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क्या आप जानते हैं:- शिवलिंग पर चढ़ाने के लिए ही नहीं बल्कि इन रोगों से छुटकारा पाने के लिए भी लाभदायक है ‘बेलपत्र’

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आज शिवरात्री के पावन अवसर पर शिवजी को अर्पित किए जाने वाले बेलपत्र से शिव जी अपने भक्तों से बहुत ही प्रसन्न हो जाते हैं । मान्यता के अनुसार बेलपत्र के बिना शिव की पूजा अधूरी मानी जाती है इसलिए शिव जी की पूजा करते समय भक्त शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ा कर पूजा अर्चना करते हैं । बेलपत्र का उपयोग सिर्फ शिवलिंग की पूजा करने के लिये नहीं किया जाता है बल्कि हमारे स्वास्थ्य के लिए भी यह बहुत ही फायदेमंद है क्योंकि ये एक बहुत अच्छी औषधि के रूप में भी साबित होता है ।

आइए जानते हैं बेलपत्र के फायदों को :-

  1. यदि किसी व्यक्ति को बुखार हो जाए तो उसके उपचार के लिए बेल की पत्तियों का काढ़ा बना कर पीने से बुखार से तुरंत आराम मिल जाता है ।
  2. मधुमक्खी, बर्र और ततैया के काटने पर बेलपत्र का रस लगाने से काटे गए स्थान पर जलन कम हो जाती है ।
  3. हृदय रोगियों के लिए भी बेलपत्र का प्रयोग बहुत ही लाभदायक होता है। हृदय मजबूती के लिए बेलपत्र का काढ़ा बना कर पीना फायदेमंद होता है और इससे हार्ट अटैक का खतरा औसतन कम हो जाता है। श्वास रोगियों के लिए भी यह काफी लाभप्रद है ।
  4. यदि किसी को बवासीर नामक बीमारी हो गई तो बेल की जड़ का गूदा पीसकर बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर उसका चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को सुबह शाम ठंडे पानी के साथ लेने से बहुत जल्दी आराम मिलता है ।
  5.  बेल की पत्तियों को मुंह में रखकर चबाने से शरीर में बढ़ी गर्मी और मुंह में गर्मी से हुए छालों से मुक्ति मिल जाती है ।
  6. बरसात में अक्सर लोगो को सर्दी, जुकाम और बुखार की शिकायत रहती है, ऐसे में बेलपत्र के रस में शहद मिलाकर पीने से बहुत जल्दी आराम मिलता है । वहीं विषम बुखार होने पर इसके पेस्ट की गोलियां गुड़ के साथ खाई जाती हैं।
  7.  यदि पेट या आंतों में कीड़े हों या फिर बच्चों में दस्त आने की समस्या हो, इसको दूर करने के लिए बेल के रस का सेवन करना लाभप्रद साबित होगा ।
  8. बेलपत्र के फायदे में एक फ़ायदा ये भी है कि इसमें एंटी वायरल ओर एंटी फंगल गुण शरीर में कई संकर्मण के इलाज़ में सहायता करते   है । http://www.satyodaya.com
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आसपास की कुछ चीजों से हो जाएं सावधान, जो कैंसर के खतरे को बढ़ावा देने में करती है मदद

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कैंसर एक बहुत गंभीर बीमारी है। शुरुवाती दौर में कैंसर के लक्षण आमतौर पर नज़र नहीं आते है , लेकिन व्यक्ति के आस-पास मौजूद कई हानिकारक चीजें अंजाने में शरीर में कैंसर का खतरा बढ़ा सकती है। जिससे व्यक्ति बिलकुल अंजान रहता है । बीते एक दशक में लोगों की जीवनशैली और खानपान बहुत कुछ बदल गया है।  दुनियाभर में हर साल करोड़ों लोगों की मौत कैंसर के कारण होती है । शोधकर्ताओं की रिपोर्ट्स के अनुसार अब तक 200 से भी ज्यादा प्रकार के कैंसर खोजे जा चुके हैं। आइए जानते है कि कैंसर के खतरे को बढ़ावा देने वाली कौन सी चीजें आपके आसपास मौजूद हैं।

डीजल के धुएं से कैंसर का खतरा :

व्यस्त रोड के आसपास के घरों में रहने वाले लोगों और सड़क पर डीजल का धुंआ झेलने वाले लोगों में कैंसर की संभावना सबसे अधिक होती है। दरअसल डीजल के जलने से कार्सिनोजेन्‍स पैदा होते हैं। डीजल की फैक्‍ट्री और डीजल की गाड़ियों से निकलने वाला धुआं फेफड़ों के कैंसर का मुख्य कारण होता है। निकलने वाला धुआं फेफड़ो के कैंसरका मुख्य कारण होता है यह धुआं ट्रकों, ट्रेन के इंजनों ,कार, बस, जेनेरेटर आदि से निकलता है।

शहरों के प्रदूषण से कैंसर का खतरा :

शहरों में प्रदूषण का स्तर दिन प्रतिदिन बढता ही जा रहा है । वातावरण में गाड़ियो से निकलने वाला धुआं, जहरीली गैंसें, फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुंआ और जहरीले धातु कैंसर के खतरे को बढ़ावा देते है । आमतौर पर जो लोग प्रदूषित शहरों में या फिर फैक्‍ट्रियों के आस-पास रहते हैं, उनमें सिलिकॉन और अभ्रक जैसे हानिकारक तत्वों के कारण कैंसर की संभावना बढ़ जाती है । ऐसे लोगों को फेफड़ों का कैंसर, ब्लड कैंसर, गले और मुंह का कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर होने की संभावना ज्यादा होती है।

सिगरेट से निकलने वाले धुएं से भी कैंसर का खतरा :

जो व्यक्ति सिगरेट पीते है, उनको कैंसर का खतरा होता है| लेकिन जो व्यक्ति सिगरेट नहीं पीते है, पर उसका धुआं झेलते है तो उनको भी कैंसर का खतरा उतना ही होता है जितना की सिगरेट पीने वाले व्यक्ति को होता है | सिगरेट में निकोटीन के अलावा 4000 दूसरे खतरनाक केमिकल्स होते हैं, इसमें से लगभग 60 कार्सिनोजेन्‍स होते हैं। जिससे कैंसर का खतरा बहुत अधिक मात्रा में बढ़ जाता है |

यह भी पढ़े :  ग्लूकोमा वीक: समय रहते पहचान लिए लक्षण तो बच सकती है आंखों की रोशनी…

रेडिएशन के कारण :

आजकल कई रोगों के इलाज के लिए रेडिएशन का प्रयोग किया जाता है। इनमें मैमोग्राम, एक्स-रे, सीटी स्कैन आदि शामिल हैं। हालांकि ये सभी जांचे सुरक्षित मानी जाती हैं, पर यदि व्यक्ति के शरीर में कोई रोग पहले से है तो, रेडिएशन के कारण उस रोग को बढ़ावा मिल सकता है ।

प्रोसेस्ड फूड्स के सेवन से कैंसर का खतरा :

पैकेटबंद आहार,  ज्यादा चीनी-नमक वाले आहार, कोल्ड ड्रिंक्स ,रेड मीट ज्यादा फैट वाले आहार और केमिकलयुक्त आहारों के सेवन से भी कैंसर का खतरा होता है। शोध के मुताबिक बहुत ज्यादा प्रोसेस किए गए आहारों में कैंसर खतरा 10 % तक बढ़ जाता है ।

मेकअप के सामान और ब्यूटी प्रोडक्ट्स से भी कैंसर का खतरा :

मेकअप के सामान, टूथपेस्ट, डिओ, परफ्यूम, बालों के जेल, क्रीम, लोशन आदि कई चीजें ऐसी है जो कि शरीर में कैंसर पैदा कर सकती हैं। दरअसल रोजमर्रा के जिन प्रोडक्ट्स में सोडियम लॉरेल सल्फ़ेट होता है, उनसे कैंसर का खतरा होता है। इसके अलावा मरकरी (पारा) भी खतरनाक तत्व है, जो लिपिस्टिक में होता है।

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ग्लूकोमा वीक: समय रहते पहचान लिए लक्षण तो बच सकती है आंखों की रोशनी…

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ग्लुकोमा के लक्षण से हो जाएं सावधान

इस साल 2019 में 10 मार्च से 16 मार्च तक वर्ल्ड ग्लूकोमा वीक मनाया जा रहा है । ताकि लोगों को ग्लूकोमा के बारे में ज्यादा से ज्यादा जागरूक किया जा सके । ग्लूकोमा को “काला मोतियाबिंद” भी कहा जाता है। 40 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में ग्लूकोमा का खतरा सबसे अधिक मात्रा में होता है। ग्लूकोमा एक प्रकार की आंखों की खतरनाक बीमारी है, जिससे व्यक्ति की आंखों की रोशनी भी जा सकती है ।

ग्लूकोमा, ऑप्टिक तंत्रिका में क्षति होने की वजह से व्यक्ति की आंखों की रोशनी पर प्रभाव पड़ता है। ऑप्टिक वो तंत्रिकाएं हैं, जो आंखों द्वारा एकत्र की गई सूचनाओं को दिमाग तक पहुंचाती है । जिस कारण से हम चीजों को देख पाते है । ग्लूकोमा सम्बंधित आंखों को क्षति तब पहुंच सकती है जब द्रव्य का दबाव सामान्य होता है ।

ग्लूकोमा के शुरुआती लक्षण :

यदि आपको ग्लूकोमा का खतरा महसूस हो या फिर आंख से सम्बंधित कोई समस्या लगे तो तुरंत डॉक्टर्स से जाचं करवा लेनी चाहिए । ग्लूकोमा के शुरुवाती लक्षण ज्यादा दिखाई नहीं देते है , इसलिए लोग इस पर कम ध्यान देते है । आइये जानते है ग्लूकोमा के शुरुवाती लक्षण :

1. सर में बार-बार दर्द होना, या सर दर्द का बने रहना, जी मिचलाना और उल्टी की समस्या।

2. आंखो के चश्मे का नंबर बहुत जल्दी बदल जाना।

3. अंधेरे कमरे (जैसे सिनेमा हॉल) में आंखों का एडजस्ट न हो पाना । आंखें सामान्य होने पर अंधेरे कमरे में कुछ समय रहने के बाद आंखें सेट हो जाती हैं, जबकि ग्लूकोमा के मरीजों की आंखें सेट होने में काफी दिक्कत होती है ।

4. आंखो में काफी तेज दर्द महसूस होना और कई बार चेहरे के हिस्से में भी दर्द होना।

5. सफेद रोशिनी के आसपास इंद्रधनुष जैसे रंग दिखाई देना आदि ।

ग्लूकोमा का इलाज :

ग्लूकोमा का जड़ से खात्मा केवल सर्जरी के माध्यम से किया जा सकता है। स्टेलैरिस-माइक्रो इनसीजन कैटरैक्ट नामक सर्जरी (एस- एमआईसीएस) पूरी तरह से सुरक्षित है। सर्जरी करवाए बिना ग्लूकोमा से छुटकारा नहीं पाया जा सकता है। ग्लूकोमा की सर्जरी अब काफी आसान व दर्दरहित हो गई है। सर्जरी के बाद मरीज की आंखों की रोशनी में बहुत तेजी से सुधार होता है। इस सर्जरी के तुरंत बाद लोग सामान्य कामकाज कर सकते हैं। इस सर्जरी में व्यक्ति की आंखों में एक चीरा लगाया जाता है ,जो कुछ दिन बाद अपने आप ठीक हो जाता है। इसमें दर्द की कोई गुंजाइश नहीं रहती है। इस सर्जरी का कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होता है और मरीज को नेत्रहीन होने से बचाया जा सकता है। http://www.satyodaya.com

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आइये जानते हैं:- पीएम मोदी ने किया था जिस ‘डिस्लेक्सिया’ शब्द का इस्तेमाल, क्या है यह बीमारी, इसके लक्षण और उपाय

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स्मार्ट इंडिया हैकेथॉन 2019 ‘ में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए एक कार्यक्रम के दौरान एक छात्रा ने डिस्लेक्सिया पीड़ितों की समस्याओं पर हो रही चर्चा में पीएम मोदी से एक सवाल पूछ लिया कि डिस्लेक्सिया से पीड़ित ऐसे बच्चे होते हैं जिनकी लर्निंग और राइटिंग काफी कमजोर होती है, लेकिन उनकी बुद्धिमता और क्रियेटिविटी काफी तेज होती है। इस पर मोदी ने तुरंत जवाब दिया कि क्या 40-50 साल के बच्चों के लिए भी यह योजना काम आएगी! तब तो ऐसे बच्चों की मां बहुत खुश हो जाएगी। इस बात पर मोदी और सभी बच्चों खूब हंसे । जानकारी के लिए बता दें कि यहां पीएम मोदी का इशारा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और सोनिया गांधी की तरफ था । इस व्यंग्य को लेकर कांग्रेस मोदी पर हलमावर हो गई है ।

आइये जानते है डिस्लेक्सिया बीमारी के बारे में :

फिल्म ‘तारे जमीन पर’ तो हम सभी ने कई बार देखी होगी । इस फिल्म में मुख्य किरदार निभाने वाला ईशान डिस्लेक्सिया बीमारी से पीड़ित होता है, लेकिन इस बीमारी के बारे में उसके घरवाले पहचान नहीं कर पाते। फिल्म में ईशान के पेरेंट्स ये सोचते है कि आख़िर ईशान ऐसी हरकते क्यों करता है? क्या उसका पढाई में मन नही लगता है? आखिर ईशान को हुआ क्या है ? लेकिन इसमें दोष न ही ईशान के माता पिता का होता है और न ही ईशान का क्योंकि इस बीमारी के बारे में सभी को जानकारी नहीं होती है ।

डिस्लेक्सिया बीमारी आखिर है क्या ?

डिस्लेक्सिया मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति का एक प्रकार है। इसमें बच्चे की बोलने लिखने की क्षमता प्रभावित होती है । हर पांच में से एक बच्चे में आप को डिस्लेक्सिया के कुछ लक्षण देखने को मिल सकते हैं। यह एक ऐसी समस्या है जहां व्यक्ति को रोजमर्रा के कार्यो के लिए काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है । इसमें बच्चा एक जैसे सुनने वाले या दिखने वाले अक्षरों, रंगों और मूल चीजों को समझने में अंतर करने में परेशानी महसूस करता है। उदहारण के लिए 6 और 9 में या 21 और 12 में। इनकी हैंडराइटिंग ख़राब होती है, कई बार शब्दों में अक्षरों का क्रम सही नहीं होता है, ध्वनि में अंतर नहीं कर पाते हैं । दिशा सम्बंधित भ्रम जैसे की ‘दाएं को बाएं समझना और बाएं को दाएं समझना आदि कई विशेषज्ञ इसे एक आनुवांशिक बीमारी भी मानते हैं।
अल्बर्ट आइंस्टीन से तो सभी लोग परिचित है । बचपन में वो भी डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चे थे । लेकिन किसी को भी ये नहीं पता था कि वे बड़े हो कर विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक बनेंगे ,और एक और पूरी दुनिया उनके नाम के उदारण देगी ।

डिस्लेक्सिया बीमारी के लक्षण :

डिस्लेक्सिया बीमारी में बच्चा देर से बोलना शुरू करता है, नए शब्दों को धीमे धीमे सीखना, नर्सरी की कविताओं को कठिनाई से सीख पाना, कविताओं वाले खेल खेलने में दिक्कत आना, ऊँची आवाज़ में पढ़ने में कठिनाई , किसी भी चीज को याद रखने में समस्या, कहानी को संक्षिप्त करने में समस्या, उम्र के हिसाब से कम पढ़ पाना, निर्देशों को समझने में कठिनाई, अक्षरों व शब्दों के अंतर को समझने में कठिनाई, विदेशी भाषा सीखने की समस्या, नंबरों को जोड़ने और घटाने में समस्या आदि । ये सभी लक्षण किसी बच्चे में दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए ।

डिस्लेक्सिया में क्या करना चाहिए :

डिस्लेक्सिया से प्रभावित बच्चों को पढने लिखने में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, इसके समाधान के लिए ये नहीं है कि बच्चों को पढाई में ज्यादा मेहनत और ध्यान देने के लिए जोर दें बल्कि बच्चों को पढ़ने के तरीकों में बदलाव लाने की आवश्कता होगी ।
यदि बच्चा पढ़ी हुई चीजें भूल जाये तो दूसरे बच्चों से तुलना किये और बिना डांटे उनको हिंट के द्वारा उत्तर बताये , जिससे उनका मनोबल बना रहेगा । इसमें बच्चे के लिए बातों को भूल जाना बहुत स्वाभाविक है ।आप का बच्चा सामान्य बच्चों से भिन्न है तो उसकी गलतियौं को नजरंदाज करना होगा ताकि वो अपने आप में विश्वास ना खोये और आत्मविश्वासी बने । ज्यादा मेहनत कराने से बच्चे में शायद ही कोई सुधर हो। इससे बच्चा पढाई से दूर भागने लगेगा और हताश भी हो जायेगा इससे नुकसान ज्यादा और फायेदा कम होगा इसलिए बच्चे से उतनी ही मेहनत करवाए जितनी की वो कर सकता है और ज्यादा से ज्यादा बच्चे को समझने की कोशिश करे । http://www.satyodaya.com

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