी नेबेटे को मंदिर में ही छोड़ देने कहा बेगमरूबिया रात में बेटे को मंदिर में ही छोड़ गयीं। दूसरे दिन रूबिया को बेटा पूरी तरह स्वस्थ मिला। तबरूबियाने इस पुराने हनुमान मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।जीर्णोद्धार के समय लगाया गया प्रतीक चांदतारा का चिन्ह आज भी मंदिर के गुंबद पर चमक रहा है। मंदिर के जीर्णोद्धार के साथ ही मुगल शासक ने उस समय ज्येष्ठ माह में पड.ने वाले मंगल को पूरे नगर में गुडधनिया (भुने हुए गेहूं में गुड मिलाकर बनाया जाने वाला प्रसाद) बंटवाया और प्याऊ लगवाये थे। तभी से इस बडे मंगल की पर परा की नींव पडी।बडा मंगल मनाने के पीछे एक और कहानी है। नवाब सुजा-उद-दौला की दूसरी पत्नी जनाब-ए-आलिया को स्वप्न आया कि उसे हनुमान मंदिर का निर्माण कराना है। सपने में मिले आदेश को पूरा करने के लिये आलिया ने हनुमान जी की मूर्ति मंगवाई। हनुमान जी की मूर्ति हाथी पर लाई जा रही थी। मूर्ति को लेकर आता हुआ हाथी अलीगंज के एक स्थान पर बैठ गया और फिर उस स्थान से नहीं उठा।आलिया ने उसी स्थान पर मंदिर बनवाना शरू कर दिया जो आज नया हनुमान मंदिर कहा जाता है। मंदिर का निर्माण ज्येष्ठ महीने में पूरा हुआ। मंदिर बनने पर मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करायी गयी और बड़ा भंडारा हुआ।

तभी से जेठ महीने का हर मंगलवार बड़ा मंगल के रूप में मनाने की पर परा चल पड़ी। चार सौ साल पुरानी इस परंपरा ने इतना वृहद रूप ले लिया है कि अब पूरे लखनऊ के हर चैराहे व हर गली पर भंडारा चलता है।
वहीं दूसरी ओर पौराणिक कथाओं की मानें तो ज्येष्ठ के पहले मंगल के दिन ही भगवान लक्ष्मण ने लखनऊ शहर को बसाया था। तब उन्होंने पहली बार बड़ा मंगल मनाने की परंपरा की शुरुआत की थी। उसके बाद से आज तक लखनऊ में बड़ा मंगल मानने की परंपरा चलती आ रही है। खास बात यह कि, पूरे भारत में सिर्फ उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ही बड़े मंगल का आयोजन किया जाता है, जिसमे बड़े धूमधाम भंडारे आयोजित होते हैं और हनुमान मंदिरों में सुंदरकांड का पाठ आयोजित किया जाता है।

एक और किवदंति है कि नवाब वाजिद अली शाह के समय में केसर-कस्तूरी का एक मारवाड़ी व्यापारी जटमल लखनऊ आया और चैक के निकट की तत्कालीन सबसे बड़ी सआदतगंज की मंडी में कई दिन तक पड़ा रहा, किन्तु अधिक मँहगी होने के कारण उसके दर्जनों ऊँटों पर लदी केसर ज्यों-की-त्यों पड़ी रह गयी, कोई खरीददार भी नहीं मिला। ज्ञातव्य है कि इस मंडी की प्रशंसा बड़ी दूर-दूर तक थी। फारस, अफगानिस्तान तथा कश्मीर आदि से मेवों, फलों तथा जेवरात आदि के बड़े-बड़े व्यापारी वहाँ आते थे। मारवाड़ी व्यापारी बड़ा निराश हुआ और लोगों से कहने लगा कि श्अवध के नवाबों का मैंने बड़ा नाम सुना था, किंतु वह सब झूठ निकला।श् इतनी दूर आकर भी खाली हाथ लौटने के विचारमात्र से वह बड़ा दुरूखी हुआ और अयोध्या की ओर चल दिया। रास्ते में इसी नये मन्दिर के पास आकर जब वह विश्राम के लिये रूका, तब लोगों के कहने से उसने हनुमान जी से अपने माल की बिक्री के लिए मनौती मानी।
संयोगवश उन्हीं दिनों नवाब वाजिद अली शाह अपनी कैसर बेगम के नाम पर कैसरबाग का निर्माण करा रहे थे। किसी ने उनको राय दी कि यदि इस कैसरबाग की इमारत को केसर-कस्तूरी से पुतवा दिया जाये तो सारा इलाका ही अत्यंत सुवासित हो जायेगा। और जटमल की सारी कस्तूरी उसके मुँहमाँगे दाम पर खरीद ली गयी। जटमल के हर्ष का काई ठिकाना नहीं रहा, उसने हृदय खोलकर मन्दिर के लिए खर्च किया। आज भी मन्दिर के भीतर मूर्ति पर जो छत्र लगा है, वह इसी व्यापारी का बनवाया हुआ है। उसने पूरे मन्दिर को ही नये सिरे से बनवाया। वर्तमान स्तूप (गुंबद) भी तभी का है। तभी से यहाँ मेली भी लगने लगा।http://www.satyodaya.com

सत्योदय विशेष

इंसान वो जंग कभी नहीं जीत सकता जिसमें उसके दुश्मन अपने हो :#RAHUL GUPTA

Published

on

जीवन के किसी भी क्षेत्र में बेहतर रणनीति आपके जीवन को सफल बना सकती है और यदि कोई योजना या रणनीति नहीं है तो समझो जीवन एक अराजक भविष्य में चला जाएगा जिसके सफल होने की कोई गारंटी नहीं। भगवान श्रीकृष्ण के पास पांडवों को बचाने का कोई मास्टर प्लान नहीं होता तो पांडवों की कोई औकात नहीं थी कि वे कौरवों से किसी भी मामले में जीत जाते।

संगत और पंगत हमेशा अच्छी होनी चाहिए: #राहुल गुप्ता

कहते हैं कि जैसी संगत वैसी पंगत और जैसी पंगत वैसा जीवन। आप लाख अच्छे हैं लेकिन यदि आपकी संगत बुरी है, तो आप बर्बाद हो जाएंगे। लेकिन यदि आप लाख बुरे हैं और आपकी संगत अच्छे लोगों से है और आप उनकी सुनते भी हैं, तो निश्‍चित ही आप आबाद हो जाएंगे। कौरवों के साथ शकुनि जैसे लोग थे जो पांडवों के साथ कृष्ण। शकुनि मामा जैसी आपने संगत पाल रखी है तो आपका दिमाग चलना बंद ही समझो।

खुद नहीं बदलोगे तो समाज आपको बदल देगा: #RAHUL GIPTA

 जीवन में हमेशा दानी, उदार और दयालु होने से काम नहीं चलता। महाभारत में जिस तरह से कर्ण की जिंदगी में उतार-चढ़ाव आए, उससे यही सीख मिलती है कि इस क्रूर दुनिया में अपना अस्तित्व बनाए रखना कितना मुश्किल होता है। इसलिए समय के हिसाब से बदलना जरूरी होता है, लेकिन वह बदलाव ही उचित है जिसमें सभी का हित हो। कर्ण ने खुद को बदलकर अपने जीवन के लक्ष्य तो हासिल कर लिया, लेकिन वे फिर भी महान नहीं बन सकें, क्योंकि उन्होंने अपनी शिक्षा का उपयोग समाज से बदला लेने की भावना से किया। बदले की भावना से किया गया कोई भी कार्य आपके समाज का हित नहीं कर सकता।

#RAHUL GUPTA

बुलियन कारोबारी #राहुल गुप्ता हमेशा कहते है ज्यादा लालच इंसान की जिंदगी को नर्क बना देता है। जो आपका नहीं है उसे अनीतिपूर्वक लेने, हड़पने का प्रयास कभी न करें। आज नहीं तो कल, उसका दंड अवश्य मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि आज जो तेरा है कल (बीता हुआ कल) किसी और का था और कल (आने वाला कल) किसी और का हो जाएगा। अत: तू संपत्ति और वस्तुओं से आसक्ति मत पाल। यह तेरी मृत्यु के बाद यहीं रखे रह जाएंगे। अर्जित करना है तो परिवार का प्रेम और अपनत्व अर्जित कर, जो हमेशा तेरे साथ रहेगा।

आज के समय में दोस्त और दुश्मन की पहचान करना बहुत जरुरी है:#RAHUL GUPTA

 महाभारत में ऐसे कई मित्र थे जिन्होंने अपनी ही सेना के साथ विश्वासघात किया। ऐसे भी कई लोग थे, जो आखिरी समय पर पाला बदलकर कौरवों या पांडवों के साथ चले गए। शल्य और युयुत्सु इसके उदाहरण हैं। इसीलिए कहते हैं कि कई बार दोस्त के भेष में दुश्मन हमारे साथ आ जाते हैं और हमसे कई तरह के राज लेते रहते हैं। कुछ ऐसे भी दोस्त होते हैं, जो दोनों तरफ होते हैं। जैसे कौरवों का साथ दे रहे भीष्म, द्रोण और विदुर ने अंतत: युद्ध में पांडवों का ही साथ दिया।http://www.satyodaya.com

Continue Reading

सत्योदय विशेष

भारतीय वैज्ञानिक की तकनीक चुराकर मारकोनी ने किया था रेडियो का अविष्कार

Published

on

क्या आप जाते हैं! जानिए रेडियो के अविष्कार की पूरी कहानी-

लखनऊ। बचपन से ही हम सुनते आ रहे हैं रेडियो का अविष्कार इटली के वैज्ञानिक गुगलेल्मो मारकोनी ने की थी। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। कई भारतीय व विदेशी रिपोर्टों में दावा किया जाता है कि वास्तव में रेडियो का अविष्कार भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस ने किया था। स्वभाव से बेहद सरल और सीधे जेसी बोस को धोखा देकर मारकोनी ने बोस की तकनीक चुरा ली और उसी में सुधार कर रेडियो का पेटेंट अपने नाम करवा लिया। इस अविष्कार के लिए मारकोनी को नोबल पुरस्कार भी मिला। आइए जानते हैं रेडियो अविष्कार की पूरी कहानी और इसमें भारतीय योगदान का सच…

भारतीय वैज्ञानिक प्रोफेसर जगदीश चंद्र बोस बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। जिन्होंने रेडियो और माइक्रोवेव ऑप्टिक्स के अविष्कार तथा पेड़−पौधों में जीवन सिद्धांत के प्रतिपादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भौतिक वैज्ञानिक होने के साथ-साथ वह जीव वैज्ञानिक, वनस्पति वैज्ञानिक, पुरातत्वविद और लेखक भी थे। जेसी बोस अपनी वैज्ञानिक मेधा का उस दौर में मनवाया जब देश में विज्ञान शोध कार्य लगभग नहीं के बराबर थे। अंग्रेजो का गुलाम होने के चलते किसी भी भारतीय मेधा या प्रतिभा को किसी तरह का सरकारी सहयोग नहीं मिलता था।

यह भी पढ़ें-1200 किलोमीटर साइकिल के सफर ने ज्योति के सपनों को दी नई उड़ान

एक बार की बात है, इटली का विश्व प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री मारकोनी कोलकाता घूमने आया। इस दौरान वह प्रोफेसर जगदीश चंद्र बोस से मिला। बोस के शोध की तारीफ करते हुए मारकोनी ने उन्हें देखने का आग्रह किया। सरल स्वभाव होने के कारण बोस उसे अपनी लेबोरेटरी में ले गए और अपने नवीनतम प्रयोग के बारे में विस्तार से बताया। उस समय बोस बेतार का तार, आधुनिक वायरस या मोबाइल फोन पर रिसर्च कर रहे थे। मारकोनी ने पूरे सिद्धांत को और प्रयोग को विस्तार से समझा और अपने देश लौट गया।

बाद में मारकोनी ने भारतीय वैज्ञानिक बोस की तकनीक को ही आधार बनाकर रेडियो का अविष्कार कर लिया और इसका पेटेंट भी अपने नाम करवा लिया। दिसंबर 1895 में दूरस्थ स्थानों से रेडियो सम्पर्क स्थापित करने का आविष्कार करने का श्रेय मारकोनी के नाम दर्ज हो गया। मारकोनी बेतार के तार का जन्मदाता बन गया। लेकिन शायद बहुत कम भारतीयों को पता होगा कि इस अविष्कार का असली आधार जगदीश चन्द्र बोस ने ही तैयार किया था। लेकिन दुर्भाग्य से बोस को इसका कोई श्रेय नहीं मिला। संचार-क्रांति के क्षेत्र में की गई इस महत्वपूर्ण खोज के लिए मारकोनी को सन् 1909 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था।

मारकोनी से मिले इस धोखे से जेसी बोस बहुत दुःखी हुए। उन्होंने भौतिक विज्ञान का क्षेत्र ही छोड़ दिया और वनस्पति विज्ञान की तरफ अपने अनुसंधान को मोड़ा। वैज्ञानिक मेधा के धनी बोस यहां भी क्रांति लाए। उन्होंने क्रेस्कोग्राफ का आविष्कार किया और इससे विभिन्न उत्तेजकों के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया। रेडियो के अविष्कार में भारतीय योगदान की पड़ताल अमेरिकी संस्था इंस्टिट्यूट ऑफ इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स (IEEE) भी कर चुकी है। अमेरिकी संस्था ने उस दौर के कई मीडिया चैनलों को दिए गए इंटरवव्यू व मैगजीन में छपी खबरों के आधार पर 100 बाद इस विवाद की गुत्थी को सुलझाया था।

यह भी पढ़ें-महाराष्ट्र में एक और संत की हत्या, बदमाशों ने गला रेतकर मौत के घाट उतारा

दरअसल 1896-97 में बोस और मारकोनी दोनों लंदन में थे। मारकोनी ब्रिटिश पोस्ट ऑफिस के लिए वायरलेस बनाने के लिए प्रयोग कर रहे थे, तो वहीं बोस एक टूर पर थे। मैक्लर नाम की मैगजीन ने मार्च 1897 में इन दोनों वैज्ञानिकों के इंटरव्यू किए थे। अपने इंटरव्यू में बोस ने कहा था कि वह कॉमर्शियल टेलिग्राफी में इंटरेस्टेड नहीं हैं। 1899 में बोस ने अपने वायरलेस अविष्कार ‘मर्क्युरी कोहेनन विद टेलीफोन डिटेक्टर’ की तकनीक और काम करने तरीके पर एक पेपर रॉयल सोसायटी में पब्लिश करवाया। लेकिन इसे भारत का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि बोस वह डायरी कहीं गुम हो गई, जिसमें उन्होंने इस खोज से संबंधित अन्य जानकारी नोट कर रखी थी। वहीं दूसरी ओर बोस के इस अविष्कार के कामर्शियल फायदों को समझ चुका था।

मारकोनी ने अपनी डिजाइन में बोस की तकनीक को ही बनाया आधार

उसने अपने दोस्त लुईजी सोलारी के साथ मिलकर बोस की तकनीक को आधार बनाकर एक बेहतर डिजाइन तैयार की। जिसके बाद 1901 में मारकोनी ने दुनिया के सामने अपनी नई डिजाइन पेश की। इस डिजाइन का बड़ा आधार बोस की तकनीक का ही था। मारकोनी ने ब्रिटेन में अपनी इस खोज का पेटेंट करवाया। 1909 में नोबेल पुरस्कार जीता, लेकिन कभी भी बोस को इसका श्रेय नहीं दिया। ऐसा कहा जाता है कि राॅयल सोसाइटी को भी बोस के अविष्कार की जानकारी थी, लेकिन आंतरिक राजनीति और एक गुलाम देश के निवासी भारतीस वैज्ञानिक जेसी बोस के पक्ष में कोई आवाज नहीं उठी। वरना रेडियो के अविष्कार का श्रेय मारकोनी को नहीं बोस को दिया गया होता।

बोस ने ही सिद्ध किया, पौधों में भी होते हैं प्राण

बोस ने ही सिद्ध किया कि पौधों में प्राण होते हैं। पौधे भी स्पर्श को महसूस करते हैं। बोस ने सिद्ध किया कि वनस्पतियों और पशुओं के ऊतकों में काफी समानता है। बायोफिजिक्स के क्षेत्र में उनका सबसे बड़ा योगदान यही था कि उन्होंने दिखाया कि पौधों में उत्तेजना का संचार वैद्युतिक (इलेक्ट्रिकल) माध्यम से होता है न कि केमिकल माध्यम से। बाद में इन दावों को वैज्ञानिक प्रोयोगो के माध्यम से सच साबित किया गया था। आचार्य बोस ने सबसे पहले माइक्रोवेव के वनस्पति के टिश्यू पर होने वाले असर का अध्ययन किया था। उन्होंने पौधों पर बदलते हुए मौसम से होने वाले असर का अध्ययन किया था।

इसके साथ साथ उन्होंने रासायनिक इन्हिबिटर्स का पौधों पर असर और बदलते हुए तापमान से होने वाले पौधों पर असर का भी अध्ययन किया था। अलग अलग परिस्थितियों में सेल मेम्ब्रेन पोटेंशियल के बदलाव का विश्लेषण कर बोस इस नतीजे पर पहुंचे कि पौधे संवेदनशील होते हैं। वे दर्द महसूस कर सकते हैं। स्नेह अनुभव कर सकते हैं। ये पेटेंट प्रक्रिया के बहुत विरुद्ध थे फिर भी अपने दोस्तों के अनुरोध और एक बार मिले धोखे से सचेत होकर बोस ने इस प्रक्रिया को पहला भारतीय पेटेंट कराया।http://www.satyodaya.com

Continue Reading

सत्योदय विशेष

लॉकडाउन में फीस बीएलवाई पब्लिक स्कूल ने 2 माह की फीस माफ कर पेश की मिसाल

Published

on

राष्ट्रीय अभिभावक मंच ने किया सम्मान

लखनऊ। वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के चलते लॉकडाउन में सभी काम धंधे बंद चल रहे हैं। ऐसे में लोगों के सामने बच्चों की फीस का संकट है। देश में इस कोरोना जैसी संकट के बीच मध्यम वर्गीय परिवारों को अब बच्चों की स्कूल फीस देना संभव नही है। जहां हर तरफ लॉकडाउन के दौरान स्कूल फीस माफी पर बहस जोरों पर है। वहीं बीएलवाई पब्लिक स्कूल के प्रबंधक ने मिसाल पेश करते हुए विद्यालय ने सभी बच्चों की दो माह की फीस को माफ करने घोषणा किया है।

कई दिनों से चल रही इस बहस को लखनऊ के बुधेश्वर स्थित बीएलवाई पब्लिक स्कूल में कोविड-19 के चलते शैक्षिक सत्र 2020- 2021 में अपने विद्यार्थियों से दो माह का शिक्षण शुल्क नहीं लेने का एक महत्वपूर्ण निर्णय से इस बहस को एक दिशा दी है। फीस माफी की मांग अभिभावकों के लिए जायज है।

इसे भी पढ़ें-Lockdown-4.0: लखनऊ की सड़कों पर दिखे सामान्य दिनों की तरह हालात, देखें फोटो

फीस माफी के फैसले का स्वागत करते हुए, राष्ट्रीय अभिभावक मंच ने बीएलवाई पब्लिक स्कूल के प्रबंधक दिलीप यादव को माला पहन पहनाकर सम्मानित किया। सम्मानित करते हुए राष्ट्रीय अध्यापक संघ के संयोजक अभिषेक खरे ने कहा कि यह अन्य स्कूलों के लिए प्रेरणा का काम करेगा और अन्य स्कूलें भी इस दिशा में कदम उठाएंगे।

स्टेशनरी विक्रेता एवं निर्माता एसोसिएशन के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि अगर सभी स्कूल इस तरह का फैसला लेने लगेंगे तो इस महामारी के दौरान अभिभावकों को बहुत राहत मिलेगी। इस कार्यक्रम में सुशील गुप्ता संतोष त्रिपाठी, सुशील सिंह उपस्थित थे। बी एल वाई पब्लिक स्कूल के प्रबंधक दिलीप यादव ने कहा कि अभिभावक संघ के मांग से प्रभावित होकर हमने इस फीस माफी का फैसला लिया है।http://www.satyodaya.com

Continue Reading

Category

Weather Forecast

July 5, 2020, 10:12 pm
Fog
Fog
29°C
real feel: 36°C
current pressure: 1000 mb
humidity: 88%
wind speed: 0 m/s N
wind gusts: 0 m/s
UV-Index: 0
sunrise: 4:49 am
sunset: 6:34 pm
 

Recent Posts

Trending