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सत्योदय विशेष: सियासत में आया भूचाल, जब होलियारों ने मचाया धमाल 

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बुरा न मानो होली है 

मोदी बोले मैं चौकन्ना , मैं हूं चौकीदार
उनको भी मैं रंग लगाऊं , जो हैं तड़ीपार
बोलो सा रा रा रा रा

 

बुआ आईं , डिम्पल आईं , आ गए देखो बबुआ
सारे भेद मिटा डाले, सत्ता का मीठा हलुआ
बोलो सा रा रा रा रा

 

मम्मा बोलीं राहुल बेटा, राहुल बोले हांजी
आंख मारते रहोगे या कि मारोगे भी बाजी
बोलो सा रा रा रा रा

 

योगी बोले रंगो में, भगवा रंग ही लाओ
हमसे होली जो खेलो तो, गौशाला में आओ
बोलो सा रा रा रा रा

 

 

लिये हाथ में पिचकारी, शिवपाल चाचा भागे
नेताजी की हो गई सांसत, उधर से टीपू दागे
बोलो सा रा रा रा रा

 

जल जंगल जमीन की बातें ममता दीदी बोली
नाजुक है प्रदेश हमारा मत खेलो तुम होली
बोलो सा रा रा रा रा

खांसे -खांसे केजरी इतना बदल गईं है चाल
आ गई आ गई आ गई होली, आया न लोकपाल
बोलो सा रा रा रा रा रा

 

 

हालत पतली देख के देखो आई बहन बेचारी
जींस छोड़ कर पहने साड़ी, हो जायें सत्ताधारी
बोलो सा रा रा रा रा

खूब हुआ विकास यहां पर क्यों कहते हो थोड़ा
नाले से तुम गैस बनाओ उससे तलो पकौड़ा
बोलो सा रा रा रा रा

रंग बदलते देख के गिरगिट नेताजी से बोला
मैं भी कल से जॉइन कर लूं, क्या कोई सेंटर खोल
बोलो सा रा रा रा रा

प्यार मिला सम्मान मिला , मिला लो भाईचारा
रंग बनाओ ऐसा कि मिटे ये झगड़ा सारा
बोलो सा रा रा रा

आप सभी को सत्योदय परिवार की तरफ से रंगों के त्योहार होली की हार्दिक शुभकामनाएं। अरे भईया, ‘बुरा न मानो होली है’।http://www.satyodaya.com

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… आखिर मेरा क्या कसूर था मेरी मां?

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लखनऊ। बच्ची के पैदा होते ही माता-पिता ने उसे झाड़ियो के बीच आवारा जानवरों के शिकार के लिये छोड़ दिया। सोचने वाली बात है कि उस समय उस मां का दिल भी नहीं पिघला। जिसको 9 माह अपनी कोख में रखा और पैदा होते ही छोड़ दिया। ये बच्ची भी कितनी बदनसीब है। सोच रही होगी कि उसको लड़की होने की सजा मिली है।

चाइल्डलाइन लखनऊ को आज सोमवार को थाना प्रभारी ठाकुरगंज द्वारा बाल कल्याण समिति सदस्य सुधा रानी को सूचना दी कि एक बालिका जो आज ही पैदा हुई है। जो जनसामान्य सम्भारी निवासी भगवंत नगर को बसंत विहार कालोनी की झाड़ियो में मिली। सम्भारी द्वारा बताया कि मैं नौकरी पर जा रहा था तभी बसंत विहार के झाड़ियो के बीच रोने की आवाज सुनकर पहुंचे जहां पर देखा कि निर्वस्त्र बच्ची जिसको चीटियां व चीटे नोंच रहे थे।

यह भी पढ़ें :- खंड विकास अधिकारियों का ओपन ट्रांसफर के साथ दिए गये नियुक्ति पत्र

चाइल्डलाइन टीम सदस्य कृष्ण प्रताप शर्मा, नेहा कश्यप व पुलिस डी.बी. सिंह के सहयोग से रानी लक्ष्मीबाई संयुक्त चिकित्सालय में बच्ची को दिखाया गया। उन्होंने बच्ची को दो तीन दिन (एसएनसीयू) में भर्ती करने की सलाह दी। परन्तु वंहा पर (एसएनसीयू) की सुविधा न होने के कारण लोकबन्धु संयुक्त चिकित्सालय आशियाना के लिए रेफर किया। लोकबन्धु चिकित्सालय बाल लोक विशेषज्ञ डाॅक्टर पूर्णिमा को पूरी जानकारी दी गयी। डाॅक्टर पूर्णिमा द्वारा हर सम्भव मदद का आश्वासन दिया गया। जिसके उपरांत बच्ची को हाॅस्पिटल में भर्ती कर लिया गया है। साथ ही उसकी जानकारी बाल न्यायालय (सीडब्लूसी) को दी गयी।http://www.satyodaya.com

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क्या है Chief of Defense staff और जानिए क्या होगी पाॅवर

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नई दिल्ली। देश में एक बार फिर से चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की चर्चा जोर शोर से चल निकली है। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस स्वतंत्रता दिवस समारोह के अपने भाषण में इस पद को सृजित करने का ऐलान किया है। भारत में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बनाने की कवायद 20 साल पुरानी है। कुछ समस्याओं और सेन्य अफसरों के बीच मतभेदों के चलते आज तक चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ अमल में नहीं आ सका।

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का मतलब है, एक ऐसा अधिकारी जो तीनों सेनाओं के मध्य तालमेल बिठा सके साथ ही सेनाओं और सरकार के बीच सेतु का काम करे। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की जिम्मेदारी होगी कि वह तीनों सेना अध्यक्षों से बात करके प्रधानमंत्री को सलाह दे। सैन्य अभ्यास, रक्षा खरीद, बाहरी देशों के साथ रक्षा सहयोग समेत तमाम मामलों में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ नीति निर्णायक होगा। वह राष्टपति के नीचे रहकर सेन्य शक्ति का इस्तेमाल देश हित में करेगा।#Chiefofarmystaff
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की सबसे पहले मांग कारगिल युद्ध (1999) के दौरान उठी थी। कारगिल युद्ध में भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान को धूल चटा दी। लेकिन 65 दिनों तक चले इस युद्ध में भारत को भी काफी नुकसान उठाना पड़ा, सैकड़ों जवानों को जान की कुर्बानी देनी पड़ी। तत्कालीन उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में मंत्रियों के एक समूह ने युद्ध की समीक्षा में पाया कि अगर तीनों सेनाओं बीच बेहतर तालमेल होता तो भारत की क्षति को कम किया जा सकता था। मंत्रियों के समूह ने सरकार को चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बनाने का सुझाव दिया। लेकिन तब वायु सेना ने इसका विरोध कियाए जिसके बाद वाजपेयी सरकार ने पिफलहाल इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया था।
बाद में बीच का रास्ता निकालते हुए चीफ ऑफ स्टाॅफ कमेटी का गठन किया गया था। लेकिन इस कमेटी प्रमुख के पास ज्यादा शक्तियां नहीं हैं। चीफ ऑफ स्टाॅफ कमेटी केवल तीनों सेनाओं के बीच तालमेल का कार्य करता है। वर्तमान समय में वायु सेना प्रमुख बीएस धनोआ इस कमेटी के अध्यक्ष हैं।

इंदिरा गांधी सैम मानेकशां को बनाना चाहती थीं सीडीएस

युद्ध के समय भारतीय सेनाओं के बीच तालमेल की कमी 1999 के पहले के युद्धों में भी जाहिर हो चुकी थी। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय 1971 में भी थल सेना और वायु सेना के बीच समन्वय की कमी खली थी। खबरों के मुताबिक इस कमी को पूरा करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थल सेना अध्यक्ष सैम मानेकशाॅ को फील्ड मार्शल की रैंक देकर उन्हे सीडीएस बनाना चाहती थी लेकिन तब भी सैन्य प्रमुखों के बीच उभरे मतभेदों के चलते सीडीएस का पद अमल में नहीं आ सका था। बाद में इंदिरा गांधी ने असाधारण वीरता के लिए सैम मानेकशां को फील्ड मार्शल की उपाधि से विभूषित किया था। जनवरी 1973 में मानेकशाॅ को फील्ड मार्शल बनाया गया था। इसके लिए मानेकशां का कार्यकाल भी छह महीने के लिए बढ़ाया गया था।

कई देशों के पास है सीडीएस

सेनाओं के बीच तालमेल की महत्ता इसी से समझी जा सकती है कि अमेरिका, चीन, यूनाइटेड किंगडम, जापान जैसे दुनिया के ताकतवर देशों में चीफ ऑफ डिफेंस जैसी व्यवस्था है। नॉटो देशों की सेनाओं में ये पद हैं। बताया जा रहा है कि विस्तृत भूमिए लंबी सीमाओं, तटरेखाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियों को सीमित संसाधनों से निपटने के लिए भारत के पास एकीकृत रक्षा प्रणाली के लिए चीफ ऑफ डिफेंस पद की बहुत जरूरत थी।http://www.satyodaya.com

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श्रमिक हितकारी है उत्तर प्रदेश भवन एवं निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड, जानिए क्यों हुआ इसका गठन

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लखनऊ। देश की श्रम शक्ति का बहुत बड़ा भाग असंगठित व अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों में भवन निर्माण कार्यों में लगे हुए श्रमिकों की संख्या काफी अधिक है। निर्माण श्रमिकों के कार्य की प्रवृत्ति ऐसी होती है कि उन्हें कठिन स्थितियों में कार्य करना पड़ता है। जिसमें धूल व प्रदूषण, जोखिम पूर्ण कार्य अनिश्चित व अस्थाई रोजगार, कार्य के घण्टों का अनिश्चित होना, कल्याणकारी उपायों का अभाव आदि शामिल हैं, जो निर्माण श्रमिकों की कार्य दशाओं को और कठिन बनाते है।
श्रमिकों की इन्ही समस्याओं को देखते हुए निर्माण श्रमिकों के नियोजन व सेवा शर्तों का विनियमन करने तथा उनकी सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य व कल्याण के उपाय करने के उद्देश्य से भवन एवं अन्य सन्निर्माण श्रमिक अधिनियम 1996 बनाया गया था। जिसके अन्तर्गत उत्तर प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड का गठन करते हुये प्रदेश सरकार ने श्रमिकों के कल्याण एवं उनके जीवन में गुणात्मक सुधार करने के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित की हैं।
कोई भी प्रतिष्ठान जो सरकार के स्वामित्व या उसके नियन्त्रण के अधीन हो, कोई निकाय, कम्पनी फर्म कोई संघ या व्यक्तियों के कोई संगठन जो भवन व अन्य सन्निर्माण कार्य में श्रमिकों को नियोजित करते हैं, ठेकेदार से सम्बन्धित प्रतिष्ठान, जो श्रमिक से कार्य कराते हैं इस अधिनियम के अन्तर्गत आते हैं। इसी प्रकार निर्माण स्थलों जहां वर्ष मेे किसी भी दिन 10 या इससे अधिक निर्माण श्रमिक नियोजित हैं का पंजीयन भी अधिनियम के अन्तर्गत अनिवार्य है, रिहायशी भवनों की स्थिति में 10 लाख रूपये से अधिक लागत के भवनों पर ही अधिनियम के प्राविधान लागू हैं। प्रदेश में माह जून 2019 तक कुल 210841 निर्माण स्थलों का पंजीयन किया जा चुका है।

उत्तर प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण उपकर अधिनियम 1996 की धारा-3 द्वारा अधिनियम से आवर्त सभी भवनों एवं अन्य सन्निर्माणों के लागत का 01 प्रतिशत धनराशि उपकर लिये जाने का प्राविधान है। जून 2019 तक कुल 4786.30 करोड़ रूपये की धनराशि उपकर के रूप में बोर्ड को प्राप्त हो चुकी है। उपकर के रूप में प्राप्त धनराशि का उपयोग पंजीकृत निर्माण श्रमिकों हेतु संचालित कल्याणकारी योजनाओं पर व्यय किया जाता है। इस अधिनियम के अन्तर्गत 18 से 60 वर्ष की आयु वर्ग के निर्माण श्रमिक जो निर्माण प्रक्रिया में एक वर्ष में 90 दिन से अधिक कार्य किये हो, पंजीयन के लिए पात्र है।
भवन एवं अन्य सन्निर्माण श्रमिक वे हैं जो किसी भवन या अन्य निर्माण (कन्सट्रक्शन) कार्य में अकुशल, अर्द्ध कुशल श्रमिक के रूप में शारीरिक, तकनीकी, सुपरवाइजरी, लिपिकीय कार्य वेतन या पारिश्रमिक पाने के लिए करते हैै। इसके अन्तर्गत 40 प्रक्रियाओं के निर्माण कार्यों में लगे प्रदेश में माह जून 2019 तक 4941825 श्रमिकों का पंजीकरण किया गया है।

यह भी पढ़ें-सभी जिलों में सामान्य सुविधा केन्द्र होगा स्थापित, एमएसएमई व एएसआईडीई के अधूरे कार्य भी होंगे पूरे

इन श्रमिको में बांध, पुल, सड़क या भवन निर्माण के अधीन कोई संक्रिया, ईट-भट्टों पर ईंट निर्माण, मिट्टी का कार्य, राजमिस्त्री, सीमेंट कंक्रीट, ईंट आदि ढोने का कार्य, इलेक्ट्रानिक, सड़क निर्माण, पुताई, बढ़ई, मिट्टी, बालू, मोंरम के खनन, लिपिकीयध्लेखा कार्य, प्लम्बरिंग, वेल्डिंग, सभी प्रकार के पत्थर काटने, तोड़ने व पीसने वाले श्रमिक, चौकीदारी, लोहार, मकानोंध्भवनों की आन्तरिक सज्जा का कार्य, टाइल्स लगाने, मार्बल एवं स्टोन वर्क, कुआं खोदना, छप्पर डालने का कार्य, चट्टान तोड़ने, खनिकर्म, हथोड़ा चलाने, चूना बनाना, मिक्सर चलाना, रोलर चलाना, बड़े यान्त्रिक कार्य, जैसे-मशीनरी, पुल निर्माण कार्य, खिड़की, ग्रिल, दरवाजे आदि की गढ़ाई एवं स्थापना का कार्य, रसोई में उपयोग हेतु माडूलर इकाईयों की स्थापना का कार्य, मोजैक पालिश, लिफ्ट एवं स्वचालित सीढ़ी की स्थापना, सुरक्षा द्वार एवं अन्य उपकरणों की स्थापना का कार्य, सामुदायिक पार्क या फुटपाथ का निर्माण, स्प्रे वर्क या मिक्सिंग वर्क, सुरंग निर्माण, स्विमिंग पूल, गोल्फ कोर्स आदिध्सहित अन्य मनोरंजन सुविधाओं का निर्माण कार्य, अग्निशमन प्रणाली की स्थापना एवं मरम्मत कार्य, कुएं से गाद (तलछट) हटाने का कार्यध्डिविंग तथा ठण्डे एवं गर्म मशीनरी की स्थापना और मरम्मत का कार्य करने वाल श्रमिक सम्मिलित किये गये हैं। जिन्हें उप्र भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड के अन्तर्गत पंजीकृत करते हुये प्रदेश सरकार द्वारा दी जा रही 18 प्रकार की श्रमिक हितकारी एवं कल्याणकारी योजनाओें से लाभान्वित किया जा रहा है।http://www.satyodaya.com

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August 20, 2019, 12:28 am
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