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संस्कृति

महिला दिवस विशेष: इतना मत घूरो कि फिर से किसी को ‘नंगेली’ बनना पड़े!!

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आज अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर हमारे लिए उस महिला के लिए जानना बहुत ज़रूरी है जिसने महिला होने का कर भरने के खिलाफ आवाज उठाई और कुछ ऐसा कर दिया जिससे उसका नाम न भूतो न भविष्यति की श्रेणी में लिखा गया।

आइए जानते हैं उस महिला के बारे में

औरतें बच्चों को दूध पिला रही हों या ऐसे ही खड़ी हों, जिनका काम घूरना है वो घूरेंगे। उनकी सोच वहीं जा कर बंध जाती है। उनकी मानसिकता बस उन स्तनों की गोलाई नापने भर ही है। इससे ज्यादा उनसे कोई अपेक्षा नहीं की जा सकती। अगर आप सवाल उठायें, लोगों को समझाएं तो आगे एक जवाब मिलता है कि औरतें भड़काऊ कपडे क्यों पहनती हैं, उनके सूट अथवा ब्लाउज का गला इतना गहरा क्यों होता है ? अभी हाल ही में स्तनों को ना घूरने को ले कर बड़ी बहस की जा रही थी। शायद ऐसी ही मानसिकता वाले कुछ लोग रहे होंगे जिन्होंने औरतों पर स्तन कर लगाया था। लेकिन अति का अंत अवश्य होता है और ऐसी सोच का अंत किया नंगेली नामक महिला ने।

तकरीबन सौ डेढ़ सौ साल पहले की बात है, यह वह दौर था जब केरल में निचली जाति की महिलाओं को अपने स्तन ढकने की इजाजत नहीं थी। एक तरह से ऐसे रहना उनकी पहचान बन गई थी। औरतों के पहरावे से यह अनुमान लगाया जा सकता था कि कौन किस जाति की औरत है। कोई महिला अपने स्तन तभी ढक सकती थी यदि वो ‘स्तन कर’ चुकाए। यह ‘स्तन कर’ त्रावणकोर के राजा ने लगाया था। ये निचली जाति के लोग खेती या मजदूरी कर के अपनी आजीविका चलाते थे। इस कारण से ऐसा कर चुकाना उनके लिए संभव नहीं था और यही वजह थी कि वो सभी औरतें अपने स्तन खुले रखती थीं।

इसी दौरान नंगेली नमक एक महिला ने इस कर के खिलाफ आवाज उठाई। उसने राजा के आदेश की नाफरमानी करते हुए बिना कर दिए अपने स्तन ढक कर चलने का फैसला किया। जब उस पर कर देने अथवा स्तन खुला छोड़ने का दवाब बनाया गया तो उसने हंसुली से अपने स्तन काट दिए। इस घटना ने उस समय के खोखले नियम कानून की जड़ें हिला दी थीं। दुर्भाग्यवश अधिक खून बह जाने के कारण नंगेली की मृत्यु हो गई। कहते हैं जब उसका दाह संस्कार हुआ तो उसके पति ने उसकी चिता में कूद कर अपनी जान दे दी। जिस जगह नंगेली ने अपने स्तन काटे थे उस जगह का नाम मुलच्छीपुरम यानी ‘स्तन का स्थान’ रख दिया गया। पर समय के साथ अब वहां से नंगेली का परिवार चला गया है और साथ ही इलाके का नाम भी बदलकर मनोरमा जंक्शन पड़ गया है। अफसोस नंगेली जैसी वीरांगनाओं का नाम इतिहास में कहीं दब कर रह गया।

भले ही आज किसी राजा का ऐसा फरमान ना हो लेकिन लोगों की घूरती नज़रें शायद यही कहती हैं कि या तो हमें घूरने की छूट दो या फिर स्तन कर दो। सौ, डेढ़ सौ साल बीत गए मगर कहीं ना कहीं कई लोगों की मानसिकता उसी दौर के इर्द गिर्द घूम रही है। http://www.satyodaya.com

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संस्कृति

झारखण्ड की धरती पर जन्मे थें वीर बजरंगी, गुमला में आज भी मौजूद माता अंजना की प्राचीन गुफा…

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सांकेतिक चित्र

बजरंगबली के साथ राजा बलि और सुग्रीव से भी जुड़ा है इतिहास

गुमला। देशभर में आज रामनवमी की धूम मची है।मान्यता है कि इसी दिन अयोध्या नरेश की पत्नी कौशल्या ने भगवन राम को जन्म दिया था।इसी दिन श्रीराम के प्रिय भक्त हनुमान की पूजा की जाती है।रामनवमी के मौके पर राज्य की छठा कुछ अलग ही देखने को मिलती है।ऐसा हो भी क्यों न आखिर झारखण्ड के गुमला जिले में ही श्रीराम भक्त हनुमान का जन्म हुआ था।गुमला जिले से करीबन 20 किमी दूर आंजनधाम में माता अनजाना ने वीर बजरंगी को जन्म दिया था।

प्रकृति की गोद में बसा आंजन गांव अति प्राचीन धार्मिक स्थल के रूप में विख्यात है।यहीं पहाड़ की चोटी पर स्थित गुफा में माता अंजनी ने भगवान हनुमान को जन्म दिया था।इसी धरोहर को सहेजने के लिए आज इस जगह पर अंजनी माता की प्रस्तर मूर्ति विद्यमान है।

1500 फीट से अधिक लम्बी इस गुफा का प्रवेश द्वार एक विशाल पत्थर से बंद था जिसे एक साल पहले खुदाई कर खोला गया है। इसी गुफा से माता अंजनी खटवा नदी तक जाती थीं और स्नान कर लौट आती थीं. खटवा नदी में एक अंधेरी सुरंग है, जो आंजन गुफा तक ले जाती है।रख-रखाव के अभाव में ये सुरंग जंगली जानवारों का डेरा बन चुकी है।

यह भी पढ़ें- ‘अस्मिता सम्मान’ से सम्मानित की गयी राजधानी की 12 महिलाएं, कहा- ‘हम नहीं हैं किसी से कम’…

इतना ही नहीं माता अंजना गांव में अत्यंत प्राचीन सप्त आश्रम, माता अनजानी का कोषागार भी मौजूद है। भगवान हनुमान की जन्म स्थली के अलावा गुमला जिले के पालकोट प्रखंड में बालि व सुग्रीव का भी राज्य था। यहां तक की शबरी आश्रम भी यहीं है, जहां माता शबरी ने भगवान राम व लक्ष्मण को जूठे बेर खिलाये थे. पंपापुर सरोवर भी यहीं है, जहां भगवान राम ने अपने भाई लक्ष्मण के साथ रुक कर स्नान किया था।http://www.satyodaya.com

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आज करें मां के आठवें रूप महागौरी की पूजा …

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नवरात्रि के आठवें दिन देवी महागौरी की आराधना की जाती है। मां  के इस रूप की पूजा से भक्तों को मनचाहे फल की प्राप्ति की होती है । कई भक्त इस दिन अष्टमी का व्रत रखते हैं इससे मां की पूजा-अर्चना करने वालों के हर कष्ट दूर होते हैं।

इस दिन अन्नकूट पूजा यानी कन्या पूजन का भी विधान है। कुछ लोग नवमी के दिन भी कन्या पूजन करते हैं लेकिन अष्टमी के दिन कन्या पूजन करना ज्यादा फलदायी रहता है । मां की पूजा करने से मनचाहे जीवनसाथी की मुराद पूरी होती है।

आइए जानते हैं मां महागौरी की पूजा से क्या लाभ मिलता है
कहा जाता है कि भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिये इन्होंने कठोर तपस्या की थी। इस दिन मां की पूजा करने से मनचाहे जीवनसाथी की मुराद पूरी होती है।महागौरी की आराधना से किसी प्रकार के रूप और मनोवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है और जीवन की अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का नाश होता है।

यह दिन हमारे शरीर का सोमचक्र जागृत करने का दिन है। सोमचक्र उर्ध्व ललाट में स्थित होता है। मां की आराधना से सोमचक्र जागृत हो जाता है और इस चक्र से संबंधित सभी शक्तियां श्रद्धालु को प्राप्त हो जाती हैं।

यह भी पढ़ें –आज करें भय से मुक्ति दिलाने वाली मां कालरात्रि की पूजा…

मां महागौरी के प्रसन्न होने पर भक्तों को सभी सुख स्वत: ही प्राप्त हो जाते हैं। साथ ही इनकी भक्ति से हमें मन की शांति भी मिलती है।मां की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता।http://www.satyodaya .com

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आज करें भय से मुक्ति दिलाने वाली मां कालरात्रि की पूजा…

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आज नवरात्री का सातवां दिन है और इस दिन मां दुर्गा के सातवें स्वरुप मां कालरात्रि की पूजा होती हैं। मां दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है। अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। इनके सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है।

इस देवी के तीन नेत्र हैं। यह तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं। इनकी सांसों से अग्नि निकलती रहती है। यह गर्दभ की सवारी करती हैं। ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती हैं। दाहिनी ही तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। यानी वो भक्तों को कहती हैं कि हमेशा निडर, निर्भय रहो। बायीं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है। इनका रूप भले ही भयंकर हो लेकिन यह सदैव शुभ फल देने वाली मां हैं। इसीलिए यह शुभंकरी कहलाईं।

कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं। यह ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।

यह भी पढ़ें -सर्वधर्म समानता की मिसाल हैं सद्दाम हुसैन, मंदिर की सेवा से इन्हें मिलता है सुख….

ऐसे करें सप्तमी की पूजा 

सप्तमी की पूजा अन्य दिनों की तरह ही होती है परंतु रात्रि में विशेष विधान के साथ देवी की पूजा की जाती है। इस दिन कहीं कहीं तांत्रिक विधि से पूजा होने पर मदिरा भी देवी को अर्पित की जाती है। सप्तमी की रात्रि ‘सिद्धियों’ की रात भी कही जाती है। माँ कालरात्रि के उपासना के लिए ये मंत्र बहुत शुभ हैं

ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तु ते।।
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोस्तु ते।।http://www .satyodaya.com

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April 19, 2019, 3:35 pm
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