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किस्सा कहानी

गुड़ सी मोहब्बत (कहानी)

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– धीरज झा

“अरे वो देखो बाबा आ गए।” मैदान के एक कोने में सुस्ता रहे लड़कों में से एक ने कहा। इसी के साथ सभी बच्चे बाबा के लौटने का इंतजार करने लगे।

“अरे यार ये बाबा रोज़ कब्रिस्तान में क्या करने जाते होंगे।”

“हमारी दाई बता रही थी कि ये बाबा भूतों से बात करते हैं। हर रोज़ उनका हाल चाल पूछने जाते हैं।” किसी गुप्त सूचना की तरह उस लगभग गंजे से लड़के ने धीमे से ये बात कही

“अरे चुप हो जाओ, हर रोज तुम्हारे पास यही कहानी होती है। इस दफे दसवीं तड़प जाओगे और अभी भी तुम सुनी सुनाई बात पर विश्वास करते हो।” उन लड़कों में सबसे बड़ी उम्र के लड़के ने समझदारी भरे लहजे में कहा।

“अरे नहीं भइया, ये सच कह रहा है। हमने कई बार बाबा को अकेले बतियाते देखा है।” गमछा से अपना पूरा मुंह लपेटे लड़के ने गंजे लड़के की बात का समर्थन किया।

उस बड़े लड़के ने छोटे लड़कों की बात पर कुछ दे सोचा और फिर कहा “ठीक है जब बाबा भूतों से बात करते हैं फिर हमें यहां नहीं रुकना चाहिए। कौन जाने वो अपने साथ किसी भूत को पकड़े आएं।”

बड़े लड़के की बात सुन कर बाकी सभी लड़के एक साथ बोले “हां हम चले जाएं और आप बाबा से सारी गुड़ उड़ा ले जाओ।”

“अच्छा तो गुड़ भी खाओगे और बाबा की बुराई भी करोगे। ठहरो बाबा को बतात हूं।”

“क्या बताना है राकेश बाबू। बता दो। ज़माना गुज़र गया हमको किसी ने कुछ बताया ही नहीं।” सभी लड़कों की आवाज के बीच एक बूढी आवाज गूंजी। सब चुप हो गए।

“अस्सलाम वालेकुम बाबा।”

“वालेकुम अस्सलाम बच्चों। और सब खैरियत न ?”

“हां बाबा सब अच्छा है।”

“तो राकेश मियां, आपने बताया नहीं कि हमें क्या बताने वाले थे।”

“अरे कुछ नहीं बाबा, जानते ही हैं सब बच्चों को।” लड़के ने बाकी सबको बच्चा बता कर खुद के सयाने होने की पहचान दी।

“हाहाहा, हां सब बच्चे हैं ही बहुत ख़राब एक आप ही तो होनहार हैं। बाकी मैं इनके अब्बा लोगों को यहां गुड़ बांटता आया हूं जानता हूं ये क्या कह रहे होंगे।” सभी बच्चों के गले सूखने लगे कि आज तो बाबा गुस्सा जाएंगे। अब तो गुड़ भी नहीं मिलेगी और बाबा भूत पीछे छोड़ेंगे वो अलग।

“नहीं नहीं बाबा ऐसा वैसा कुछ थोड़े ही न कह रहे थे।” उस गंजे बच्चे ने सफाई दी

“तो जैसा तैसा कह रहे थे वैसा वैसा ही बता दो।” बाबा ने चुटकी ली।

“वो ये कह रहा था कि आप भूत से बातें करते हैं।” गमछे से मुंह ढके जिस लड़के ने गंजे लड़के की बात का समर्थन किया था उसी ने राज खोल दिया जिसके बाद बाबा बहुत जोर से हंसे। बाबा की हंसी ने सबको डरा दिया।

बाबा ने आगे कुछ नहीं कहा उन्होंने सभी बच्चों को गुड़ दिया और पेड़ की छांव में हमेशा की तरह बैठ गए। गुड़ मिलने की देर थी कि सभी लड़के वहां से दुम दबा कर भाग खड़े हुए। बाबा उन्हें जाता देख एक बार को मुस्कुराए और अपने आंखें बंद कर कुछ सोचने लगे।

“बाबा।” एक आवाज ने बाबा का ध्यान खींचा। उनके हिसाब से सभी लड़के जा चुके थे।

“अरे राकेश मियां, आप अभी तक गए नहीं। जाइए नहीं तो भूत बुला लेंगे हम।” बाबा हंसे लेकिन इस हंसी में एक पीड़ा थी। हम सब हंसी को हंसी की तरह देखते हैं। आंसुओं की किस्में हमने तय कर दीं लेकिन हंसी हमेशा हमारे लिए ख़ुशी का प्रतीक ही रही। लेकिन कई बार इस हंसी में जो दर्द छुपा होता है वो दुःख के आंसुओं से कई ज्यादा गाढ़ा और पीड़ादायक होता है।

“बाबा हम जानते हैं आप न तो यहां भूतों से बात करने आते हैं और न ही आपके पास कोई भूत है।”

“फिर तो आप सच में समझदार हैं। अच्छा अब ये बताइए कि आप हमसे क्या चाहते हैं जो अभी तक गए नहीं।”

“बाबा मैं बस इतना जानना चाहता हूं कि आप यहां हर रोज़ क्यों आते हैं। सब तो कहते हैं कि आप कई बार रात में भी यहां आकर बैठे रहते हैं।”

“है कोई अपना उसी से मिलने आता हूं।”

“है ? लेकिन बाबा यहां तो सिर्फ ‘था’ रहते हैं।”

“मेरे बच्चे किसी को भी ‘था’ हमारी सोच बनाती है। जिंदगी तो बस मौजूदगी छीन कर ले जाती है, खयाल नहीं। और खयालों का जहान ऐसा है कि जो वहां का हो गया वो फिर कभी ‘था’ नहीं होता।” समझदारी दिखने वाले लड़के के लिए अब ये ‘था’ ‘है’ का खेल बहुत पेचीदा होता चला जा रहा था।

“बाबा सही से बताइए ना वो कौन है जिसे आप मिलने आते हैं, क्या आप सच में भूतों से बात करते हैं ?”

“नहीं राकेश मियां भूतों से हमारा कभी कोई राबता नहीं रहा। यहां तो कोई अपना है जिसके स्नेह की डोर हमें हर रोज यहां खींच लाती है।”

“कौन है वो अपना।” लड़के के चेहरे की उत्सुकता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई।

“इसके लिए तो आपको एक कहानी सुननी पड़ेगी।”

“हाँ मुझे कहानियां बहुत पसंद हैं।”

“सिर्फ पसंद हैं या उन्हें समझते भी हैं।”

“समझता हूं बहुत अच्छे से।”

“हम्म्म्म, ठीक है।”

“तो सुनाइए।”

“बहुत पुरानी बात है। नज़रें भले आज धुंधला देखने लगी हैं लेकिन यादों में हमें अब भी सब साफ साफ दीखता है। हम आपको तब की बात बता रहे हैं जब आपके बाबा भी बिना चड्डी के घूमा करते थे। उन दिनों गांव टोलों में नहीं बंटा था। सियासी हवा तब गाँवों तक नहीं पहुंची थी। मुस्लिम का हिन्दुओं के दरवाजों पर खूब आना जाना था। न हम तिलक ठोप देख कर डरते थे न वो हमारी दाढ़ी का खौफ खाते थे। आपको शायद सुन कर हैरानी हो कि तब किसी घर में ताला नहीं लगता था। किसी को अगर एक दो दिन के लिए कहीं जाना हो तो वो पड़ोसियों के हवाले घर छोड़ कर चला जाया करता था। सुबह की नमाज़ें और आरती एक साथ ही हुआ करती थी। वो आस्था के सम्मान का दौर था, इंसानियत का दौर था। लेकिन…” बाबा खामोश हो गए, कुछ सोचने लगे।

“लेकिन क्या बाबा…” लड़के ने टोका

“लेकिन मोहब्बत तब भी गुनाह ही थी। शायद आज से बड़ा गुनाह। और मैं तब का ही गुनेहगार हूं। मैंने मोहब्बत की। उस लड़की से जिसका कोई नहीं था। मैंने गुनाह किया उसके साथ जिंदगी गुजारने का सपना देखने का। मैंने बचपन से उसको मार खाते देखा था, उसकी आंखों से बहने वाला एक एक आसूं तेजाब की तरह मेरे दिल पर फफोले बना रहा था। मैंने एक उम्र तक उसे रोज़ अपने रिश्तेदारों के हाथों पिटते देखा, अच्छे खाने को तरसते देखा। मेरे घर से अचानक गुड़ गायब हो जाना, मां की बनाई पिन्नियों का कम होना या कोई अच्छा पकवान बनने पर उसकी मात्र घाट जाना कोई इत्तेफाक नहीं था। ये मैं ही था जो उसके लिए ये सब चुराया करता था।

अजीब खेल खेला था नियति ने। एक परियों सी खूबसूरत लड़की की ख़ुशी की कीमत बस एक भेली गुड़ थी। वो गुड़ देख कर इतनी खुश हो जाती कि उससे लिपट कर मर चुकी चींटियों का ख्याल भी उसे न आता। वो गुड़ देख कर खुश होती और मैं उसकी खुशी देख कर सुकून पा जाता। उसे देख कर ही मैंने जाना था कि ख़ुशी पाना कितना आसान होता है। मैं रोज़े रखता था ताकि वो सहरी और इफ्तारी में कुछ अच्छा खा सके। दिक्कतें हमारे यहां भी थीं लेकिन उन दिक्कतों से बचाने के लिए मेरे पास अम्मा और अब्बा थे। मुझे बचपन में ही ये समझ आ गया था कि अल्लाह ने मुझे इसकी देखरेख के लिए ही पैदा किया है।” बाबा असमान की और देखते हुए उन दिनों में खो गए थे और बाबा की कहानी के साथ साथ लड़का भी उनके पीछे पीछे चल दिया था।

“वक्त बीतता रहा और मेरा दिल में उस लड़की के लिए दबा स्नेह का बीज प्रेम का विशाल शजर हो गया। और वो लड़की, उसे तो शायद मुझसे उसी दिन मुझसे मोहब्बत हो गई थी जिस दिन मैंने पहली बार उसके आंसू पोंछे थे। जब तक हमारी मोहब्बत छुपी हुई थी तब तक वो अनाथ थी, अपने रिश्तेदारों पर बोझ थी और जिस दिन इस मोहब्बत की खुशबू हर तरफ फैली उसी दिन उसे अपने घर की इज्जत बना लिया था उसके रिश्तेदारों ने।

जो सूखी रोटी खाने पर मजबूर थी वो अब उस महल की राजकुमारी हो गई थी। वो खूब रोई लेकिन उसका रोना तो रोटी तक के लिए नहीं सुना जाता था फिर मोहब्बत के लिए कहां से चुना जाता। उसकी शादी कहीं और तय कर दी गई। लेकिन मेरी रोज उसे गुड़ देने की आदत नहीं छूटी। ये गुड़ ही था जिसके कारण लोगों द्वारा इतना ज़हर फ़ैलाने के बावजूद हमारे रिश्ते की मिठास हमेशा बनी रही।” प्यार मोहब्बत के नाम पर लड़के ने अभी तक कुछ फिल्में ही देखी थीं। मोहब्बत की ये सच्ची दास्तां सुनना उसके लिए नया अनुभव था लेकिन इसके बावजूद उसकी आंखों के कोर भीग चुके थे।

“उसके निकाह का दिन आ गया। मैंने सोच लिया था कि मैं मोहब्बत के लिए अपने पूरे समाज से बैर मोल लूंगा। मैंने सब हिसाब लगा लिया था कि उसे लेकर यहां से कहां जाना है, क्या करना है, किस तरह जिंदगी बितानी है लेकिन मैं इन सब बातों का हिसाब लगाते हुए ये भूल गया था कि आखिरी हिसाब उस अल्लाह का ही होता है। यहां भी अल्लाह मुझसे पहले अपना हिसाब लगाये बैठा था। मेरे पहुंचने तक शादी का घर मातम के घर में तब्दील हो चुका था। वो पागल लड़की कुछ देर इंतजार भी न कर पाई और उसने ज़हर खा लिया था। लोगों की भीड़ के बीच पड़ा उसका जिस्म अपनी जल रही रूह को बाहर निकाल में जुटा था लेकिन उसकी रूह मुझसे मिलने की जिद्द पर अड़ी थी। भीड़ को हटाते हुए मैं उसके पास पहुंचा। उसका सिर मैंने अपनी गोद में लिया। शायद इस विरोध होता लेकिन न जाने क्यों उस वक्त हर कोई शांत था। अभी सिर्फ और सिर्फ मेरी चीखें और दो पलों की जिंदगी के लिए मौत से लड़ती सांसों की आवाज वहां गूँज रही थी।”

उसने मुझे देखते ही अपनी बंद हो रही आंखों को खोला और अपने होंठ हिलाए “आ गए तुम! गुड़ लाए हो ?”

उसके सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं था क्योंकि आज मैं गुड़ नहीं लाया था। मैंने सोचा कि मैं गुड़ कैसे भूल सकता हूं, हमारे रिश्ते की बुनियाद है ये गुड़ और मैं इसे ही भूल गया।

“मुझसे एक वादा करो।” वो ऐसे बोली जैसे बहुत जल्दी में हो। हां वो जल्दी में ही तो थी। मैंने सिर हिला दिया।

“मैं वापस आउंगी। तुम मेरा इंतजार…?” उसकी सांसें मौत से लड़ते हुए हार चुकी थीं। आंखें खुली रहीं और उसकी आखिरी बात उसकी हलक में ही रह गई।  मैंने उसकी आंखें बंद करते हुए कहा “हां, इरम मैं हमेशा तुम्हारा इंतजार करूंगा। तुम्हे मेरे लिए लौट कर आना होगा” वो चली गई थी। मैं रोता रहा बिलखता रहा। मैंने किसी को उसे हाथ न लगाने दिया। वो जिंदा नहीं थी इसी लिए न तो किसी के घर की बेटी थी, न इज्जत। भले ही अब वो दूसरों के लिए लाश थी मगर मेरे लिए आज भी उसके उतने ही मायने थे जितना उसके जिंदा होने पर।” बाबा अब ठीक उसी तरह खामोश हो गए जैसे किसी तूफान के बाद कुदरत शांत हो जाती है।

लड़का बाबा के हाथ में रखे गुड़ को एक टक देखे जा रहा था। बाबा को शायद अब ये बताने की ज़रूरत नहीं थी कि वो हर रोज यहां किस्से मिलने आते हैं। लड़का ये भी समझ चुका था कि बाबा किसी भूत से बात नहीं करते। लेकिन उसके दिमाग में एक बात लगातार घूम रही थी जिसे वो पूछना चाहता था। कुछ पल रुक कर उसने बाबा से सवाल किया “बाबा आप तो मुस्लिम हैं न और मुस्लिम तो पुनर्जन्म में विश्वास नहीं रखते न। फिर वो वापस कैसे आएंगी ?”

लड़के की बात पर बाबा पहले मुस्कुराए और फिर एक लंबी सांस खींच कर बोले “प्रेम का अपना अलग ही धर्म है। यहां सिर्फ वही रिवायतें मानी जाती हैं जिसमें मिलने की उम्मीद जिंदा रहे। इस प्रेम और उससे मिलने की उम्मीद ने मुझे भी काफ़िर बना दिया। ये प्रेम एक दिन हमें ज़रूर मिलाएगा…”

बाबा के इन शब्दों के साथ ही उनकी नजरें कब्रिस्तान की और जा टिकीं और फिर टिकी रहीं। उनके चेहरे पर इस वक्त वही मुस्कान थी जो उन दिनों उस लड़की को देखते ही खिल जाया करती थी. लड़के के आंखों में आये पानी के सूखने पर उसे ये मालूम हुआ कि बाबा का इंतजार आज समाप्त हो गया है। लड़के ने कुछ देर बाबा को गौर से देखा और फिर गांव की तरफ ये चिल्लाता हुआ भगा “बाबा चले गए, बाबा चले गए।”

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हरगोविन्द खुराना की पुण्यतिथि पर जानिए उनके जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें…

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लखनऊ। हरगोविंद खुराना का जन्म 9 जनवरी 1922 को रायपुर (जिला मुल्तान,पाकिस्तान ) में हुआ था। पटवारी पिता के चार पुत्रों में ये सबसे छोटे थे। प्रतिभावान् विद्यार्थी होने के कारण विद्यालय तथा कालेज में इन्हें छात्रवृत्तियाँ मिलीं। पंजाब विश्वविद्यालय से 1943 में बी. एस-सी. (आनर्स) तथा 1945 में एम. एस-सी. (ऑनर्स) परीक्षाओं में ये उत्तीर्ण हुए तथा भारत सरकार से छात्रवृत्ति पाकर इंग्लैंड गए। यहाँ लिवरपूल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर ए. रॉबर्टसन् के अधीन अनुसंधान कर इन्होंने डाक्टरैट की उपाधि प्राप्त की। इन्हें फिर भारत सरकार से शोधवृत्ति मिलीं और ये जूरिख (स्विट्सरलैंड) के फेडरल इंस्टिटयूट ऑव टेक्नॉलोजी में प्रोफेसर वी. प्रेलॉग के साथ अन्वेषण में प्रवृत्त हुए।

भारत वापस आकर डाक्टर खुराना को अपने योग्य कोई काम न मिला। हारकर इंग्लैंड चले गए, जहाँ कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में सदस्यता तथा लार्ड टाड के साथ कार्य करने का अवसर मिला। 1952 में वैकवर (कनाडा) की ब्रिटिश कोलंबिया अनुसंधान परिषद् के जैवरसायन विभाग के अध्यक्ष नियुक्त हुए। 1960 में इन्होंने संयुक्त राज्य अमरीका के विस्कान्सिन विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट ऑव एन्ज़ाइम रिसर्च में प्रोफेसर का पद मिला बाद में यही निदेशक हो गए थे । उन्होंने अमरीकी नागरिकता स्वीकार कर ली।

चिकित्सक खुराना जीवकोशिकाओं के नाभिकों की रासायनिक संरचना के अध्ययन में लगे रहे। नाभिकों के नाभिकीय अम्लों के संबंध में खोज दीर्घकाल से हो रही है, पर डाक्टर खुराना की विशेष पद्धतियों से वह संभव हुआ। इनके अध्ययन का विषय न्यूक्लिऔटिड नामक उपसमुच्चर्यों की अतयंत जटिल, मूल, रासायनिक संरचनाएँ हैं। डाक्टर खुराना इन समुच्चयों का योग कर महत्व के दो वर्गों के न्यूक्लिप्रोटिड इन्जाइम यौगिकों को बनाने में सफल हुये।

नाभिकीय अम्ल सहस्रों एकल न्यूक्लिऔटिडों से बनते हैं। जैव कोशिकओं के आनुवंशिकीय गुण इन्हीं जटिल बहु न्यूक्लिऔटिडों की संरचना पर निर्भर रहते हैं। डॉ॰ खुराना ग्यारह न्यूक्लिऔटिडों का योग करने में सफल हो गए थे तथा अब वे ज्ञात शृंखलाबद्ध न्यूक्लिऔटिडोंवाले न्यूक्लीक अम्ल का प्रयोगशाला में संश्लेषण करने में सफल हुये। इस सफलता से ऐमिनो अम्लों की संरचना तथा आनुवंशिकीय गुणों का संबंध समझना संभव हो गया है और वैज्ञानिक अब आनुवंशिकीय रोगों का कारण और उनको दूर करने का उपाय ढूँढने में सफल हो सकेंगे।

डाक्टर खुराना की इस महत्वपूर्ण खोज के लिए उन्हें अन्य दो अमरीकी वैज्ञानिकों के साथ 1968 का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। आपको इसके पूर्व 1958 में कनाडा के केमिकल इंस्टिटयूट से मर्क पुरस्कार मिला तथा इसी वर्ष आप न्यूयार्क के राकफेलर इंस्ट्टियूट में विजिटिंग प्रोफेसर नियुक्त हुए। 1959 में कनाडा के केमिकल इंस्ट्टियूट के सदस्य निर्वाचित हुए तथा 1967 में होनेवाली जैवरसायन की अंतरराष्ट्रीय परिषद् में आपने उद्घाटन भाषण दिया। डॉ॰ निरेनबर्ग के साथ आपको पचीस हजार डालर का लूशिया ग्रौट्ज हॉर्विट्ज पुरस्कार भी 1968 में मिला था । डाक्टर हरगोविंद खुराना की मृत्यु 09 नवम्बर, 2011 को कॉनकॉर्ड, मैसाचूसिट्स अमरीका में हुई थी।

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डॉ. धोंडो केशव कर्वे (18 अप्रॅल, 1858) ‘महर्षि कर्वे’ के नाम के साथ बड़े ही सम्मान और आदर के साथ याद किए जाने वाले आधुनिक भारत के सबसे बड़े समाज सुधारक और उद्धारक थे। अपना पूरा जीवन विभिन्न बाधाओं और संघर्षों में भी समाज सेवा करते हुए समाप्त कर देने वाले महर्षि कर्वे ने अपने कथन (‘जहाँ चाह, वहाँ राह’) को सर्वथा सत्य सिद्ध किया। महर्षि कर्वे का जन्म 18 अप्रॅल, 1858 को रत्नागिरि ज़िले के ‘मुरूड़’ गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम केशव पंत था। यद्यपि महर्षि कर्वे के माता पिता बहुत ही स्वाभिमानी और उच्च विचारों वाले दंपत्ति थे, किंतु उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। वे अपने पुत्र को अच्छी शिक्षा और संस्कारों से युक्त बनाना चाहते थे, किंतु अपनी विपन्नता के कारण अधिक कुछ ना कर सके।

किसी प्रकार महर्षि कर्वे की प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही प्राइमरी स्कूल में हुई। तत्पश्चात् कुछ समय तक उन्हें घर पर रह कर ही पढ़ना पड़ा। शिक्षा के लिए उन्हें बचपन में कितने संघर्षों से गुज़रना पड़ा, इसका ज्ञान इसी बात से हो जाता है कि मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए उन्हें अपनी नियमित पढ़ाई छोड़ कर गांव से मीलों दूर कोल्हापुर जाकर स्वतंत्र परीक्षार्थी के रूप में परीक्षा देनी पड़ी। 1881 में ने उन्होंने बम्बई अब मुम्बई के ‘रॉबर्ट मनी स्कूल’ से हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। बाद में बम्बई अब मुम्बई के ‘एलफिंस्टन कॉलेज’ से 1884 में गणित विषय में विशेष योग्यता के साथ स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। अपनी पारिवारिक आर्थिक स्थिति को देखते हुए आगे की पढ़ाई ना करते हुए, अपनी योग्यता के आधार पर ‘मराठा स्कूल’ में अध्यापन कार्य प्रारम्भ कर दिया।


महर्षि कर्वे का प्रारम्भिक जीवन कैसे कष्टों में बीता इसका शब्दों में वर्णन कठिन है। जब वे मात्र 15 वर्ष के थे, तभी उनका विवाह भी कर दिया गया था। एक ओर कम उम्र में विवाह और दूसरी ओर शिक्षा प्राप्ति के लिए संघर्ष। इतना सब होने पर भी महर्षि कर्वे में छोटी आयु से ही समाज सुधार के प्रति रुचि दिखायी देने लगी थी। उनके गांव के ही कुछ विद्वान् और समाज के प्रति जागरुक कुछ लोगों राव साहब मांडलिक और सोमन गुरुजी ने उनके मन में समाज सेवा के प्रति भावना और उच्च चारित्रिक गुणों को उत्पन्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। उनके वही गुण दिन प्रतिदिन निखरते चले गये। अत्यंत विपन्नता में जीवन व्यतीत करते हुए जब वे किसी अति निर्धन मनुष्य को देखते जो भी उस समय उनके पास होता उसे दे देते थे। 1891 में जब वे देशभक्त और समाज सेवी गोपालकृष्ण गोखले, दादा भाई नौरोजी और महादेव गोविंद रानाडे जैसे महापुरुषों के पद चिह्नों पर चलते हुए समाज सेवा के क्षेत्र में कुछ सार्थक करने की योजना बना रहे थे, उन्हीं दिनों उनकी पत्नी ‘राधाबाई’ का निधन हो गया। यद्यपि वे अपनी पत्नी के अधिक सम्पर्क में नहीं रहे थे, तथापि यह उनके लिए बड़ा आघात था। 1891 के अंतिम माह में वे राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा संचालित पूना के ‘फर्ग्युसन कॉलेज’ में गणित के प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हुए।

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अपनी मेहनत और प्रतिभा से वह ‘डेक्कन शिक्षा समिति’ के आजीवन सदस्य बने।फर्ग्युसन कॉलेज में अध्यापन करते समय उन्होंने समाज सुधार के क्षेत्र में पदार्पण किया। 1893 में उन्होंने अपने मित्र की विधवा बहिन ‘गोपूबाई’ से विवाह किया। विवाह के बाद गोपूबाई का नया नाम ‘आनंदीबाई’ पड़ा। उनके इस कार्य के परिणाम स्वरूप पूरे महाराष्ट्र में विशेषकर उनकी जाति बिरादरी में बड़ा रोष और विरोध उत्पन्न हो गया। इसी विरोध ने महर्षि कर्वे को समाज द्वारा उपेक्षित विधवाओं के उद्धार और पुनर्वास के लिए प्रेरित किया। वह इन दिनों महात्मा गाँधी द्वारा चलाई गयी नई शिक्षा नीति और महाराष्ट्र समाज सुधार समिति के कार्यों में भी व्यस्त थे। जब देश के जाने माने समाज सेवियों और विद्वानों को महर्षि कर्वे द्वारा विधवाओं के उद्धार के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों का पता चला तो उन्होंने मुक्त कंठ से उनके कार्यों की प्रशंसा की और सभी संभव सहायता देने का आश्वासन भी दिया।

अब महर्षि कर्वे सहयोग और समर्थन प्राप्त होते ही उत्साह के साथ आम जनता को अपने विचारों से सहमत करने और इस उद्देश्य के लिए धन एकत्र करने के काम में लग गये। उन्होंने कुछ स्थानों पर अपने तत्वाधान में विधवाओं के पुनर्विवाह भी सम्पन्न कराये। धीरे धीरे महर्षि कर्वे के इस विधवा उद्धार के कार्यों को प्रशंसा, मान्यता और धन जन सभी मिलने लगे। 1896 में उन्होंने पूना के हिंगले स्थान पर दान में मिली भूमि पर कुटिया में विधवा आश्रम और अनाथ बालिका आश्रम की स्थापना कर दी। धीरे धीरे समाज के धनी और दयालु लोग महर्षि कर्वे के कार्यों से प्रभावित होकर तन मन धन तीनों प्रकार से सहयोग देने लगे। 1907 में महर्षि कर्वे ने महिलाओं के लिए ‘महिला विद्यालय’ की स्थापना की। जब उन्होंने विधवा और अनाथ महिलाओं के इस विद्यालय को सफल होते देखा तो उन्होंने इस काम को आगे बढ़ाते हुए ‘महिला विश्वविद्यालय’ की योजना पर भी विचार करना प्रारम्भ कर दिया। अंतत: महर्षि कर्वे के अथक प्रयासों और महाराष्ट्र के कुछ दानवीर धनियों द्वारा दान में दी गयी विपुल धनराशि के सहयोग से 1916 में ‘महिला विश्वविद्यालय’ की नींव रखी गयी। महर्षि कर्वे के मार्ग दर्शन में यह विश्वविद्यालय विध्वाओं को समाज में पुनर्स्थापित करने और आत्मनिर्भर बनाने का अनूठा संस्थान बन गया। जैसे जैसे इस विश्वविद्यालय का विस्तार होता गया, वैसे वैसे इसकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए महर्षि कर्वे के प्रयास भी बढ़ने लगे।

1931- 32 में महिला विश्वविद्यालय के संस्थापक और कुलपति के रूप में उन्होंने इंग्लैंड, जापान, अमेरिका, अफ्रीका सहित लगभग 35- 40 देशों की यात्राएं की। इस यात्रा काल में जहाँ उन्होंने विदेशों में महिला विश्वविद्यालयों की कार्य प्राणाली का अध्ययन किया, वहीं वह विश्व के प्रसिद्ध विद्वानों से भी मिले। अपनी इस यात्रा में उन्हें अपने कार्यों के लिए धन की भी प्राप्ति हुई।महर्षि कर्वे का कार्य केवल महिला विश्वविद्यालय या महिलाओं के पुनरोत्थान तक ही सीमित नहीं रहा, वरन् उन्होंने ‘इंडियन सोशल कॉंफ्रेंस’ के अध्यक्ष के रूप में समाज में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। महान् सुधारक होने के साथ साथ वह अच्छे शिक्षा शास्त्री भी थे। बचपन में ग़रीबी की हालत में शिक्षा ना मिलने का कष्ट क्या होता है, वह भली भाँति जानते थे। गांवों में शिक्षा को सहज सुलभ बनाने और उसके प्रसार के लिए उन्होंने चंदा एकत्र कर लगभग 50 से भी अधिक प्राइमरी विद्यालयों की स्थापना की थी। 1942 में उनके द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय की रजत जयंती मनायी गयी। सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे महान् विद्वान् और शिक्षाविद ने इस समारोह की अध्यक्षता की। इसी वर्ष महर्षि कर्वे को बनारस विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। 1951 में उनके विश्वविद्यालय को ‘राष्ट्रीय विश्वविद्यालय’ का दर्ज़ा प्राप्त हुआ। इसी वर्ष पूना विश्वविद्यालय ने महर्षि कर्वे को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की। महर्षि कर्वे के महान् समाज सुधार के कार्यों के सम्मान स्वरूप 1955 में भारत सरकार द्वारा उन्हें ‘पद्म भूषण’ से विभूषित किया गया। इसी वर्ष ‘श्रीमती नत्थीबाई भारतीय महिला विश्वविद्यालय’ द्वारा उन्हें डी.लिट. की उपाधि प्रदान की गयी।सन 1958 में जब महर्षि कर्वे ने अपने जीवन के सौ वर्ष पूरे किए, देश भर में उनकी जन्म शताब्दी मनायी गयी। इस अवसर को अविस्मरणीय बनाते हुए भारत सरकार द्वारा इसी वर्ष उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान और स्मृति में डाक टिकट भी ज़ारी किया गया।उन्होंने 105 वर्ष के दीर्घ आयु प्राप्त की और अंत तक वह किसी न किसी रूप में मानव सेवा के कार्यों में लगे रहे। 9 नवंबर 1962 को इस महान् आत्मा ने इस लोक से विदा ली।एजेंसी।

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जयंती पर विशेष: 9 नवम्बर 1877 को अविभाजित भारत के स्यालकोट (पंजाब) में जन्मे मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के पिता शेख नूर मुहम्मद स्यालकोट में कारोबारी थे। इक़बाल की प्रारंभिक शिक्षा मदरसे से शुरू हुई और बाद में मिशनरी स्कूल से उन्होंने प्राइमरी स्तर की शिक्षा प्रारंभ की। स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई लाहौर से करने के बाद उन्होंने शिक्षण भी किया। 1905 में वे दर्शनशास्त्र की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड गए और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में दाखिला लेकर फिलॉसफ़ी का विशेष अध्ययन करने लगे। अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने के बाद इक़बाल ईरान की यात्रा पर निकल गए, जहाँ से लौटकर उन्होंने ‘दि डेवलपमेंट ऑफ मेटाफ़िज़िक्स इन पर्शियन’ नाम की एक किताब भी लिखी। इसी को आधार बनाकर बाद में जर्मनी की म्युनिख विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि भी प्रदान की। इक़बाल की अध्ययनशील प्रवृत्ति ने उन्हें इतने से संतोष नहीं करने दिया और बाद में उन्होंने बैरिस्ट्री की भी पढ़ाई की। इतना ही नहीं लंदन विश्वविद्यालय में वे छह माह अरबी के अध्यापक भी रहे।

1908 में वे स्वदेश लौटे और गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में प्रोफ़ेसर नियुक्त हो गए। इस नौकरी के साथ वे वक़ालत भी कर रहे थे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘सर’ की उपाधि से भी नवाज़ा था। ग़ौरतलब है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर के बाद इक़बाल ही वे दूसरे शख्स थे जिन्हें यह उपाधि मिली। 21 अप्रेल 1938 को यह महान कवि हमारे मध्य से चला गया। उनकी मृत्यु के बाद दिल्ली की ‘जौहर’ पत्रिका के इक़बाल विशेषांक पर महात्मा गांधी का एक पत्र छपा था- ”….डॉ. इक़बाल मरहूम के बारे में क्या लिखूँ? लेकिन मैं इतना तो कह सकता हूँ कि जब उनकी मशहूर नज्म ‘हिन्दोस्तां हमारा’ पढ़ी तो मेरी दिल भर आया और मैंने बड़ोदा जेल में तो सैंकड़ों बार इस नज्म को गाया होगा….”इक़बाल की कृतियों में फारसी की रचनाओं के साथ-साथ, उर्दू की चार कृतियों बाँगे-दारा, बाले-जिब्रील, ज़र्बे-कलीम और अर्मुगाने-हिजाज़ के नाम भी सम्मिलित हैं। इक़बाल की नज्में और ग़ज़लियात हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता और भारतीय सांस्कृतिक बोध की गहरी छाप लिए हमारे बीच रहेंगी।

इनकी प्रमुख रचनाएं हैं: असरार-ए-ख़ुदी, रुमुज़-ए-बेख़ुदी और बंग-ए-दारा, जिसमें देशभक्तिपूर्ण तराना-ए-हिन्द (सारे जहाँ से अच्छा) शामिल है। फ़ारसी में लिखी इनकी शायरी ईरान और अफ़ग़ानिस्तान में बहुत प्रसिद्ध है, जहाँ इन्हें इक़बाल-ए-लाहौर कहा जाता है। इन्होंने इस्लाम के धार्मिक और राजनैतिक दर्शन पर काफ़ी लिखा है। भारत के विभाजन और पाकिस्तान की स्थापना का विचार सबसे पहले इक़बाल ने ही उठाया था। 1930 में इन्हीं के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने सबसे पहले भारत के विभाजन की माँग उठाई। इसके बाद इन्होंने जिन्ना को भी मुस्लिम लीग में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और उनके साथ पाकिस्तान की स्थापना के लिए काम किया। इन्हें पाकिस्तान में राष्ट्रकवि माना जाता है। इन्हें अलामा इक़बाल , मुफ्फकिर-ए-पाकिस्तान, शायर-ए-मशरीक़ और हकीम-उल-उम्मत भी कहा जाता है।http://www.satyodaya.com

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किस्सा कहानी

ये सिंगर हर रोज तीन महिलाओं के साथ करता है…

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अमेरिका: मशहूर ब्रिटिश सिंगर मिक हकनॉल ने पूर्व में उनके द्वारा दिए गए एक बयान पर रिएक्ट किया है। एक बयान के मुताबिक उन्होंने कहा था कि वह तीन सालों तक रोज तीन महिलाओं के साथ सोते थे। इसके मुताबिक वो तीन हजार से अधिक महिलाओं के साथ रात बिता चुके हैं।

बयान को लेकर सिंगर ने कही ये बात

इस मामले पर दोबारा बयान देते हुए कहा कि तीन हजार महिलाओं वाला आंकड़ा उनका नहीं था बल्कि अखबार का था। द संडे टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक मिक ने कहा है कि करियर की बुलंदी के दौरान उनकी लाइफस्टाइल प्लेब्वॉय जैसी थी।

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बताते चलें कि एक सवाल जब उनसे किया गया कि कितनी महिलाओं के साथ मिक रात बिता चुके हैं, इस सवाल पर मिक ने कहा कि उन्हें इसका कोई आइडिया नहीं है लेकिन 2010 में मिक ने कहा था- ‘1985 से 1987 के बीच मैं एक दिन में तीन महिलाओं के साथ सोता था, हर दिन ऐसा होता था। http://www.satyodaya.com

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किस्सा कहानी

दूसरी बार ब्रेकअप करने पर गर्लफ्रेंड ने प्रेमी की काटी जीभ

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स्पेन के बार्सिलोना से एक बड़ा ही अजब-गजब मामला सामने आया है, आपको बता दे, एक प्रेमिका को अपने प्रेमी की लास्ट किस पड़ गई इतनी मंहगी कि उसे आठ साल की सजा सुना दी गई। बता दे, प्रेमिका ने लास्ट किस के बहाने अपने बॉयफ्रेंड की जीभ काट ली, इस घटना के बाद बार्सिलोना पुलिस ने उस महिला को गिरफ्तार कर आठ साल की सजा सुना दी ।

बदलते मूड से परेशान था बॉयफ्रेंड
मामला थोड़ा पुराना है लेकिन हैरान कर देने वाला है आडिया लोपेज ईस्टीवे ने अपने प्रेमी से दूसरी बार ब्रेकअप होने पर उसकी जीभ काट ली। उनका पहला रिलेशनशिप 2016 में शुरू हुआ था, जो दो माह ही चला। इसके कुछ दिनों के बाद दोनों ने एक बार फिर रिलेशनशिप में आने का फैसला किया। लेकिन चार माह बाद ही उसके प्रेमी ने कहा कि वह उसके लगातार बदलते मूड के कारण थक चुका है।

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प्रेमिका को मिली आठ साल की सजा

जब ईस्टीवे ने सुना तो वह आपे से बाहर हो गई और पूरे अपार्टमेंट में शोर-शराबा करने लगी। हालांकि थोड़े देर बाद वह अपने बर्ताव के लिए मांफी मांगने अपने प्रेमी के पास वापस आई। उसने प्रेमी को गले लगाया और आखिरी किस के बहाने उसकी जीभ काट ली। जीभ के कटे हुए हिस्से को उसने जमीन पर थूक दिया और भाग गई। दर्द के मारे उसका प्रेमी चिल्लाने लगा और उसके मुंह से खून बह रहा था। पड़ोसियों की मदद से उसे अस्पताल पहुंचाया गया।http://www.satyodaya.com

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