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हरगोविन्द खुराना की पुण्यतिथि पर जानिए उनके जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें…

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लखनऊ। हरगोविंद खुराना का जन्म 9 जनवरी 1922 को रायपुर (जिला मुल्तान,पाकिस्तान ) में हुआ था। पटवारी पिता के चार पुत्रों में ये सबसे छोटे थे। प्रतिभावान् विद्यार्थी होने के कारण विद्यालय तथा कालेज में इन्हें छात्रवृत्तियाँ मिलीं। पंजाब विश्वविद्यालय से 1943 में बी. एस-सी. (आनर्स) तथा 1945 में एम. एस-सी. (ऑनर्स) परीक्षाओं में ये उत्तीर्ण हुए तथा भारत सरकार से छात्रवृत्ति पाकर इंग्लैंड गए। यहाँ लिवरपूल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर ए. रॉबर्टसन् के अधीन अनुसंधान कर इन्होंने डाक्टरैट की उपाधि प्राप्त की। इन्हें फिर भारत सरकार से शोधवृत्ति मिलीं और ये जूरिख (स्विट्सरलैंड) के फेडरल इंस्टिटयूट ऑव टेक्नॉलोजी में प्रोफेसर वी. प्रेलॉग के साथ अन्वेषण में प्रवृत्त हुए।

भारत वापस आकर डाक्टर खुराना को अपने योग्य कोई काम न मिला। हारकर इंग्लैंड चले गए, जहाँ कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में सदस्यता तथा लार्ड टाड के साथ कार्य करने का अवसर मिला। 1952 में वैकवर (कनाडा) की ब्रिटिश कोलंबिया अनुसंधान परिषद् के जैवरसायन विभाग के अध्यक्ष नियुक्त हुए। 1960 में इन्होंने संयुक्त राज्य अमरीका के विस्कान्सिन विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट ऑव एन्ज़ाइम रिसर्च में प्रोफेसर का पद मिला बाद में यही निदेशक हो गए थे । उन्होंने अमरीकी नागरिकता स्वीकार कर ली।

चिकित्सक खुराना जीवकोशिकाओं के नाभिकों की रासायनिक संरचना के अध्ययन में लगे रहे। नाभिकों के नाभिकीय अम्लों के संबंध में खोज दीर्घकाल से हो रही है, पर डाक्टर खुराना की विशेष पद्धतियों से वह संभव हुआ। इनके अध्ययन का विषय न्यूक्लिऔटिड नामक उपसमुच्चर्यों की अतयंत जटिल, मूल, रासायनिक संरचनाएँ हैं। डाक्टर खुराना इन समुच्चयों का योग कर महत्व के दो वर्गों के न्यूक्लिप्रोटिड इन्जाइम यौगिकों को बनाने में सफल हुये।

नाभिकीय अम्ल सहस्रों एकल न्यूक्लिऔटिडों से बनते हैं। जैव कोशिकओं के आनुवंशिकीय गुण इन्हीं जटिल बहु न्यूक्लिऔटिडों की संरचना पर निर्भर रहते हैं। डॉ॰ खुराना ग्यारह न्यूक्लिऔटिडों का योग करने में सफल हो गए थे तथा अब वे ज्ञात शृंखलाबद्ध न्यूक्लिऔटिडोंवाले न्यूक्लीक अम्ल का प्रयोगशाला में संश्लेषण करने में सफल हुये। इस सफलता से ऐमिनो अम्लों की संरचना तथा आनुवंशिकीय गुणों का संबंध समझना संभव हो गया है और वैज्ञानिक अब आनुवंशिकीय रोगों का कारण और उनको दूर करने का उपाय ढूँढने में सफल हो सकेंगे।

डाक्टर खुराना की इस महत्वपूर्ण खोज के लिए उन्हें अन्य दो अमरीकी वैज्ञानिकों के साथ 1968 का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। आपको इसके पूर्व 1958 में कनाडा के केमिकल इंस्टिटयूट से मर्क पुरस्कार मिला तथा इसी वर्ष आप न्यूयार्क के राकफेलर इंस्ट्टियूट में विजिटिंग प्रोफेसर नियुक्त हुए। 1959 में कनाडा के केमिकल इंस्ट्टियूट के सदस्य निर्वाचित हुए तथा 1967 में होनेवाली जैवरसायन की अंतरराष्ट्रीय परिषद् में आपने उद्घाटन भाषण दिया। डॉ॰ निरेनबर्ग के साथ आपको पचीस हजार डालर का लूशिया ग्रौट्ज हॉर्विट्ज पुरस्कार भी 1968 में मिला था । डाक्टर हरगोविंद खुराना की मृत्यु 09 नवम्बर, 2011 को कॉनकॉर्ड, मैसाचूसिट्स अमरीका में हुई थी।

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डॉ. धोंडो केशव कर्वे (18 अप्रॅल, 1858) ‘महर्षि कर्वे’ के नाम के साथ बड़े ही सम्मान और आदर के साथ याद किए जाने वाले आधुनिक भारत के सबसे बड़े समाज सुधारक और उद्धारक थे। अपना पूरा जीवन विभिन्न बाधाओं और संघर्षों में भी समाज सेवा करते हुए समाप्त कर देने वाले महर्षि कर्वे ने अपने कथन (‘जहाँ चाह, वहाँ राह’) को सर्वथा सत्य सिद्ध किया। महर्षि कर्वे का जन्म 18 अप्रॅल, 1858 को रत्नागिरि ज़िले के ‘मुरूड़’ गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम केशव पंत था। यद्यपि महर्षि कर्वे के माता पिता बहुत ही स्वाभिमानी और उच्च विचारों वाले दंपत्ति थे, किंतु उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। वे अपने पुत्र को अच्छी शिक्षा और संस्कारों से युक्त बनाना चाहते थे, किंतु अपनी विपन्नता के कारण अधिक कुछ ना कर सके।

किसी प्रकार महर्षि कर्वे की प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही प्राइमरी स्कूल में हुई। तत्पश्चात् कुछ समय तक उन्हें घर पर रह कर ही पढ़ना पड़ा। शिक्षा के लिए उन्हें बचपन में कितने संघर्षों से गुज़रना पड़ा, इसका ज्ञान इसी बात से हो जाता है कि मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए उन्हें अपनी नियमित पढ़ाई छोड़ कर गांव से मीलों दूर कोल्हापुर जाकर स्वतंत्र परीक्षार्थी के रूप में परीक्षा देनी पड़ी। 1881 में ने उन्होंने बम्बई अब मुम्बई के ‘रॉबर्ट मनी स्कूल’ से हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। बाद में बम्बई अब मुम्बई के ‘एलफिंस्टन कॉलेज’ से 1884 में गणित विषय में विशेष योग्यता के साथ स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। अपनी पारिवारिक आर्थिक स्थिति को देखते हुए आगे की पढ़ाई ना करते हुए, अपनी योग्यता के आधार पर ‘मराठा स्कूल’ में अध्यापन कार्य प्रारम्भ कर दिया।


महर्षि कर्वे का प्रारम्भिक जीवन कैसे कष्टों में बीता इसका शब्दों में वर्णन कठिन है। जब वे मात्र 15 वर्ष के थे, तभी उनका विवाह भी कर दिया गया था। एक ओर कम उम्र में विवाह और दूसरी ओर शिक्षा प्राप्ति के लिए संघर्ष। इतना सब होने पर भी महर्षि कर्वे में छोटी आयु से ही समाज सुधार के प्रति रुचि दिखायी देने लगी थी। उनके गांव के ही कुछ विद्वान् और समाज के प्रति जागरुक कुछ लोगों राव साहब मांडलिक और सोमन गुरुजी ने उनके मन में समाज सेवा के प्रति भावना और उच्च चारित्रिक गुणों को उत्पन्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। उनके वही गुण दिन प्रतिदिन निखरते चले गये। अत्यंत विपन्नता में जीवन व्यतीत करते हुए जब वे किसी अति निर्धन मनुष्य को देखते जो भी उस समय उनके पास होता उसे दे देते थे। 1891 में जब वे देशभक्त और समाज सेवी गोपालकृष्ण गोखले, दादा भाई नौरोजी और महादेव गोविंद रानाडे जैसे महापुरुषों के पद चिह्नों पर चलते हुए समाज सेवा के क्षेत्र में कुछ सार्थक करने की योजना बना रहे थे, उन्हीं दिनों उनकी पत्नी ‘राधाबाई’ का निधन हो गया। यद्यपि वे अपनी पत्नी के अधिक सम्पर्क में नहीं रहे थे, तथापि यह उनके लिए बड़ा आघात था। 1891 के अंतिम माह में वे राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा संचालित पूना के ‘फर्ग्युसन कॉलेज’ में गणित के प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हुए।

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अपनी मेहनत और प्रतिभा से वह ‘डेक्कन शिक्षा समिति’ के आजीवन सदस्य बने।फर्ग्युसन कॉलेज में अध्यापन करते समय उन्होंने समाज सुधार के क्षेत्र में पदार्पण किया। 1893 में उन्होंने अपने मित्र की विधवा बहिन ‘गोपूबाई’ से विवाह किया। विवाह के बाद गोपूबाई का नया नाम ‘आनंदीबाई’ पड़ा। उनके इस कार्य के परिणाम स्वरूप पूरे महाराष्ट्र में विशेषकर उनकी जाति बिरादरी में बड़ा रोष और विरोध उत्पन्न हो गया। इसी विरोध ने महर्षि कर्वे को समाज द्वारा उपेक्षित विधवाओं के उद्धार और पुनर्वास के लिए प्रेरित किया। वह इन दिनों महात्मा गाँधी द्वारा चलाई गयी नई शिक्षा नीति और महाराष्ट्र समाज सुधार समिति के कार्यों में भी व्यस्त थे। जब देश के जाने माने समाज सेवियों और विद्वानों को महर्षि कर्वे द्वारा विधवाओं के उद्धार के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों का पता चला तो उन्होंने मुक्त कंठ से उनके कार्यों की प्रशंसा की और सभी संभव सहायता देने का आश्वासन भी दिया।

अब महर्षि कर्वे सहयोग और समर्थन प्राप्त होते ही उत्साह के साथ आम जनता को अपने विचारों से सहमत करने और इस उद्देश्य के लिए धन एकत्र करने के काम में लग गये। उन्होंने कुछ स्थानों पर अपने तत्वाधान में विधवाओं के पुनर्विवाह भी सम्पन्न कराये। धीरे धीरे महर्षि कर्वे के इस विधवा उद्धार के कार्यों को प्रशंसा, मान्यता और धन जन सभी मिलने लगे। 1896 में उन्होंने पूना के हिंगले स्थान पर दान में मिली भूमि पर कुटिया में विधवा आश्रम और अनाथ बालिका आश्रम की स्थापना कर दी। धीरे धीरे समाज के धनी और दयालु लोग महर्षि कर्वे के कार्यों से प्रभावित होकर तन मन धन तीनों प्रकार से सहयोग देने लगे। 1907 में महर्षि कर्वे ने महिलाओं के लिए ‘महिला विद्यालय’ की स्थापना की। जब उन्होंने विधवा और अनाथ महिलाओं के इस विद्यालय को सफल होते देखा तो उन्होंने इस काम को आगे बढ़ाते हुए ‘महिला विश्वविद्यालय’ की योजना पर भी विचार करना प्रारम्भ कर दिया। अंतत: महर्षि कर्वे के अथक प्रयासों और महाराष्ट्र के कुछ दानवीर धनियों द्वारा दान में दी गयी विपुल धनराशि के सहयोग से 1916 में ‘महिला विश्वविद्यालय’ की नींव रखी गयी। महर्षि कर्वे के मार्ग दर्शन में यह विश्वविद्यालय विध्वाओं को समाज में पुनर्स्थापित करने और आत्मनिर्भर बनाने का अनूठा संस्थान बन गया। जैसे जैसे इस विश्वविद्यालय का विस्तार होता गया, वैसे वैसे इसकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए महर्षि कर्वे के प्रयास भी बढ़ने लगे।

1931- 32 में महिला विश्वविद्यालय के संस्थापक और कुलपति के रूप में उन्होंने इंग्लैंड, जापान, अमेरिका, अफ्रीका सहित लगभग 35- 40 देशों की यात्राएं की। इस यात्रा काल में जहाँ उन्होंने विदेशों में महिला विश्वविद्यालयों की कार्य प्राणाली का अध्ययन किया, वहीं वह विश्व के प्रसिद्ध विद्वानों से भी मिले। अपनी इस यात्रा में उन्हें अपने कार्यों के लिए धन की भी प्राप्ति हुई।महर्षि कर्वे का कार्य केवल महिला विश्वविद्यालय या महिलाओं के पुनरोत्थान तक ही सीमित नहीं रहा, वरन् उन्होंने ‘इंडियन सोशल कॉंफ्रेंस’ के अध्यक्ष के रूप में समाज में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। महान् सुधारक होने के साथ साथ वह अच्छे शिक्षा शास्त्री भी थे। बचपन में ग़रीबी की हालत में शिक्षा ना मिलने का कष्ट क्या होता है, वह भली भाँति जानते थे। गांवों में शिक्षा को सहज सुलभ बनाने और उसके प्रसार के लिए उन्होंने चंदा एकत्र कर लगभग 50 से भी अधिक प्राइमरी विद्यालयों की स्थापना की थी। 1942 में उनके द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय की रजत जयंती मनायी गयी। सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे महान् विद्वान् और शिक्षाविद ने इस समारोह की अध्यक्षता की। इसी वर्ष महर्षि कर्वे को बनारस विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। 1951 में उनके विश्वविद्यालय को ‘राष्ट्रीय विश्वविद्यालय’ का दर्ज़ा प्राप्त हुआ। इसी वर्ष पूना विश्वविद्यालय ने महर्षि कर्वे को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की। महर्षि कर्वे के महान् समाज सुधार के कार्यों के सम्मान स्वरूप 1955 में भारत सरकार द्वारा उन्हें ‘पद्म भूषण’ से विभूषित किया गया। इसी वर्ष ‘श्रीमती नत्थीबाई भारतीय महिला विश्वविद्यालय’ द्वारा उन्हें डी.लिट. की उपाधि प्रदान की गयी।सन 1958 में जब महर्षि कर्वे ने अपने जीवन के सौ वर्ष पूरे किए, देश भर में उनकी जन्म शताब्दी मनायी गयी। इस अवसर को अविस्मरणीय बनाते हुए भारत सरकार द्वारा इसी वर्ष उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान और स्मृति में डाक टिकट भी ज़ारी किया गया।उन्होंने 105 वर्ष के दीर्घ आयु प्राप्त की और अंत तक वह किसी न किसी रूप में मानव सेवा के कार्यों में लगे रहे। 9 नवंबर 1962 को इस महान् आत्मा ने इस लोक से विदा ली।एजेंसी।

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जयंती पर विशेष: 9 नवम्बर 1877 को अविभाजित भारत के स्यालकोट (पंजाब) में जन्मे मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के पिता शेख नूर मुहम्मद स्यालकोट में कारोबारी थे। इक़बाल की प्रारंभिक शिक्षा मदरसे से शुरू हुई और बाद में मिशनरी स्कूल से उन्होंने प्राइमरी स्तर की शिक्षा प्रारंभ की। स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई लाहौर से करने के बाद उन्होंने शिक्षण भी किया। 1905 में वे दर्शनशास्त्र की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड गए और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में दाखिला लेकर फिलॉसफ़ी का विशेष अध्ययन करने लगे। अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने के बाद इक़बाल ईरान की यात्रा पर निकल गए, जहाँ से लौटकर उन्होंने ‘दि डेवलपमेंट ऑफ मेटाफ़िज़िक्स इन पर्शियन’ नाम की एक किताब भी लिखी। इसी को आधार बनाकर बाद में जर्मनी की म्युनिख विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि भी प्रदान की। इक़बाल की अध्ययनशील प्रवृत्ति ने उन्हें इतने से संतोष नहीं करने दिया और बाद में उन्होंने बैरिस्ट्री की भी पढ़ाई की। इतना ही नहीं लंदन विश्वविद्यालय में वे छह माह अरबी के अध्यापक भी रहे।

1908 में वे स्वदेश लौटे और गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में प्रोफ़ेसर नियुक्त हो गए। इस नौकरी के साथ वे वक़ालत भी कर रहे थे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘सर’ की उपाधि से भी नवाज़ा था। ग़ौरतलब है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर के बाद इक़बाल ही वे दूसरे शख्स थे जिन्हें यह उपाधि मिली। 21 अप्रेल 1938 को यह महान कवि हमारे मध्य से चला गया। उनकी मृत्यु के बाद दिल्ली की ‘जौहर’ पत्रिका के इक़बाल विशेषांक पर महात्मा गांधी का एक पत्र छपा था- ”….डॉ. इक़बाल मरहूम के बारे में क्या लिखूँ? लेकिन मैं इतना तो कह सकता हूँ कि जब उनकी मशहूर नज्म ‘हिन्दोस्तां हमारा’ पढ़ी तो मेरी दिल भर आया और मैंने बड़ोदा जेल में तो सैंकड़ों बार इस नज्म को गाया होगा….”इक़बाल की कृतियों में फारसी की रचनाओं के साथ-साथ, उर्दू की चार कृतियों बाँगे-दारा, बाले-जिब्रील, ज़र्बे-कलीम और अर्मुगाने-हिजाज़ के नाम भी सम्मिलित हैं। इक़बाल की नज्में और ग़ज़लियात हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता और भारतीय सांस्कृतिक बोध की गहरी छाप लिए हमारे बीच रहेंगी।

इनकी प्रमुख रचनाएं हैं: असरार-ए-ख़ुदी, रुमुज़-ए-बेख़ुदी और बंग-ए-दारा, जिसमें देशभक्तिपूर्ण तराना-ए-हिन्द (सारे जहाँ से अच्छा) शामिल है। फ़ारसी में लिखी इनकी शायरी ईरान और अफ़ग़ानिस्तान में बहुत प्रसिद्ध है, जहाँ इन्हें इक़बाल-ए-लाहौर कहा जाता है। इन्होंने इस्लाम के धार्मिक और राजनैतिक दर्शन पर काफ़ी लिखा है। भारत के विभाजन और पाकिस्तान की स्थापना का विचार सबसे पहले इक़बाल ने ही उठाया था। 1930 में इन्हीं के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने सबसे पहले भारत के विभाजन की माँग उठाई। इसके बाद इन्होंने जिन्ना को भी मुस्लिम लीग में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और उनके साथ पाकिस्तान की स्थापना के लिए काम किया। इन्हें पाकिस्तान में राष्ट्रकवि माना जाता है। इन्हें अलामा इक़बाल , मुफ्फकिर-ए-पाकिस्तान, शायर-ए-मशरीक़ और हकीम-उल-उम्मत भी कहा जाता है।http://www.satyodaya.com

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ये सिंगर हर रोज तीन महिलाओं के साथ करता है…

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अमेरिका: मशहूर ब्रिटिश सिंगर मिक हकनॉल ने पूर्व में उनके द्वारा दिए गए एक बयान पर रिएक्ट किया है। एक बयान के मुताबिक उन्होंने कहा था कि वह तीन सालों तक रोज तीन महिलाओं के साथ सोते थे। इसके मुताबिक वो तीन हजार से अधिक महिलाओं के साथ रात बिता चुके हैं।

बयान को लेकर सिंगर ने कही ये बात

इस मामले पर दोबारा बयान देते हुए कहा कि तीन हजार महिलाओं वाला आंकड़ा उनका नहीं था बल्कि अखबार का था। द संडे टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक मिक ने कहा है कि करियर की बुलंदी के दौरान उनकी लाइफस्टाइल प्लेब्वॉय जैसी थी।

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बताते चलें कि एक सवाल जब उनसे किया गया कि कितनी महिलाओं के साथ मिक रात बिता चुके हैं, इस सवाल पर मिक ने कहा कि उन्हें इसका कोई आइडिया नहीं है लेकिन 2010 में मिक ने कहा था- ‘1985 से 1987 के बीच मैं एक दिन में तीन महिलाओं के साथ सोता था, हर दिन ऐसा होता था। http://www.satyodaya.com

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दूसरी बार ब्रेकअप करने पर गर्लफ्रेंड ने प्रेमी की काटी जीभ

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स्पेन के बार्सिलोना से एक बड़ा ही अजब-गजब मामला सामने आया है, आपको बता दे, एक प्रेमिका को अपने प्रेमी की लास्ट किस पड़ गई इतनी मंहगी कि उसे आठ साल की सजा सुना दी गई। बता दे, प्रेमिका ने लास्ट किस के बहाने अपने बॉयफ्रेंड की जीभ काट ली, इस घटना के बाद बार्सिलोना पुलिस ने उस महिला को गिरफ्तार कर आठ साल की सजा सुना दी ।

बदलते मूड से परेशान था बॉयफ्रेंड
मामला थोड़ा पुराना है लेकिन हैरान कर देने वाला है आडिया लोपेज ईस्टीवे ने अपने प्रेमी से दूसरी बार ब्रेकअप होने पर उसकी जीभ काट ली। उनका पहला रिलेशनशिप 2016 में शुरू हुआ था, जो दो माह ही चला। इसके कुछ दिनों के बाद दोनों ने एक बार फिर रिलेशनशिप में आने का फैसला किया। लेकिन चार माह बाद ही उसके प्रेमी ने कहा कि वह उसके लगातार बदलते मूड के कारण थक चुका है।

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प्रेमिका को मिली आठ साल की सजा

जब ईस्टीवे ने सुना तो वह आपे से बाहर हो गई और पूरे अपार्टमेंट में शोर-शराबा करने लगी। हालांकि थोड़े देर बाद वह अपने बर्ताव के लिए मांफी मांगने अपने प्रेमी के पास वापस आई। उसने प्रेमी को गले लगाया और आखिरी किस के बहाने उसकी जीभ काट ली। जीभ के कटे हुए हिस्से को उसने जमीन पर थूक दिया और भाग गई। दर्द के मारे उसका प्रेमी चिल्लाने लगा और उसके मुंह से खून बह रहा था। पड़ोसियों की मदद से उसे अस्पताल पहुंचाया गया।http://www.satyodaya.com

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जानिए: रहस्यमयी कहानियों के मशहूर लेखक चंद्रकांता के चरित्र को गढ़ने वाले देवकीनन्दन खत्री के बारे में…

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देवकीनंदन खत्री को आधुनिक हिंदी उपन्यासकारों की पहली पीढ़ी माना जाता है। चंद्रकांता के चरित्र को गढ़ने वाले देवकीनंदन खत्री ने हिंदी उपन्यास लेखन के क्षेत्र में एक नया मुकाम हासिल किया। हिंदी में रहस्य-रोमांस से भरपूर उपन्यासों के पहले लेखक थे।

देवकीनंदन खत्री का जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में हुआ था। उनके पिता लाला ईश्वरदास एक धनी व्यापारी थे। जिनके पूर्वज मुगल शासन में महत्वपूर्ण पद पर रहे महाराजा रणजीत सिंह के पुत्र शेर सिंह के शासनकाल में लाला ईश्वरदास काशी में आकर बस गए थे। घर में संबंधों के कारण देवकीनंदन खत्री का बचपन खुशनुमा माहौल में बिता। उन्होंने अपना बचपन अपने नाना के घर में बिताया देवकीनंदन खत्री की प्रारंभिक शिक्षा उर्दू फारसी में हुई थी। बाद में उन्होंने उपन्यास में हिंदी संस्कृत और अंग्रेजी का भी अध्ययन किया। पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण रियासतों के शासन में उनको कई दोस्त है उसके अलावा फकीरों और तांत्रिकों से भी उनकी अच्छी दोस्ती थी। प्रारंभिक शिक्षा के बाद वे गया में टेकरी चले गए। बाद में उन्होंने वाराणसी में लहरी नाम से एक प्रिंटिंग प्रेस की शुरुआत की और 1898 में हिंदी मासिक दूरदर्शन का प्रारंभ किया। शुरुआत में बीसवीं सदी की शुरुआत में देवकीनंदन खत्री और उनके पुत्र दुर्गा प्रसाद की कई रचनाओं को लहरी प्रेशर दोबारा प्रकाशित किया गया। चंद्रकांता ने बनाया मसूदा देवकीनंदन खत्री बचपन से ही सैर सपाटे के बहुत शौकीन थे। वे लगातार कई दिनों तक चकिया और नौगढ़ के बीहड़ जंगलों पहाड़ों और ऐतिहासिक इमारतों के खंडहरों में घूमा करते थे। बाद में इन्हें ऐतिहासिक इमारतों के खंडहर की पृष्ठभूमि में अपनी तिलिस्मी तथा ऐयारी करनामों की कल्पनाओं को मिश्रित कर उन्होंने चंद्रकांता उपन्यास की रचना की। यह उपन्यास उन्होंने 19वीं सदी के अंत में लिखा इस उपन्यास ने देवकीनंदन खत्री को मशहूर बना दिया। यह उपन्यास तिलिस्मी और रहस्यों से भरा हुआ था। कहा जाता है कि देवकीनंदन खत्री के इस रचना को पढ़ने के लिए कई गैर हिंदी भाषी लोगों को हिंदी सीखने को मजबूर होना पड़ा। इस उपन्यास पर चंद्रकांता नाम से टेलीविजन धारावाहिक भी बनाया गया। जो बेहद लोकप्रिय धारावाहिक 1994 और 1996 के बीच दूरदर्शन के डीडी नेशनल चैनल पर प्रसारित होता था। उन दिनों जब यह धारावाहिक टीवी पर प्रसारित होता था तो सड़के और गलियां खाली पड़ जाती थी। यही नहीं देवकीनंदन खत्री ने तिलिस्म और ऐय्यार,और ऐयारी जैसे शब्दों को हिंदी भाषियों के बीच लोकप्रिय बनाया। इस उपन्यास की लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इसी कथा को आगे बढ़ाते हुए दूसरा उपन्यास चंद्रकांता संतति भी लिखा जो चंद्रकांता की अपेक्षा कई गुना रोचक था यह उपन्यास भी अत्यंत लोकप्रिय हुआ।

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प्रमुख रचनाएं

उन्होंने चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, काजर की कोठरी, नरेंद्र मोहिनी, कुसुम कुमारी, बीरेंद्र बीर, गुप्त गोदना, कटोरा भर, भूतनाथ जैसी अनेक रचनाएं लिखी चंद्रकांता संतति के एक पात्र को नायक का रूप देकर देवकीनंदन खत्री ने भूतनाथ की रचना की पर असामयिक मृत्यु के कारण वे इस उपन्यास के केवल 6 भाग ले पाए इसके बाद के शेष 15 भागों को उनके पुत्र दुर्गा प्रसाद खत्री ने पूरा किया।http://www.satyodaya.com

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