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किस्सा कहानी

लाल आंखें (कहानी)   

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-धीरज झा 

किसी इंसान के अंदर छुपे जानवर ने उसके अंदर की इंसानियत को मार दिया था। नतीजन उस पर हावी हुए जानवर ने एक मासूम को अपने पंजे में दबोच लिया। कुछ दिनों से यही चर्चा शहर भर में घूम रही थी। दुर्भाग्य से ये जानवर अप्रवासी था। चुनाव सर पर थे और राजनीति को आप्रवासियों के मुकाबले स्थानीय लोगों से ज्यादा फायदा होने वाला था सो मरहम के नाम पर अप्रवासियों को लेकर स्थानीय लोगों के मन में जहर घोला जाना शुरू हो गया। आम तबके के लोग जल्दी इस जहर की चपेट में नहीं आते, उन्हें बस डर लगने लगता है। और दुर्भाग्य से जब ये डर सच बनता है तब ये जहर काम करता है। अभी फ़िलहाल शहर के माहौल में डर था। रात होते ही ये डर कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता था जो स्वाभाविक है।

लोग बाहर काम करने या पढ़ने वाली अपनी बहू बेटियों को हिदायत दे चुके थे कि घर जल्दी आना है। देश भर में हुई किसी भी घटना का असर सबसे पहले ऐसी महिलाओं पर ही होता है जो मर्यादा के अंदर रहना जानती हैं। राशन महंगा तो रसोई के लिए हिदायत, कहीं किसी बच्चे को कोई बहरूपिया उठा ले जाए तो बच्चों के लिए हिदायत, कोई वारदात हो जाए घर से न निकलने या घर जल्दी आने की हिदायत।  

उस रात रिम्मी को भी घर आने में देर हो गई थी। ऑफिस से घर यही कोई साढ़े चार किमी दूर था। आज तो माधव भी घर नहीं था जो उसे पिक कर लेता ऑफिस से। वैसे तो रिम्मी साहसी लड़की थी लेकिन शहर भर में मंडरा रहे इस भय ने उसे भी आशंकित कर दिया था। मगर अब चारा भी तो कोई नहीं था। जो होगा देखा जाएगा जैसा मन बना कर रिम्मी ऑफिस से निकल कर चौराहे पर पहुंची। दिन में जो सड़क एक मिनट नहीं शांत रहती रात आते आते तक सन्नाटे से जुगलबंदी कर बैठी थी।

अंधेरा रिम्मी को रह रह कर चुनौती दे रहा था। उसकी चुनौती स्वीकार करने के सिवा कोई और चारा भी तो नहीं था न रिम्मी के पास। इतनी देर में उसे एक रिक्शे वाला आता दिखा। उसने हाथ दिया, लेकिन जैसे ही रिक्शेवाला पास आया रिम्मी सहम सी गई। सहमे भी कैसे न, उसकी शक्ल सूरत ही ऐसी थी। उसकी लाल लाल लटकी हुई आंखें बता रही थीं कि उसने किसी चालू नशे का हद से ज्यादा सेवन किया है। बाल बिखरे हुए, रंग ऐसा कि रात का अंधेरा उसके आगे चमकदार लगे, सर पर ताज़ा ताज़ा किसी गहरी चोट का निशान जैसे बता रहा हो कि इसने अभी अभी मार खाई है।

“कहां जाईब मैडम जी…”

“अं…..!!!”

“बताइए कहां छोड़ दें।” रिक्शेवाले की आवाज में थरथराहट सी थी। इसने रिम्मी को और डरा दिया।

“न न नहीं कहीं नहीं जाना है।” रिम्मी ने हडबडाते हुए कहा। कई मौकों पर शरीर के अंग दिमाग के आदेश का इंतजार नहीं करते जिस तरह रिम्मी के बाएं हाथ ने नहीं किया और झट से पहले से सही दुप्पटे को सही करने की कोशिश की।

“समय पहिलहीं बहुत जादा हो गया है। जईसे जईसे बेर (समय) बीतेगा साथ साथ आने जाने का साधनों कम होता जाएगा।” रिक्शेवाले ने समझाने की कोशिश की।

“नहीं नहीं, मुझे कोई लेने आ रहे हैं। मुझे नहीं जाना।” मगर वो नहीं मानी

“अरे अच्छा हुआ भईया आप दिख गए वरना दिक्कत हो जाती, अजीमपुर तक जाना है।” इन दो आवाजों के बीच तीसरी आवाज गूंजी। किसी अन्य सवारी की थी।

“माफ़ करिए बाबूजी, उधर नहीं जाएंगे। आप आगे से कोनो औरो रिक्शा पकड़ लीजिए, ऊहां से अजीमपुर जाने का बहुते सबारी मिल जाएगा।” दूसरी सवारी रिक्शेवाले के इनकार से आगे बढ़ गई। इसके बाद तो रिम्मी का संदेह यकीन में बदल गया। हो न हो ये गलत आदमी है इसीलिए इसने उस आदमी को ले जाने से इनकार किया। रिक्शेवाला वहीं एक बगल में रिक्शा खड़ा कर टहलने लगा।

15 मिनट बाद

“मैडम जी कोई नहीं आया आपको लेने, आप कहें तो आपको छोड़ दूं, रात जादा हो गया है।” इतनी देर में रिम्मी ने किसी से मदद मांगने के लिए अपना फोन निकला मगर बुरे समय में फोन भी साथ छोड़ गया। इसके साथ ही रिक्शेवाले की लाल लाल आंखें उसे लगातार खुद को ही घूरती नज़र आ रही थीं। उसके मन में बैठ गया कि आज उसके साथ कोई अनहोनी होनी तय है। सोच में पड़ गई थी रिम्मी।

रिक्शेवाला समझ गया, वो धीरे धीरे रिम्मी की तरफ बढ़ा। अपने पीठ पीछे से उठ रही कदमों की आहट को पास आता महसूस कर रही थी रिम्मी। जब तक रिक्शेवाला उसके नजदीक आता तब तक वो एक दम से पलटी। रिक्शे वाला उससे कुछ ही दूरी पर था। उसका दायां हाथ पीछे की तरफ कुछ इस तरह था जैसे वो कुछ निकल रहा हो। रिम्मी समझ गई की उसका कल्याण नहीं आज। वो अपनी पूरी ताकत लगा कर रिक्शेवाले पर झपटने को एक दम तैयार थी लेकिन जब तक वो झपटती रिक्शेवाले ने वो निकाल लिया जिसके लिए उसने हाथ पीछे किए थे। रिम्मी ने खुद को वहीं रोक लिए। रिक्शे वाले के हाथ में उसका पर्स था। उसने पर्स में से अपना आई डी कार्ड निकाला।

“मैडम जी, हम जानते हैं माहौल बहुत ख़राब चल रहा है, हम जैसा बाहर से आया लोग को लेकर तो औरो जादा ख़राब है। अपना ही देस में हम लोग दुसमन दिखने लगे हैं सबको। लेकिन मैडम जी आपका इहां अकेले रुकना भी सही नहीं है न। थोडा देर में आपको एको सही आदमी नहीं मिलेगा इहां, नसेड़ी सब का हुडदंग शुरू हो जाएगा। आप हमारा आधार कार्ड और हमारा फोटो खींच के अपना घरवाला सब को भेज दीजिए। या फिर भी मन न माने तो 100 नं पर फोन लगा के बता दीजिए कि हम यहां से यहां जा रहे हैं अगर हम 20 मिनट में दोबारा फोन न करें तो…” रिम्मी जान रही थी कि ये साजिश भी हो सकती है भोला बन कर उसे फंसाने की मगर फिर भी न जाने क्यों उसके विचार उस रिक्शेवाले के लिए बदलने लगे। वो उसकी बात पूरी होने से पहले ही चुप चाप रिक्शे पर ये सोच कर बैठ गई कि अब कोई रास्ता नहीं, हो सकता है ये मुझे घर भी पहुंचा दे लेकिन यहां खड़ी रही तो पक्का कुछ बुरा हो जाएगा। जो होगा देखा जाएगा।

रिक्शेवाले ने उसे रिक्शे पर बैठता देख चैन की सांस ली। वो भी पीछे से रिक्शे की काठी पर जा बैठा। रिक्शेवाला बिना कुछ बोले रिक्शा खींचता रहा। रिम्मी बस यही प्रार्थना करती रही कि आज वो सही सलामत घर पहुंच जाए। कल से इतनी रात तक ऑफिस में रुकेगी ही नहीं।

सर्दियों के आने की दस्तक के साथ हवा में नमी बढ़ गई थी। दिन भले ही शर्ट में कट जाता लेकिन रात को किसी पतली चादर या मोटे कपडे की जरुरत पड़ ही जाती। रिक्शेवाला एक शर्ट में ही रिक्शा खींचे जा रहा था। जैसे जैसे रिम्मी का घर नजदीक आ रहा था वैसे वैसे उसकी जान में जान वापस आ रही थी। पूरे 20 मिनट रिक्शा खींचने के बाद उसने रिम्मी को घर पहुंचा दिया। अब रिम्मी एक दम सुरक्षित महसूस कर रही थी खुद को।

वो रिक्शे से उतरी और रिक्शेवाले की और पैसे बढ़ाते हुए कहा “शुक्रिया आपका। आप न आते तो न जाने कैसे घर पहुंचती।”

“कोनो आता नहीं मैडम जी, ईश्वर भेज देता है और हम तो आपका शुक्रिया कहेंगे जो आपने हमको ईश्वर का हुकुम पूरा करने का मौका दिया।”

रिम्मी के चेहरे की मुस्कराहट लौट आई थी, उसने तंज सा मारते हुए कहा “आपकी बातों से तो आप बहुत धार्मिक और अच्छे इंसान लग रहे हैं फिर इतना नशा क्यों करते हैं। इसी नशे की वजह से तो मैं डर गई थी। परिवार का सोचिए। ये लाल लाल ऑंखें बता रही हैं कि आपने नशा लेने की हद कर रखी है।”

इस पर रिक्शेवाला मुस्कुराया “मैडम जी एक कहावत है कि गरीब का बच्चा जब दो दिन खाना न खाने पर कमजोरी के मारे लडखडाता चलता है तो लोग कहते हैं इसने दारू बहुत पिया है। वही हिसाब हमारे साथ है। नशे को तो हम आज तक छुए नहीं।”

“फिर ये आंखें क्यों लाल हैं आपकी?”

“बेटी के इस्कूल का फीस देना है। पिछला महीने का 5, 7 दिन बीमारी खा गया, एक रुपया का काम नहीं कर पाए। अब इस्कूल या घर का खर्चा बीमारी का बहाना थोड़े न मानता है। इहे कारण है कि अभी रात दिन काम कर रहे हैं। चार रात से एक मिनट नहीं सोए हैं इहे कारण आंख लाल है। दो दिन पाहिले का बात है चक्कर खा के गिर पड़े सर पर चोट लग गया. अब पहिले जईसा बात कहां रह गया. लेकिन हमारा क्या है, हमारा चोट और हम तो ठीक हो ही जाएंगे लेकिन बच्चिया को इस्कूल से निकाल दिए तो उसका मन टूट जाएगा। बहुत आगे बढ़ना है उसको न, इसी लिए चाहते हैं उसका मन नहीं टूटे।” रिक्शेवाले की बात सुन कर रिम्मी उसकी आंखों में देखते हुए खुद का शर्मिंदा हो रहा चेहरा देख रही थी। असल में गलती रिम्मी की भी नहीं थी। समाज में छुपे भेड़ियों का डर लोगों पर इतना हावी हो गया है कि अब आंखें सही और गलत पहचानने में अकसर गलती कर जाती हैं। रिम्मी कुछ बोल ना पाई।  

“कित्थे रह गई सी रिम्मी। किन्नी देर ला दित्ती। उत्तों तेरा फोन वी नइ सी लग रेहा। असीं तां डर ही गए सी, तेरे बाऊ जी चल्ले सी तेनू लब्बण। नाले आ कौन आ ?” दोनों के बीच में एक बूढी मगर फिकरमंद आवाज ने एंट्री की थी जिसने एक साथ ही कई सारे सवाल पूछ डाले थे।

“बीजी इन्होने ही मुझे आज घर तक पहुंचाया है वरना सच में डरने वाली बात हो जाती।” रिम्मी ने उन बुजुर्ग महिला से लिपटते हुए सारी बात बताई।

“जींदे रहो बेटा जी, वाहेगुरु आपको खूब तरक्की दे। अंदर आओ चाय पी लो फिर जाना।” भारत में मेहमानों को चाय पूछने का कोई समय निर्धारित नहीं है। ये आश्चर्य है कि अभी तक चाय को भारत का राष्ट्रीय पेय क्यों नहीं घोषित किया गया। खैर रिक्शेवाले ने देरी का बहाना कर चाय की बात टाल दी और अपना रिक्शा मोड़ने लगा।

“मेरा नंबर रख लीजिए, किसी मदद की जरुरत हो तो बताइएगा।” रिम्मी ने अपना कार्ड रिक्शेवाले की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

रिक्शेवाले ने रिम्मी से उसका कार्ड लिया और जेब से पेन निकालते हुए कार्ड के पीछे एक नंबर लिख कर कार्ड को दोबारा उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा “मैडम जी मदद लेने की आदत नहीं डाली हमने। हम मानते हैं मदद मांगना इंसान को कमजोर कर देता है और वैसे भी आप एक बार मदद कर सकती हैं बाकी तो हमें ही देखना है। हां हमने आपके कार्ड पर अपना नंबर लिख दिया है। कभी भी देर हो जाए तो हमें फोन कर दीजिएगा। हम आसपास हुए तो ठीक नहीं तो हम किसी भरोसेमंद को भेज देंगे।” इतना कह कर रिक्शेवाला मुस्कुराते हुए रिक्शे पर सवार हो गया।

इधर रिम्मी अपने उस मददगार को हैरानी से देखते हुए बीजी के साथ अपने घर की ओर बढ़ चली। चलते हुए बीजी ने रिम्मी से कहा “और कुछ ‘कंजर’ लोग कहते हैं भइये (पंजाब में बिहार यूपी के उन लोगों को भइया बोला जाता है जो रिक्शा चलाने, सब्जी बेचने,या मजदूरी करते हैं) बुरे होते हैं।” बीजी की बात ख़तम होने के साथ ही रात के उस शांत से माहौल को एक ठहाके ने गुदगुदी की। ये ठहाका रिक्शेवाले का था जो रिक्शे के आगे बढ़ने के साथ साथ गायब हो गया।

नोट : ये कहानी केवल पंजाब या फिर वहां रोजी रोटी की तलाश में गए यूपी बिहार के लोगों के विषय में नहीं। ये कहानी है हर उस इंसान की जो अपना घर छोड़ कर किसी दूसरी जगह जाता है और अपने जैसे किसी एक की गलती के लिए वहां रह रहे सब लोगों की नफरत झेलता है। आंख बंद कर विश्वास करना सही नहीं तो फिर आंख बंद कर अविश्वास कैसे सही हो सकता है ?

फीचर इमेज : गूगल से साभार 

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पगार (कहानी)

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सुबह – सुबह जहां पूरी दुनिया रंगो में डूबी थी, वहीं मैं थोड़े से रंग लगाकर, होली मनाकर अपनी कुर्सी में आराम फ़रमा रहा था ।

चाय की चुस्कियां लेते हुए, बिस्कुट को हाथ में लिए, इलेक्शन्स की खबरें सुन ही रहा था तभी दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी ।

मैं उठकर बढ़ा ही था कि फिर से किसी ने खटखटाया ।

मैंने सोचा बेल नहीं बजाने के दो कारण होंगे

या तो उसे पता नहीं होगा की इस घर में डोर-बेल भी है, या तो कोई बच्चा होगा जिसकी नन्ही बाहें वहां तक पहुंच नहीं रही होंगी ।

मैंने ज्यों ही दरवाज़े खोलने को हाथ बढ़ाया तो उसने फिर से लेकिन अबकी बार ज़ोर से दरवाज़े को खटखटाया ।

मैंने बोला, “अरे भाई! आ रहा हूं, आ रहा हूं ” ।

जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला, एक छोटी सी बच्ची सामने खड़ी थी ।

पसीने से लथपथ, आंखों में आंसू और डर साफ झलक रहा था ।

अपने नंगे पैर धूप में जलाते हुए लगता है दौड़कर आई थी ।

मैंने पूछा, “क्या बात है बच्चे, क्या हुआ?”

बच्ची की ज़ुबान से लफ्ज बाहर आना तो चाहते थे मगर आ नहीं पा रहे ।

मैंने फिर से पूछा की, “बोलो बच्चे बात क्या है? तुम होली क्यो नहीं खेल रही और बच्चों के साथ?”

उसने फिर हिम्मत जुटाकर कहा कि, “बाबूजी वो मैं-मैं, वो आज मां काम पे नहीं आ पाई, उसकी तबीयत ठीक नहीं, तो आज मैं झाड़ू – बर्तन कर दूं ?”

वो जो वक़्त, जो लम्हा था मेरे लिए जुबां से बता पाना मैं सही नहीं समझता ।

मैंने उसकी आंखों में डर और दर्द दोनो देखें ।

मैंने कहा, “ज़रा रुको, कहीं जाना नहीं”

मैं अंदर गया और कुछ पैसे और दवाइया लाकर उसे दी और बोला, “ये जाकर अभी अपनी मां को खिला दो और कहना की हम उससे मिलने आ रहे ।”

उसके चेहरे पर मुझे एक शांति दिखी । मैंने जरा सा गुलाल लिया और उसके चेहरे पर लगा दिया ।

वो खुश हो गई और उसकी खुशी देखकर मुझे चैन मिला ।

मैंने कहा, “अब तुम घर जाओ” और दरवाज़ा बंद करके मैं अंदर गया ही था की फिर से किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी ।

मैंने दरवाज़ा खोला तो देखा फिर वही बच्ची ।

मैंने पूछा, “क्या बात है बच्चे?”

तो वो हांफते – हांफते कहती है, “बाबूजी! तुम पगार तो नहीं काटोगे ना?”

अमित सोनी

फोटो साभार: गूगल

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एक फौजी के मन की ‘आखिरी’ बात : कह दीजिएगा दोमुंहे सांपों से ‘फौजी का जोश हमेशा हाई रहता है’…

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धीरज झा

सन्न्न्नन्न्न्नन्न………………..

कईसे एक क्षण में सब कुछ बदल जाता है न! बस कुछ मिनट पहिले ही तो हम कोमल से बतिया रहे थे। कोमल हमारी जान, हमारी पत्नी। बहुत सीधी है बेचारी। हमको अच्छा से याद है जब बियाह के घर आई थी हमारे तो एक दम डरी सहमी सी थी। हा हा हा…एक बात याद आगया। पर्सनल है, लेकिन आपको बता दे रहे हैं। सुहागरात में जब हम कमरा में गए न तो हमारा हाथ पैर में बिलकुल वईसा ही कंपकप्पी दौड़ रहा था जईसा दसमा में पहिला बार रधिया को अपने दिल का हाल लिख के देते हुए दौड़ा था। रधिया हमारा बचपन आ जवानी का पहिला और आखरी प्यार थी, जिसका अंत हमारा दिया चिट्ठी के हेडमास्टर साहब के हाथ लग जाने और फिर उनके द्वारा जुतियाए जाने के बाद हो गया था। गुस्सा तो हमको बहुत आया था, मन हुआ था बोक्सिंग मार के हेडमस्टरवा का पेट फोड़ दें लेकिन फिर हमको बाबू जी का चंडाल रूप याद आ गया तो हम चुप चाप मार खा लिए। उसके बाद हम फैसला कर लिए थे कि ससुर ई सब लफड़ा में हमको पड़ना ही नहीं है।

लेकिन जब हम बियाह के लिए भेजा गया कोमल का फोटो देखे न तो साला लगा जईसे हमारे उजाड़ खंडर मन में कोनो गुलाब रोप दिया हो। हमको प्यार हो गया कोमल से। हालांकि इस बार ये डर नहीं था कि कोमल हमारे प्यार के इजहार का शिकायत हेडमास्टर से कर देगी लेकिन फिर भी हमारा हाथ पैर कांप रहा था। हम डरते डरते पलंग तक पहुंचे थे। इस बीच हम दोबार टकराए। एक बार ड्रेसिंग टेबुल से दूसरा बार पलंग से। कांपते हाथ पैर आ जोर जोर से धड़कते दिल के साथ हम कोमल के नजीक पहुंचे ही थे कि देखे वो भी कांप रही थी। कांप क्या वो तो रो भी रही थी। जनाना सब को गांव में हल्ला मचाते तो देखे थे बहुत बार लेकिन अईसे रोते पहिला बार देख रहे थे।

हमको बिलकुल नहीं बुझा रहा था कि हम क्या करें। पानी दिए, कितना देर समझाते रहे कि रो मत, पूछे भी कि काहे रो रही हो। हमको लगा घर का याद आ रहा होगा बेचारी को, तो हम ये भी बोले कि बिहाने तुमको घर छोड़ आएंगे। जब मन करेगा तब आना। केतना देर पोल्हाने, समझाने के बाद उसका रोना बंद हुआ। ऊ रात हम दोनों बतियाते रह गए या अईसे कहें कि हम बोलते रहे और वो पहले रोती रही फिर शांत हुई फिर मुस्कुराने लगी और सुबह की पहली किरण के साथ उसकी हंसी किसी प्रकाश पुंज की तरह पूरे कमरे में फ़ैल गई। हमारा रात भर टेपरिकॉर्डर की तरह बजना सफल रहा।

कुछ दिन बाद जब उसको भी हमसे प्यार हो गया तो हम पूछे कि ऊ रात काहे रो रही थी तो वो बताई कि उसको फौजी लोग सबसे बड़ा डर लगता है। हमको बहुत जोर से हंसी आ गया था। वो बताई थी हमको कि उसको फौजी लोग सबसे ठीक वैसा ही डर लगता है जैसे बचपन में बच्चा सबको माहटर साहेब से। और तो और उसकी सहेली बताई थी उसको कि फौजी लोग बहुत दारू पीते हैं आ बात बात पर गुस्सा जाते हैं। हम दो पलंग तक आते आते दो बार टकराए थे न तो उसे लगा था कि हम नशे में टुन्न हो के आये हैं। इसको ही कहते हैं “गरीब के लईका भूखे मरे आ लोग कहे कि दारु पी के टेंढिया रहा है।” उसको का पता हम तो साला उस दिन कुछो खायेबे नहीं किए थे। हम दोनों बहुत हँसे थे ई सब बात बतिया के।

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कोमल से बियाह होने के बाद हमको लगा जईसे रधिया हमारा प्यार इसीलिए स्वीकार नहीं की थी। हमारा जिंदगी में कोमल को जो आना था। अभी थोडा देर पहिले कोमल हमसे फोन पर कह रही थी कि बाबू जी नेहिया के बियाह को लेकर बहुत चिंता में रहते हैं। कल तो बीपियो बढ़ गया था। अम्मा उनको समझाई हैं कि बेटवा सब संभाल लेगा, आप अपना सेहत पर ध्यान दीजिए। अम्मा को हम पर हमेसा से बिस्बास रहा है। ऐसा नहीं कि बाबू हम पर बिस्बास नहीं करते। अईसा होता तो बिसेसर कका के बात पर वो हमको इंटर के बादे उनका संघे बम्बई पेठा दिए होते। उस समय घर का इस्थिति भी तो एकदम्मे से गड़बड़ाया था लेकिन बाबू जी हमारा सनक जानते थे उनको पता था कि हमारे अंदर कुछ औउरो ही चल रहा है। उनको हम पर बिस्बास था तभिये ऊ हमारे लिए खेत बेचे। लेकिन बाप के लिए उनका बेटा हमेशा नादान ही रहता है न इसीलिए डर जाते हैं। मगर उनको क्या पता हम इधर सारा तैयारी किए बईठे थे।

कोमल बोल रही थी कि जल्दी आइएगा। आपको पपा कहने वाला बौउआ कोनो बेरिया आ सकता है। पगलिया है एक दम वो। सब सोच ली है कि बेटा होगा तो क्या नाम रखेंगे, क्या बनाएंगे और बेटी होगी तो उसका क्या नाम होगा, क्या बनेगी। हम कह दिए थे कि छुट्टी का जुगाड़ बना लिए हैं जल्दीए आएंगे। असल में जानते हैं उसका एक ठो ख्वाहिस है कि जब हमारा बच्चा दुनिया में आने वाला हो न तो हम उसके साथ रहें। उसको डर लगता है, कहती है बहुत दुखाएगा, आप नहीं रहेंगे तो हम मरिए जाएंगे। हमको भी मन है कि हम ऊ टाइम उसके साथै रहें।

इधर नेहिया हमारा जान खाई है। पिछला बार छुट्टी नहीं मिला था हमको राखी में, बहुत दिन तक हमसे बात नहीं की थी और आखिर में इस शर्त पर मानी कि अगला साल हमको आना ही होगा। अईसे जिद्द करती है न तो मन करता है मुकिया दें पहिले की तरह लेकिन अब वो बड़ी हो गई है और ओइसहियो उसका अधिकार है हम पर। हम वादा किए थे कि हम इस बार राखी पर जरुर आएंगे, पक्का। नहीं गए तो वो पगली लड़की खाना पीना छोड़ के बैठ जाएगी। फिर उसको मानाने के लिए हमारा दम निकल जाएगा।

यही सब कारण से इस बार महीना भर का छुट्टी लेने का सोचे थे। अम्मा को अब आंख से बिल्कुले नहीं सुझाता है। बाबू अन्हरी कह के चिढ़ाने लगे हैं। दोनों मियां बीबी एक नंबर के आलसी हैं डेढ़ साल से कह रहे हैं दिखा देते हैं आंख लेकिन ऊ है कि मनबे नहीं करती। कहती हैं जाता है आंख तो जाता रहे, हमको कौन सा कलक्टर का पढ़ाई पढ़ना है। लेकिन सोचे थे इस बार हम पोल्हा पुचकार के ले जाएंगे आंख देखाने। बाबू जी का बीपियो चेक करना था। सबसे जरुरी तो था घर का मरम्मत कराना। पुराना हो गया है न, जब जब मेघ बरसता है तब तब छत रोने लगता है। अपना तक तो ठीक है लेकिन कोनो पाहून आ जाए तो अच्छा थोड़े न लगता है।

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नेहिया का शादी इस बार तय कर देना था हमको, आ चईत बईसाख तक उसका हाथ पीला कर देते। हमको जल्दी नहीं था लेकिन बाबू जी टेंसनिया जाते हैं। सही बताएं तो हम बचपन से खूब बहादुर रहे तभिये तो यहां मौत के सामने रोज सीना तान खड़े हो जाते थे लेकिन बाबू के आँख का पानी ससुर हमको कमजोर कर देता है। बहुत जतन से बड़ा किए हैं हमको। एगो किसान जब अच्छा आ जिम्मेदार बाप होने का ठान लेता है न तो उसका जिंदगी बहुत जादा कठिन हो जाता है।

सब सोचे बैठे थे, यही सब कोमल से बतिया रहे थे। गाड़ी कश्मीर घाटी की तरफ बढ़ रहा था। हम कौनो बात कहे, कोमालिया खूब जोर जोर से हंसी। उसकी हंसी की खनक हमारे रोम रोम में समां ही रही थी कि एक दम से धमाका हुआ। इसके बाद खाली सन्न्न्नन्न्न्नन्न का आवाज आ रहा था। कुछ नहीं दिख रहा था। हम कहाँ थे हमको खुद नहीं पता लगा। हिम्मत की उठाने की लेकिन उठ नहीं पाए। थोडा दम लगाए और खट से उठ खड़े हुए। लेकिन साला देह में जान नहीं बुझा रहा था। लग रहा था जैसे हवा से भी हलके हो गए हैं। धुआं धीरे धीरे हटा। हमारे सामने सुब्बू था नहीं नहीं सुब्बू नहीं सुब्बू का हाथ था बस। वो हाथ पर धागा बांधता था उसी से पहचाने थे उसको। वो खुद अपने हाथ से दस मीटर दूर पड़ा था। हम भागे उसकी तरफ उसको उठाने का कोशिश किए लेकिन उठा नहीं पाए। हाथ आर पार हो गया। हम सन्न रह गए। ई का होगया हमारे साथ। पीछे से किसी ने आवाज दिया। हम घूम के देखे, सामने सुब्बू था, मुस्कुराता हुआ। समझ नहीं आ रहा था हो क्या रहा है। हम उससे पूछ रहे थे लेकिन वो बस मुस्कुरा रहा था। हम जहां खड़े थे वहां देखे, हमारा पेट से ऊपर आ गर्दन से नीचे का हिस्सा वहां पड़ा था।

न न न….ई नहीं हो सकता। अईसे कईसे, अभी अभी तो हम कोमल से बात कर रहे थे, ये एक मिनट में क्या हो गया। हमने खोजना शुरू किया। देखा वो दूर हाथ है हमारा। हमको याद आया भक्क से अब नेहिया खाना नहीं खाएगी। कंधा था हमारा सोचने लगे अब कोमालिया सर कहां टिकाएगी। सर कहीं नहीं दिख रहा था। उसका मिलना जरुरी था ऊ बाबू जी का हिस्सा है, ‘ऊ हमेशा कहते थे तुम्हारा सर ही हमारा गर्व है, ये कभी झुकने न पाए। जिस दिन ये झुका समझना हमरा गर्व मर गया।’ हमारा सर मिलना बहुत जरुरी था। हम अपना धड़ के पास बैठ, अपना दिल छूने का कोसिस करने लगे। उहां अम्मा रहती हैं, हम देखना चाह रहे थे कि अम्मा ठीक हैं न लेकिन दिल अब कहां जवाब देने वाला था।

मरने से हमको कहां भय लगता था लेकिन अईसे मरना नहीं चाहते थे। परिवार के लिए करना तो बहुते कुछ था लेकिन ये सब हमारी प्राथमिकता कभी थी ही नहीं। इतना सब सोचते तो भर्ती काहे होते। हमको दुःख हमारे सपने के टूटने का हो रहा था। अभी साल भर पहिले जब हम अपना दोस्त शहीद गुरुसरन का बॉडी देखे थे तो दुःख के साथ जलन भी हुई थी। जलन का कारण था कि वो हमसे पहले अपना मन का कर लिया था। तीन आतंकियों का देह छलनी बना के फिर छोड़ा था अपना आखरी सांस उसने। उस दिन हम सोचे थे इस गुरुसरनवा का रिकार्ड तोड़ेंगे लेकिन साला ई कायर लोग मौका नहीं दिया हमको। सामने से आना चाहिए था इनको फिर भले साला अपना पूरा फ़ौज के साथ हमसे भिड़ जाते। जितना जादा आतंकवादी होता हम उतना जादा को निपटाते लेकिन ई साला सब हमसे हमारा सपना छीन लिया।

बाकी हमारी कोमालिया बहुत बहादुर है, सब संभाल लेगी। हां एक ठो दुःख और है कि हमारे बच्चा को जनम देते हुए अब हम कोमाल का हाथ नहीं पकड़ पाएंगे। चलो भाई हम चलते हैं लगता है ऊपर से दूत सब आ गया हमको लेने। हां, एक ठो और बात। हमारे जाने के बाद कुछो करिए, बस राजनीति मत करिएगा, बिनती है आप सबसे। हम देश के लिए अपना जान देते हैं, हमारा चिता से उठ रहा धुआं हमें अपनी देश की हवा में मिलाने के लिए उठता है, हमारी राख देश की मिट्टी में मिट्टी हो जाने के लिए होती है। इस पर हमें हमेशा गर्व रहेगा और आप सब इस गर्व की लौ पर किसी को रोटी नहीं सेकने दीजिएगा। एक फौजी कभी नहीं मरता जब तक उसकी आत्मा पर वार न किया जाए। शारीर की हम कभी परवाह नहीं करते बस आप लोग हमारी आत्मा बचाए रखिएगा। परिवार के लिए कुछो नहीं कहेंगे, काहे ऊ लोग को अच्छे से पता है कि हम क्या चाहते थे और हमारे बाद उनको क्या करना है।

और हां, कह दीजिएगा उन दोमुंहे सांपों से कि सैनिक का जोश साला हमेशा हाई रहता है…         

अब चलते हैं

जय हिंद

भारत माता की जय

आपका फौजी भाई 

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किस्सा कहानी

किस्सा उस अबूझ लड़की का…

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ऋचा द्विवेदी

बहुत सालों पहले उसने बड़े जतन से तिनका तिनका जोड़ अपना नीड बनाया था। जिसे लोगों की बुरी नज़र से बचाकर रखना उसका ख़्वाब था। अनगिन धूप, मेह से नीड को साल दर साल बचाती पर अब हालात ये थी कि हर बारिश में पानी बहकर अंदर चला आता था और बारिश थी कि हर लम्हा ही आती थी। वो लड़की जो सिर्फ खिड़की से ही बारिश देखा करती थी। अब उसकी आंखें हमेशा बारिश से सीली रहने के कारण उजड़ी सी रहने लगीं थीं।

खिड़की के इस छोर पर खड़ी लड़की की उदास आंखों में हमेशा समंदर तैरता रहता था। उसे नीर भरी अपनी आंखों से बेहद लगाव होने लगा था। ठीक वैसे ही जैसे होठों पर ठहरी एक बूंद ओस से प्रेमी को होता है। वो अक्सर अपने अकेलेपन में दीवार से सिर टिकाकर रोती थी। खिड़की किनारे सीली आंखें कोई देख न ले, कोई भांप न ले उन आसुओं को, इस वजह से सारे खिड़की दरवाजे बंद कर घुप्प अंधेरे में रहना ही उसे जीवन लगने लगा था। आंखें खाली तो नही हुईं थीं उसकी पर बात बेबात तुनकने वाली शरारती लड़की अचानक से शांत हो गयी थी। उसी साल पहली बार आये तूफान के कारण पानी उसके नीड में रिसना शुरू हुआ था।

लड़की ने बहुत कोशिश की टाट के बोरे, प्लास्टिक के दरवाजे और भावनाओं के बांध से तूफान को अंदर आने से रोकने की पर ये तूफान भी आंखों के पानी जैसे बांध में एक सुराख ढूंढ ही लेता था। अगले साल तो तूफान उसका सब बहा ले गया। उसकी समंदर आंखों का वो पहला साल था कि उन्होंने महसूसना ही बंद कर दिया, नंगे पाँव ही चलना शुरू कर दिया। वो पहला साल ही तो था जब बारिश के बाद धूप नहीं निकली थी। सीधे कोहरा गिरने लगा था। वो पहला ऐसा साल भी था जब वसंत में उसकी खिड़की पर टेसू के फूल नहीं मिले थे।

उसने वसंत के कुछ दिन खुद को बहलाए रखा कि शायद में जंगलों की कटाई हो गयी हो, भू माफिया ने जमीन पर मकान बना दिए हों। वो चाह कर भी नहीं सोच पायी की वो लड़का जिसका कि नाम सूरज था और जिसने कि वादा किया था, उसके लिए हर वसंत टेसू के फूल लाने का। वो अब बहूत बड़ा अधिकारी है और चाहे उसे हर चीज़ के लिए फुर्सत मिले, हर सुख सुविधा उपलब्ध हो, वो अब उसके लिए टेसू नहीं लाएगा। लड़की को यक़ीनन सुकून होता जान कर कि जिसे वो हर लम्हा उम्मीद बंधाती आई है उसके सपने सच हो गए।

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लड़की के कुछ अपने सपने भी थे। होली में टेसू के फूल के बिना रंग नहीं बने। होली फीकी रह गयी, वो इतनी बेसुध थी कि मालपुए में चीनी, दही बड़े में नमक, सब भूल गयी। उसकी आँखें काजल तो क्या ख्वाबों से भी खाली हो गयीं। इस बार सबने बस पानी से होली खेली। जब रंग न हों तो होली में गर्माहट नहीं रहती बिलकुल भी। वो घंटों थरथराती रही, पर उसके गालों को दहकाने सूरज नहीं आया।

मकान मालिक ने उसके घर की खिड़की को कीलों से जड़वाने के विचार को कार्यरूप में बदल दिया। आँसुओं की इक छोटी धारा ठीक उसके आंखों से गालों के रास्ते सीने को भिगोने लगी। उसके कागज़ की नाव तैराने के दिन बीत चुके थे। वैसे भी बिना खेवैया के कब तक बहती नाव। कोई पोछने वाला न होने पर उन आंसुओं का बहते जाना नियति ही था। यादों में जब वो डूबती उतराती है तो उसे बहुत साल पहले की एक शाम याद आती है जब राकेश ने जाने कैसे हिम्मत कर के उससे पुछा था ‘एक बार तुम्हें गले लगा सकता हूं, प्लीज’ और लड़की कुछ शर्म, कुछ हडबडाहट में एकसाथ चार कदम पीछे हट गयी थी। आज इन भीगी, सर्द रातों में वो एक लम्हा तो होता। उसकी लौ में हौले हौले पिघल जाने वाला एक पल, एक खून में गर्मी घोल देने वाला पल। कि तब ऐसी ठंड शायद नहीं लगती कभी भी।

उसकी आंखें सूनी होने लगीं थीं। होंठों पर नील समा गया था। आंखों से सीने तक का रास्ता नदी बन गया था। वो थरथराते होठों और अपनी सीली आंखों के साथ, अपने ही जिस्म में कैद हो के रह गयी थी। जिंदगी भर के लिये, कभी न उबर पाने के लिये।

क्रमशः

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