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युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक ‘कोल्हापुरी चप्पल’ का है क्रेज, जानिए क्या है इतिहास

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कोल्हापुर महाराष्ट्र का फेमस जगह है। कोल्हापुर अपने रंग-बिरंग परिधान, खाने-पीने और खूबसूरत चप्पलों के लिए पूरे देश में मशहूर है। कोल्हापुरी चप्पलों का महाराष्ट्र के कोल्हापुर से शुरू हुआ व्यवसाय आज विश्व भर में मशहूर है। कोल्हापुरी चप्पलें 12वीं सदी की शुरुआत से पहनी जा रही हैं। इस से पहले जिस गांव में ये चप्पलें बनती थीं उसी गांव के नाम पर उन का नाम रख दिया जाता था। चलिए आपको आज इसका इतिहास बताते हैं।

12वीं सदी में भी बनती थी कोल्हापुरी चप्पलें
भारत में कोल्हापुरी चप्पलें 12वीं सदी में भी बनती थी, लेकिन 20वीं सदी में कोल्हापुरी ब्रांड विकसित हुआ था। छत्रपति शाहू महाराज (1874-1922) ने कोल्हापुरी चप्पलों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया था और अपने शासन में कोल्हापुर में 29 टैनिंग सेंटर खोले थे।

सौदागर परिवार ने दिलाई पहचान

सौदागर परिवार ने अपने नई डिजाइन वाले चप्पल को मुंबई के मशहूर जे जे एंड संस शूज नामक दुकान के मालिक को बेचा। इस रिटेलर की दुकान पर इसको बहुत अधिक पसंद किया गया। बढ़ती मांग को देखते हुए रिटेलर ने कई और जोड़ी चप्पलों की मांग कर डाली। एक समय ऐसा आया जब सौदागर परिवार अकेले मार्केट में इसकी डिमांड नहीं पूरी कर पा रहा था। तब वे दूसरे लोगों को भी अपनी इस हस्तकला का हुनर सिखाने लगे। इसको इतना पसंद किया गया कि, ये अपने निर्मित गांव के नाम पर ही कोल्हापुरी के नाम से ही मशहूर हो गई। आज भले ही अलग-अलग डिजाइनों की वजह से इसके कई नाम हों, मगर मार्केट में इसे कोल्हापुरी चप्पल के नाम से ही जाना जाता है। इसी के साथ ही मुंबई की वह शॉप भी आज अपनी शाख बनाये हुए है। रिपोर्टों की मानें तो इसको बनाने के लिए जो चमड़ा प्रयोग किया जाता है। वह अधिकतर कोलकाता और चेन्नई से आता है। आज जिला कोल्हापुर में कई ऐसे कुटुंब परिवार रहते है, जिनकी रोजी रोटी इसी चप्पल से चलती है।

कैसे तैयार होती है कोल्हापुरी चप्पल
अब ये चप्पलें समय की मांग के हिसाब से अलग-अलग पैटर्न में बनाई जाने लगी है। इसको बनाने के लिए बकरों, भैंस व बैलों के चमड़े का इस्तेमाल किया जाता है। सबसे पहले चमड़ों को कुछ देर पानी में छोड़ देते है, जिससे चमड़ा नरम हो जाता है। इससे चमड़े की बदबू भी लगभग समाप्त हो जाती है। इसके बाद फर्मे की साइज के हिसाब से चमड़े को काट लिया जाता है। वाटर प्रूफ चप्पल बनाने के लिए कटे हुए चमड़े को तेल में भिगो देते हैं। इससे चमड़े की झुर्री को भी ख़त्म करने में मदद मिलती है

फिर चप्पल की एड़ी को उसके हिसाब से बनाकर चमड़े को सोल से अच्छी तरह जोड़ देते हैं। आगे चप्पल की डिजाइन के हिसाब से इसे आकार दिया जाता है। जैसे दो पट्टे, अंगूठेदार, आदि पैटर्न की तरह इसे तैयार करते हैं। आज के समय में पहले की अपेक्षाकृत हल्के वजन में निर्मित किए जाते हैं। इसको पहले अधिकतर सफ़ेद ही धागे से सिला जाता था। वहीं इसका रंग भूरा या पीला ही होता था, मगर बढ़ते फैशन में कोल्हापुरी चप्पल को भी अलग-अलग रंगों में रंग दिया गया। आज मार्केट में कोल्हापुरी लाल, हरी, गुलाबी, काली व सुनहरे आदि जैसे कई रंग-बिरंगे कलरों में उपलब्ध हैं। पूरी तरह तैयार होने के बाद इस पर धागे की कढ़ाई, मोती व गोटे (लैस) आदि से सजाया भी जाता है। कोल्हापुरी चप्पलों के अलावा इसके जूते व जूतियां भी काफी पसंद की जाती हैं।

कोल्हापुरी चप्पलों को मिला GI टैग
विश्व व्यापार संगठन (WTO) की ओर से देश और दुनिया भर मे मशहूर कोल्हापुरी चप्पल को जीआई टैग दिया गया है। इस टैग की मांग पिछले कई वर्षों से लगातर की जा रही थी। इस टैग के मिलने के बाद ये चप्पल बस उन्हीं इलाको में बनाई जा सकेगी जिन इलाकों को इन्हें बनाने के लिए अधिकृत किया गया है। इस चप्पल को बनाने के लिए महाराष्ट्र के चार कोल्हापुर, शोलापुर, सांगली और सतारा के साथ ही कर्नाटक के चार जिलों को शामिल किया गया हैं। महाराष्ट्र का कोल्हापुर अपनी खास कोल्हापुरी चप्पलों की वजह से भी जाना जाता है। कोल्हापुरी चप्पल को एक नई पहचान तब मिली जब अस्सी के दशक में फिल्म सुहाग के एक दृश्य में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन एक गुंडे को कोल्हापुरी चप्पल से पीटते नजर आए थे। अब इन्हीं कोल्हापुरी चप्पलों को जीआई टैग दे दिया गया है।

क्रेज विदेशों में भी
कोल्हापुरी चप्पलों का के्रज भारत में नहीं विदेशों में भी है। वहां भी इन्हें पहना जाता है। यहां वैस्टर्न, इंडियन सभी तरह की पोशाकों के साथ ये खूब फबती हैं। इन्हें जरमनी, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, सिंगापुर आदि देशों में निर्यात किया जाता है। कोल्हापुरी काप्सी, महाराजा, बीसबंदी गांधी, कोल्हापुरी पोइंटेड, लेडीज और जैंट्स मोजरी आदि सभी इस के अलग-अलग पैटर्न हैं।

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जयंती : पढ़िए दुनिया में मशहूर उपन्यासकार आर के नारायण का जीवन परिचय

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नई दिल्ली। आरके नारायण, पढ़ने-लिखने और साहित्य से रूचि रखने वाले हर शख्स ने यह नाम जरूर सुना होगा। आज उनकी जयंती है। उनकी रचनाओं ने हिंदी भाषी लोगों को जितना प्रेरित किया है, उतना शायद ही किसी अंग्रेजी लेखक की रचनाओं ने किया होगा। आर के नारायण अंग्रेजी साहित्य के भारतीय लेखकों में 3 सबसे महान् उपन्यासकारों में गिने जाते थे।

आर के नारायण जीवन परिचय
10 अक्टूबर 1906 को चेन्नई में जन्में आर के नारायण का पूरा नाम राशीपुरम कृष्णास्वामी अय्यर नारायणस्वामी था। बचपन के दिनों में आर के नारायण के परिवार के लोग उन्हें प्यार से कुंजप्पा कहकर बुलाता थे। बचपन के दिनों में आर के नारायण ज्यादातर अपनी नानी के घर रहे। बचपन से ही आर के नारायण को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। वह किताबों को पढ़ने के साथ-साथ लिखते भी थे। आर के नारायण के पिता एक तमिल टीचर थे। आर के नारायण ने भी बहुत कम वक्त के लिए एक टीचर और पत्रकार के रूप में कार्य भी किया है, लेकिन उन्होंने इसके सिवा अपना सारा जीवन लेखन में ही लगाया। इसके लिए उन्होंने अपनी टीचर की नौकरी भी छोड़ दी थी। आर के नारायण की पहली उपन्यास लिखा था जिसका नाम ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’ था।

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आर के नारायण ने इस उपन्यास में एक प्रसिद्द जगह जिक्र किया था, जिसे उन्होंने मालगुडी नाम दिया था। जोकि आगे इसी मालगुडी के नाम पर हिंन्दी टीवी जगत का प्रसिद्ध नाटक मालगु़डी डेज बन गया था। वह दक्षिण भारत के एक काल्पनिक शहर मालगुडी को आधार बनाकर अधिकतर रचनाएं लिखा करते थे। दुनियाभर में प्रसिद्ध आर के नारायण का 13 मई 2001 को चेन्नई में उनका निधन हो गया था। लेकिन अपनी रचनाओं में वे आज भी जीवित हैं।

उपन्यासकार आर के नारायण को इन पुरस्कारों से नवाजा गया
दुनियाभर में मशहूर उपन्यासकार आर के नारायण को साहित्य एकेडमी अवार्ड, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और ए सी बेनसन मेडल समेत अनेक पुरस्कारों से नवाजा गया। आर के नारायण को वर्ष 1989 में राज्यसभा के लिए भी चयनित किये गए थे।

उनकी प्रसिद्ध कृतियों में द इंग्लिश टीचर, वेटिंग फ़ॉर द महात्मा, द गाइड, द मैन ईटर आफ़ मालगुडी, द वेंडर ऑफ़ स्वीट्स, अ टाइगर फ़ॉर मालगुडी शामिल है। उन्होंने लॉली रोड, अ हॉर्स एंड गोट्स एंड अदर स्टोरीज़, अंडर द बैनियन ट्री एंड अदर स्टोरीज़ शामिल हैं। आरके नारायण की लेखन यात्रा लघुकथाओं से शुरू हुई थी। जीवन के विभिन्न पड़ावों से गुजरती हुई यह यात्रा 94 वर्ष की आयु में 13 मई, 2001 को सदा के लिए थम गई।http://www.satyodaya.com

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पुण्यतिथि: जानिए गजल सम्राट जगजीत सिंह के संघर्ष और उनकी उपलब्धियों के बारे में…

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नई दिल्ली। गजल सम्राट नाम से मशहूर जगजीत सिंह उर्फ जगजी​त दादा की मखमली आवाज का जादू आज भी लोगों पर चढ़ा हुआ है। जब भी गजलों का ​जिक्र होता है जगजीत सिंह का नाम सबसे पहले ​याद किया जाता है। आज उनकी पुण्यतिथि है। 10 अक्टबूर 2011 को मुंबई के लीलावती अस्पताल में ब्रेन हैमरेज के कारण उनका निधन हो गया था।

जगजीत सिंह ने अपनी पढ़ाई जालंधर के डीएवी कॉलेज से की थी। वे वहां हॉस्टल में रहते थे, लेकिन उनके साथ कोई कमरे में रहना पसंद नहीं करता था। क्योंकि जगजीत सिंह सुबह पांच बजे उठ कर दो घंटे रियाज करते थे। वे न खुद सोते थे, न बगल में रहने वाले लड़कों को सोने देते थे।

जगजीत के पिता चाहते थे कि वो पढ़-लिखकर आईएएस बने लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। उन्होंने एमए तक पढ़ाई की, लेकिन उनकी दिलचस्पी सिंगिंग में थी इसलिए अपना करियर बनाने मुंबई पहुंच गए।

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बहुत कम लोग ही इस बात को जानते होंगे कि ऑल इंडिया रेडियो के जालंधर स्टेशन ने उन्हें उपशास्त्रीय गायन की शैली में फेल कर दिया था। उनके गीतों और गजलों ने सबके दिलों पर ऐसा जादू बिखेरा की उन्हें गजल सम्राट कहा जाने लगा।

जगजीत सिंह तो अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनकी आवाज आज भी सुनने वालों को बेहद सुकून देती है। उनकी पत्नी चित्रा सिंह का भी काफी नाम हैं। वह भी अपनी गजलों के लिए काफी जानी जाती हैं। लोग आज भी दगजीत की मधुर आवाज सुनने के लिए तरसते हैं। लोग जब उकी आवाज सुनते हैं तो बेहद खुश हो जाते हैं।

जगजीत का पहला एलबम ‘द अनफॉरगेटेबल्स (1976)’ हिट रहा। जगजीत ने गजलों को जब फिल्मी गानों की तरह गाना शुरू किया तो आम आदमी ने गजल में दिलचस्पी दिखानी शुरू की। जगजीत जी ने क्लासिक शायरी के अलावा साधारण शब्दों में ढली आम-आदमी की जिंदगी को भी सुर दिए। जगजीत सिंह ने 150 से ज्यादा एलबम बनाईं। गजल को लेकर जगजीत सिंह सबसे अधिक लोकप्रिय हैं।

जगजीत ने अपनी मखमली आवाज के जरिए गजलों को नया जीवन दिया। ‘तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है’, ‘झुकी झुकी सी नजर बेकरार है कि नहीं’,’तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो’, ‘तुमको देखा तो ये ख्याल आया’,’प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है’, ‘होश वालों को खबर क्या’, ‘कोई फरियाद’,’होठों से छू लो तुम’, ‘ये दौलत भी ले लो’, ‘चिठ्ठी न कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश’ जैसी फिल्मी गजलें पेश कीं। वहीं गैरफिल्मी फेहरिस्त में ‘कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा’, ‘सरकती जाए है रुख से नकाब आहिस्ता-आहिस्ता’, ‘वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी’ जैसी मशहूर गजलें शुमार हैं।

जगजीत सिंह को 2011 में यूके में गुलाम अली के साथ परफॉर्म करना था, लेकिन इससे पहले सेरिब्रल हैमरेज के चलते उन्हें मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनकी हालत बिगड़ती चली गई और वो कोमा में चले गए। 10 अक्टूबर 2011 को जगजीत सिंह को अंतिम सांसे ली।http://www.satyodaya.com

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शी जिनपिंग 11 अक्टूबर को आएंगे भारत, दूसरे शिखर सम्मेलन में लेंगे हिस्सा

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नई दिल्ली: पीएम नरेन्द्र मोदी के आमंत्रण पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 11 अक्टूबर को भारत के दो दिवसीय दौरे पर आएंगे। चीन के राष्ट्रपति और मोदी के बीच दूसरा अनौपचारिक शिखर सम्मेलन 11-12 अक्टूबर को भारत के चेन्नई में होगा। बता दें कि इससे पहले शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री के बीच पहला अनौपचारिक शिखर सम्मेलन पिछले वर्ष 27-28 अप्रैल को चीन के वुहान में हुआ था।

इस शिखर सम्मेलन के दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक संबंधी महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। इसके साथ ही भारत-चीन क्लोजर डेवलपमेंट पार्टनरशिप को लेकर कई अहम समझौते हो सकते हैं। साथ ही, इस सम्मेलन से दोनों देशों को आपसी संबंधों को मजबूत करने का अच्छा अवसर मिलेगा।

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वहीं चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे से पहले चीन ने पाकिस्तान और भारत से कश्मीर मुद्दे को सुलझाने की बात कही है। दरअसल, पाक के पीएम इमरान खान चीन के अपने तीसरे आधिकारिक दौरे पर मंगलवार को बीजिंग पहुंचे। जहां चीन ने कहा कि कश्मीर के मुद्दे को दोनों देशों के बीच हल किया जाना चाहिए।http://www.satyodaya.com

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