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पुलिस के जवानों का ‘दर्द’ भी समझिए साहब…

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काम के बढ़ते बोझ ने पुलिस वालों में ’इंसान’ होने के भाव को ही खो दिया है

आखिर सत्ता पुलिस वालों को इंसान से ’हिंसक’ जानवर बनाने में क्यों तुली है और इसके पीछे उसका असल मकसद क्या है?

अभी कुछ दिन पहले की बात है जब मेरा एक पुलिस स्टेशन (थाना) पर एक काम के सिलसिले में जाना हुआ। भरी दोपहरी में जब मैं पुलिस स्टेशन पहुंचा तो वहां पर मुझे केवल तीन व्यक्ति मौजूद मिले। पहिला एक होमगार्ड का जवान,जो कि वहां पर संतरी ड्यूटी कर रहा था। दूसरा एक मुंशी (पुलिस स्टेशन का लिपिक),जो कि थाने में बैठा कुछ लिखा पढ़ी में व्यस्त था। उसकी मेज पर फाइलों का ढेर लगा हुआ था। इन सबसे इतर तीसरे व्यक्ति थाना प्रभारी थे। वे अपने विश्राम कक्ष में सो रहे थे। जब मैंने मुंशी से पूछा कि थाना प्रभारी कहां हैं? मुझे उनसे मुलाकात करनी है? इस पर मुंशी ने मुझसे जो कुछ कहा वह अपने आप में चैंकाने वाला था। उसने बताया कि पिछले तीन दिन से एक जरूरी काम के कारण साहब बहुत व्यस्त थे। वे अभी सो रहे हैं और मैं उनको ’डिस्टर्ब’ नहीं कर सकता। आपको अगर उनसे मिलना है तो फिर कल सुबह आइए या फिर एक चिट्ठी में लिख दीजिए। उनके जगने पर दे दूंगा। हलांकि, बाद में आस-पास की चाय की दुकानों पर चर्चा में मुझे यह पता चला कि हाई प्रोफाइल हत्या के एक मामले में स्थानीय पुलिस पर आरोपियों को पकड़ने का काफी दबाव था। इसी वजह से रात-रात भर छापेमारी करने के कारण दो रात थाना प्रभारी सो नहीं पाए थे। अब जबकि आरोपी पकड़ लिया गया था तो वो आराम कर रहे थे।

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गौरतलब है कि ऐसी दबाव भरी दिनचर्या एक दिन का मामला नहीं है। पुलिस वालों का जीवन तकरीबन ऐसे ही हर दिन चलता है। एक बार सुबह नहाने के बाद शरीर पर टंगी वर्दी रात के दो बजे के बाद ही बदन से उतर पाती है। यही नहीं, अगले दिन दस बजे उन्हें कार्यालय में समय से उपस्थित होना होता है। सप्ताह में चैबीस घंटे का सामान्य ’रूटीन’ यही होता है। अब जबकि पुलिस के कार्यक्षेत्र लगातार व्यापक होते जा रहे हैं, उनके ऊपर काम का बोझ भी लगातार बढ़ा है। इस काम के बोझ के दौरान उनके दुख दर्द से किसी को कोई मतलब नहीं होता। काम के दबाव में भले ही पुलिस वाले मानसिक स्तर पर टूट जाएं, लेकिन पुलिस विभाग को उनसे कोई हमदर्दी नहीं होती है। पुलिस अधिकारियों के स्तर पर एक सामान्य समझ विकसित कर ली गयी है कि विभाग में सब कुछ ’ठीक’ है और उसे किसी तरह के सुधार की जरूरत नहीं है। पुलिस के अफसर जवानों की बेहतरी पर बात करना अपनी ’तौहीन’ समझते हैं। उनका वर्ग चरित्र शासक वर्ग का होता है जो जवानों को महज एक ’गुलाम’ भर समझता है।

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दरअसल, उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था का सवाल पिछले कई सालों से विधानसभा चुनाव में राजनैतिक बहस का मुद्दा बनता रहा है। लेकिन, इस बात पर राजनीति में कभी कोई बहस नहीं होती कि आखिर कानून का शासन स्थापित करने में लगे लोगों-खासकर ’पुलिस’ के सिपाहियों-दारोगाओं की मानवीय गरिमा को सुनिश्चित कैसे रखा जाए? कानून व्यवस्था के खात्मे का रोना सभी दल भले ही रोते हों, लेकिन कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाने वाले पुलिस के इन सबसे निचले स्तर के जवानों के दुख दर्द उनकी बहस का हिस्सा नहीं होते हैं। पुलिस के कर्मचारी चाहे जितने जोखिम और तनाव में काम करें लेकिन उन्हें इंसान समझने और उसकी इंसानी गरिमा सुनिश्चित करने की ’भूल’ कोई भी राजनैतिक दल नहीं करना चाहता है।

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गौरतलब है कि अन्य राज्यों के मुकाबले उत्तर प्रदेश में प्रति पुलिसकर्मी सबसे ज्यादा आबादी रहती है। जहां तक इसके संख्या बल का सवाल है-यह रिक्तियों की भीषण कमी से साल दर साल लगातार जूझ रही है। पुलिस थानों का हाल यह है कि कई थाने अपनी कुल स्वीकृत पुलिस बल के आधे से भी कम संख्या पर किसी तरह से अपना काम चला रहे हैं। पुलिस के पास आने वाली शिकायतों की जांच के लिए दारोगा की जगह सिपाही भेजकर काम चलाया जा रहा है। यह सब पुलिस के प्रोफेशनलिज्म का न केवल मजाक है बल्कि कानून सम्मत भी नहीं है। जाहिर है इससे पीड़ित के लिए इंसाफ पाने की प्रक्रिया भी गंभीर तौर पर बाधित होती है यही नहीं, साल दर साल जिस तरह से पुलिस की जिम्मेदारियां और कार्यक्षेत्र बढ़ रहा हैं, ठीक उसी अनुपात में उसका संख्या बल लगातार घटता जा रहा है। कार्य बल में लगातार हो रही कमी पुलिस की कार्यक्षमता पर बहुत ही नकारात्मक असर डाल रही है। इससे एक तरफ अपराध नियंत्रण में मुश्किल तो होती ही है, पुलिस के कर्मचारियों पर काम का दबाव भी काफी बढ़ जाता है। काम के इसी दबाव के कारण पुलिस वाले आज अपनी मानवीय गरिमा को ’भूल’ चुके हैं और शारीरिक तथा दिमागी रूप से बीमार होते हुए लगातार ’हिंसक’ हो रहे हैं। बिना अवकाश के लगातार ’ड्यूटी’ करने वाले पुलिस वालों को मैंने बहुत नजदीक से देखा है। वे सब गंभीर रूप से ’अवसाद’ का शिकार हो रहे हैं।

बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है

पुलिस महकमे में सब इंस्पेक्टर का पद बहुत ही जिम्मेदारी भरा होता है। इस समय जो हालात हैं उसमें एक सब इंस्पेक्टर के पास औसत दस से ग्यारह मुकदमों की विवेचना लंबित है। यह सब पुलिस वालों में अपने कर्तव्य पालन को लेकर एक गंभीर ’तनाव’ पैदा करता है। जाहिर है काम के बढ़ते बोझ ने पुलिस वालों में ’इंसान’ होने के भाव को ही खो दिया है। हर वर्ष लगभग चार प्रतिशत कार्यबल पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त और बर्खास्तगी इत्यादि कारणों से स्टाफ से हट जाता है। लेकिन इसकी भरपायी के बतौर नयी भर्तियां नहीं की जाती हैं। इससे मौजूदा स्टाॅफ पर और ज्यादा बोझ बढ़ जाता है जो कि ’तनाव’ पैदा करता है। इस तनाव का असर जवानों की जीवनशैली में भी साफ देखा जाता है। डिप्रेशन और अथाह काम के इस बोझ ने पुलिसकर्मियों को ’बीमार’ बना दिया है। बस वे बोझ ढोने वाले ’गधों’ में तब्दील हो गए हैं।

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों है

जिम्मेदार इस समस्या पर बात क्यों नहीं करना चाहते? आखिर पुलिस वालों में इंसान होने के स्वाभाविक गुणों के विकास की जगह उनका खात्मा करने में तंत्र इतना ’तत्पर’ क्यों है? आखिर पुलिस के जवानों के सामाजिक और मानवीय ’गुण’ को प्रायोजित तरीके से सत्ता खत्म करने पर क्यों जुटी है? आखिर उसे क्यों केवल एक डंडाधारी आज्ञापालक जवान ही चाहिए, बिल्कुल मशीन की तरह से कमांड लेने वाला?

आखिर सत्ता पुलिस वालों को इंसान से ’हिंसक’ जानवर बनाने में क्यों तुली है और इसके पीछे उसका असल मकसद क्या है

दरअसल किसी समाज में हो रहे अपराध के कारणों में एक बड़ा हिस्सा तंत्र की संरचना, समाज और तत्कालीन आर्थिक परिवेश होता है। कोई व्यक्ति पैदायशी अपराधी नहीं होता। चूंकि मौजूदा तंत्र में व्यक्ति अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहा है और जीवन जीना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। इसलिए अपराधों में बढ़ोत्तरी भी लगातार हो रही है। अब चूंकि राजनैतिक तंत्र अपराधों के मूल कारणों पर बहस से डरता है इसलिए वह इसे डंडे और बंदूक के बल पर खत्म करने की वर्ग सापेक्ष और ’सतही’ व्याख्या करने की चालाकी करता है। वह इसी चालाकी के मूल में पुलिस के जवानों को ’आज्ञापालक’ मशीन में बदल देता है। इसीलिए जब जवान अपने मानव होने के अधिकारों की मांग करते हैं तब तंत्र डर जाता है। चूंकि यह व्यवस्था हिंसा के बल पर खड़ी है और अगर पुलिस के जवान में मानवोचित गुण आ जाएंगे तो वे अपने अधिकार और हक की मांग कर रहे निहत्थे नागरिकों पर लाठी और गोली कभी नहीं बरसाएंगे। इसके पीछे का मनोविज्ञान यही है। इसीलिए पुलिस के जवानों को हिंसक और बर्बर बनाए रखने का एक मैराथन लगातार चल रहा है।

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वहीं कुछ पुलिस के जवानों से इस विषय पर चर्चा की गई तो उनके द्वारा कहा गया कि पुलिस के जवानों की अमानवीय कार्य परिस्थितियां उनके मानवीय गर्व के खात्मे का एक कुचक्र हैं जिसके अपने वर्ग चरित्र हैं। हिंसक और बर्बर व्यवस्था को हिंसक सिपहसलार ही चाहिए। वहीं कुछ पुलिस कर्मी कहते हैं कि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में पुलिस बल की संख्या बढ़ाते हुए पुलिस में रिक्तियों को भरने का वादा भले ही किया हो लेकिन इससे पुलिस के जवानों को कुछ खास राहत नहीं मिलेगी। वर्तमान समय में कार्यस्थल पर जिस यंत्रणा पूर्ण हालात से पुलिस कर्मियों का सामना हो रहा है, उससे तत्काल निपटने की कोई ठोस रणनीति योगी सरकार के पास नहीं है। थकी हारी बीमार पुलिस एक स्वच्छ और न्यायपूर्ण प्रशासन नहीं दे सकती। साथ ही पुलिस कर्मियों का कहना है कि इसके लिए योगी सरकार को चाहिए कि वह पुलिस वालों की इंसानी गरिमा को सुनिश्चित करने की दिशा में पहल करें। इसके लिए सबसे पहले सप्ताह में एक दिन आवश्यक रूप से अवकाश देने की व्यवस्था को तत्काल लागू किया जाए। यह अवकाश सभी पुलिस कर्मियों के लिए अनिवार्य हो और इसे वे अपने परिवार और बच्चों के साथ अवश्य बिताएं। इससे इतर, उनके लिए काम के घंटे फिक्स किए जांए ताकि उनका व्यक्तिगत जीनव भी पटरी पर लौटे। यह सब पुलिस कर्मियों में काम के बोझ को हल्का करेगा और उनके काम को आनन्द दायक बनाएगा। सबसे बड़ी बात यह है कि योगी सरकार द्वारा कानून का राज स्थापित करने की बात के वाबजूद पुलिस वालों को संवेदना युक्त बनाने का कोई विचार नहीं दिख रहा है, जबकि जिम्मेदारी और जवाब देही के लिए यह बहुत जरूरी है। वक्त की मांग है कि अब इस पर तत्काल विचार किया जाए।http://www.satyodaya.com

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यूपी-100 कर्मियों ने ब्लड डोनेट कर बचाई सूचनाकर्ता की बुजुर्ग मां की जान

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लखनऊ। राजधानी की #पुलिस ने एक बार फिर मानवता की मिशाल पेश की है जिसमें बताया जा रहा है कि इंदिरा नगर स्थित एक अस्पताल से एक युवक ने 100 नंबर पर फोन कर पुलिस से मदद मांगी जिसपर मौके पर पहुंची पीआरवी 4569 और इवेंट सूचना पर 4614 ने देखा की पीड़ित की बुजुर्ग मां को खून की जरूरत है जिसपर तत्काल पुलिस ने ब्लड डोनेट कर उस युवक के मां की जान बचाई।

पूरी घटना कुछ इस प्रकार है कि एक ’कालर-विनोद कुमार सिंह ने यूपी-100 को सूचना दिया कि, उसकी मां इंद्रावती सिंह बीमार हैं अस्पताल वाले ब्लड नहीं दे रहे हैं, तत्काल पुलिस की आवश्यकता है। घटनास्थल,-शेखर अस्पताल इंदिरानगर पर, इस सूचना पर पीआरवी 4569 कॉलर के द्वारा बताए हुए स्थान पर अल्प समय में मौके पर पहुंचे तो कॉलर ने बताया कि उनका नाम विनोद कुमार सिंह है जो कि भूतपूर्व आर्मी है, सुल्तानपुर का रहने वाला है, उनकी माँ इंद्रावती जिनकी उम्र लगभग 80 वर्ष है, जो 12 मई को घर के आंगन में गिर गयी थी जिसके कारण उनका पैर टूट गया था, जिसके बाद उनको लखनऊ के आर्मी कमांड अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां के डॉक्टरों द्वारा 16 मई को ऑपरेशन करने के लिए शेखर अस्पताल भेजा गया।

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उसके बाद ही उसने बताया कि उसको ऑपरेशन से पहले डॉक्टर द्वारा बताया गया कि उसकी माँ का लिवर और किडनी डैमेज है, उनको तत्काल 2 यूनिट खून की आवश्यकता है, मैं ब्लड बैंक गया था खून लेने पर उन लोगों ने कहा ही हम आपको तभी खून दे पाएंगे जब आप हमें 2 यूनिट खून कहीं से उपलब्ध कराओगे क्योंकि ऐसा नियम है और हम नियम के विपरीत कार्य नही कर सकते हैं, मैने ब्लड बैंक वालों से कहा कि मुझे खून की आवश्यकता तुरंत है और मेरा लखनऊ में कोई जानने वाला नहीं है और मैंने सुल्तानपुर में अपने परिवार वालों को सूचित कर दिया है वो लोग निकल चुके हैं, आते ही आपको खून मिल जाएगा पर वो लोग देने को तैयार नहीं हैं इसीलिए मैंने यूपी 100 को सूचना दी थी।

इस सूचना पर मौके पर पहुंचे पीआरवी 4569 के कमांडर दिगम्बर सिंह द्वारा खुद का खून देकर कालर की मदद करने का निर्णय लिया, चूंकी कॉलर को 2 यूनिट खून की आवश्यकता थी, इसलिए पीआरवी कमांडर दिगम्बर सिंह द्वारा उपरोक्त घटना के संबंध में आरोआईपी पर ड्यूटी पर मौजूद पर्यवेक्षक अधिकारी चंद्रशेखर को उपरोक्त घटना की सम्पूर्ण जानकारी दी गयी जिसके बाद उनके द्वारा उपरोक्त सूचना को सभी ग्रुप में प्रसारित कर पीआरवी स्टाफ से मदद मांगी गई जिसपे पीआरवी 4542 पर नियुक्त कमांडर रवि कुमार द्वारा खून देने की इच्छा जाहिर की गयी, और दोनों पीआरवी वाहनों पर नियुक्त कॉमण्डर द्वारा कॉलर को खून देकर उसकी सहायता की गयी। http://www.satyodaya.com

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खाकी में भी होता है साहब इंसान…

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थानों पर कैसा गुज़रता है पुलिसकर्मियों का दिन

आपको बता दिया जाए कि सुबह होते ही पुलिस पर परेशानियों का पहाड़ टूट पड़ता है वो मैं इसलिए कह रहा हूँ कि जहां एक आम आदमी एक परेशानी को नहीं झेल सकता वहीं पुलिस हज़ारों परेशानियों को दिन भर झेलती है। सुबह थाने पर पहुंचते ही फरियादियों की भीड़ उमड़ आती है। अगर किसी की परेशानी नहीं सुनी गई तो तुरंत ही कुछ न कुछ आरोप लगा दिया जाता है। जिससे दिन भर अधिकारियों का प्रेशर बना रहता है। आपको बता दिया जाए कि थाने पर जहां कांस्टेबलों से लेकर होमगार्डो की संख्या भी जितनी होनी चाहिए वो भी नहीं है। जिससे कारण पुलिस को कम संख्या में ही काम चलाना पड़ता है। अब आप सोचिए किसी प्राइवेट दफ्तर में जाईये। प्राइवेट दफ्तर में देखने को मिलता है कि अगर एक युवक छुट्टी पर है तो तुरंत ही दूसरा युवक रख लिया जाता है लेकिन पुलिस में ऐसा नहीं है।

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क्या कभी आपने सोचा है थाना कितने आदमियों के भरोशे चलता है नहीं सोचा है। वो इसलिए कह रहा हूं कि मैंने देखा है। थाना केवल तीन आदमियों के भरोशे चलता है। मुंशी, पहरा और एक दरोगा के भरोशे। अगर थाने पर बदमाशों द्वारा हमला कर दिया जाए तो ये अपनी ही रक्षा नहीं कर पाएंगे, क्योंकि थाने पर फोर्स ही नहीं है। फिर भी पुलिस अपनी सुरक्षा भूलकर लोगों की सुरक्षा करती है। जब किसी भी युवक को किसी फर्जी काम के लिए बोल दिया जाये तो युवक भड़क उठता है। पुलिस के पास कभी सोचा है थानों पर कितनी फर्जी सूचना मिलती है लेकिन फिर भी पुलिस मौके पर पहुंचती है। वो इसलिए कहीं कोई घटना न घट जाये जिससे लोगों को परेशानी ना हो।

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अब आपको थाने पर एक मुंशी की जुबानी सुनाता हूँ कि वह कितना डर कर काम करता है लेकिन किसी को जाहिर नहीं करता वो इसलिए कि अगर उसका डर दिख गया तो अपराधी निडर हो जाएगा। एक बार रात को मैं थाने पहुंचा तो मालूम चला थाने पर कोई नहीं सभी ड्यूटी पर लगे हैं। थाने पर बस रात के वक्त दो ही लोग मौजूद थे एक मुंशी व एक पहरा और अपराधी थे नौ। जब मैंने पूछा तुम दो और वो नौ तुम्हें डर नहीं लग रहा। तभी उसने धीमी आवाज़ में बताया डर तो लगता है लेकिन अपनी ड्यूटी की जिम्मेदारी से कैसे भागूं। थाने पर पहुंची पुलिस को दिनभर कैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है ये आप नहीं समझोगे।

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सुबह जब पुलिस थाने पहुंचती है तब कैसे लिया जाता है इनसे काम मैं बताता हूँ। जब सभी पुलिसकर्मी थाने आते हैं जिनकी ड्यूटी 12 घंटे की होती है। अगर कोई वीआईपी प्रोग्राम लगा है तो उसको देखना। अगर सड़क जाम हो जाये उसको देखना। जंहा तक नगर निगम का भी काम पुलिस को देखना पड़ता है। आदमी दो घंटे भी खाली पेट नहीं रह सकता वहीं पुलिस कभी-कभी कह लें या ज्यादातर भी कह सकते हैं कि खाली पेट लोगों की सुरक्षा में बिता देती है। फिर भी पुलिस पर आरोप लगता है कि पुलिस काम नहीं करती साहब।http://www.satyodaya.com

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191.38 करोड़ जब्त व 4,229 बम बरामद

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निर्वाचन आयोग के निर्देश पर 1,946 प्रकरणों में एफआईआर दर्ज

लखनऊ। भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश पर पूरे प्रदेश में आदर्श आचार संहिता के अनुपालन में आयकर, नारकोटिक्स, पुलिस तथा आबकारी की संयुक्त कार्रवाई में अब तक कुल 191.38 करोड़ रुपये की जब्ती की गई है, जिसमें पुलिस एवं आयकर विभाग द्वारा 47.45 करोड़ रूपये की नगदी तथा नारकोटिक्स एवं पुलिस द्वारा कुल 26.76 करोड़ रुपये मूल्य की गांजा, स्मैक, चरस आदि की जब्ती की गई। इसके अलावा 71.79 करोड़ मूल्य की बहुमूल्य धातुएं सोना चाँदी आदि जब्त की गई है। आबकारी विभाग द्वारा 45.38 रूपये मूल्य की 16,52,545.5 लीटर मदिरा जब्त की गई है।

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1011 लोगों के लाइसेन्स निरस्त

प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एल वेंकटेश्वर लू ने यह जानकारी देते हुए गुरूवार को बताया कि कानून व्यवस्था के तहत अब तक 8,96,596 लाइसेन्सी शस्त्र जमा कराये गये हैं तथा 1011 लोगों के लाइसेन्स निरस्त किये गये हैं। इसके अलावा निरोधात्मक कार्रवाई के तहत 22,19,083 लोगों को पाबन्द किया गया है तथा 35,211 लोगों पर गैर जमानती वारन्ट तामिला कराया गया है। उन्होंने बताया कि प्रदेश में अब तक 7401.6 किलोग्राम विस्फोटक सामग्री, 14,214 कारतूस, 4,229 बम बरामद किये गये हैं।

मीटिंग, लाउडस्पीकर व उत्तेजनात्मक भाषण के 4,329 मामले

वेंकटेश्वर लू के मुताबिक अभियान के तहत अब तक कुल 67,76,288 वॉल राइटिंग, पोस्टर्स, बैनर्स आदि सार्वजनिक एवं निजी स्थानों से हटा दिये गये हैं या ढक दिये गये हैं। वॉल राइटिंग के 3,40,387 पोस्टर्स के 28,54,084 बैनर्स के 9,71,583 तथा अन्य मामलों के 14,41,726 प्रचार-प्रसार से सम्बन्धित सामग्रियों को हटा दिया गया है। इसी तरह से निजी स्थानों से वॉल राइटिंग के 1,44,783 पोस्टर्स के 5,10,489 बैनर्स के 2,93,536 तथा अन्य मामलों के 2,19,700 प्रचार-प्रसार से सम्बन्धित सामग्री हटा दिये गये हैं। चुनाव के दौरान वाहनों, बिना अनुमति मीटिंग, लाउडस्पीकर एवं उत्तेजनात्मक भाषण तथा प्रलोभन आदि के 4,329 मामले प्रकाश में आये, जिसमें 1,946 प्रकरणों में एफआईआर दर्ज करायी गयी है। http://www.satyodaya.com

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