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पुलिस का गठन कैसे हुआ आईये आपको पुराने इतिहास में ले चलते हैं

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आपको तो याद भी नहीं होगा कि हिन्दू काल में इतिहास में दंडधारी शब्द का उल्लेख आता है। भारतवर्ष में पुलिस शासन के विकास क्रम में उस काल के दंडधारी को वर्तमान काल के पुलिस जन के समक्ष माना जा सकता है। प्राचीन भारत का स्थानीय शासन मुख्यतः ग्रामीण पंचायतों पर आधारित था। गाँव के न्याय एवं शासन सम्बन्धी कार्य गांव के नामी एक अधिकारी द्वारा संचलित किए जाते थे। गांव के राज्यों में वेतनभोगी अधिकारी नहीं होते थे परन्तु इन्हें गांव के व्यक्ति अपने में से चुन लेते थे। चुने गये लोगों के ऊपर 5-10 गाँवों की व्यवस्था के लिए ‘‘गोप‘‘ एवं लगभग एक चैथाई जनपद की व्यवस्था करने के लिए ‘‘स्थानिक‘‘ नामक अधिकारी होते थे। प्राचीन यूनानी इतिहास में लिखा है कि इन निर्वाचित ग्रामीण अधिकारियों द्वारा अपराधों की रोकथाम का कार्य सुचारु रूप से होता था और उनके संरक्षण में जनता अपने व्यापार उद्योग-निर्भय होकर करती थी।

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सल्तनत और मुगल काल में भी ग्राम पंचायतों और ग्राम के स्थानीय अधिकारियों की परंपरा अक्षुण्ण रही। मुगल काल में गांव के मुखिया मालगुजारी एकत्र करने, झगड़ों का निपटारा आदि करने का महत्वपूर्ण कार्य करते थे और निर्माण चैकीदारों की सहायता से गांव में शांति की व्यवस्था स्थापित रखे थे।

चैकीदार दो श्रेणी में विभक्त थे.. उच्च और साधारण

उच्च श्रेणी के चैकीदार अपराध और अपराधियों के संबंध में सूचनाएँ प्राप्त करते थे और गांव में शान्ति व्यवस्था रखने में सहायता देते थे। उनका यह भी कर्तव्य था कि एक गांव से दूसरे गांव तक यात्रियों को सुरक्षा पूर्वक पहुँचा दें। साधारण कोटि के चैकीदारों द्वारा फसल की रक्षा और उनकी नाप जोख का कार्य करा जाता था। गांव का मुखिया न केवल अपने गांव में अपराध शासन का कार्य करता था वहीं सभी गांवों के मुखियों को उनके क्षेत्र में भी अपराधों के विरोध में सहायता प्रदान करता था। शासन की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों की देखभाल फौजदार और नागरिक क्षेत्रों की देखभाल कोतवाल के द्वारा की जाती थी।

मुगलों के पतन के उपरांत भी ग्रामीण शासन की परंपरा चलती रही

यह अवश्य हुआ कि शासन की ओर से नियुक्त अधिकारियों की शक्ति क्रमशः लुप्तप्राय होती गई। सन् 1765 में जब अंग्रेजों ने बंगाल की दीवानी हथिया ली तब जनता का दायित्व उन पर आया। वारेन हेस्टिंग्ज ने सन् 1781 तक फौजदारों और ग्रामीण पुलिस की सहायता से पुलिस शासन की रूप रेखा बनाने के प्रयोग किए और अंत में उन्हें सफल पाया। लार्ड कार्नवालिस का यह विश्वास था कि अपराधियों की रोकथाम के निमित्त एक वेतन भोगी एवं स्थायी पुलिस दल की स्थापना आवश्यक है। इसके निमित्त जनपदीय मजिस्ट्रेटों को आदेश दिया गया कि प्रत्येक जनपद को अनेक पुलिस क्षेत्रो में विभक्त किया जाए और प्रत्येक पुलिस क्षेत्र दरोगा नामक अधिकारी के निरीक्षण में सौंपा जाये। इस प्रकार दरोगा का उदभव हुआ। बाद में ग्रामीण चैकीदारों को भी दारोगा के अधिकार में दे दिया गया।

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इस प्रकार से वर्तमान पुलिस शासन की रूपरेखा का जन्मदाता लार्ड कार्नवालिस था। वर्तमान काल में हमारे देश में अपराध निरोध सम्बन्धी कार्य की इकाई, जिसका दायित्व पुलिस पर है, थाना अथवा पुलिस स्टेशन हैं। थाने में नियुक्त अधिकारी एवं कर्मचारियों द्वारा इन दायित्वों का पालन होता है। सन् 1861 के पुलिस ऐक्ट के आधार पर पुलिस शासन प्रत्येक प्रदेश में स्थापित है। इसके अंतर्गत प्रदेश में महानिरीक्षक की अध्यक्षता में और उपमहानिरीक्षकों के निरीक्षण में जनपदीय पुलिस शासन स्थापित है। प्रत्येक जनपद में सुपरिटेंडेंट पुलिस के संचालन में पुलिस कार्य करती है। सन् 1861 के ऐक्ट के अनुसार जिलाधीश को जनपद के अपराध संबंधी शासन का प्रमुख और उस रूप में जनपदीय पुलिस के कार्यों का निर्देशक माना गया है।http://www.satyodaya.com

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यूपी-100 कर्मियों ने ब्लड डोनेट कर बचाई सूचनाकर्ता की बुजुर्ग मां की जान

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लखनऊ। राजधानी की #पुलिस ने एक बार फिर मानवता की मिशाल पेश की है जिसमें बताया जा रहा है कि इंदिरा नगर स्थित एक अस्पताल से एक युवक ने 100 नंबर पर फोन कर पुलिस से मदद मांगी जिसपर मौके पर पहुंची पीआरवी 4569 और इवेंट सूचना पर 4614 ने देखा की पीड़ित की बुजुर्ग मां को खून की जरूरत है जिसपर तत्काल पुलिस ने ब्लड डोनेट कर उस युवक के मां की जान बचाई।

पूरी घटना कुछ इस प्रकार है कि एक ’कालर-विनोद कुमार सिंह ने यूपी-100 को सूचना दिया कि, उसकी मां इंद्रावती सिंह बीमार हैं अस्पताल वाले ब्लड नहीं दे रहे हैं, तत्काल पुलिस की आवश्यकता है। घटनास्थल,-शेखर अस्पताल इंदिरानगर पर, इस सूचना पर पीआरवी 4569 कॉलर के द्वारा बताए हुए स्थान पर अल्प समय में मौके पर पहुंचे तो कॉलर ने बताया कि उनका नाम विनोद कुमार सिंह है जो कि भूतपूर्व आर्मी है, सुल्तानपुर का रहने वाला है, उनकी माँ इंद्रावती जिनकी उम्र लगभग 80 वर्ष है, जो 12 मई को घर के आंगन में गिर गयी थी जिसके कारण उनका पैर टूट गया था, जिसके बाद उनको लखनऊ के आर्मी कमांड अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां के डॉक्टरों द्वारा 16 मई को ऑपरेशन करने के लिए शेखर अस्पताल भेजा गया।

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उसके बाद ही उसने बताया कि उसको ऑपरेशन से पहले डॉक्टर द्वारा बताया गया कि उसकी माँ का लिवर और किडनी डैमेज है, उनको तत्काल 2 यूनिट खून की आवश्यकता है, मैं ब्लड बैंक गया था खून लेने पर उन लोगों ने कहा ही हम आपको तभी खून दे पाएंगे जब आप हमें 2 यूनिट खून कहीं से उपलब्ध कराओगे क्योंकि ऐसा नियम है और हम नियम के विपरीत कार्य नही कर सकते हैं, मैने ब्लड बैंक वालों से कहा कि मुझे खून की आवश्यकता तुरंत है और मेरा लखनऊ में कोई जानने वाला नहीं है और मैंने सुल्तानपुर में अपने परिवार वालों को सूचित कर दिया है वो लोग निकल चुके हैं, आते ही आपको खून मिल जाएगा पर वो लोग देने को तैयार नहीं हैं इसीलिए मैंने यूपी 100 को सूचना दी थी।

इस सूचना पर मौके पर पहुंचे पीआरवी 4569 के कमांडर दिगम्बर सिंह द्वारा खुद का खून देकर कालर की मदद करने का निर्णय लिया, चूंकी कॉलर को 2 यूनिट खून की आवश्यकता थी, इसलिए पीआरवी कमांडर दिगम्बर सिंह द्वारा उपरोक्त घटना के संबंध में आरोआईपी पर ड्यूटी पर मौजूद पर्यवेक्षक अधिकारी चंद्रशेखर को उपरोक्त घटना की सम्पूर्ण जानकारी दी गयी जिसके बाद उनके द्वारा उपरोक्त सूचना को सभी ग्रुप में प्रसारित कर पीआरवी स्टाफ से मदद मांगी गई जिसपे पीआरवी 4542 पर नियुक्त कमांडर रवि कुमार द्वारा खून देने की इच्छा जाहिर की गयी, और दोनों पीआरवी वाहनों पर नियुक्त कॉमण्डर द्वारा कॉलर को खून देकर उसकी सहायता की गयी। http://www.satyodaya.com

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खाकी में भी होता है साहब इंसान…

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थानों पर कैसा गुज़रता है पुलिसकर्मियों का दिन

आपको बता दिया जाए कि सुबह होते ही पुलिस पर परेशानियों का पहाड़ टूट पड़ता है वो मैं इसलिए कह रहा हूँ कि जहां एक आम आदमी एक परेशानी को नहीं झेल सकता वहीं पुलिस हज़ारों परेशानियों को दिन भर झेलती है। सुबह थाने पर पहुंचते ही फरियादियों की भीड़ उमड़ आती है। अगर किसी की परेशानी नहीं सुनी गई तो तुरंत ही कुछ न कुछ आरोप लगा दिया जाता है। जिससे दिन भर अधिकारियों का प्रेशर बना रहता है। आपको बता दिया जाए कि थाने पर जहां कांस्टेबलों से लेकर होमगार्डो की संख्या भी जितनी होनी चाहिए वो भी नहीं है। जिससे कारण पुलिस को कम संख्या में ही काम चलाना पड़ता है। अब आप सोचिए किसी प्राइवेट दफ्तर में जाईये। प्राइवेट दफ्तर में देखने को मिलता है कि अगर एक युवक छुट्टी पर है तो तुरंत ही दूसरा युवक रख लिया जाता है लेकिन पुलिस में ऐसा नहीं है।

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क्या कभी आपने सोचा है थाना कितने आदमियों के भरोशे चलता है नहीं सोचा है। वो इसलिए कह रहा हूं कि मैंने देखा है। थाना केवल तीन आदमियों के भरोशे चलता है। मुंशी, पहरा और एक दरोगा के भरोशे। अगर थाने पर बदमाशों द्वारा हमला कर दिया जाए तो ये अपनी ही रक्षा नहीं कर पाएंगे, क्योंकि थाने पर फोर्स ही नहीं है। फिर भी पुलिस अपनी सुरक्षा भूलकर लोगों की सुरक्षा करती है। जब किसी भी युवक को किसी फर्जी काम के लिए बोल दिया जाये तो युवक भड़क उठता है। पुलिस के पास कभी सोचा है थानों पर कितनी फर्जी सूचना मिलती है लेकिन फिर भी पुलिस मौके पर पहुंचती है। वो इसलिए कहीं कोई घटना न घट जाये जिससे लोगों को परेशानी ना हो।

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अब आपको थाने पर एक मुंशी की जुबानी सुनाता हूँ कि वह कितना डर कर काम करता है लेकिन किसी को जाहिर नहीं करता वो इसलिए कि अगर उसका डर दिख गया तो अपराधी निडर हो जाएगा। एक बार रात को मैं थाने पहुंचा तो मालूम चला थाने पर कोई नहीं सभी ड्यूटी पर लगे हैं। थाने पर बस रात के वक्त दो ही लोग मौजूद थे एक मुंशी व एक पहरा और अपराधी थे नौ। जब मैंने पूछा तुम दो और वो नौ तुम्हें डर नहीं लग रहा। तभी उसने धीमी आवाज़ में बताया डर तो लगता है लेकिन अपनी ड्यूटी की जिम्मेदारी से कैसे भागूं। थाने पर पहुंची पुलिस को दिनभर कैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है ये आप नहीं समझोगे।

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सुबह जब पुलिस थाने पहुंचती है तब कैसे लिया जाता है इनसे काम मैं बताता हूँ। जब सभी पुलिसकर्मी थाने आते हैं जिनकी ड्यूटी 12 घंटे की होती है। अगर कोई वीआईपी प्रोग्राम लगा है तो उसको देखना। अगर सड़क जाम हो जाये उसको देखना। जंहा तक नगर निगम का भी काम पुलिस को देखना पड़ता है। आदमी दो घंटे भी खाली पेट नहीं रह सकता वहीं पुलिस कभी-कभी कह लें या ज्यादातर भी कह सकते हैं कि खाली पेट लोगों की सुरक्षा में बिता देती है। फिर भी पुलिस पर आरोप लगता है कि पुलिस काम नहीं करती साहब।http://www.satyodaya.com

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191.38 करोड़ जब्त व 4,229 बम बरामद

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निर्वाचन आयोग के निर्देश पर 1,946 प्रकरणों में एफआईआर दर्ज

लखनऊ। भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश पर पूरे प्रदेश में आदर्श आचार संहिता के अनुपालन में आयकर, नारकोटिक्स, पुलिस तथा आबकारी की संयुक्त कार्रवाई में अब तक कुल 191.38 करोड़ रुपये की जब्ती की गई है, जिसमें पुलिस एवं आयकर विभाग द्वारा 47.45 करोड़ रूपये की नगदी तथा नारकोटिक्स एवं पुलिस द्वारा कुल 26.76 करोड़ रुपये मूल्य की गांजा, स्मैक, चरस आदि की जब्ती की गई। इसके अलावा 71.79 करोड़ मूल्य की बहुमूल्य धातुएं सोना चाँदी आदि जब्त की गई है। आबकारी विभाग द्वारा 45.38 रूपये मूल्य की 16,52,545.5 लीटर मदिरा जब्त की गई है।

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1011 लोगों के लाइसेन्स निरस्त

प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एल वेंकटेश्वर लू ने यह जानकारी देते हुए गुरूवार को बताया कि कानून व्यवस्था के तहत अब तक 8,96,596 लाइसेन्सी शस्त्र जमा कराये गये हैं तथा 1011 लोगों के लाइसेन्स निरस्त किये गये हैं। इसके अलावा निरोधात्मक कार्रवाई के तहत 22,19,083 लोगों को पाबन्द किया गया है तथा 35,211 लोगों पर गैर जमानती वारन्ट तामिला कराया गया है। उन्होंने बताया कि प्रदेश में अब तक 7401.6 किलोग्राम विस्फोटक सामग्री, 14,214 कारतूस, 4,229 बम बरामद किये गये हैं।

मीटिंग, लाउडस्पीकर व उत्तेजनात्मक भाषण के 4,329 मामले

वेंकटेश्वर लू के मुताबिक अभियान के तहत अब तक कुल 67,76,288 वॉल राइटिंग, पोस्टर्स, बैनर्स आदि सार्वजनिक एवं निजी स्थानों से हटा दिये गये हैं या ढक दिये गये हैं। वॉल राइटिंग के 3,40,387 पोस्टर्स के 28,54,084 बैनर्स के 9,71,583 तथा अन्य मामलों के 14,41,726 प्रचार-प्रसार से सम्बन्धित सामग्रियों को हटा दिया गया है। इसी तरह से निजी स्थानों से वॉल राइटिंग के 1,44,783 पोस्टर्स के 5,10,489 बैनर्स के 2,93,536 तथा अन्य मामलों के 2,19,700 प्रचार-प्रसार से सम्बन्धित सामग्री हटा दिये गये हैं। चुनाव के दौरान वाहनों, बिना अनुमति मीटिंग, लाउडस्पीकर एवं उत्तेजनात्मक भाषण तथा प्रलोभन आदि के 4,329 मामले प्रकाश में आये, जिसमें 1,946 प्रकरणों में एफआईआर दर्ज करायी गयी है। http://www.satyodaya.com

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May 17, 2019, 9:21 pm
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