Connect with us

ख़ैरियत

अच्छी सेहत पाना चाहते हैं पर इसके लिए कई बातों पर ध्यान देना जरुरी

Published

on

clickretina digital marketing company
clickretina digital marketing company

नई दिल्ली । सभी लोग अच्छी सेहत पाना चाहते हैं पर इसके लिए कई बातों पर ध्यान देना जरुरी होता है। इसके लिए हमें दिनचर्या और खान-पान पर भी ध्यान देना होता है। व्यायाम और पौष्टिक आहार के साथ ही समय पर खाना भी अहम होता है। नाश्ते से लेकर दिन और रात का खाना एक तय समय पर होना चाहिये। शाम में 7 बजे से पहले अपना रात का खाना खा लेने का प्रयास करें। अगर आप ऐसा करते हैं तो आपको स्वयं फर्क देखने को मिलेगा। जैसे नींद सही आना, वज़न कम होना, अगले दिन के लिए उर्जा बनी रहना आदि। वज़न कम करने के लिए शाम में 7 बजे से पहले खाना खा लें और ध्यान रखें कि कोई भारी चीज़ का सेवन न करें।

एक्सट्रा कैलोरीज़ लेना आपकी सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है। शाम में जल्दी खाना खाने से आपको सोते समय जो सीने में या पेट में जलन महसूस नहीं होगी। अगले दिन एनर्जिटिक फील करने के लिए शाम में जल्दी डिनर करने का आइडिया काफी अच्छा है। पेट में हल्कापन महसूस करना हो तो शाम में खाना जल्दी खा लें। पूरे दिन की भाग-दौड़ के बाद जब व्यक्ति थक जाता है तो उसे सोने के लिए सिर्फ अपना बेड दिखाई देता है। ऐसे में अगर आप शाम में जल्दी खाना खाते हैं तो प्यार भरी नींद का लुत्फ उठा सकते हैं।

कहते हैं कि खाना खाने के तुरंत बाद सोना नहीं चाहिए। इससे आपका खाना सही ढंग से पचता नहीं है, जिसकी वजह से व्यक्ति को कई बीमारियां घेर लेती हैं। शाम में अगर आप खाना 7 बजे से पहले खा लेते हैं तो इससे खाने को सही ढंग से पचने का वक़्त मिलेगा और आपको मूड भी अच्छा रहेगा। जब खाना सही ढंग से पचता है तो आपके दिल की धड़कन नॉर्मल पेस पर काम करती हैं। इससे आपका हार्ट हेल्दी भी होता है. पेट की बीमारियां होने का सबसे बड़ा कारण देर रात खाना लेना है। अगर आप सही समय से अपना खाना खा लेते हैं तो पेट की बीमारियों से छुटकारा पा सकते हैं। इससे अगले दिन आपका पेट तो साफ होगा ही, साथ ही आप सक्रिय बने रहेंगे। सेहतमंद खान भी बहुत ज़रूरी होता है. जब आप समय से अपने रुटीन में हर चीज़ करते हैं तो खान-पान में प्रोटीन, मिनरल्स और विटामिन्स के साथ सही मात्रा में पोषक तत्व लेना सबसे अच्छा विकल्प है। https://satyodaya.com

Continue Reading
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

ख़ैरियत

आसपास की कुछ चीजों से हो जाएं सावधान, जो कैंसर के खतरे को बढ़ावा देने में करती है मदद

Published

on

clickretina digital marketing company
clickretina digital marketing company

सांकेतिक चित्र

कैंसर एक बहुत गंभीर बीमारी है। शुरुवाती दौर में कैंसर के लक्षण आमतौर पर नज़र नहीं आते है , लेकिन व्यक्ति के आस-पास मौजूद कई हानिकारक चीजें अंजाने में शरीर में कैंसर का खतरा बढ़ा सकती है। जिससे व्यक्ति बिलकुल अंजान रहता है । बीते एक दशक में लोगों की जीवनशैली और खानपान बहुत कुछ बदल गया है।  दुनियाभर में हर साल करोड़ों लोगों की मौत कैंसर के कारण होती है । शोधकर्ताओं की रिपोर्ट्स के अनुसार अब तक 200 से भी ज्यादा प्रकार के कैंसर खोजे जा चुके हैं। आइए जानते है कि कैंसर के खतरे को बढ़ावा देने वाली कौन सी चीजें आपके आसपास मौजूद हैं।

डीजल के धुएं से कैंसर का खतरा :

व्यस्त रोड के आसपास के घरों में रहने वाले लोगों और सड़क पर डीजल का धुंआ झेलने वाले लोगों में कैंसर की संभावना सबसे अधिक होती है। दरअसल डीजल के जलने से कार्सिनोजेन्‍स पैदा होते हैं। डीजल की फैक्‍ट्री और डीजल की गाड़ियों से निकलने वाला धुआं फेफड़ों के कैंसर का मुख्य कारण होता है। निकलने वाला धुआं फेफड़ो के कैंसरका मुख्य कारण होता है यह धुआं ट्रकों, ट्रेन के इंजनों ,कार, बस, जेनेरेटर आदि से निकलता है।

शहरों के प्रदूषण से कैंसर का खतरा :

शहरों में प्रदूषण का स्तर दिन प्रतिदिन बढता ही जा रहा है । वातावरण में गाड़ियो से निकलने वाला धुआं, जहरीली गैंसें, फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुंआ और जहरीले धातु कैंसर के खतरे को बढ़ावा देते है । आमतौर पर जो लोग प्रदूषित शहरों में या फिर फैक्‍ट्रियों के आस-पास रहते हैं, उनमें सिलिकॉन और अभ्रक जैसे हानिकारक तत्वों के कारण कैंसर की संभावना बढ़ जाती है । ऐसे लोगों को फेफड़ों का कैंसर, ब्लड कैंसर, गले और मुंह का कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर होने की संभावना ज्यादा होती है।

सिगरेट से निकलने वाले धुएं से भी कैंसर का खतरा :

जो व्यक्ति सिगरेट पीते है, उनको कैंसर का खतरा होता है| लेकिन जो व्यक्ति सिगरेट नहीं पीते है, पर उसका धुआं झेलते है तो उनको भी कैंसर का खतरा उतना ही होता है जितना की सिगरेट पीने वाले व्यक्ति को होता है | सिगरेट में निकोटीन के अलावा 4000 दूसरे खतरनाक केमिकल्स होते हैं, इसमें से लगभग 60 कार्सिनोजेन्‍स होते हैं। जिससे कैंसर का खतरा बहुत अधिक मात्रा में बढ़ जाता है |

यह भी पढ़े :  ग्लूकोमा वीक: समय रहते पहचान लिए लक्षण तो बच सकती है आंखों की रोशनी…

रेडिएशन के कारण :

आजकल कई रोगों के इलाज के लिए रेडिएशन का प्रयोग किया जाता है। इनमें मैमोग्राम, एक्स-रे, सीटी स्कैन आदि शामिल हैं। हालांकि ये सभी जांचे सुरक्षित मानी जाती हैं, पर यदि व्यक्ति के शरीर में कोई रोग पहले से है तो, रेडिएशन के कारण उस रोग को बढ़ावा मिल सकता है ।

प्रोसेस्ड फूड्स के सेवन से कैंसर का खतरा :

पैकेटबंद आहार,  ज्यादा चीनी-नमक वाले आहार, कोल्ड ड्रिंक्स ,रेड मीट ज्यादा फैट वाले आहार और केमिकलयुक्त आहारों के सेवन से भी कैंसर का खतरा होता है। शोध के मुताबिक बहुत ज्यादा प्रोसेस किए गए आहारों में कैंसर खतरा 10 % तक बढ़ जाता है ।

मेकअप के सामान और ब्यूटी प्रोडक्ट्स से भी कैंसर का खतरा :

मेकअप के सामान, टूथपेस्ट, डिओ, परफ्यूम, बालों के जेल, क्रीम, लोशन आदि कई चीजें ऐसी है जो कि शरीर में कैंसर पैदा कर सकती हैं। दरअसल रोजमर्रा के जिन प्रोडक्ट्स में सोडियम लॉरेल सल्फ़ेट होता है, उनसे कैंसर का खतरा होता है। इसके अलावा मरकरी (पारा) भी खतरनाक तत्व है, जो लिपिस्टिक में होता है।

http://www.satyodaya.com

Continue Reading

ख़ैरियत

ग्लूकोमा वीक: समय रहते पहचान लिए लक्षण तो बच सकती है आंखों की रोशनी…

Published

on

clickretina digital marketing company
clickretina digital marketing company

सांकेतिक चित्र

ग्लुकोमा के लक्षण से हो जाएं सावधान

इस साल 2019 में 10 मार्च से 16 मार्च तक वर्ल्ड ग्लूकोमा वीक मनाया जा रहा है । ताकि लोगों को ग्लूकोमा के बारे में ज्यादा से ज्यादा जागरूक किया जा सके । ग्लूकोमा को “काला मोतियाबिंद” भी कहा जाता है। 40 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में ग्लूकोमा का खतरा सबसे अधिक मात्रा में होता है। ग्लूकोमा एक प्रकार की आंखों की खतरनाक बीमारी है, जिससे व्यक्ति की आंखों की रोशनी भी जा सकती है ।

ग्लूकोमा, ऑप्टिक तंत्रिका में क्षति होने की वजह से व्यक्ति की आंखों की रोशनी पर प्रभाव पड़ता है। ऑप्टिक वो तंत्रिकाएं हैं, जो आंखों द्वारा एकत्र की गई सूचनाओं को दिमाग तक पहुंचाती है । जिस कारण से हम चीजों को देख पाते है । ग्लूकोमा सम्बंधित आंखों को क्षति तब पहुंच सकती है जब द्रव्य का दबाव सामान्य होता है ।

ग्लूकोमा के शुरुआती लक्षण :

यदि आपको ग्लूकोमा का खतरा महसूस हो या फिर आंख से सम्बंधित कोई समस्या लगे तो तुरंत डॉक्टर्स से जाचं करवा लेनी चाहिए । ग्लूकोमा के शुरुवाती लक्षण ज्यादा दिखाई नहीं देते है , इसलिए लोग इस पर कम ध्यान देते है । आइये जानते है ग्लूकोमा के शुरुवाती लक्षण :

1. सर में बार-बार दर्द होना, या सर दर्द का बने रहना, जी मिचलाना और उल्टी की समस्या।

2. आंखो के चश्मे का नंबर बहुत जल्दी बदल जाना।

3. अंधेरे कमरे (जैसे सिनेमा हॉल) में आंखों का एडजस्ट न हो पाना । आंखें सामान्य होने पर अंधेरे कमरे में कुछ समय रहने के बाद आंखें सेट हो जाती हैं, जबकि ग्लूकोमा के मरीजों की आंखें सेट होने में काफी दिक्कत होती है ।

4. आंखो में काफी तेज दर्द महसूस होना और कई बार चेहरे के हिस्से में भी दर्द होना।

5. सफेद रोशिनी के आसपास इंद्रधनुष जैसे रंग दिखाई देना आदि ।

ग्लूकोमा का इलाज :

ग्लूकोमा का जड़ से खात्मा केवल सर्जरी के माध्यम से किया जा सकता है। स्टेलैरिस-माइक्रो इनसीजन कैटरैक्ट नामक सर्जरी (एस- एमआईसीएस) पूरी तरह से सुरक्षित है। सर्जरी करवाए बिना ग्लूकोमा से छुटकारा नहीं पाया जा सकता है। ग्लूकोमा की सर्जरी अब काफी आसान व दर्दरहित हो गई है। सर्जरी के बाद मरीज की आंखों की रोशनी में बहुत तेजी से सुधार होता है। इस सर्जरी के तुरंत बाद लोग सामान्य कामकाज कर सकते हैं। इस सर्जरी में व्यक्ति की आंखों में एक चीरा लगाया जाता है ,जो कुछ दिन बाद अपने आप ठीक हो जाता है। इसमें दर्द की कोई गुंजाइश नहीं रहती है। इस सर्जरी का कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होता है और मरीज को नेत्रहीन होने से बचाया जा सकता है। http://www.satyodaya.com

Continue Reading

ख़ैरियत

आइये जानते हैं:- पीएम मोदी ने किया था जिस ‘डिस्लेक्सिया’ शब्द का इस्तेमाल, क्या है यह बीमारी, इसके लक्षण और उपाय

Published

on

clickretina digital marketing company
clickretina digital marketing company

स्मार्ट इंडिया हैकेथॉन 2019 ‘ में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए एक कार्यक्रम के दौरान एक छात्रा ने डिस्लेक्सिया पीड़ितों की समस्याओं पर हो रही चर्चा में पीएम मोदी से एक सवाल पूछ लिया कि डिस्लेक्सिया से पीड़ित ऐसे बच्चे होते हैं जिनकी लर्निंग और राइटिंग काफी कमजोर होती है, लेकिन उनकी बुद्धिमता और क्रियेटिविटी काफी तेज होती है। इस पर मोदी ने तुरंत जवाब दिया कि क्या 40-50 साल के बच्चों के लिए भी यह योजना काम आएगी! तब तो ऐसे बच्चों की मां बहुत खुश हो जाएगी। इस बात पर मोदी और सभी बच्चों खूब हंसे । जानकारी के लिए बता दें कि यहां पीएम मोदी का इशारा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और सोनिया गांधी की तरफ था । इस व्यंग्य को लेकर कांग्रेस मोदी पर हलमावर हो गई है ।

आइये जानते है डिस्लेक्सिया बीमारी के बारे में :

फिल्म ‘तारे जमीन पर’ तो हम सभी ने कई बार देखी होगी । इस फिल्म में मुख्य किरदार निभाने वाला ईशान डिस्लेक्सिया बीमारी से पीड़ित होता है, लेकिन इस बीमारी के बारे में उसके घरवाले पहचान नहीं कर पाते। फिल्म में ईशान के पेरेंट्स ये सोचते है कि आख़िर ईशान ऐसी हरकते क्यों करता है? क्या उसका पढाई में मन नही लगता है? आखिर ईशान को हुआ क्या है ? लेकिन इसमें दोष न ही ईशान के माता पिता का होता है और न ही ईशान का क्योंकि इस बीमारी के बारे में सभी को जानकारी नहीं होती है ।

डिस्लेक्सिया बीमारी आखिर है क्या ?

डिस्लेक्सिया मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति का एक प्रकार है। इसमें बच्चे की बोलने लिखने की क्षमता प्रभावित होती है । हर पांच में से एक बच्चे में आप को डिस्लेक्सिया के कुछ लक्षण देखने को मिल सकते हैं। यह एक ऐसी समस्या है जहां व्यक्ति को रोजमर्रा के कार्यो के लिए काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है । इसमें बच्चा एक जैसे सुनने वाले या दिखने वाले अक्षरों, रंगों और मूल चीजों को समझने में अंतर करने में परेशानी महसूस करता है। उदहारण के लिए 6 और 9 में या 21 और 12 में। इनकी हैंडराइटिंग ख़राब होती है, कई बार शब्दों में अक्षरों का क्रम सही नहीं होता है, ध्वनि में अंतर नहीं कर पाते हैं । दिशा सम्बंधित भ्रम जैसे की ‘दाएं को बाएं समझना और बाएं को दाएं समझना आदि कई विशेषज्ञ इसे एक आनुवांशिक बीमारी भी मानते हैं।
अल्बर्ट आइंस्टीन से तो सभी लोग परिचित है । बचपन में वो भी डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चे थे । लेकिन किसी को भी ये नहीं पता था कि वे बड़े हो कर विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक बनेंगे ,और एक और पूरी दुनिया उनके नाम के उदारण देगी ।

डिस्लेक्सिया बीमारी के लक्षण :

डिस्लेक्सिया बीमारी में बच्चा देर से बोलना शुरू करता है, नए शब्दों को धीमे धीमे सीखना, नर्सरी की कविताओं को कठिनाई से सीख पाना, कविताओं वाले खेल खेलने में दिक्कत आना, ऊँची आवाज़ में पढ़ने में कठिनाई , किसी भी चीज को याद रखने में समस्या, कहानी को संक्षिप्त करने में समस्या, उम्र के हिसाब से कम पढ़ पाना, निर्देशों को समझने में कठिनाई, अक्षरों व शब्दों के अंतर को समझने में कठिनाई, विदेशी भाषा सीखने की समस्या, नंबरों को जोड़ने और घटाने में समस्या आदि । ये सभी लक्षण किसी बच्चे में दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए ।

डिस्लेक्सिया में क्या करना चाहिए :

डिस्लेक्सिया से प्रभावित बच्चों को पढने लिखने में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, इसके समाधान के लिए ये नहीं है कि बच्चों को पढाई में ज्यादा मेहनत और ध्यान देने के लिए जोर दें बल्कि बच्चों को पढ़ने के तरीकों में बदलाव लाने की आवश्कता होगी ।
यदि बच्चा पढ़ी हुई चीजें भूल जाये तो दूसरे बच्चों से तुलना किये और बिना डांटे उनको हिंट के द्वारा उत्तर बताये , जिससे उनका मनोबल बना रहेगा । इसमें बच्चे के लिए बातों को भूल जाना बहुत स्वाभाविक है ।आप का बच्चा सामान्य बच्चों से भिन्न है तो उसकी गलतियौं को नजरंदाज करना होगा ताकि वो अपने आप में विश्वास ना खोये और आत्मविश्वासी बने । ज्यादा मेहनत कराने से बच्चे में शायद ही कोई सुधर हो। इससे बच्चा पढाई से दूर भागने लगेगा और हताश भी हो जायेगा इससे नुकसान ज्यादा और फायेदा कम होगा इसलिए बच्चे से उतनी ही मेहनत करवाए जितनी की वो कर सकता है और ज्यादा से ज्यादा बच्चे को समझने की कोशिश करे । http://www.satyodaya.com

Continue Reading

Category

Weather Forecast

March 26, 2019, 3:05 pm
Sunny
Sunny
30°C
real feel: 31°C
current pressure: 1010 mb
humidity: 26%
wind speed: 3 m/s NW
wind gusts: 3 m/s
UV-Index: 4
sunrise: 5:34 am
sunset: 5:50 pm
 

Recent Posts

Top Posts & Pages

Subscribe to Blog via Email

Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.

Join 7 other subscribers

Trending