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पुलिस के जवानों का ‘दर्द’ भी समझिए साहब…

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काम के बढ़ते बोझ ने पुलिस वालों में ’इंसान’ होने के भाव को ही खो दिया है

आखिर सत्ता पुलिस वालों को इंसान से ’हिंसक’ जानवर बनाने में क्यों तुली है और इसके पीछे उसका असल मकसद क्या है?

अभी कुछ दिन पहले की बात है जब मेरा एक पुलिस स्टेशन (थाना) पर एक काम के सिलसिले में जाना हुआ। भरी दोपहरी में जब मैं पुलिस स्टेशन पहुंचा तो वहां पर मुझे केवल तीन व्यक्ति मौजूद मिले। पहिला एक होमगार्ड का जवान,जो कि वहां पर संतरी ड्यूटी कर रहा था। दूसरा एक मुंशी (पुलिस स्टेशन का लिपिक),जो कि थाने में बैठा कुछ लिखा पढ़ी में व्यस्त था। उसकी मेज पर फाइलों का ढेर लगा हुआ था। इन सबसे इतर तीसरे व्यक्ति थाना प्रभारी थे। वे अपने विश्राम कक्ष में सो रहे थे। जब मैंने मुंशी से पूछा कि थाना प्रभारी कहां हैं? मुझे उनसे मुलाकात करनी है? इस पर मुंशी ने मुझसे जो कुछ कहा वह अपने आप में चैंकाने वाला था। उसने बताया कि पिछले तीन दिन से एक जरूरी काम के कारण साहब बहुत व्यस्त थे। वे अभी सो रहे हैं और मैं उनको ’डिस्टर्ब’ नहीं कर सकता। आपको अगर उनसे मिलना है तो फिर कल सुबह आइए या फिर एक चिट्ठी में लिख दीजिए। उनके जगने पर दे दूंगा। हलांकि, बाद में आस-पास की चाय की दुकानों पर चर्चा में मुझे यह पता चला कि हाई प्रोफाइल हत्या के एक मामले में स्थानीय पुलिस पर आरोपियों को पकड़ने का काफी दबाव था। इसी वजह से रात-रात भर छापेमारी करने के कारण दो रात थाना प्रभारी सो नहीं पाए थे। अब जबकि आरोपी पकड़ लिया गया था तो वो आराम कर रहे थे।

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गौरतलब है कि ऐसी दबाव भरी दिनचर्या एक दिन का मामला नहीं है। पुलिस वालों का जीवन तकरीबन ऐसे ही हर दिन चलता है। एक बार सुबह नहाने के बाद शरीर पर टंगी वर्दी रात के दो बजे के बाद ही बदन से उतर पाती है। यही नहीं, अगले दिन दस बजे उन्हें कार्यालय में समय से उपस्थित होना होता है। सप्ताह में चैबीस घंटे का सामान्य ’रूटीन’ यही होता है। अब जबकि पुलिस के कार्यक्षेत्र लगातार व्यापक होते जा रहे हैं, उनके ऊपर काम का बोझ भी लगातार बढ़ा है। इस काम के बोझ के दौरान उनके दुख दर्द से किसी को कोई मतलब नहीं होता। काम के दबाव में भले ही पुलिस वाले मानसिक स्तर पर टूट जाएं, लेकिन पुलिस विभाग को उनसे कोई हमदर्दी नहीं होती है। पुलिस अधिकारियों के स्तर पर एक सामान्य समझ विकसित कर ली गयी है कि विभाग में सब कुछ ’ठीक’ है और उसे किसी तरह के सुधार की जरूरत नहीं है। पुलिस के अफसर जवानों की बेहतरी पर बात करना अपनी ’तौहीन’ समझते हैं। उनका वर्ग चरित्र शासक वर्ग का होता है जो जवानों को महज एक ’गुलाम’ भर समझता है।

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दरअसल, उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था का सवाल पिछले कई सालों से विधानसभा चुनाव में राजनैतिक बहस का मुद्दा बनता रहा है। लेकिन, इस बात पर राजनीति में कभी कोई बहस नहीं होती कि आखिर कानून का शासन स्थापित करने में लगे लोगों-खासकर ’पुलिस’ के सिपाहियों-दारोगाओं की मानवीय गरिमा को सुनिश्चित कैसे रखा जाए? कानून व्यवस्था के खात्मे का रोना सभी दल भले ही रोते हों, लेकिन कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाने वाले पुलिस के इन सबसे निचले स्तर के जवानों के दुख दर्द उनकी बहस का हिस्सा नहीं होते हैं। पुलिस के कर्मचारी चाहे जितने जोखिम और तनाव में काम करें लेकिन उन्हें इंसान समझने और उसकी इंसानी गरिमा सुनिश्चित करने की ’भूल’ कोई भी राजनैतिक दल नहीं करना चाहता है।

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गौरतलब है कि अन्य राज्यों के मुकाबले उत्तर प्रदेश में प्रति पुलिसकर्मी सबसे ज्यादा आबादी रहती है। जहां तक इसके संख्या बल का सवाल है-यह रिक्तियों की भीषण कमी से साल दर साल लगातार जूझ रही है। पुलिस थानों का हाल यह है कि कई थाने अपनी कुल स्वीकृत पुलिस बल के आधे से भी कम संख्या पर किसी तरह से अपना काम चला रहे हैं। पुलिस के पास आने वाली शिकायतों की जांच के लिए दारोगा की जगह सिपाही भेजकर काम चलाया जा रहा है। यह सब पुलिस के प्रोफेशनलिज्म का न केवल मजाक है बल्कि कानून सम्मत भी नहीं है। जाहिर है इससे पीड़ित के लिए इंसाफ पाने की प्रक्रिया भी गंभीर तौर पर बाधित होती है यही नहीं, साल दर साल जिस तरह से पुलिस की जिम्मेदारियां और कार्यक्षेत्र बढ़ रहा हैं, ठीक उसी अनुपात में उसका संख्या बल लगातार घटता जा रहा है। कार्य बल में लगातार हो रही कमी पुलिस की कार्यक्षमता पर बहुत ही नकारात्मक असर डाल रही है। इससे एक तरफ अपराध नियंत्रण में मुश्किल तो होती ही है, पुलिस के कर्मचारियों पर काम का दबाव भी काफी बढ़ जाता है। काम के इसी दबाव के कारण पुलिस वाले आज अपनी मानवीय गरिमा को ’भूल’ चुके हैं और शारीरिक तथा दिमागी रूप से बीमार होते हुए लगातार ’हिंसक’ हो रहे हैं। बिना अवकाश के लगातार ’ड्यूटी’ करने वाले पुलिस वालों को मैंने बहुत नजदीक से देखा है। वे सब गंभीर रूप से ’अवसाद’ का शिकार हो रहे हैं।

बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है

पुलिस महकमे में सब इंस्पेक्टर का पद बहुत ही जिम्मेदारी भरा होता है। इस समय जो हालात हैं उसमें एक सब इंस्पेक्टर के पास औसत दस से ग्यारह मुकदमों की विवेचना लंबित है। यह सब पुलिस वालों में अपने कर्तव्य पालन को लेकर एक गंभीर ’तनाव’ पैदा करता है। जाहिर है काम के बढ़ते बोझ ने पुलिस वालों में ’इंसान’ होने के भाव को ही खो दिया है। हर वर्ष लगभग चार प्रतिशत कार्यबल पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त और बर्खास्तगी इत्यादि कारणों से स्टाफ से हट जाता है। लेकिन इसकी भरपायी के बतौर नयी भर्तियां नहीं की जाती हैं। इससे मौजूदा स्टाॅफ पर और ज्यादा बोझ बढ़ जाता है जो कि ’तनाव’ पैदा करता है। इस तनाव का असर जवानों की जीवनशैली में भी साफ देखा जाता है। डिप्रेशन और अथाह काम के इस बोझ ने पुलिसकर्मियों को ’बीमार’ बना दिया है। बस वे बोझ ढोने वाले ’गधों’ में तब्दील हो गए हैं।

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों है

जिम्मेदार इस समस्या पर बात क्यों नहीं करना चाहते? आखिर पुलिस वालों में इंसान होने के स्वाभाविक गुणों के विकास की जगह उनका खात्मा करने में तंत्र इतना ’तत्पर’ क्यों है? आखिर पुलिस के जवानों के सामाजिक और मानवीय ’गुण’ को प्रायोजित तरीके से सत्ता खत्म करने पर क्यों जुटी है? आखिर उसे क्यों केवल एक डंडाधारी आज्ञापालक जवान ही चाहिए, बिल्कुल मशीन की तरह से कमांड लेने वाला?

आखिर सत्ता पुलिस वालों को इंसान से ’हिंसक’ जानवर बनाने में क्यों तुली है और इसके पीछे उसका असल मकसद क्या है

दरअसल किसी समाज में हो रहे अपराध के कारणों में एक बड़ा हिस्सा तंत्र की संरचना, समाज और तत्कालीन आर्थिक परिवेश होता है। कोई व्यक्ति पैदायशी अपराधी नहीं होता। चूंकि मौजूदा तंत्र में व्यक्ति अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहा है और जीवन जीना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। इसलिए अपराधों में बढ़ोत्तरी भी लगातार हो रही है। अब चूंकि राजनैतिक तंत्र अपराधों के मूल कारणों पर बहस से डरता है इसलिए वह इसे डंडे और बंदूक के बल पर खत्म करने की वर्ग सापेक्ष और ’सतही’ व्याख्या करने की चालाकी करता है। वह इसी चालाकी के मूल में पुलिस के जवानों को ’आज्ञापालक’ मशीन में बदल देता है। इसीलिए जब जवान अपने मानव होने के अधिकारों की मांग करते हैं तब तंत्र डर जाता है। चूंकि यह व्यवस्था हिंसा के बल पर खड़ी है और अगर पुलिस के जवान में मानवोचित गुण आ जाएंगे तो वे अपने अधिकार और हक की मांग कर रहे निहत्थे नागरिकों पर लाठी और गोली कभी नहीं बरसाएंगे। इसके पीछे का मनोविज्ञान यही है। इसीलिए पुलिस के जवानों को हिंसक और बर्बर बनाए रखने का एक मैराथन लगातार चल रहा है।

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वहीं कुछ पुलिस के जवानों से इस विषय पर चर्चा की गई तो उनके द्वारा कहा गया कि पुलिस के जवानों की अमानवीय कार्य परिस्थितियां उनके मानवीय गर्व के खात्मे का एक कुचक्र हैं जिसके अपने वर्ग चरित्र हैं। हिंसक और बर्बर व्यवस्था को हिंसक सिपहसलार ही चाहिए। वहीं कुछ पुलिस कर्मी कहते हैं कि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में पुलिस बल की संख्या बढ़ाते हुए पुलिस में रिक्तियों को भरने का वादा भले ही किया हो लेकिन इससे पुलिस के जवानों को कुछ खास राहत नहीं मिलेगी। वर्तमान समय में कार्यस्थल पर जिस यंत्रणा पूर्ण हालात से पुलिस कर्मियों का सामना हो रहा है, उससे तत्काल निपटने की कोई ठोस रणनीति योगी सरकार के पास नहीं है। थकी हारी बीमार पुलिस एक स्वच्छ और न्यायपूर्ण प्रशासन नहीं दे सकती। साथ ही पुलिस कर्मियों का कहना है कि इसके लिए योगी सरकार को चाहिए कि वह पुलिस वालों की इंसानी गरिमा को सुनिश्चित करने की दिशा में पहल करें। इसके लिए सबसे पहले सप्ताह में एक दिन आवश्यक रूप से अवकाश देने की व्यवस्था को तत्काल लागू किया जाए। यह अवकाश सभी पुलिस कर्मियों के लिए अनिवार्य हो और इसे वे अपने परिवार और बच्चों के साथ अवश्य बिताएं। इससे इतर, उनके लिए काम के घंटे फिक्स किए जांए ताकि उनका व्यक्तिगत जीनव भी पटरी पर लौटे। यह सब पुलिस कर्मियों में काम के बोझ को हल्का करेगा और उनके काम को आनन्द दायक बनाएगा। सबसे बड़ी बात यह है कि योगी सरकार द्वारा कानून का राज स्थापित करने की बात के वाबजूद पुलिस वालों को संवेदना युक्त बनाने का कोई विचार नहीं दिख रहा है, जबकि जिम्मेदारी और जवाब देही के लिए यह बहुत जरूरी है। वक्त की मांग है कि अब इस पर तत्काल विचार किया जाए।http://www.satyodaya.com

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एयरपोर्ट पर चेन्नई फ्लाइट में बम की सूचना से मचा हड़कम्प

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लखनऊ। राजधानी के सरोजनीनगर स्थित चौधरी चरण सिंह अमौसी एयरपोर्ट पर बम होने की सूचना से हड़कंप मच गया। पीयूष वर्मा नामक यात्री ने चेन्नई जा रही इंडिगो फ्लाइट में बम होने की सूचना दी। जिसके बाद मौके पर एयरपोर्ट अधिकारी और पुलिस पहुंच गई। रेस्क्यू ऑपरेशन जारी किया साथ ही अधिकारी पीयूष से भी पूछताछ करने में जुटे रहे।

एयरपोर्ट अथॉरिटी ने बताया कि पीयूष वर्मा नाम के पैसेंजर को 6E447 द्वारा दिल्ली की यात्रा करनी थी। फ्लाइट के उड़ान का समय रात के 10:40 का था। लेकिन गेट नं- 5 के पास ड्यूटी पर तैनात सीआईएसएफ की टीम को पीयूष वर्मा का व्यवहार कुछ आसामान्य लगा। पूछताछ के दौरान पीयूष ने बताया कि चेन्नई जा रही इंडिगो की फ्लाइट में बम है। जैसे ही ये सूचना मिली हड़कंप मच गया।

सीआईएसएफ की टीम ने तुरंत सभी संबंधित एजेंसियों को सतर्क कर दिया। एयरपोर्ट डायरेक्टर, सीनियर कमांडेंट, बॉम्ब डिटेक्शन एंड डिस्पोजल टीम (BDDS), सीआईएसएफ के डॉग स्कॉड और सीआईएसएफ की क्विक रिएक्शन टीम, सीओ कृष्णानगर, इंस्पेक्टर सरोजनीनगर एयरपोर्ट पहुंचे। चेन्नई जा रही फ्लाइट की उड़ान को रोक दिया गया और जांच की जाने लगी।

वहीं रेस्क्यू ऑपरेशन करने के साथ ही काफी जांच करने के बाद एयरपोर्ट पर चेन्नई फ्लाइट में बम मिलने की सूचना फर्जी निकली। जिसके बाद से ही चेन्नई जाने वाले यात्री पीयूष वर्मा को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। साथ ही सूचना देने वाले पीयूष वर्मा के खिलाफ तहरीर मिलने पर सरोजनीनगर पुलिस आगे की कार्रवाई भी करने में जुट गई है। वहीं पूरी जांच करने के बाद ही चेन्नई की फ्लाइट को उड़ान भरने की मंजूरी मिल गई और वह कुछ देर बाद ही उड़ान भर्ती बनी।http://www.satyodaya.com

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उत्तर प्रदेश के सात अस्पतालों पर करोड़ों जुर्माने की सिफारिश

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अनुश्रवण समिति ने एनजीटी को भेजी रिपोर्ट

लखनऊ। एनजीटी की अनुश्रवण समिति ने बायो मेडिकल वेस्ट के खुले में निस्तारण, अवैध निर्माण, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के रूप में मिली कमियों पर आजमगढ़ के पांच और मऊ के दो अस्पतालों समेत आजमगढ़ विकास प्राधिकरण और नगरपालिका आजमगढ़ पर लगभग 25.79 करोड़ का जुर्माना लगाया है। इसके साथ ही समिति ने और जुर्माने को बढ़ाने की चेतावनी दी है।

एनजीटी द्वारा गठित पूर्वी यूपी की नदियों और जलाशयों की अनुश्रवण समिति में शामिल देवी प्रसाद सिंह पूर्व न्यायाधीश अध्यक्ष, राजेंद्र सिंह पूर्व न्यायाधीश सचिव, ने अन्य अधिकारियों के साथ 31 मई और एक जून 2019 को आजमगढ़ और मऊ का निरीक्षण किया था। समिति में शामिल सदस्य राजेश सिंह के मुताबिक इस दौरान मुख्य रूप से तमसा के किनारे हुए अवैध निर्माण, कूड़ा निस्तारण और बायो मेडिकल वेस्ट के निस्तारण को फोकस किया गया था। टीम ने प्राधिकरण को तीन माह के भीतर तमसा नदी के 75 मीटर के दायरे में हुए निर्माण के हटाने, पालिका को कूड़ा निस्तारण की समुचित व्यवस्था करने, नालों को टैप करने तथा तमसा नदी के किनारे से कूड़े को हटाने के निर्देश दिए थे।

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स्वास्थ्य विभाग को भी चेतावनी दी गई थी और बलरामपुर स्थित ओशोधरा अस्पताल को सीज कर दिया गया था। निरीक्षण के दौरान मिली कमियों पर समिति ने अब आजमगढ़ के पांच और मऊ के दो अस्पतालों के साथ ही आजमगढ़ विकास प्राधिकरण और नगरपालिका पर जुर्माना लगाया है। आजमगढ़ के जिला महिला अस्पताल, मंडलीय पुरुष अस्पताल, रहमान अस्पताल, ओशोधरा अस्पताल, वेदांता हाॅस्पिटल, मऊ जनपद के जिला अस्पताल मऊ पर प्रति अस्पताल 3.46 करोड़ का जुर्माना लगाया गया है। मऊ के फातिमा अस्पताल पर 1.15 करोड़ का जुर्माना लगाया गया है।

इस प्रकार कुल सात अस्पतालों पर 21.96 करोड़ का जुर्माना लगाया गया है। वहीं आजमगढ़ विकास प्राधिकरण पर 2.73 करोड़, नगर पालिका पर 1.09 करोड़ समेत कुल 25.79 करोड़ का जुर्माना लगाया गया है। इसके अलावा आजमगढ़ विकास प्राधिकरण और नगरपालिका प्रशासन को तमसा नदी के 50 मीटर परिधि में हुए अवैध निर्माण को हटाने के निर्देश दिए गए हैं। यह समय सीमा एक नवंबर से शुरू हो जाएगी। अगर निर्माण नहीं हटाया गया तो पांच लाख रुपये प्रतिदिन के हिसाब से दोनों पर जुर्माना लगाया जाएगा। इसके साथ ही नगरपालिका को छह माह के भीतर तमसा नदी में गिरने वाले सीधे नालों के ट्रीटमेंट की व्यवस्था करनी होगी। समिति ने अपने आदेश में कहा है कि आगे भी समिति की ओर से जनपद का निरीक्षण किया जाएगा। यदि मामले में कार्रवाई नहीं की गई तो आगे भी जुर्माना लगाया जाएगा।

महेसरा ताल और चिलुआताल के जमीन पर अवैध कब्जा

एनजीटी की अनुश्रवण समिति ने सतर्क करते हुए कहा है कि गोरखपुर के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में स्थित महेसरा ताल और चिलुआताल के जमीन पर कब्जा हो रहा है। उसका कहना है कि सबसे खराब स्थिति महेसरा ताल की है। यह ताल सूखता जा रहा है। एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल) द्वारा गठित ईस्टन यूपी रीवर्स एंड वॉटर रिजर्वायर मानीटरिंग कमेटी के सचिव पूर्व जिला जज राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में जांच टीम ने एसटीपी, चिलुआताल, जटाशंकर पोखरा, सूरजकुंड, राप्ती नदी व सरैया डिस्टिलरी, सरदारनगर का इसी वर्ष अगस्त में निरीक्षण किया था। कमेटी ने एनजीटी को रिपोर्ट सौंपते हुए कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं।

जांच टीम में सीपीसीबी (सेंट्रल पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड) व यूपीपीसीबी (उत्तर प्रदेश पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड) के प्रतिनिधि भी शामिल थे। हाईपावर कमेटी का मानना है कि महेसरा ताल को पूरी तरह से घरों से निकल रहे कचरे (म्यूनिसिपल सालिड वेस्ट) का डंपिंग ग्राउंड बना दिया गया है। इस ताल में हजारों टन कचरा फेंका गया है। इस कचरें के कारण ताल का एक हिस्सा सूख रहा है। ताल के दूसरे तरफ तेजी से अवैध भवनों का निर्माण हो रहा है। चिलुआताल के वेट लैंड पर भी बड़े भवनों का निर्माण हो रहा है। इन भवनों के निर्माण के लिए किसी विभाग ने एनओसी तक नहीं जारी की है।

एनजीटी की हाई पावर कमेटी का भी जिला प्रशासन के अधिकारियों पर जोर नहीं चला है। कमेटी ने चिलुआताल और महेसरा ताल को लेकर जिला प्रशासन से रिपोर्ट मांगी थी और यह आज तक नहीं मिली। इसका उल्लेख कमेटी ने एनजीटी को भेजी गई सिफारिशों में किया है। कमेटी ने सूबे के रिमोट सेंसिंग अप्लीकेशन सेंटर से ताल का सेटेलाइट मैप बनाने की सिफारिश की है। इसके साथ ही कमेटी ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राजस्व विभाग और जिला प्रशासन से दोनों तालों का राजस्व क्षेत्र निर्धारण कर अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है।http://www.satyodaya.com

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मुख्तार अंसारी के बेटे पर दर्ज हुआ एक ही लाइसेंस पर कई असलहे खरीदने का मुकदमा

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लखनऊ। राजधानी के महानगर थाना में मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी पर धोखाधड़ी और आर्म्स ऐक्ट में मुकदमा दर्ज हुआ है। जिसमें बताया गया है कि उसके द्वारा एक ही लाइसेंस पर कई असलहे खरीदने का मामला सामने आया है। बता दें कि कुछ दिनों से लखनऊ पुलिस इस मामले में हीलाहवाली कर रही थी जिसके बाद ही आखिरकार पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर आगे की कार्रवाई में जुटी हुई है।

महानगर पुलिस द्वारा बताया गया कि शस्त्र एवं कारतूस के सत्यापन को लेकर दारोगा इमरान खाँ द्वारा एक बीट सूचना थाना महानगर पर दर्ज करायी गयी है। जिसके आधार पर जांच की गयी तो पाया गया कि शस्त्र धारक अब्बास अन्सारी पुत्र मुख्तार अंसारी मैट्रो सिटी पेपर मिल कम्पाउण्ड निशातगंज थाना महानगर लखनऊ निवासी जो मूलरूप से यूसुफपुर दर्जी टोला थाना मोहम्मदाबाद जनपद गाजीपुर के निवासी हैं। जिन्होंने एक ही नाम से डीबीबीएल लाइसेंस वर्ष-2002 जिलाधिकारी लखनऊ द्वारा स्वीकृत किया गया था। उक्त लाइसेंस को शस्त्र धारक अब्बास अंसारी द्वार अपने दिल्ली के पते पर स्थानान्तरित कराया गया। जिसका लाइसेंस तथा यूआईडी नम्बर तथा दिल्ली के शस्त लाइसेंस नम्बर पर शस्त्र धारक द्वारा विख्यात निशानेबाज होने के आधार पर अनेक शस्त्र खरीदना दर्शाया गया है।

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वहीं पुलिस ने आगे बताया है शस्त्र धारक द्वारा लाइसेंस नई दिल्ली स्थान्तरित करा लिया गया है। परन्तु लखनऊ पुलिस या महानगर थाने पर कोई सूचना पूर्व में प्राप्त नहीं करायी गयी। जिसके कारण एक ही शस्त्र दो प्रदेशों में पंजीकृत कर अलग-अलग शस्त्र लाइसेंस व अलग-अलग अंकित होना प्रतीत होता है। जिसको देखते हुए शस्त्र धारक द्वारा धोखाधड़ी कर आवश्यक तथ्य छुपाये जाने व शस्त्र का अवैधनिक प्रयोग करने की मंशा को प्रदर्शित करता है। जिसके आधार पर थाना महानगर पर धारा 420 में मुकदमा दर्ज किया गया है और आगे की वैद्यानिक कार्रवाई की जा रही है।http://www.satyodaya.com

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