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पुलिस के जवानों का ‘दर्द’ भी समझिए साहब…

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काम के बढ़ते बोझ ने पुलिस वालों में ’इंसान’ होने के भाव को ही खो दिया है

आखिर सत्ता पुलिस वालों को इंसान से ’हिंसक’ जानवर बनाने में क्यों तुली है और इसके पीछे उसका असल मकसद क्या है?

अभी कुछ दिन पहले की बात है जब मेरा एक पुलिस स्टेशन (थाना) पर एक काम के सिलसिले में जाना हुआ। भरी दोपहरी में जब मैं पुलिस स्टेशन पहुंचा तो वहां पर मुझे केवल तीन व्यक्ति मौजूद मिले। पहिला एक होमगार्ड का जवान,जो कि वहां पर संतरी ड्यूटी कर रहा था। दूसरा एक मुंशी (पुलिस स्टेशन का लिपिक),जो कि थाने में बैठा कुछ लिखा पढ़ी में व्यस्त था। उसकी मेज पर फाइलों का ढेर लगा हुआ था। इन सबसे इतर तीसरे व्यक्ति थाना प्रभारी थे। वे अपने विश्राम कक्ष में सो रहे थे। जब मैंने मुंशी से पूछा कि थाना प्रभारी कहां हैं? मुझे उनसे मुलाकात करनी है? इस पर मुंशी ने मुझसे जो कुछ कहा वह अपने आप में चैंकाने वाला था। उसने बताया कि पिछले तीन दिन से एक जरूरी काम के कारण साहब बहुत व्यस्त थे। वे अभी सो रहे हैं और मैं उनको ’डिस्टर्ब’ नहीं कर सकता। आपको अगर उनसे मिलना है तो फिर कल सुबह आइए या फिर एक चिट्ठी में लिख दीजिए। उनके जगने पर दे दूंगा। हलांकि, बाद में आस-पास की चाय की दुकानों पर चर्चा में मुझे यह पता चला कि हाई प्रोफाइल हत्या के एक मामले में स्थानीय पुलिस पर आरोपियों को पकड़ने का काफी दबाव था। इसी वजह से रात-रात भर छापेमारी करने के कारण दो रात थाना प्रभारी सो नहीं पाए थे। अब जबकि आरोपी पकड़ लिया गया था तो वो आराम कर रहे थे।

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गौरतलब है कि ऐसी दबाव भरी दिनचर्या एक दिन का मामला नहीं है। पुलिस वालों का जीवन तकरीबन ऐसे ही हर दिन चलता है। एक बार सुबह नहाने के बाद शरीर पर टंगी वर्दी रात के दो बजे के बाद ही बदन से उतर पाती है। यही नहीं, अगले दिन दस बजे उन्हें कार्यालय में समय से उपस्थित होना होता है। सप्ताह में चैबीस घंटे का सामान्य ’रूटीन’ यही होता है। अब जबकि पुलिस के कार्यक्षेत्र लगातार व्यापक होते जा रहे हैं, उनके ऊपर काम का बोझ भी लगातार बढ़ा है। इस काम के बोझ के दौरान उनके दुख दर्द से किसी को कोई मतलब नहीं होता। काम के दबाव में भले ही पुलिस वाले मानसिक स्तर पर टूट जाएं, लेकिन पुलिस विभाग को उनसे कोई हमदर्दी नहीं होती है। पुलिस अधिकारियों के स्तर पर एक सामान्य समझ विकसित कर ली गयी है कि विभाग में सब कुछ ’ठीक’ है और उसे किसी तरह के सुधार की जरूरत नहीं है। पुलिस के अफसर जवानों की बेहतरी पर बात करना अपनी ’तौहीन’ समझते हैं। उनका वर्ग चरित्र शासक वर्ग का होता है जो जवानों को महज एक ’गुलाम’ भर समझता है।

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दरअसल, उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था का सवाल पिछले कई सालों से विधानसभा चुनाव में राजनैतिक बहस का मुद्दा बनता रहा है। लेकिन, इस बात पर राजनीति में कभी कोई बहस नहीं होती कि आखिर कानून का शासन स्थापित करने में लगे लोगों-खासकर ’पुलिस’ के सिपाहियों-दारोगाओं की मानवीय गरिमा को सुनिश्चित कैसे रखा जाए? कानून व्यवस्था के खात्मे का रोना सभी दल भले ही रोते हों, लेकिन कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाने वाले पुलिस के इन सबसे निचले स्तर के जवानों के दुख दर्द उनकी बहस का हिस्सा नहीं होते हैं। पुलिस के कर्मचारी चाहे जितने जोखिम और तनाव में काम करें लेकिन उन्हें इंसान समझने और उसकी इंसानी गरिमा सुनिश्चित करने की ’भूल’ कोई भी राजनैतिक दल नहीं करना चाहता है।

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गौरतलब है कि अन्य राज्यों के मुकाबले उत्तर प्रदेश में प्रति पुलिसकर्मी सबसे ज्यादा आबादी रहती है। जहां तक इसके संख्या बल का सवाल है-यह रिक्तियों की भीषण कमी से साल दर साल लगातार जूझ रही है। पुलिस थानों का हाल यह है कि कई थाने अपनी कुल स्वीकृत पुलिस बल के आधे से भी कम संख्या पर किसी तरह से अपना काम चला रहे हैं। पुलिस के पास आने वाली शिकायतों की जांच के लिए दारोगा की जगह सिपाही भेजकर काम चलाया जा रहा है। यह सब पुलिस के प्रोफेशनलिज्म का न केवल मजाक है बल्कि कानून सम्मत भी नहीं है। जाहिर है इससे पीड़ित के लिए इंसाफ पाने की प्रक्रिया भी गंभीर तौर पर बाधित होती है यही नहीं, साल दर साल जिस तरह से पुलिस की जिम्मेदारियां और कार्यक्षेत्र बढ़ रहा हैं, ठीक उसी अनुपात में उसका संख्या बल लगातार घटता जा रहा है। कार्य बल में लगातार हो रही कमी पुलिस की कार्यक्षमता पर बहुत ही नकारात्मक असर डाल रही है। इससे एक तरफ अपराध नियंत्रण में मुश्किल तो होती ही है, पुलिस के कर्मचारियों पर काम का दबाव भी काफी बढ़ जाता है। काम के इसी दबाव के कारण पुलिस वाले आज अपनी मानवीय गरिमा को ’भूल’ चुके हैं और शारीरिक तथा दिमागी रूप से बीमार होते हुए लगातार ’हिंसक’ हो रहे हैं। बिना अवकाश के लगातार ’ड्यूटी’ करने वाले पुलिस वालों को मैंने बहुत नजदीक से देखा है। वे सब गंभीर रूप से ’अवसाद’ का शिकार हो रहे हैं।

बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है

पुलिस महकमे में सब इंस्पेक्टर का पद बहुत ही जिम्मेदारी भरा होता है। इस समय जो हालात हैं उसमें एक सब इंस्पेक्टर के पास औसत दस से ग्यारह मुकदमों की विवेचना लंबित है। यह सब पुलिस वालों में अपने कर्तव्य पालन को लेकर एक गंभीर ’तनाव’ पैदा करता है। जाहिर है काम के बढ़ते बोझ ने पुलिस वालों में ’इंसान’ होने के भाव को ही खो दिया है। हर वर्ष लगभग चार प्रतिशत कार्यबल पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त और बर्खास्तगी इत्यादि कारणों से स्टाफ से हट जाता है। लेकिन इसकी भरपायी के बतौर नयी भर्तियां नहीं की जाती हैं। इससे मौजूदा स्टाॅफ पर और ज्यादा बोझ बढ़ जाता है जो कि ’तनाव’ पैदा करता है। इस तनाव का असर जवानों की जीवनशैली में भी साफ देखा जाता है। डिप्रेशन और अथाह काम के इस बोझ ने पुलिसकर्मियों को ’बीमार’ बना दिया है। बस वे बोझ ढोने वाले ’गधों’ में तब्दील हो गए हैं।

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों है

जिम्मेदार इस समस्या पर बात क्यों नहीं करना चाहते? आखिर पुलिस वालों में इंसान होने के स्वाभाविक गुणों के विकास की जगह उनका खात्मा करने में तंत्र इतना ’तत्पर’ क्यों है? आखिर पुलिस के जवानों के सामाजिक और मानवीय ’गुण’ को प्रायोजित तरीके से सत्ता खत्म करने पर क्यों जुटी है? आखिर उसे क्यों केवल एक डंडाधारी आज्ञापालक जवान ही चाहिए, बिल्कुल मशीन की तरह से कमांड लेने वाला?

आखिर सत्ता पुलिस वालों को इंसान से ’हिंसक’ जानवर बनाने में क्यों तुली है और इसके पीछे उसका असल मकसद क्या है

दरअसल किसी समाज में हो रहे अपराध के कारणों में एक बड़ा हिस्सा तंत्र की संरचना, समाज और तत्कालीन आर्थिक परिवेश होता है। कोई व्यक्ति पैदायशी अपराधी नहीं होता। चूंकि मौजूदा तंत्र में व्यक्ति अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहा है और जीवन जीना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। इसलिए अपराधों में बढ़ोत्तरी भी लगातार हो रही है। अब चूंकि राजनैतिक तंत्र अपराधों के मूल कारणों पर बहस से डरता है इसलिए वह इसे डंडे और बंदूक के बल पर खत्म करने की वर्ग सापेक्ष और ’सतही’ व्याख्या करने की चालाकी करता है। वह इसी चालाकी के मूल में पुलिस के जवानों को ’आज्ञापालक’ मशीन में बदल देता है। इसीलिए जब जवान अपने मानव होने के अधिकारों की मांग करते हैं तब तंत्र डर जाता है। चूंकि यह व्यवस्था हिंसा के बल पर खड़ी है और अगर पुलिस के जवान में मानवोचित गुण आ जाएंगे तो वे अपने अधिकार और हक की मांग कर रहे निहत्थे नागरिकों पर लाठी और गोली कभी नहीं बरसाएंगे। इसके पीछे का मनोविज्ञान यही है। इसीलिए पुलिस के जवानों को हिंसक और बर्बर बनाए रखने का एक मैराथन लगातार चल रहा है।

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वहीं कुछ पुलिस के जवानों से इस विषय पर चर्चा की गई तो उनके द्वारा कहा गया कि पुलिस के जवानों की अमानवीय कार्य परिस्थितियां उनके मानवीय गर्व के खात्मे का एक कुचक्र हैं जिसके अपने वर्ग चरित्र हैं। हिंसक और बर्बर व्यवस्था को हिंसक सिपहसलार ही चाहिए। वहीं कुछ पुलिस कर्मी कहते हैं कि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में पुलिस बल की संख्या बढ़ाते हुए पुलिस में रिक्तियों को भरने का वादा भले ही किया हो लेकिन इससे पुलिस के जवानों को कुछ खास राहत नहीं मिलेगी। वर्तमान समय में कार्यस्थल पर जिस यंत्रणा पूर्ण हालात से पुलिस कर्मियों का सामना हो रहा है, उससे तत्काल निपटने की कोई ठोस रणनीति योगी सरकार के पास नहीं है। थकी हारी बीमार पुलिस एक स्वच्छ और न्यायपूर्ण प्रशासन नहीं दे सकती। साथ ही पुलिस कर्मियों का कहना है कि इसके लिए योगी सरकार को चाहिए कि वह पुलिस वालों की इंसानी गरिमा को सुनिश्चित करने की दिशा में पहल करें। इसके लिए सबसे पहले सप्ताह में एक दिन आवश्यक रूप से अवकाश देने की व्यवस्था को तत्काल लागू किया जाए। यह अवकाश सभी पुलिस कर्मियों के लिए अनिवार्य हो और इसे वे अपने परिवार और बच्चों के साथ अवश्य बिताएं। इससे इतर, उनके लिए काम के घंटे फिक्स किए जांए ताकि उनका व्यक्तिगत जीनव भी पटरी पर लौटे। यह सब पुलिस कर्मियों में काम के बोझ को हल्का करेगा और उनके काम को आनन्द दायक बनाएगा। सबसे बड़ी बात यह है कि योगी सरकार द्वारा कानून का राज स्थापित करने की बात के वाबजूद पुलिस वालों को संवेदना युक्त बनाने का कोई विचार नहीं दिख रहा है, जबकि जिम्मेदारी और जवाब देही के लिए यह बहुत जरूरी है। वक्त की मांग है कि अब इस पर तत्काल विचार किया जाए।http://www.satyodaya.com

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संगीत को भाषा देने वाले महान कलाकार पंडित विष्णु नारायण भातखंडे के बारे में जानिए ये बातें…

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पंडित विष्णु नारायण भातखंडे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के विद्वान थे। आधुनिक भारत में शास्त्रीय संगीत के पुनर्जागरण के अग्रदूत हैं जिन्होंने शास्त्रीय संगीत के विकास के लिए भातखंडे संगीत-शास्त्र की रचना की तथा कई संस्थाएँ तथा शिक्षा केन्द्र स्थापित किए। इन्होंने इस संगीत पर प्रथम आधुनिक टीका लिखी थी। उन्होने संगीतशास्त्र पर “हिंदुस्तानी संगीत पद्धति” चार भागों में प्रकाशित किया और ध्रुपद, धमार, तथा ख्यात का संग्रह करके “हिंदुस्तानी संगीत क्रमीक” ग्रंथ के छह भाग।

इनका जन्म बम्बई (अब महाराष्ट्र ) प्रान्त के बालकेश्वर ग्राम में 10 अगस्त, 1860 को हुआ। इनके माता-पिता संगीत के विशेष प्रेमी थे, अतः बालकाल्य से ही इन्हें गाने का शौक हो गया। कहा जाता है कि माता से सुने गीतों को वे ठीक उसी प्रकार नकल करके गा देते थे। इतने छोटे बालक की संगीत में विशेष रुचि देख कर उनके माता-पिता को अनुभव हुआ कि इस बालक को संगीत की ईश्वरीय देन है। इसलिए उन्होंने उसकी उचित शिक्षा की व्यवस्था की।

संगीत का अंकुर तो उनके हृदय में बाल्य-काल से था ही, कुछ बड़े होने पर इनको भारतीय संगीत कला के प्रसिद्ध कलाकारों को सुनने का भी अवसर प्राप्त हुआ, जिससे वे बहुत प्रभावित हुए और सोई हुई संगीत-जिज्ञासा जाग उठी। इसके बाद इन्हें संगीत कला को अधीक गहराई से जानने की इच्छा हुई। इसलिए इन्होंने मुंबई आकर ‘गायक उत्तेजन मंडल’ में कुछ दिन संगीत शिक्षा प्राप्त की और कई पुस्तकों का अध्ययन किया।

1907 में इनकी ऐतिहासिक संगीत यात्रा आरंभ हुई। सबसे पहले ये दक्षिण की ओर गए और वहाँ के बड़े-बड़े नगरों में स्थित पुस्तकालयों में पहुंचकर संगीत सम्बन्धी प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन किया।

वे दक्षिण भारत के अनेक संगीत विद्वानों के साथ संगीत चर्चा में शामिल हुए। वहीं पर इन्हें पं॰ वेंकटमखी के 72 थाटों का भी पहली बार पता चला। इसके बाद पंडित जी ने उत्तरी तथा पूर्वी भारत की यात्रा की। इस यात्रा में उन्हें उत्तरी संगीत-पद्धति की विशेष जानकारी हुई। विविध कलावंतों से इन्होंने बहुत से गाने भी सीखे और संगीत-विद्वानों से मुलाकात करके प्राचीन तथा अप्रचलित रागों के सम्बन्ध में भी कुछ जानकारी प्राप्त की। इसके बाद इन्होंने विजयनगरम्, हैदराबाद, जगन्नाथपुरी, नागपुर और कलकत्ता की यात्रायें कीं तथा 1908 में केंद्रीय प्रान्त (अब मध्य प्रदेश )और संयुक्त प्रान्त (अब उत्तर प्रदेश) के विभिन्न नगरों का दौरा किया।

देश भर के राजकीय, देशी राज्यांतर्गत, संस्थागत, मठ-मंदिर-गत और व्यक्तिगत संग्रहालयों में हस्तलिखित संगीत ग्रंथों की खोज और उनके नामों का अपने ग्रंथों में प्रकाशन, देश के अनेक हिंदू मुस्लिम गायक वादकों से लक्ष्य-लक्षण-चर्चा-पूर्वक सारोद्धार और विपुलसंख्यक गेय पदों का संगीत लिपि में संग्रह, कर्णाटकीय मेलपद्धति के आदर्शानुसार राग वर्गीकरण की दश थाट् पद्धति का निर्धारण। इन सब कार्यो के निमित्त भारत के सभी प्रदेशों का व्यापक पर्यटन किया। संस्कृत एवं उर्दू, फ़ारसी, संगीत ग्रंथों का तत्तद्भाषाविदों की सहायता से अध्ययन और हिंदी अंग्रेजी ग्रंथों का भी परिशीलनकर। अनेक रागों के लक्षणगीत, स्वरमालिका आदि की रचना और तत्कालीन विभिन्न प्रयत्नों के आधार पर सरलतानुरोध से संगीत-लिपि-पद्धति का स्तरीकरण किया।

मैरिस कॉलेज (वर्तमान भातखंडे संगीत विद्यापीठ, लखनऊ) माधव संगीत विद्यालय, ग्वालियर, एवं संगीत महाविद्यालय, बड़ोदा, की स्थापना अथवा उन्नति में प्रेरक सहयोगी रहे। 1916 में बड़ोदा में देश भर के संगीतज्ञों की विशाल परिषद् का आयोजन किया। तदनंतर दिल्ली, बनारस तथा लखनऊ में संगीत परिषदें आयोजित हुई।

संगीत कला का विशेष ज्ञान प्राप्त करने एवं उसके प्रचार करने के लिए उन्होंने विविध स्थानों में संगीत सम्मेलन कराने का निश्चय किया। इसके लिए इन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ी लेकिन सफलता भी मिली। सन् 1916 में इन्होंने बड़ौदा में एक विशाल संगीत सम्मेलन आयोजित किया, जिसका उद्घाटन महाराजा बड़ौदा द्वारा हुआ। इस सम्मेलन में संगीत के बड़े-बड़े विद्वानों द्वारा संगीत के अनेक तथ्यों पर गंभीरतापूर्वक आपस में विचार विनिमय हुए और एक “आल इंडिया म्यूजिक एकेडमी” की स्थापना का प्रस्ताव पास हुआ इसके बाद दूसरा सम्मेलन दिल्ली में, तीसरा बनारस में और चौथा लखनऊ में आयोजित किया गया एवं अन्य कई स्थानों में भी संगीत सम्मेलन हुए।

संगीत की उन्नति और प्रचार के लिये संगीत सम्मेलन आयोजित करने के साथ ही इन्होंने कई जगह संगीत महाविद्यालय भी स्थापित किए। इनमें लखनऊ का मैरिस म्यूजिक कालेज प्रमुख है यह संस्थान अब भातखंडे संगीत विद्यापीठ के नाम से जाना जाता है। 1933 से, जब इन पर रोगों का आक्रमण हुआ, इनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। तीन साल की लम्बी बीमारी के बाद 19 सितम्बर, 1936 को इनका निधन हो गया।

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प्रदूषण मुक्त दिल्ली के लिए एक बार फिर Odd-Even, नितिन गडकरी ने जताई असहमति

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नई दिल्ली। प्रदूषण से निपटने के लिए अरविंद केजरीवाल एक बार फिर से दिल्ली में Odd-Even पॉलिसी लागू कर रहे हैं। इस बात की जानकारी उन्होंने शुक्रवार को एक प्रेस कांफ्रेंस कर के दी है। केजरीवाल ने बताया कि 4 से 15 नवंबर तक Odd-Even पॉलिसी लागू रहेगी। इसी के साथ उन्होंने दिल्लीवासियों से पटाखा मुक्त दिवाली मनाने का अनुरोध भी किया है। इसके अलावा प्रदूषण से मुक्ति के लिए 7 सूत्रीय ऐक्शन प्लान का भी ऐलान किया है।

सीएम केजरीवाल ने ये भी कहा कि दिल्ली सरकार N-95 मास्क खरीदकर लोगों में बांटेगी, जिससे लोग प्रदूषण से बच सकें। अभी 50-60 लाख मास्क खरीदने की योजना है। सीएम केजरीवाल ने आगे बताया कि छोटी दीवाली के दिन लेजर शो कराएगी, जिसमें फ्री एंट्री होगी। दिल्ली सरकार प्रदूषण के रोकथाम के लिए अन्य साधन भी अपनाएगी।

कूड़ा जलाने से रोकने के लिए नियुक्त होंगे मार्शल

Arvind Kejriwal ने बताया कि दिल्ली में 12 ऐसे स्पॉट है जहां प्रदूषण ज्यादा है ऐसी जगहों के लिए अलग से प्लान बनाएंगे। उड़ती धूल से लोगों को निजात दिलाने के लिए जगह-जगह पानी का छिड़काव किया जाएगा। सड़कों पर मैकेनाइज्ड स्वीपिंग (मशीन से झाड़ू लगाना) का भी प्रयोग होगा। इसी के साथ लोग कूड़ा या पत्ती न जलाएं इसके लिए हर वार्ड में मार्शल नियुक्त करेंगे।

वॉर रूम निपटेंगे प्रदूषण की शिकायत से

उन्होंने बताया कि लोगों को पेड़ उनके घर पर सप्लाई किये जाएंगे और उन्हें पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। स्कूली बच्चों में पर्यावरण को लेकर जागरूकता फैलाई जाएगी। इतना ही नहीं प्रदूषण की शिकायतों से निपटने के लिए वॉर रूम भी बनाए जाएंगे। Odd-Even और दीवाली के अलावा बाकी सारे पॉइंट विंटर एक्शन प्लान की तरह होंगे। इतना ही नहीं उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कहा कि दिल्ली में 8-10 महीने में 4,000 बसें आ जाएंगी और बस एग्रीगेटर पॉलिसी भी जल्द ही लागू होगी।

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Odd-Even से नितिन गडकरी ने जताई असहमति

दिल्ली को प्रदूषण मुक्त रखने लिए जहां केजरीवाल ने तमाम उपायों का ऐलान किया है वहीं, केंद्रीय परिवहन मंत्री ने उनकी इस योजना से असहमति जताई है। उन्होंने Odd-Even पॉलिसी को लेकर कहा कि, ‘मैं नहीं मानता कि इसकी जरूरत थी। हमने जो रिंग रोड बनाया है, उससे शहर के प्रदूषण में बड़ी कमी आई है। अगले 2 सालों में हमारी स्कीमों से दिल्ली प्रदूषण से मुक्त हो जाएगी।’

इन तारीखों पर नंबर प्लेट चेक कर निकलें

Odd-Even लागू होने के बाद आप जब घर से निकले तो अपनी नंबर प्लेट चेक कर लें। क्योंकि इस योजना के तहत ईवन दिन ऐसे वाहन चलेंगे जिनकी नंबर प्लेट के नंबरों की आखिरी संख्या ईवन होगी। अगले दिन वह वाहन चलेंगे जिनकी नंबर प्लेट के नंबरों की आखिरी संख्या ऑड होगी। ऑड नंबर की गाड़ियां 5, 7, 11, 13, 15 तारीख को चलेंगी जबकि ईवन नंबर की गाड़ियां 4, 6, 8, 12, 14 तारीख को चलेंगी।http://www.satyodaya.com

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केजरीवाल: सरकारी अस्पतालों में अब नहीं मिलेगा प्राइवेट रूम, सरकार की नजर में सब बराबर

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नई दिल्ली। सरकारी अस्पतालों में अब वीआईपी कल्चर नहीं चलेगा। इस बात की जानकारी खुद सीएम अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट कर दी है। उन्होंने कहा है कि दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में किसी भी वीआईपी शख्स को प्राइवेट रूम नहीं दिया जाएगा।

केजरीवाल ने ट्वीट किया कि, मैंने स्वास्थ्य विभाग को सरकारी अस्पतालों में वीआईपी कल्चर को खत्म करने का निर्देश दिया है। अब किसी भी वीआईपी के लिए प्राइवेट रूम नहीं होगा। सरकार की नजर में सभी मरीज एक जैसे है न तो कोई खास है और न ही आम।

उन्होंने लिखा कि दिल्ली सरकार अस्पतालों में 13, 899 बेड्स का इजाफा कर रही है। ऐसा कर दिल्ली में अस्पतालों की क्षमता में 120 फीसदी की बढ़ोतरी होगी। यह मौजूदा व्यवस्था को और भी सुदृढ़ करेगा। इसके साथ ही सभी अस्पातालों को पूरी तरह वातानुकूलित बनाया जाएगा जिसमें विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध होंगी।

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दिल्ली की केजरीवाल सरकार लगातार एक के बाद लोगों की बेहतरी के लिए बड़े फैसले ले रही है। बिजली बिल में कटौती, पानी के बिल में माफी, शिक्षा में सुधार और मोहल्ला क्लीनिक के बाद हालही में डीटीसी बसों में महिलाओं को फ्री राइड उनमें से एक फैसला है। अब अस्पतालों की क्षमता और व्यवस्था में सुधार आप पार्टी का एक और बड़ा कदम है। http://www.satyodaya.com

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