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संस्कृति

Chaitra Navratri 2020:राजा हिमालय की पुत्री हैं मां ब्रह्मचारिणी, जानें उनकी व्रत कथा

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लखनऊ। नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के मां ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से व्यक्ति को अपने कार्य में सदैव विजय प्राप्त होता है। मां ब्रह्मचारिणी दुष्टों को सन्मार्ग दिखाने वाली हैं। माता की भक्ति से व्यक्ति में तप की शक्ति, त्याग, सदाचार, संयम और वैराग्य जैसे गुणों में वृद्धि होती है।

मां ब्रह्मचारिणी पूजा मुहूर्त
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि का प्रारंभ 25 मार्च दिन बुधवार को शाम 05 बजकर 26 मिनट से हो रहा है, जो 26 मार्च दिन गुरुवार को शाम 07 बजकर 53 मिनट तक है। ऐसे में मां ब्रह्मचारिणी की पूजा गुरुवार सुबह करें।

मां ब्रह्मचारिणी पूजन विधि
चैत्र शुक्ल द्वितीया को आप स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं। उसके बाद मां ब्रह्मचारिणी की विधिपूर्वक पूजा करें। उनके अक्षत्, सिंदूर, धूप, गंध, पुष्प आदि अर्पित करें। अब ऊपर दिए गए मंत्रों का स्मरण करें। इसके पश्चात कपूर या गाय के घी से दीपक जलाकर मां ब्रह्मचारिणी की आरती करें। मां ब्रह्मचारिणी को चमेली का फूल प्रिय है, पूजा में अर्पित करें।

मां ब्रह्मचारिणी व्रत कथा
मां ब्रह्मचारिणी ने राजा हिमालय के घर जन्म लिया था। नारदजी की सलाह पर उन्होंने कठोर तप किया, ताकि वे भगवान शिव को पति स्वरूप में प्राप्त कर सकें। कठोर तप के कारण उनका ब्रह्मचारिणी या तपश्चारिणी नाम पड़ा। भगवान शिव की आराधना के दौरान उन्होंने 1000 वर्ष तक केवल फल-फूल खाए तथा 100 वर्ष तक शाक खाकर जीवित रहीं। कठोर तप से उनका शरीर क्षीण हो गया। उनक तप देखकर सभी देवता, ऋषि-मुनि अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि आपके जैसा तक कोई नहीं कर सकता है। आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगा। भगवान शिव आपको पति स्वरूप में प्राप्त होंगे।http://www.satyodaya.com

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चैत्र नवरात्र 2020: कैला मइया के दरबार में भक्त लगाएंगे कोरोना से बचाव की गुहार

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कोरोना वायरस के खौफ के चलते हर कोई बचाव में जुट गया है। 25 मार्च से कैलादेवी मंदिर से शुरू होने वाले चैत्र नवरात्र मेलों में आने वाले श्रद्धालुओं से अपील की कि अगर आपको खांसी-जुकाम या वायरल की शिकायत है तो भीड़ में लाइनों में लगने से बचें, घर पर ही रहें। लेकिन भक्त इस बार चैत्र नवरात्र में कैला देवी में कोरोना से बचाव की गुहार लगाएंगें। चैत्र नवरात्र 25 मार्च से शुरू होगा। चैत्र नवरात्र 10 दिन का समय शेष है। मां के दरबार में हाजिरी लगाने के लिए कई भक्त तो घरों से निकल भी पड़े हैं, जबकि अधिकांश भक्त बसौड़ा पूजन के बाद घरों से निकलेंगे। भक्त 230 किमी. की पदयात्रा सात से आठ दिन में पूरी करेंगे।

करौली में कैलादेवी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। 25 मार्च से चैत्र नवरात्र शुरू हो रहे हैं। इस नवरात्र में आगरा और आसपास के जनपदों से देवी मां के भक्त करौली देवी के लिए पदयात्रा करते हैं। आगरा में हजारों ऐसे भक्त ऐसे हैं, जो सालों से पदयात्रा कर माता के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं। कमला नगर निवासी राजेश प्रसाद और बल्केश्वर निवासी अमित का कहना है कि वह पिछले 10 साल से निरंतर कैला देवी के दरबार में हाजिरी लगाने जाते हैं। इस बार कोरोना वायरस के कारण उनके कुछ साथियों में असमंजस था, लेकिन माता रानी की कृपा से अब वह भी जाने को तैयार हैं, क्योंकि कैला मइया के दरबार में सभी के दुख दर्द दूर होते हैं।

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फतेहाबाद रोड स्थित एक होटल में रविवार को भक्तों को बसों से कैला देवी के दर्शन कराने के लिए वार्ता की गई। समाजसेवी अतुल तिवारी ने बताया कि पिछले आठ साल से भक्तों को कैला देवी दर्शन को ले जा रहे हैं। 24 मार्च को टीडीआई मॉल के पीछे स्थित होटल स्टार ऑफ ताज से बस निकलेगी। हजारों लोगों ने पंजीकरण कराए हैं। पिछली बार 26 बसों से दो हजार से अधिक लोगों को दर्शन कराया है। इस बार कैला देवी के दरबार में कोरोना वायरस से बचाव के लिए प्रार्थना की जाएगी। वार्ता के दौरान दिलीप तिवारी, विकास यादव, दुर्गेश यादव, देवेंद्र धाकरे आदि मौजूद रहे। http://www.satyodaya.com

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श्री कृष्ण की नगरी ब्रज में होली की धूम, देश व दुनिया के लोग रंगों में हुए सराबोर

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कृष्ण की नगरी में इन दिनों होली की धूम मची है। ब्रज के प्रसिद्ध श्री द्वारकाधीश मंदिर में होली महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। बसंत पंचमी से ब्रज में शुरु हुई होली का आनंद लेने के लिए देश के कोने-कोन से श्रद्धालुओं के यहां पहुंचने का सिलसिला जारी है। मंगलवार को बरसाना और सोमवार को नन्दगांव में लट्ठमार होली का कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद अब श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली लट्ठमार होली खेली जाएगी।

ब्रज की होली के बारे में कहावत है कि ‘सब जग होरी या जग होरा। ऐसा इसलिए क्योंकि यह 40 दिनों तक चलता हैं। ब्रज में बसंत पंचमी पर होली का डंडा गड़ने के साथ ही ब्रज के सभी मंदिरों और गांव में होली महोत्सव की शुरुआत हो जाती है। लेकिन खासतौर से होली महोत्सव फाल्गुन शुक्लपक्ष अष्टमी से यानी लड्डू फेक होली से शुरू होता है। यह इस बार 10 मार्च को है। होली के त्योहार को गोकुल, वृंदावन और मथुरा में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यहां रंग वाली होली से पहले लड्‌डू, फूल और छड़ी वाली होली भी मनाई जाती है। इसके बाद बरसाने और नंदगांव में लठमार होली का आयोजन होता है। ब्रज के होली कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए देश और दुनियाभर से श्रद्धालु आते हैं।

रंगों से होली की मस्ती में लोग झूमते हुए नजर आ रहे हैं। होली रसिया गायन होली गीतों के साथ पूरा वातावरण होली के रंगों में सराबोर हो गया है। मथुरा में होली का विशेष महत्व है। दरअसल गोकुल बालकृष्ण की नगरी है। यहां उनके बालस्वरूप को ज्यादा महत्व दिया जाता है। इसलिए श्रीकृष्ण के बचपन की शरारतों को याद करते हुए गोकुल मे छड़ीमार होली खेली जाती है। यहां फाल्गुन शुक्लपक्ष द्वादशी को प्रसिद्ध छड़ीमार होली खेली जाती है।

जिसमें गोपियों के हाथ में लट्ठ नहीं, बल्कि छड़ी होती है और होली खेलने आए कान्हाओं पर गोपियां छड़ी बरसाती हैं। मान्यता के अनुसार बालकृष्ण को लाठी से चोट न लग जाए, इसलिए यहां छड़ी से होली खेलने की परंपरा है। गोकुल में होली द्वादशी से शुरू होकर धुलेंडी तक चलती है। दरअसल, कृष्ण-बलराम ने यहां ग्वालों और गोपियों के साथ होली खेली थी। कहा जाता है कि इस दौरान कृष्ण भगवान सिर्फ एक दिन यानी द्वादशी को बाहर निकलकर होली खेला करते थे। गोकुल में बाकी दिनों में होली मंदिर में ही खेलने की परंपरा है।

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मथुरा- वृंदावन की दिलचस्प लड्डू फेक होली, जिसे देखने दुनियाभर से पहुंचते हैं लोग…

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HOLI SPECIAL: मथुरा, वृंदावन में होली के उत्सव की शुरुआत बसंत पंचमी से ही हो जाती है। बरसाने में लट्ठ, लड्डू और फूलों से भी होली खेली जाती है। लड्डू मार-मारकर होली खेलने की यह परंपरा काफी अनोखी होती है। होली तक यानि पूरे आठ दिनों तक ब्रज, मथुरा, वृंदावन में होली खेली जाती है। ब्रज में बसंत पंचमी पर होली का डंडा गड़ने के साथ ही ब्रज के सभी मंदिरों और गांव में होली महोत्सव की शुरुआत हो जाती है। यह 40 दिनों तक चलता है, लेकिन खासतौर से होली महोत्सव फाल्गुन शुक्लपक्ष अष्टमी से यानि लड्डू फेक होली से शुरू होता है। होली के त्योहार को गोकुल, वृंदावन और मथुरा में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यहां रंग वाली होली से पहले लड्डू, फूल और छड़ी वाली होली भी मनाई जाती है। ब्रज की होली में शामिल होने के लिए देश और दुनियाभर से श्रद्धालु आते हैं।

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द्वापर युग से हुई शुरुआत
लड्डू होली की परंपरा के पीछे एक पौराणिक कथा है कि द्वापर युग में बरसाने की होली खेलने का निमंत्रण लेकर सखियों को नंदगांव भेजा गया था। राधारानी के पिता बृषभानजी के न्यौते को कान्हा के पिता नंद बाबा ने स्वीकार कर लिया और स्वीकृति का पत्र एक पुरोहित जिसे पंडा कहते हैं उनके हाथों बरसाना भेजा। बरसाने में बृषभानजी ने नंदगांव से आए पंडे का स्वागत किया और थाल में लड्डू खाने को दिया। इस बीच बरसाने की गोपियों ने पंडे को गुलाल लगा दिया। फिर क्या था पंडे ने भी गोपियों को लड्डूओं से मारना शुरु कर दिया। तब लेकर आज तक इसे परंपरागत रूप से लड्डू और फूलो की होली बड़ी उत्साह के साथ मनाई जाती है।http://www.satyodaya.com

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March 26, 2020, 10:13 am
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