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फाइट द वाइट अभियान- स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने डेंगू से बचाव की दी जानकारी

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लखनऊ। सीएमओ के निर्देश पर फाइट द वाइट अभियान के तहत नगरीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सिल्वर जुबली, इंदिरानगर, अलीगंज, चंदननगर एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र चिनहट और मलिहाबाद लखनऊ में आशा एवं एएनएम की टीमों के माध्यम से 8900 घरों में जाकर लोगों को डेंगू रोग से बचाव एवं रोकथाम का पंपलेट बांटा और स्वास्थ संबन्धि जानकारी भी दी।

वृंदावन योजना समेत आठ को नोटिस

स्वास्थ्य टीम ने लखनऊ के वृंदावन योजना समेत विभिन्न इलाकों में मच्छर जनित स्थितियां मिलने पर आठ लोगों को नोटिस दिया है। इसके साथ ही 10 स्कूलों में डेंगू रोग के बचाव एवं रोकथाम के संबंध में जानकारी भी दी है। सीएमओ प्रवक्ता योगेश रघुवंशी ने बताया कि फाइंट द वाइट अभियान के अंतर्गत स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने राजधानी के 1,897 घरों तथा विभिन्न स्थानों पर मच्छर जनित स्थितियों का सर्वेक्षण किया। जिनमें वृंदावन योजना समेत 8 घर व स्थानों पर मच्छर जनित स्थितियां पाए जाने पर संबंधितों को नोटिस जारी की गई है। सीएमओ प्रवक्ता के मुताबिक इनमें वृंदावन योजना के अलावा प्रमुख रूप से इंदिरा नगर सी ब्लॉक, एलडीए कॉलोनी कानपुर रोड व शारदा नगर शामिल है।

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19 डेंगू मरीज मिले

राजधानी में डेंगू का कहर पहले से और तेज हो गया है। विभिन्न इलाकों से 19 डेंगू मरीज मिले हैं। डेंगू प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने सोर्स रिडक्शन तथा स्वास्थ्य संबन्धि शिक्षा दी। इसके साथ ही फाॅगिंग एवं सफाई के लिए नगर निगम को निर्देश भी दिया है। सीएमओ प्रवक्ता के मुताबिक ये डेंगू मरीज शहर के चिनहट, मुलायमनगर, जानकीपुरम विस्तार, शारदा नगर, तेलीबाग, रजनीखंड, कैलाशपुरी, संजय गांधी पुरम, एलडीए कॉलोनी कानपुर रोड, नीलमथा, काकोरी, राजाजीपुरम, हुसैनाबाद, त्रिवेणी नगर, कैसरबाग, वजीरगंज, ठाकुरगंज, आलमबाग में पाए गए हैं।http://www.satyodaya.com

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क्या होता है 3 स्टेज का लंग कैंसर और ये क्यों होता है? जानिए जरुरी बातें

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नई दिल्ली। कैंसर दुनिया की सबसे खतरनाक और जानलेवा बिमारियों में से एक है और इस खतरनाक बीमारी से बॉलीवुड के खलनायक संजय दत्त जूझ रहे है। कैंसर होने के मुख्य कारण क्या होते हैं? इसको लेकर आज भी कई शोध हो रहे हैं। आज तक कैंसर होने का कोई मजबूत कारण नहीं पता चला है। कैंसर जैसी भयावह बीमारी भी कई तरह की होती हैं। इन्हीं में से एक है फेफड़ों का कैंसर होता है। फेफड़ों का कैंसर आनुवंशिक कारणों से भी होता है। लेकिन इस बात को निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है। लंग कैंसर यानी फेफड़ों का कैंसर अधिकतर धूम्रपान करने वाले या गुटखा या ड्रग्स लेने वालों में होता है। आइए जानते हैं कि लंग्स कैंसर कैसे होता है और इसकी कितनी स्टेज होती है।

ऐसे होती है कैंसर की शुरुआत
शरीर की बनावट कुछ ऐसी होती है कि इसमें लगातार कोशिकाओं का निर्माण होने और नष्ट होने की प्रक्रिया चलती रहती है। नई कोशिकाएं पुरानी कोशिकाओं की जगह आ जाती हैं। शरीर में हर दिन करीब 40 हजार कोशिकाओं की मृत्यु हो जाती है। जिस अनुपात में कोशिकाएं नष्ट होती हैं, उसी अनुपात में नई कोशिकाएं निर्मित होती हैं। इसी प्रक्रिया के बीच कई अलग-अलग कारणों से कोई एक कोशिका लगातार बढ़ती चली जाती है। शरीर उस कोशिका की अव्यवस्थित वृद्धि को रोक नहीं पाता है। इसी वजह से यह कोशिका बढ़ते-बढ़ते भविष्य में कैंसर का रूप ले लेती है।

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लंग कैंसर की थ्री स्टेज क्या होता है
किसी भी तरह के कैंसर में स्टेज-3 की अवस्था वह अवस्था होती है। जब कैंसर मरीज के शरीर के दूसरे अंगों को भी अपनी चपेट में लेने लगता है। कैंसर के अलग-अलग प्रकारों की बात करें तो स्टेज-3 से आशय यह है कि कैंसर उनके शरीर के किसी एक भाग में विकसित होकर शरीर के दूसरे अंगों तक फैलने लगता है। इसका मतलब है कि लंग कैंसर फेफड़ों में विकसित होता है और तीसरी स्टेज तक फेफड़ों में ही फैलता रहता है। बता दें लंग कैंसर में चौथी स्टेज सबसे अधिक खतरनाक और जानलेवा मानी जाती है।

जो लोग इस स्थिति में पहुंच जाते हैं। उनके जीवन पर मौत का खतरा मंडराने लगता है। लेकिन यदि इस स्थिति में पहुंचने से पहले ही लंग कैंसर को नियंत्रित कर लिया जाए तो इस रोग को हराने की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। स्टेज-थ्री में रहते हुए लंग कैंसर लिंफ नोड और लंग्स के पीछे की तरफ ही फैलता है। जबकि इसके बाद यह दूसरे अंगों में फैलने लगता है तो यह इसकी अंतिम स्टेज होती है और इसे स्टेज-4 कहा जाता है।

ये रखें सावधानी
लंग कैंसर से पीड़ित मरीज को धूम्रपान या शराब आदि का सेवन बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से समस्या ज्यादा बढ़ सकती है। इसके अलावा डॉक्टर या योगाचार्य की सलाह पर प्राणायाम भी जरूर करना चाहिए। शुरुआती अवस्था में हल्की सांसों के साथ प्राणायम का अभ्यास करना चाहिए।

अस्वीकरण: इस लेख में दी गयी जानकारी कुछ खास स्वास्थ्य स्थितियों और उनके संभावित उपचार के संबंध में शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। यह किसी योग्य और लाइसेंस प्राप्त चिकित्सक द्वारा दी जाने वाली स्वास्थ्य सेवा, जांच, निदान और इलाज का विकल्प नहीं है। यदि आप, आपका बच्चा या कोई करीबी ऐसी किसी स्वास्थ्य समस्या का सामना कर रहा है, जिसके बारे में यहां बताया गया है तो जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क करें। यहां पर दी गयी जानकारी का उपयोग किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या या बीमारी के निदान या उपचार के लिए बिना विशेषज्ञ की सलाह के ना करें। यदि आप ऐसा करते हैं तो ऐसी स्थिति में आपको होने वाले किसी भी तरह से संभावित नुकसान के लिए आप स्वयं जिम्मेदार होंगे।http://satyodaya.com

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ईयरफोन का ज्यादा इस्तेमाल है कई बीमारियों की जड़, बरतें ये सावधानियां

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नई दिल्ली। आज कल युवाओं में ईयरफोन का चलन ज्‍यादा बढ़ने लगा है। फिर चाहें सड़क पर चलते युवा हों या किसी बस, मेट्रो ट्रेन में बैठे लोग, उनके कानों में ईयरफोन लगा जरूर दिख जाएगा। मगर क्या आप जानते हैं? कि ईयरफोन लगाना और तेज आवाज में गाना सुनना आपके कानों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। ईयरफोन का ज्‍यादा इस्‍तेमाल करने से कानों में दर्द और सुनने में परेशानी जैसी समस्‍या हो सकती है। कई घंटों तक हेडफोन और ईयरफोन का इस्तेमाल करने से न सिर्फ कानों को नुकसान पहुंच सकता है, बल्कि इससे मस्तिष्क पर भी नकारात्मक असर पड़ता सकता है। इसकी वजह यह है कि ईयरफोन से निकलने वाली चुंबकीय तरंगे मस्तिष्क की कोशिकाओं पर बुरा असर डालती हैं। इसीलिए ईयरफोन का इस्तेमाल करने से सिर में दर्द, नींद न आने की समस्‍या, कानों में दर्द और गर्दन के किसी हिस्से में दर्द जैसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। ईयरफोन में आने वाली सूक्ष्म ध्वनि भी स्‍पष्‍ट और तेज सुनाई देती है। अगर आप इसका इस्‍तेमाल करना ही चाहते हैं। तो इसे कम से कम आवाज पर रखें। बता दें ईयरफोन का इस्‍तेमाल करने वालों को इससे जुड़े इन प्रभावों की जानकारी जरूर होनी चाहिए। साथ ही आप इससे बचाव के कुछ तरीके अपना कर भी खुद को इसके दुष्‍प्रभाव से बचा सकते हैं।

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साफ-सफाई का रखें ध्‍यान
आप ईयरफोन चाहे जिस तरह का इस्तेमाल कर रहे होते हैं। फिर भी उस पर बैक्टीरिया पनपने का खतरा बना रहता है। जब आप अपने कान में इसे लगाते हैं, तो इन बैक्‍टीरिया की वजह से कान में संक्रमण होने की आशंका भी बढ़ जाती है। ऐसे में अपने ईयरफोन की साफ-सफाई का पूरा ध्‍यान रखें।

ईयरफोन कभी शेयर न करें
कई बार दोस्‍तों में ईयरफोन को भी शेयर कर लिया जाता है। मगर आपको इससे बचना चाहिए। क्‍योंकि इससे किसी अन्‍य का संक्रमण आपके कानों तक पहुंच कर आपको भी नुकसान पहुंचा सकता है।

कानों से कम सुनाई देना
आप अगर ईयरफोन का ज्‍यादा इस्तेमाल करते हैं, तो इससे आपके कानों की सुनने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। सामान्य तौर पर कानों की सुनने की क्षमता 90 डेसिबल होती है, जो लगातार सुनने से धीरे-धीरे 40 से 50 डेसिबल तक कम हो जाती है। वहीं कुछ मामलों में यह बहरेपन का कारण भी बन सकता है।

ईयरफोन ज्‍यादा देर न करें इस्‍तेमाल
अगर आप संगीत सुनने का शौक रखते हैं। और रोजाना संगीत सुनने के लिए ईयरफोन का इस्‍तेमाल करते हैं। तो 2 घंटे से अधि‍क समय तक अपने कानों में ईयरफोन न लगाएं। बीच-बीच में कानों को आराम दें। वरना लगातार ईयरफोन लगाने की वजह से आपके कानों को क्षति पहुंच सकती है।

बचाव का तरीका
अगर आप सड़क पर चल रहे हैं या वाहन चला रहे हैं। तो ईयरफोन का इस्‍तेमाल बिल्कुल न करें। इससे आप और अन्‍य लोग भी प्रभावित हो सकते हैं। साथ ही दुर्घटना होने का खतरा बढ़ जाता है।और आपको अगर अपने काम की वजह से लगातार कई घंटों तक ईयरफोन का इस्तेमाल करना पड़ता है, तो एक घंटे के दौरान कई बार 5-10 मिनट का ब्रेक जरूर लें। इससे कानों को आराम मिलेगा।
बता दें ईयर फोन लगाने से मल्टीपल फ्रिक्वैंसेस की टोन कान के पर्दे से टकराती है और टकराने के बाद वापस भी आ जाती हैं। ऐसे में कई सारी आवाजें कान के अंदर घूमती रहती हैं। इससे कानों की नसें कमजोर हो सकती हैं।http://satyodaya.com

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कोरोना वायरस

बॉडी की इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए काढ़ा है फायदेमंद, तो कुछ है इसके भी साइड-इफेक्ट

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नई दिल्ली। वैश्विक महामारी कोरोना वायरस से बचाव के लिए हेल्थ एक्सपर्ट लोगों को इम्यूनिटी स्ट्रांग करने की सलाह दे रहे हैं। इम्यूनिटी को स्ट्रांग करने के लिए लोगों ने अपनी दिनचर्या में काफी बदलाव भी किया है। वही काढ़ा पीना उन्हीं बदलावों में से एक है। कुछ लोगों ने अपने वर्तमान में रेगुलर बेसिस पर काढ़े को अपनी डायट में भी शामिल कर लिया है। हेल्थ एक्सपर्ट का मानना है कि काढ़ा इम्यूनिटी को बूस्ट कर फ्लू या इंफेक्शन से लड़ने वाली टी-सेल्स जेनरेट करता है। काढ़ा शरीर के लिए जितना फायदेमंद माना जाता है। उतने ही इसके नुकसान भी हो सकते हैं। इसलिए सेहत का ख्याल रखते हुए काढ़ा पीते वक्त कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत जरुरी है।
डॉक्टर्स का कहना है कि काढ़ा पीने वाले अगर कुछ खास बातों पर ध्यान ना दें तो ये आपकी सेहत खराब भी कर सकता है इसीलिए काढ़ा पीने वालों को अपनी उम्र, सेहत और मौसम को ध्यान में रखते हुए इसका सेवन करना चाहिए।

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जिन लोगों का पाचन कमजोर होता है। उन्हें रेगुलर बेसिस पर काढ़ा पीने से मुंह में छाले, यूरिन में परेशानी, गैस, पेट में जलन जैसी समस्या हो सकती है। इसलिए पहले अपने स्वास्थ्य को ध्यान में रखें। तभी किसी भी प्रकार के काढ़े का सेवन करें।
काढ़ा बनाने के लिए लोग गिलोय, दालचीनी, अश्वगंधा, सोंठ का इस्तेमाल करते हैं। जो कि ये सब काफी गर्म होते हैं। अगर नियमित रूप से इन गर्म चीजों का सेवन किया जाए तो पेट में एसिडिटी और नाक से खून आने की समस्या हो सकती है। आपको इनमे से किसी भी तरह की स्वास्थ्य समस्या है। तो इन पदार्थों की मात्रा काढ़े में कम रखें।
बता दें जहां एक तरफ कोरोना वायरस है। तो वहीं दूसरी तरफ बदलते मौसम की वजह से सर्दी, खांसी, जुकाम जैसी बीमारियां लोगों के लिए एक नई समस्या बन गई हैं। सर्दी या जुकाम से परेशान लोगों के लिए काढ़ा बड़ा फायदेमंद माना जाता है। हालांकि कुछ लोगों को इसमें बड़ी सतर्कता बरतनी चाहिए। खासतौर से उन लोगों को जिन्हें पित्त की शिकायत है। इन लोगों को काढ़े में काली मिर्च, सोंठ और दालचीनी का इस्तेमाल करते वक्त सावधानी बरतनी चाहिए। यदि आप काढ़े का रेगुलर इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। तो उसे कम मात्रा में लेना ही सही होगा। काढ़ा बनाते वक्त बर्तन में सिर्फ 100 मिलीलीटर पानी डालें। फिर जरूरी चीजों को मिलाने के बाद उसे तब तक उबालें जब तक काढ़ा 50 मिलीलीटर यानी आधा ना हो जाए। उसके बाद ही इसका सेवन करें।://satyodaya.com

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