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राहुल ने मसूद अजहर को जी क्यों बोला, इसका हुआ खुलासा

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तुम ही कहो सखी अब मैं क्या कहूं !!

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अनूप मणि त्रिपाठी

प्रिय सखी,

रचना

सखी, सोचा कि तुझे पत्र लिखूं ! तो मौका निकाल कर बैठ गई लिखने । वैसे कायदे से तो तुझको पत्र नहीं लिखना चाहिए, तूने ऐसा कृत्य जो किया है । तू मेरी शादी में क्यों नहीं आई रे ? मुझे कितना बुरा लगा, मैं तुझे बता नहीं सकती । एक ही तो मेरी सहेली है और वो भी नहीं आई । बताओ ! अच्छा चल जाने दे । इधर कुछ दिनों से दिल भारी हो रहा था । कई बातें मेरे दिल में उमड़-घुमड़ रही थीं, जो तुझे बताना चाहती हूं । तेरे सिवा मेरा ऐसा कोई नहीं, जिससे मन की बात करके मन हल्का कर सकूं ।

तू तो जानती है कि तेरे जीजा जी एक कवि हैं । कवि सम्मेलनों में खूब आया-जाया करते हैं । मंच से इतना प्यार है कि बेड पर चढ़ने से पहले उसे प्रणाम करते हैं । बताओ भी! ससुराल में आते ही यह किस सौतन से पाला पड़ गया । जिसको बताती हूं कि मेरे पति कवि हैं, वो ‘अरे वाह! ‘ कहकर खुश हो जाता है । मगर मुझसे पूछो, कवि की बीवी होने पर मुझ पर क्या बीत रही है । तेरे जीजा मुझे रात भर जगाते हैं। सारी रात सोने नहीं देते । अरे वो बात नहीं है पगली ! क्या है कि वह रात भर कविता लिखते रहते हैं और मुझे सुनाते रहते हैं। अभी चार लाइनें लिखी नहीं कि कहते हैं, सुनो, कैसी बन रही है कविता ! क्या कहती हो कविता ! अब मैं क्या कहूं ? तुम तो जानती हो सखी मेरी सोने की आदत ! दुनिया का कोई भी काम करा लो मुझसे, मगर रात को जागने को मत कहो। मुझसे रात को जगा नहीं जाता। रात भर नींद आती रहती है। जम्हाई पर जम्हाई लेती हूं। अब मैं नींद को भगाने के लिए लड़ूं कि इनकी कविता को समझूं !! , नींद के मारे समझ में कुछ नहीं आता, मगर वाह ! वाह ! कह देती हूं। पर इतने में मुझे मुक्ति नहीं मिलती। मेरा वाह ! वाह ! कहना, मेरे लिए आत्मघाती सिद्ध होता है। वे फिर दुगुने जोश से कविता लिखते और सुनाते हैं । कई रातों से मैं सोई नहीं। आंखें लाल हैं। जी में आता है कह दूं कि आप की कविता मुझे समझ में नहीं आती। कृपया मुझे सोने दें !। लेकिन अभी नई-नई शादी हुई है, ऐसे स्पष्ट रूप से कैसे कह दूं, उन्हें बुरा लगेगा। दिल टूट जाएगा। दिल टूटने के बाद कवि, शायर लोग और भयानक हो जाते हैं, ऐसा मैंने सुन रखा है। इस डर से भी उनसे सच कहने की हिम्मत नहीं कर पाती।

जानती हो सखी !! मुझे उस दिन बहुत खुशी होती है जिस दिन इनका कोई कवि सम्मेलन लगा होता है। मानदेय की वजह से नहीं पगली! उस रात को मैं सो सकती हूं। मगर फिर भी इस बात की कोई गांरटी नहीं कि मैं सो पाऊंगी या नहीं। कभी ये मध्यरात्रि को आ टपकते हैं, तो कभी भोर में दस्तक दे देते हैं। नींद में खलल पड़ती है। मगर यह सोचकर कि यह तो पति का पेशा है, मन को मना लेती हूं। दूसरा मानदेय के रूप में कुछ न कुछ ये ले आते हैं। वह कितना होता है ! यह मत पूछ। जैसा इनका मान होगा, उतना ही मिलता होगा ! शायद इसीलिए मानदेय कहते हैं इसे। और मैं भी सोचती हूं कि जब मानदेय लेकर आए हैं, तो मेरा भी फर्ज बनता है कि थोड़ा-बहुत मैं भी इनका मान रखूं। अरे हां, एक बात तो बताना भूल ही गई। इनको अगर कुछ दिन कवि सम्मेलन न मिले तो इनका गला बैठ जाता है! सोच…

जानती है सखी! अरे तू कैसे जानती होगी! तू तो मेरी शादी में आई ही नहीं थी । अभी भी रह-रह कर तेरी इस बात पर गुस्सा आता है मुझे,कह कर भी मेरी शादी में नहीं आई ! मिल तू मुझे,तुझे तो देख लूंगी! जानती है जब शादी में वरमाला की रस्म आई, तो एक बड़ी मजेदार घटना हुई। सुनेगी तो तुझे भी हंसी आएगी । मुझे जब भी अपनी शादी के उन पलों का आता है, तो बरबस यह घटना याद आ जाती है और स्वतः मेरे अधरों पर हंसी की घनघोर घटाए बरसने को आतुर हो जाती हैं। देखा मेरी अभिव्यक्ति का सामर्थ्य! अरे कुछ नहीं कवि की बीवी हूं न! इतना तो असर आएगा ही!

अच्छा सुन। मैंने तो इनके गले में माला पहना दी, मगर इन्होंने मेरे गले में माला नहीं डाली। यह अपने करकमलों में मला लिए खडे़ रहे । मुझे नजर और गर्दन झुकाए-झुकाए काफी देर हो गई, तब भी इन्होंने मेरे गले में माला नहीं डाली। सब सोचने लगे कि आखिर यह क्या शरारत है। मेरे अम्मा और बाबूजी बहुत चिंतित हो गए। कहीं दहेज का लफड़ा-वफड़ा तो नहीं ! पर जब इन्हें लगा कि स्थिति तनावपूर्ण और नियंत्रण से बाहर जा रही है, तो इन्होंने अपने मित्रों से कहा कि पहले जोरदार ताली बजा दो, जरा मूड बन जाए । जब सब ने जोरदार ताली बजाई, तब जाकर इन्होंने मेरे गले में माला डाली। इनकी इस हरकत की चर्चा हमारे गांव में आज भी होती है और मेरे सारे रिश्तेदार आज भी इस बात को जब-तब छेड़ कर मुझे छेड़ा करते हैं। कहते हैं कि कही सुहागरात को घूंघट उठाने से पहले भी तो ताली नहीं बजवाई थी इन्होंने। मैं शर्म से मर जाती हूं। बताओ भी !

तुझ से बताने को बहुत कुछ है, मगर कितना लिखूं। मेरी बातें जानकर तू भी बाकी लोगों की तरह मेरी हंसी उड़ाएगी । लेकिन तू ऐसा नहीं करेगी, तू तो मेरी सबसे अच्छी सहेली है। है न ! तुझ पर मुझे खुद से ज्यादा विश्वास है, तभी तो मैं तुझे पत्र लिख रही हूं।

मेरी अभी नई-नई शादी हुई, तो हम में ज्यादा बातें तो होती नहीं है। उनमें से सब तो नहीं,हां मगर कुछ बातें बताती हूं। ले ! अभी से तू शरमाने लगी ! जब मैं कहती हूं मेरी आंखों में देखो, तो यह कहते नहीं देखूंगा। जब मैं पूछती हूं क्यों नहीं! तब यह कहते है कि तुम्हारी आंखे झील हैं, मैं उनमें डूब जाऊंगा । जब मैं बाल खोलकर सुखाती हूं, तो ये आकर झट से मेरे बाल समेट देते हैं । मैं जब इसका कारण पूछती हूं, तो कहते है कि यह जुल्फे नहीं नागिन है, मुझे डस लेंगी। इसी तरह से जब कभी इनकी किसी बेवकूफी वाली बात पर मैं हंस देती हूं, तो जानती है क्या होता है! यह फौरन जाते हैं और काला चश्मा पहन कर आते हैं। कहते है कि जब तुम हंसती हो, तो दामिनी चमक जाती है। ये मेरे होठों को सूंघते हैं, कहते हैं तुम्हारे यह होठ नहीं गुलाब की पंखुड़ियां हैं। कुल मिलाकर सखी यह जान, जब मैं कहती हूं ईर घाट, तो यह कहते है पीर घाट। मैं कहती हूं ईसा,तो यह कहते हैं मूसा। मेरा दिल भरता है आह! और इनकी जुबा से निकलता है वाह! अब क्या-क्या बताऊं तुझे!

बाकी सब तो ठीक है। जिंदगी वीर रस की कविता की तरह चल रही है । एक-एक दिन प्रबंध काव्य सा लगता है। जिंदगी जैसे कोई महाग्रंथ बन गई हो । वैसे ये बहुत अच्छे हैं। मुझे इनसे कोई शिकायत नहीं। सारी शिकायत अपने भाग्य से है । काश! इनकी तरह कविता के कुछ संस्कार मुझे में भी होते, तो जिंदगी और मजे से चलती । मैं भी इन्हें अपनी कविता-अविता सुनाकर ठीक से, बराबरी का बदला ले सकती थी । फिलहाल अभी तो बस दाल में नमक तेज कर देती हूं । हंस मत ! सच्ची !

दिल में एक बात और है, सोचती हूं तुझे बताऊं कि न बताऊं ! देख तुझे मेरी कसम है, जो बात तुझे बताने जा रही हूं किसी से बताना नहीं। कसम है! जब यह रोमंटिक होते हैं, तो जानती है मेरे साथ क्या करते हैं ! उत्तेजित मत हो ! जब हमारे बीच कुछ रोमांटिक माहौल बनता है, तो ये सब कुछ छोड़-छाड़ कर छंदबद्ध कविता सुनाने लगते हैं। कहते है कि छंदबद्ध कविता तभी होती, जब कवि का मन अत्यंत भावुक होता है । कहते हैं छंदबद्ध कविता करना कोई बच्चों का खेल नहीं । अच्छे से अच्छा कवि गच्चा खा जाता है । ये मात्राएं गिनने लगते हैं और मैं एक-एक पल छिन । देखो न इस समय भी मुझ जैसी रंगबिरंगी, छैलछबीली को छोड़कर होली मिलन को गए हैं!

तुम ही कहो सखी अब मैं क्या कहूं!! कम लिखा है ज्यादा समझना…

तुम्हारी प्यारी सखी

कविता

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पढ़िए पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का दिल्ली की झोपड़ी से लेकर लखनऊ के शानदार बंगले तक पहुंचने का पूरा सफर…

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मायावती एक भारतीय महिला राजनीतिज्ञ हैं और देश के सबसे बड़े सूबे की पूर्व मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। वे बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया हैं। उन्हें भारत की सबसे युवा महिला मुख्यमंत्री के साथ-साथ सबसे प्रथम दलित मुख्यमंत्री होने का भी श्रेय प्राप्त है। वहीं अचरज की बात है कि आज भी दलितों की हालत ज्यों की त्यों बनीं हुई  है और उनके नाम पर राजनीति करने वाली मायावती के पास आज खरबों की संपत्ति है। चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं और हालांकि उन्होंने सत्ता के साथ-साथ आनेवाली कठिनाइओं का सामना भी किया है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक स्कूल शिक्षिका के रूप में की थी।

आज हम आपको बताएंगे कि पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का दिल्ली की झोपड़ी से लेकर लखनऊ के शानदार बंगले तक पहुंचने का सफर कैसा रहा-

कांशीराम की विचारधारा से प्रभावित राजनीति में रखा कदम

मायावती का असली नाम चन्द्रावती है और इसी नाम से उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई थी, लेकिन जब वे कांशीराम के संपर्क में आईं और सक्रिय राजनीति में भाग लेने लगीं तब कांशीराम ने उनका नाम मायावती रख दिया कांशी राम की विचारधारा और कर्मठता से प्रभावित होकर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। उनका राजनीतिक इतिहास काफी सफल रहा और 2003 में उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव हारने के बावजूद उन्होने सन् 2007 में फिर से सत्ता में वापसी की। अपने समर्थको में बहन जी के नाम से मशहूर मायावती 13 मई 2007 को चौथी बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनीं और पूरे पांच वर्ष शासन के पश्चात सन् 2012 का चुनाव अपनी प्रमुख प्रतिद्वंदी पार्टी से हार गयीं।

परिवार और प्रारंभिक जीवन 

मायावती उर्फ़ चंद्रावती देवी का जन्म 15 जनवरी 1956 को दिल्ली में हुआ था। उनकी माता का नाम रामरती और पिता का नाम प्रभु दयाल था। प्रभु दूरसंचार केंद्र में अफसर थें। मायावती के 6 भाई हैं। उन्होंने कालिंदी कॉलेज, दिल्ली, से कला में स्नातक की उपाधि ली और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय से एल.एल.बी और बी. एड भी किया। उनके पिता उन्हें कलेक्टर बनाना चाहते थें और इसके लिए उन्होंने अपना बहुत सारा वक़्त भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी में भी लगाया। इसी दौरान उन्होंने शिक्षिका के रूप में कार्य करना शुरु किया। मायावती के जीवन में कांशी राम के बढ़ते प्रभाव से उनके पिता बिल्कुल भी खुश नहीं थें। उन्होंने मायावती को कांशीराम के पद चिह्न पर न चलने की सलाह दी फिर भी मायावती ने अपने पिता की बात अनसुनी कर बड़े पैमाने पर कांशी राम द्वारा शुरू किये गए कार्यों और परियोजनाओं से जुड़ गयी।

बताते चलें कि उनका बचपन दिल्ली के इंद्रपुरी में बनी जेजे (झुग्गी-झोपड़ी) कॉलोनी में बीता था।

मायावती और उनके पिता के बीच वैचारिक मतभेद

मायावती हर हाल में अपने पिता को गलत साबित करना चाहती थीं कि लड़कियां कुछ नहीं कर सकती। उनमें आईएएस बनने की इच्छा बचपन से थी। यही कारण था कि उन्होंने अपने पिता से कहा कि 3 क्लास के एग्जाम एक साथ देने के बारे में स्कूल से पूछें। प्रभुदास ने अपनी बेटी के इरादे देखते हुए स्कूल में पूछा और जवाब हां में मिला। मायावती ने 9वीं, 10वीं और 11वीं के एग्जाम एक साथ दिए। इस तरह उन्होंने 3 साल का जंप लिया और 1972 में (16 साल की उम्र) 12वीं पास कर ली।

मायावती के आइडल थे उनके दादाजी मंगलसेन

दरअसल मायावती की मां रामरती ने लगातार 3 बेटियों को जन्म दिया था। बेटा न दे पाने की वजह से प्रभुदास अपनी पत्नी को ताने दिया करते थें। यही नहीं, पड़ोसियों और रिश्तेदारों के दबाव में आकर उन्होंने वारिस के लिए दूसरी शादी तक करने का मन बना लिया था। मायावती के दादाजी ने प्रभुदास को दूसरी शादी करने से रोका था। वो कहते थे- देखना ये बेटियां ही हमारा कुल आगे बढ़ाएंगी। यही वजह थी कि मायावती अपने पिता से नफरत और दादाजी से बेहद प्यार करती थीं।

राजनीतिक सफर

1977 में मायावती, कांशीराम के सम्पर्क में आयीं। वहीं से उन्होंने एक नेत्री बनने का निर्णय लिया। सन 1984 तक मायावती ने बतौर शिक्षिका काम किया। वे कांशी राम के कार्य और साहस से काफी प्रभावित थीं। 1984 में जब कांशी राम ने एक नए राजनीतिक दल ‘बहुजन समाज पार्टी’ का गठन किया तो मायावती शिक्षिका की नौकरी छोड़ कर पार्टी की पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता बन गयीं। उसी साल उन्होंने मुज्ज़फरनगर जिले की कैराना लोक सभा सीट से अपना पहला चुनाव अभियान आरंभ किया। सन 1985 और 1987 में भी उन्होने लोक सभा चुनाव में कड़ी मेहनत की। आख़िरकार सन 1989 में उनके दल ‘बहुजन समाज पार्टी’ ने 13 सीटो पर चुनाव जीता।

प्रथम भारतीय दलित महिला मुख्यमंत्री

धीरे-धीरे पार्टी की पैठ दलितों और पिछड़े वर्ग में बढ़ती गयी और सन 1995 में वे उत्तर प्रदेश की गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री बनायी गयीं। प्रथम भारतीय दलित महिला के रूप में उत्तर प्रदेश राज्य की मुख्यमंत्री के पद की शपथ ली। सन 2001 में पार्टी के संस्थापक कांशी राम ने मायावती को दल के अध्यक्ष के रूप में अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। 2002-2003 के दौरान भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार में मायावती फिर से मुख्यमंत्री चुनी गई। इस के पश्चात बीजेपी ने सरकार से अपना समर्थन वापिस ले लिया और मायावती सरकार गिर गयी। इसके बाद मुलायम सिंह यादव को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया।

मूर्तियों की देवी नाम से हुईं फेमस

सन 2007 के विधान सभा चुनाव के बाद मायावती फिर से सत्ता में लौट आई और भारत के सबसे बड़े राज्य की कमान संभाली। मायावती के शासनकाल के दौरान उत्तर प्रदेश के बाहर बसपा का विस्तार नहीं हो पाया क्योंकी उनके निरंकुश शासन के चलते ज्यादातर पिछड़े वर्ग के लोगों ने उनसे मुंह मोड़ लिया। मायावती ने अपने कार्यकाल के दौरान दलित और बौद्ध धर्म के सम्मान में कई स्मारक स्थापित किये। मायावती ने बौद्ध और कांशीराम के साथ साथ अपनी भी मूर्ती बनवाई जिसकेबाद उनके राजनीतिक विरोधियों ने उन्हें तानाशाह और मूर्तियों की देवी के नाम से संबोधित करने लगे ।

राजनीति में पहचान

मायावती अपने शाशनकाल में कई विवादों और घोटालों के आरोपों में जरूर रही हों पर उनका राजनितिक अभ्युदय सचमुच अध्भुत रहा है।एक सामान्य परिवार से आई दलित महिला ने ऐसा मक़ाम हासिल किया जैसा इस देश के इतिहास में कम ही महिलाओं ने किया है। विवादों की परवाह किए बिना, मायावती के समर्थको ने हर बार उनका साथ दिया औउर अपनी वफादारी साबित की है। मायावती ने दलितों के दिल में अपनी खुद की जगह बनाई है और दलितों में अपने प्रति विश्वास कायम किया है।

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उपमुख्यमंत्रियों की बढ़ायी गयी सुरक्षा, केंद्र सरकार की तरफ से आया आदेश

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उपमुख्यमंत्रियों को उपलब्ध कराई गयी सशस्त्र सुरक्षा

लखनऊ। लोकसभा चुनाव बेहद ही नजदीक हैं। ऐसे में चुनावी दांव-पेंच भी खूब बढ़ता नजर आ रहा है। राजनीतिक पार्टियां सत्ता हासिल करने के साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाने में लगी हैं।इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए यूपी के दोनों डिप्टी सीएम की सुरक्षा बढ़ा दी गयी है।

लोकसभा चुनाव में संभावित खतरे के मद्देनजर केंद्र सरकार की तरफ से उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा की सुरक्षा बढ़ा दी गयी है।जहां उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या को सशश्त्र कमांडो की सुरक्षा दी गयी है।वहीं उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा को वाई प्लस कवर में एके-47 राइफल से लैस कमांडो उपलब्ध कराए गए हैं।

यह भी पढ़ें- सपा के दोबारा जारी स्टार प्रचारकों की लिस्ट में मिली मुलायम सिंह को जगह, जानिए क्या है वजह  

बताते चलें कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भी सात चरणों में वोटिंग होगी। पहले चरण की वोटिंग 11 अप्रैल को, दूसरे चरण के लिए 18 अप्रैल, तीसरे चरण के लिए 23 अप्रैल, चौथे चरण के लिए 29 अप्रैल, पांचवें चरण के लिए 6 मई, छठे चरण के लिए 12 मई और सातवें चरण के लिए वोटिंग 19 मई को होगी। नतीजे 23 मई को आएंगे।http://www.satyodaya.com

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