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किस्सा कहानी

यादें : शुक्रिया इस बच्चे का जिसने मेरे अंदर के उस बच्चे को जगा दिया जिसने कभी छोटकी चिड़इया का रोते हुए जनाजा निकला था…

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-धीरज झा 

इस बच्चे की तस्वीर को मैं कल से देख रहा हूं। ये बच्चा कौन है और इसकी तस्वीर क्यों इतनी वायरल हो रही है ये आपमें से बहुत लोगों को पता होगा और जिन्हें नहीं पता उन्हें मैं बताऊंगा लेकिन उससे पहले मैं यह बताना चाहूंगा कि मुझे ये तस्वीर किस घटना की याद दिलाती है। ध्यान रहे ये पूरा लेख मैं खुद को समझाने के लिए लिख रहा हूं। जब तक मैं खुद को नहीं समझाऊंगा मुझे दूसरों को समझाने का कोई अधिकार नहीं।

घर से दूर रह रहे लोगों का हिल स्टेशन उनका गांव घर ही होता है ( बशर्ते उनका गांव घर से लगाव अभी तक बना हो )। हमारे पिता जी का अपने गांव से लगाव हमेशा बना रहा इसीलिए छुट्टियों में हमारा हिल स्टेशन तो वही गांव होता था जहां एक बार में किलो के हिसाब से धूल पाउडर की तरह उड़ाती थी, जहां गांव की मिट्टी की खुशबू में सड़क किनारे बच्चों के निपटान की बदबू घुली रहती थी, जहां रात में लालटेन और डिबिया को ही रात के अंधेरों से लड़ना होता था। मगर ना जाने क्यों यहां हमेशा से अच्छा लगता रहा है। टीवी नहीं, पंखा कूलर नहीं, खाने को कोई अच्छी चीज नहीं बिकती फिर भी सुकून यहीं मिला हमेशा से। इन सबकी वजह थी शायद वो लाढ और प्यार जो घर पर तो बिना जन्मदिन के कभी देखने या महसूसने को नहीं मिलता था।

यहां तो कोई भी बदमाशी कर लो और छुप जाओ बाबा और दादा (ताऊ) के पास। घर घर घुमाने के लिए बुआ थी, जब मन किया माँरने का तो मार खाने के लिए छोटी बहन थी, आवारागर्दी के लिए खेत खलिहान थे, चुभुकने के लिए नदी थी। अब इतना कुछ हो तो भला बालमन कैसे न वहां रह जाना चाहेगा हमेशा के लिए। ऐसे ही एक बार हम सब गए हुए थे गांव। हां ये भी बात है कि बचपन में हर बार हमारा पाला गांव की गर्मियों से ही पड़ा, सर्दियों में तो आने वाली परीक्षाओं का डर ही कुछ सोचने नहीं देता था। यह भी एक गर्मियों की दोपहर ही थी।

हम उस बड़े से घर की छोटी सी डयोहरी में खेल रहे थे। खेल वही था दलबा भटवा वाला जिसके लिए पहले भी बहुत बार लतियाए जा चुके थे। असल में हम खेल नहीं रहे थे हम तो बस खेल बिगड़ रहे थे और यही खेल बिगाड़ना हमारा प्रिय खेल हुआ करता था। हम वहां सबसे बड़े थे इसीलिए बाकी सब हमारे खेल बिगाड़ने पर बस कूंथ कर रह जाते थे कोई कुछ बोल या कर नहीं पाता था। इसी खेल खेलने और खेल बिगड़ने के क्रम में ऊपर से एक छोटा मगर अजीब सा प्राणी धप्प से गिरा। छोटे बच्चों के लिए उस जीव का गिरना किसी बम के गिरने से कम नहीं था। एक साथ कई चीखें उठीं लेकिन हम ठहरे वीर जवान। हमने एक बार भी खुद को डरा हुआ नहीं दिखने दिया। उस छोटी सी अजीब चीज़ पर अपनी पैनी नजर चलने के बाद जब हमें लगा कि यह तो चिड़इया जैसी कोई चीज है जो ज्यादा खतरनाक नहीं है तो हमने बड़े रौब से चिल्ला कर सबको चुप कराया।

अपने अनुभवी लहजे में सबको बताया कि डरने की कोई बात नहीं, ये महज अजीब सी चिड़इया है। अब हमारे सामने चुनौती ये थी कि हमें पता लगाना था कि ये आखिर कौन से किसिम की चिड़इया थी जिसे हमने पहले नहीं देखा था। बस एक आला की कमी थी बाकि हम पूरी तरह डॉक्टर लग रहे थे। काफी मिनटों के गहन अध्ययन के बाद दो बातें सामने आयीं एक तो यह अजीब नहीं है, जो रोज दिखती है उसी जैसी चिड़इया का बच्चा है जो अभी तुरंत ही अंडे से फूटा है और दूसरी कि इस मासूम की सांसारिक यात्रा समाप्त हो चुकी है। ये हमारा वो दौर था जब मरना हमारे लिए मात्र खबर नहीं थी। किसी का भी मरना सुन कर दिल में अजीब सा डर उठ जाता था, ये समझे बगैर कि मरना असल में होता क्या है। हां बस किसी के मरने का दुःख लगता था बहुत ज्यादा। ऐसा ही दुःख अभी भी लग रहा था। मैं भूल चुका था कि मुझे खेल बिगाड़ना पसंद है। सभी बच्चों के चेहरे उदास थे। वहां से गुजरती एक दाई ने कहा ‘छिया छिया, फेको इसको।’ वो मासूम मर गया था। उसे भला ऐसे कैसे फेंक सकते थे। भला इंसान मरता है तो उसे क्या ऐसे ही फेंक दिया जाता है ? यही सब सोचने के बाद नतीजा निकला कि इसे फेंका नहीं जाएगा।

उस चिड़इया के बच्चे के साथ जो करना था वो तय होने के बाद सबको अपने अपने हिस्से का काम मिल गया। किसी को घर से धागा लाना था, किसी को साबुनदानी किसी को कोई साफ़ छोटा मखमली कपड़ा। साबुनदानी की जिम्मेदारी हमारे जिम्मे आई क्योंकि हम वहां सबसे जिम्मेदार थे। सारा सामान आ गया। साबुनदानी में मखमली( जो किसी काकी की पुरानी साड़ी में से फाड़ा गया था) कपड़ा बिछाया गया और उसके आगे लंबा धागा बांधा गया। ये अर्थी थी जिस पर बड़ी श्रद्धा पूर्वक चिड़इया के बच्चे को लिटाया गया। हमने पहले ही बताया कि हम वहां सबसे जिम्मेदार थे इसीलिए अर्थी की डोरी हमारे हाथों में आई। देखते ही देखते और बच्चों को भी खबर लग गई। छोटकी चिड़इया के जनाजे में 10 से पंद्रह बच्चे शामिल हो गए। हम डोरी को खींचते हुए धीरे धीरे आगे बढ़ रहे थे और बाकी बच्चे ‘राम नाम सत्य है’ बोलते हुए हमारे पीछे चल रहे थे।

शवयात्रा कुछ सौ मीटर चलने के बाद नदी कान्ही पर पहुंच गई थी। यहां इसलिए आये थे क्योंकि सबको पता था मरने के बाद सबको यहीं फूका जाता है। सबको यह भी पता था कि जब बच्चा मरता है तो उसे फूका नहीं दफनाया जाता है। इस सभी बैटन की चर्चा पहले हो चुकी थी । इसीलिए हम सबने भी चिड़इया के उस बच्चे को दफना दिया। यकीन मानिए आज भले ही मैं मुस्कुराता हुआ ये लिख रहा हूं लेकिन उस रात किसी बच्चे के गले से अन्न नहीं उतरा था। आज अख़बारों से लेकर न्यूज चैनल तक सुबह की शुरुआत ही ये बताते हुए करते हैं कि फलां जगह इतने लोग मर गए। हमारे लिए वो सब अख़बार की ख़बरें हैं। किसी की मैय्यत में जाना हमारे लिए मात्र औपचारिकता रह गई है। जब तक किसी अपने के साथ अप्रिय न हो उस दुःख का अहसास ही नहीं होता।

आज जब मीडिया संस्थान में काम करते हुए हर रोज कई लोगों की मौत मेरे मन में न उतर कर ज़हन के रस्ते मात्र एक खबर का रूप ले लेती है तो मुझे मेरे अंदर का वो बच्चा याद आता है जिसके लिए एक छोटी सी चिड़इया का मरना भी मायने रखता था।

शुक्रिया इस बच्चे का जो दस का नोट हाथ में लिए मुर्गी के बच्चे का इलाज कराने अस्पताल पहुंच गया

शुक्रिया इस बच्चे का जिसने याद कराया कि हमने बड़े होने के सफ़र के दौरान असल में क्या सबसे कीमती खो दिया। मिजोरम के सैरंग में रहने वाले इस 6 वर्षीय बच्चे का नाम डेरेक सी लालछन्‍ह‍िमा है। घर के बाहर खेलते हुए इस बच्चे की साइकिल से एक मुर्गी का चूजा मारा गया।

बच्चा समझ नहीं पाया कि मुर्गी का बच्चा मर चुका है। उसने अपने पिता से कलपते हुए कहा कि वे इसे अस्पताल ले जाएं तो पिता ने कहा कि तुम खुद जाओ। बच्चे के पास उसके जोड़े हुए दस रुपये थे जिन्हें लेकर वो मुर्गी के बच्चे का इलाज करने अस्पताल पहुंचा। ये तस्वीर अस्पताल की उस नर्स ने क्लिक की है जिसे जा कर बच्चे ने मुर्गी के बच्चे को ठीक करने की गुहार लगाई थी।

डेरेक इतने पर ही नहीं रुका। उसे लगा कि उसके पास कम पैसे थे शायद इसीलिए अस्पताल वालों ने मुर्गी के बच्चे का इलाज नहीं किया। वह रोते हुए वापस घर आया और 100 रुपए लेकर मुर्गी के बच्चे की मदद करने के लिए दोबारा अस्‍पताल अस्‍पताल पहुंचा। उसके मां पिता ने को अंतत: उसे समझाना पड़ा कि उस बच्चे की मौत हो गई है और वे अस्‍पताल में कुछ नहीं कर सकते हैं।

आज इस बच्चे की तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। इस तस्वीर में बच्चे की मासूमियत देख कर महज इसे शेयर कर देने भर से बात न बनेगी। इस तस्वीर को देख कर हमें याद करना होगा अपने अंदर के उस बच्चे को जिसके लिए मासूम जीव जंतु तक मायने रखते हैं। इस बच्चे की ये तस्वीर हमारी मरती हुई संवेदना को ज़िन्दा करने की एक कोशिश है। हम सबका बचपन लगभग ऐसी ही मासूमियत में बीता है। इस तस्वीर को देख कर आप भी याद करिए अपने अंदर के उस मासूम बच्चे को जिसकी मासूमियत ने उसे ईश्वर जितना बड़ा बना दिया था। http://www.satyodaya.com

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जानिए: रहस्यमयी कहानियों के मशहूर लेखक चंद्रकांता के चरित्र को गढ़ने वाले देवकीनन्दन खत्री के बारे में…

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देवकीनंदन खत्री को आधुनिक हिंदी उपन्यासकारों की पहली पीढ़ी माना जाता है। चंद्रकांता के चरित्र को गढ़ने वाले देवकीनंदन खत्री ने हिंदी उपन्यास लेखन के क्षेत्र में एक नया मुकाम हासिल किया। हिंदी में रहस्य-रोमांस से भरपूर उपन्यासों के पहले लेखक थे।

देवकीनंदन खत्री का जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में हुआ था। उनके पिता लाला ईश्वरदास एक धनी व्यापारी थे। जिनके पूर्वज मुगल शासन में महत्वपूर्ण पद पर रहे महाराजा रणजीत सिंह के पुत्र शेर सिंह के शासनकाल में लाला ईश्वरदास काशी में आकर बस गए थे। घर में संबंधों के कारण देवकीनंदन खत्री का बचपन खुशनुमा माहौल में बिता। उन्होंने अपना बचपन अपने नाना के घर में बिताया देवकीनंदन खत्री की प्रारंभिक शिक्षा उर्दू फारसी में हुई थी। बाद में उन्होंने उपन्यास में हिंदी संस्कृत और अंग्रेजी का भी अध्ययन किया। पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण रियासतों के शासन में उनको कई दोस्त है उसके अलावा फकीरों और तांत्रिकों से भी उनकी अच्छी दोस्ती थी। प्रारंभिक शिक्षा के बाद वे गया में टेकरी चले गए। बाद में उन्होंने वाराणसी में लहरी नाम से एक प्रिंटिंग प्रेस की शुरुआत की और 1898 में हिंदी मासिक दूरदर्शन का प्रारंभ किया। शुरुआत में बीसवीं सदी की शुरुआत में देवकीनंदन खत्री और उनके पुत्र दुर्गा प्रसाद की कई रचनाओं को लहरी प्रेशर दोबारा प्रकाशित किया गया। चंद्रकांता ने बनाया मसूदा देवकीनंदन खत्री बचपन से ही सैर सपाटे के बहुत शौकीन थे। वे लगातार कई दिनों तक चकिया और नौगढ़ के बीहड़ जंगलों पहाड़ों और ऐतिहासिक इमारतों के खंडहरों में घूमा करते थे। बाद में इन्हें ऐतिहासिक इमारतों के खंडहर की पृष्ठभूमि में अपनी तिलिस्मी तथा ऐयारी करनामों की कल्पनाओं को मिश्रित कर उन्होंने चंद्रकांता उपन्यास की रचना की। यह उपन्यास उन्होंने 19वीं सदी के अंत में लिखा इस उपन्यास ने देवकीनंदन खत्री को मशहूर बना दिया। यह उपन्यास तिलिस्मी और रहस्यों से भरा हुआ था। कहा जाता है कि देवकीनंदन खत्री के इस रचना को पढ़ने के लिए कई गैर हिंदी भाषी लोगों को हिंदी सीखने को मजबूर होना पड़ा। इस उपन्यास पर चंद्रकांता नाम से टेलीविजन धारावाहिक भी बनाया गया। जो बेहद लोकप्रिय धारावाहिक 1994 और 1996 के बीच दूरदर्शन के डीडी नेशनल चैनल पर प्रसारित होता था। उन दिनों जब यह धारावाहिक टीवी पर प्रसारित होता था तो सड़के और गलियां खाली पड़ जाती थी। यही नहीं देवकीनंदन खत्री ने तिलिस्म और ऐय्यार,और ऐयारी जैसे शब्दों को हिंदी भाषियों के बीच लोकप्रिय बनाया। इस उपन्यास की लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इसी कथा को आगे बढ़ाते हुए दूसरा उपन्यास चंद्रकांता संतति भी लिखा जो चंद्रकांता की अपेक्षा कई गुना रोचक था यह उपन्यास भी अत्यंत लोकप्रिय हुआ।

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प्रमुख रचनाएं

उन्होंने चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, काजर की कोठरी, नरेंद्र मोहिनी, कुसुम कुमारी, बीरेंद्र बीर, गुप्त गोदना, कटोरा भर, भूतनाथ जैसी अनेक रचनाएं लिखी चंद्रकांता संतति के एक पात्र को नायक का रूप देकर देवकीनंदन खत्री ने भूतनाथ की रचना की पर असामयिक मृत्यु के कारण वे इस उपन्यास के केवल 6 भाग ले पाए इसके बाद के शेष 15 भागों को उनके पुत्र दुर्गा प्रसाद खत्री ने पूरा किया।http://www.satyodaya.com

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गुड़ सी मोहब्बत (कहानी)

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– धीरज झा

“अरे वो देखो बाबा आ गए।” मैदान के एक कोने में सुस्ता रहे लड़कों में से एक ने कहा। इसी के साथ सभी बच्चे बाबा के लौटने का इंतजार करने लगे।

“अरे यार ये बाबा रोज़ कब्रिस्तान में क्या करने जाते होंगे।”

“हमारी दाई बता रही थी कि ये बाबा भूतों से बात करते हैं। हर रोज़ उनका हाल चाल पूछने जाते हैं।” किसी गुप्त सूचना की तरह उस लगभग गंजे से लड़के ने धीमे से ये बात कही

“अरे चुप हो जाओ, हर रोज तुम्हारे पास यही कहानी होती है। इस दफे दसवीं तड़प जाओगे और अभी भी तुम सुनी सुनाई बात पर विश्वास करते हो।” उन लड़कों में सबसे बड़ी उम्र के लड़के ने समझदारी भरे लहजे में कहा।

“अरे नहीं भइया, ये सच कह रहा है। हमने कई बार बाबा को अकेले बतियाते देखा है।” गमछा से अपना पूरा मुंह लपेटे लड़के ने गंजे लड़के की बात का समर्थन किया।

उस बड़े लड़के ने छोटे लड़कों की बात पर कुछ दे सोचा और फिर कहा “ठीक है जब बाबा भूतों से बात करते हैं फिर हमें यहां नहीं रुकना चाहिए। कौन जाने वो अपने साथ किसी भूत को पकड़े आएं।”

बड़े लड़के की बात सुन कर बाकी सभी लड़के एक साथ बोले “हां हम चले जाएं और आप बाबा से सारी गुड़ उड़ा ले जाओ।”

“अच्छा तो गुड़ भी खाओगे और बाबा की बुराई भी करोगे। ठहरो बाबा को बतात हूं।”

“क्या बताना है राकेश बाबू। बता दो। ज़माना गुज़र गया हमको किसी ने कुछ बताया ही नहीं।” सभी लड़कों की आवाज के बीच एक बूढी आवाज गूंजी। सब चुप हो गए।

“अस्सलाम वालेकुम बाबा।”

“वालेकुम अस्सलाम बच्चों। और सब खैरियत न ?”

“हां बाबा सब अच्छा है।”

“तो राकेश मियां, आपने बताया नहीं कि हमें क्या बताने वाले थे।”

“अरे कुछ नहीं बाबा, जानते ही हैं सब बच्चों को।” लड़के ने बाकी सबको बच्चा बता कर खुद के सयाने होने की पहचान दी।

“हाहाहा, हां सब बच्चे हैं ही बहुत ख़राब एक आप ही तो होनहार हैं। बाकी मैं इनके अब्बा लोगों को यहां गुड़ बांटता आया हूं जानता हूं ये क्या कह रहे होंगे।” सभी बच्चों के गले सूखने लगे कि आज तो बाबा गुस्सा जाएंगे। अब तो गुड़ भी नहीं मिलेगी और बाबा भूत पीछे छोड़ेंगे वो अलग।

“नहीं नहीं बाबा ऐसा वैसा कुछ थोड़े ही न कह रहे थे।” उस गंजे बच्चे ने सफाई दी

“तो जैसा तैसा कह रहे थे वैसा वैसा ही बता दो।” बाबा ने चुटकी ली।

“वो ये कह रहा था कि आप भूत से बातें करते हैं।” गमछे से मुंह ढके जिस लड़के ने गंजे लड़के की बात का समर्थन किया था उसी ने राज खोल दिया जिसके बाद बाबा बहुत जोर से हंसे। बाबा की हंसी ने सबको डरा दिया।

बाबा ने आगे कुछ नहीं कहा उन्होंने सभी बच्चों को गुड़ दिया और पेड़ की छांव में हमेशा की तरह बैठ गए। गुड़ मिलने की देर थी कि सभी लड़के वहां से दुम दबा कर भाग खड़े हुए। बाबा उन्हें जाता देख एक बार को मुस्कुराए और अपने आंखें बंद कर कुछ सोचने लगे।

“बाबा।” एक आवाज ने बाबा का ध्यान खींचा। उनके हिसाब से सभी लड़के जा चुके थे।

“अरे राकेश मियां, आप अभी तक गए नहीं। जाइए नहीं तो भूत बुला लेंगे हम।” बाबा हंसे लेकिन इस हंसी में एक पीड़ा थी। हम सब हंसी को हंसी की तरह देखते हैं। आंसुओं की किस्में हमने तय कर दीं लेकिन हंसी हमेशा हमारे लिए ख़ुशी का प्रतीक ही रही। लेकिन कई बार इस हंसी में जो दर्द छुपा होता है वो दुःख के आंसुओं से कई ज्यादा गाढ़ा और पीड़ादायक होता है।

“बाबा हम जानते हैं आप न तो यहां भूतों से बात करने आते हैं और न ही आपके पास कोई भूत है।”

“फिर तो आप सच में समझदार हैं। अच्छा अब ये बताइए कि आप हमसे क्या चाहते हैं जो अभी तक गए नहीं।”

“बाबा मैं बस इतना जानना चाहता हूं कि आप यहां हर रोज़ क्यों आते हैं। सब तो कहते हैं कि आप कई बार रात में भी यहां आकर बैठे रहते हैं।”

“है कोई अपना उसी से मिलने आता हूं।”

“है ? लेकिन बाबा यहां तो सिर्फ ‘था’ रहते हैं।”

“मेरे बच्चे किसी को भी ‘था’ हमारी सोच बनाती है। जिंदगी तो बस मौजूदगी छीन कर ले जाती है, खयाल नहीं। और खयालों का जहान ऐसा है कि जो वहां का हो गया वो फिर कभी ‘था’ नहीं होता।” समझदारी दिखने वाले लड़के के लिए अब ये ‘था’ ‘है’ का खेल बहुत पेचीदा होता चला जा रहा था।

“बाबा सही से बताइए ना वो कौन है जिसे आप मिलने आते हैं, क्या आप सच में भूतों से बात करते हैं ?”

“नहीं राकेश मियां भूतों से हमारा कभी कोई राबता नहीं रहा। यहां तो कोई अपना है जिसके स्नेह की डोर हमें हर रोज यहां खींच लाती है।”

“कौन है वो अपना।” लड़के के चेहरे की उत्सुकता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई।

“इसके लिए तो आपको एक कहानी सुननी पड़ेगी।”

“हाँ मुझे कहानियां बहुत पसंद हैं।”

“सिर्फ पसंद हैं या उन्हें समझते भी हैं।”

“समझता हूं बहुत अच्छे से।”

“हम्म्म्म, ठीक है।”

“तो सुनाइए।”

“बहुत पुरानी बात है। नज़रें भले आज धुंधला देखने लगी हैं लेकिन यादों में हमें अब भी सब साफ साफ दीखता है। हम आपको तब की बात बता रहे हैं जब आपके बाबा भी बिना चड्डी के घूमा करते थे। उन दिनों गांव टोलों में नहीं बंटा था। सियासी हवा तब गाँवों तक नहीं पहुंची थी। मुस्लिम का हिन्दुओं के दरवाजों पर खूब आना जाना था। न हम तिलक ठोप देख कर डरते थे न वो हमारी दाढ़ी का खौफ खाते थे। आपको शायद सुन कर हैरानी हो कि तब किसी घर में ताला नहीं लगता था। किसी को अगर एक दो दिन के लिए कहीं जाना हो तो वो पड़ोसियों के हवाले घर छोड़ कर चला जाया करता था। सुबह की नमाज़ें और आरती एक साथ ही हुआ करती थी। वो आस्था के सम्मान का दौर था, इंसानियत का दौर था। लेकिन…” बाबा खामोश हो गए, कुछ सोचने लगे।

“लेकिन क्या बाबा…” लड़के ने टोका

“लेकिन मोहब्बत तब भी गुनाह ही थी। शायद आज से बड़ा गुनाह। और मैं तब का ही गुनेहगार हूं। मैंने मोहब्बत की। उस लड़की से जिसका कोई नहीं था। मैंने गुनाह किया उसके साथ जिंदगी गुजारने का सपना देखने का। मैंने बचपन से उसको मार खाते देखा था, उसकी आंखों से बहने वाला एक एक आसूं तेजाब की तरह मेरे दिल पर फफोले बना रहा था। मैंने एक उम्र तक उसे रोज़ अपने रिश्तेदारों के हाथों पिटते देखा, अच्छे खाने को तरसते देखा। मेरे घर से अचानक गुड़ गायब हो जाना, मां की बनाई पिन्नियों का कम होना या कोई अच्छा पकवान बनने पर उसकी मात्र घाट जाना कोई इत्तेफाक नहीं था। ये मैं ही था जो उसके लिए ये सब चुराया करता था।

अजीब खेल खेला था नियति ने। एक परियों सी खूबसूरत लड़की की ख़ुशी की कीमत बस एक भेली गुड़ थी। वो गुड़ देख कर इतनी खुश हो जाती कि उससे लिपट कर मर चुकी चींटियों का ख्याल भी उसे न आता। वो गुड़ देख कर खुश होती और मैं उसकी खुशी देख कर सुकून पा जाता। उसे देख कर ही मैंने जाना था कि ख़ुशी पाना कितना आसान होता है। मैं रोज़े रखता था ताकि वो सहरी और इफ्तारी में कुछ अच्छा खा सके। दिक्कतें हमारे यहां भी थीं लेकिन उन दिक्कतों से बचाने के लिए मेरे पास अम्मा और अब्बा थे। मुझे बचपन में ही ये समझ आ गया था कि अल्लाह ने मुझे इसकी देखरेख के लिए ही पैदा किया है।” बाबा असमान की और देखते हुए उन दिनों में खो गए थे और बाबा की कहानी के साथ साथ लड़का भी उनके पीछे पीछे चल दिया था।

“वक्त बीतता रहा और मेरा दिल में उस लड़की के लिए दबा स्नेह का बीज प्रेम का विशाल शजर हो गया। और वो लड़की, उसे तो शायद मुझसे उसी दिन मुझसे मोहब्बत हो गई थी जिस दिन मैंने पहली बार उसके आंसू पोंछे थे। जब तक हमारी मोहब्बत छुपी हुई थी तब तक वो अनाथ थी, अपने रिश्तेदारों पर बोझ थी और जिस दिन इस मोहब्बत की खुशबू हर तरफ फैली उसी दिन उसे अपने घर की इज्जत बना लिया था उसके रिश्तेदारों ने।

जो सूखी रोटी खाने पर मजबूर थी वो अब उस महल की राजकुमारी हो गई थी। वो खूब रोई लेकिन उसका रोना तो रोटी तक के लिए नहीं सुना जाता था फिर मोहब्बत के लिए कहां से चुना जाता। उसकी शादी कहीं और तय कर दी गई। लेकिन मेरी रोज उसे गुड़ देने की आदत नहीं छूटी। ये गुड़ ही था जिसके कारण लोगों द्वारा इतना ज़हर फ़ैलाने के बावजूद हमारे रिश्ते की मिठास हमेशा बनी रही।” प्यार मोहब्बत के नाम पर लड़के ने अभी तक कुछ फिल्में ही देखी थीं। मोहब्बत की ये सच्ची दास्तां सुनना उसके लिए नया अनुभव था लेकिन इसके बावजूद उसकी आंखों के कोर भीग चुके थे।

“उसके निकाह का दिन आ गया। मैंने सोच लिया था कि मैं मोहब्बत के लिए अपने पूरे समाज से बैर मोल लूंगा। मैंने सब हिसाब लगा लिया था कि उसे लेकर यहां से कहां जाना है, क्या करना है, किस तरह जिंदगी बितानी है लेकिन मैं इन सब बातों का हिसाब लगाते हुए ये भूल गया था कि आखिरी हिसाब उस अल्लाह का ही होता है। यहां भी अल्लाह मुझसे पहले अपना हिसाब लगाये बैठा था। मेरे पहुंचने तक शादी का घर मातम के घर में तब्दील हो चुका था। वो पागल लड़की कुछ देर इंतजार भी न कर पाई और उसने ज़हर खा लिया था। लोगों की भीड़ के बीच पड़ा उसका जिस्म अपनी जल रही रूह को बाहर निकाल में जुटा था लेकिन उसकी रूह मुझसे मिलने की जिद्द पर अड़ी थी। भीड़ को हटाते हुए मैं उसके पास पहुंचा। उसका सिर मैंने अपनी गोद में लिया। शायद इस विरोध होता लेकिन न जाने क्यों उस वक्त हर कोई शांत था। अभी सिर्फ और सिर्फ मेरी चीखें और दो पलों की जिंदगी के लिए मौत से लड़ती सांसों की आवाज वहां गूँज रही थी।”

उसने मुझे देखते ही अपनी बंद हो रही आंखों को खोला और अपने होंठ हिलाए “आ गए तुम! गुड़ लाए हो ?”

उसके सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं था क्योंकि आज मैं गुड़ नहीं लाया था। मैंने सोचा कि मैं गुड़ कैसे भूल सकता हूं, हमारे रिश्ते की बुनियाद है ये गुड़ और मैं इसे ही भूल गया।

“मुझसे एक वादा करो।” वो ऐसे बोली जैसे बहुत जल्दी में हो। हां वो जल्दी में ही तो थी। मैंने सिर हिला दिया।

“मैं वापस आउंगी। तुम मेरा इंतजार…?” उसकी सांसें मौत से लड़ते हुए हार चुकी थीं। आंखें खुली रहीं और उसकी आखिरी बात उसकी हलक में ही रह गई।  मैंने उसकी आंखें बंद करते हुए कहा “हां, इरम मैं हमेशा तुम्हारा इंतजार करूंगा। तुम्हे मेरे लिए लौट कर आना होगा” वो चली गई थी। मैं रोता रहा बिलखता रहा। मैंने किसी को उसे हाथ न लगाने दिया। वो जिंदा नहीं थी इसी लिए न तो किसी के घर की बेटी थी, न इज्जत। भले ही अब वो दूसरों के लिए लाश थी मगर मेरे लिए आज भी उसके उतने ही मायने थे जितना उसके जिंदा होने पर।” बाबा अब ठीक उसी तरह खामोश हो गए जैसे किसी तूफान के बाद कुदरत शांत हो जाती है।

लड़का बाबा के हाथ में रखे गुड़ को एक टक देखे जा रहा था। बाबा को शायद अब ये बताने की ज़रूरत नहीं थी कि वो हर रोज यहां किस्से मिलने आते हैं। लड़का ये भी समझ चुका था कि बाबा किसी भूत से बात नहीं करते। लेकिन उसके दिमाग में एक बात लगातार घूम रही थी जिसे वो पूछना चाहता था। कुछ पल रुक कर उसने बाबा से सवाल किया “बाबा आप तो मुस्लिम हैं न और मुस्लिम तो पुनर्जन्म में विश्वास नहीं रखते न। फिर वो वापस कैसे आएंगी ?”

लड़के की बात पर बाबा पहले मुस्कुराए और फिर एक लंबी सांस खींच कर बोले “प्रेम का अपना अलग ही धर्म है। यहां सिर्फ वही रिवायतें मानी जाती हैं जिसमें मिलने की उम्मीद जिंदा रहे। इस प्रेम और उससे मिलने की उम्मीद ने मुझे भी काफ़िर बना दिया। ये प्रेम एक दिन हमें ज़रूर मिलाएगा…”

बाबा के इन शब्दों के साथ ही उनकी नजरें कब्रिस्तान की और जा टिकीं और फिर टिकी रहीं। उनके चेहरे पर इस वक्त वही मुस्कान थी जो उन दिनों उस लड़की को देखते ही खिल जाया करती थी. लड़के के आंखों में आये पानी के सूखने पर उसे ये मालूम हुआ कि बाबा का इंतजार आज समाप्त हो गया है। लड़के ने कुछ देर बाबा को गौर से देखा और फिर गांव की तरफ ये चिल्लाता हुआ भगा “बाबा चले गए, बाबा चले गए।”

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पगार (कहानी)

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सुबह – सुबह जहां पूरी दुनिया रंगो में डूबी थी, वहीं मैं थोड़े से रंग लगाकर, होली मनाकर अपनी कुर्सी में आराम फ़रमा रहा था ।

चाय की चुस्कियां लेते हुए, बिस्कुट को हाथ में लिए, इलेक्शन्स की खबरें सुन ही रहा था तभी दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी ।

मैं उठकर बढ़ा ही था कि फिर से किसी ने खटखटाया ।

मैंने सोचा बेल नहीं बजाने के दो कारण होंगे

या तो उसे पता नहीं होगा की इस घर में डोर-बेल भी है, या तो कोई बच्चा होगा जिसकी नन्ही बाहें वहां तक पहुंच नहीं रही होंगी ।

मैंने ज्यों ही दरवाज़े खोलने को हाथ बढ़ाया तो उसने फिर से लेकिन अबकी बार ज़ोर से दरवाज़े को खटखटाया ।

मैंने बोला, “अरे भाई! आ रहा हूं, आ रहा हूं ” ।

जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला, एक छोटी सी बच्ची सामने खड़ी थी ।

पसीने से लथपथ, आंखों में आंसू और डर साफ झलक रहा था ।

अपने नंगे पैर धूप में जलाते हुए लगता है दौड़कर आई थी ।

मैंने पूछा, “क्या बात है बच्चे, क्या हुआ?”

बच्ची की ज़ुबान से लफ्ज बाहर आना तो चाहते थे मगर आ नहीं पा रहे ।

मैंने फिर से पूछा की, “बोलो बच्चे बात क्या है? तुम होली क्यो नहीं खेल रही और बच्चों के साथ?”

उसने फिर हिम्मत जुटाकर कहा कि, “बाबूजी वो मैं-मैं, वो आज मां काम पे नहीं आ पाई, उसकी तबीयत ठीक नहीं, तो आज मैं झाड़ू – बर्तन कर दूं ?”

वो जो वक़्त, जो लम्हा था मेरे लिए जुबां से बता पाना मैं सही नहीं समझता ।

मैंने उसकी आंखों में डर और दर्द दोनो देखें ।

मैंने कहा, “ज़रा रुको, कहीं जाना नहीं”

मैं अंदर गया और कुछ पैसे और दवाइया लाकर उसे दी और बोला, “ये जाकर अभी अपनी मां को खिला दो और कहना की हम उससे मिलने आ रहे ।”

उसके चेहरे पर मुझे एक शांति दिखी । मैंने जरा सा गुलाल लिया और उसके चेहरे पर लगा दिया ।

वो खुश हो गई और उसकी खुशी देखकर मुझे चैन मिला ।

मैंने कहा, “अब तुम घर जाओ” और दरवाज़ा बंद करके मैं अंदर गया ही था की फिर से किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी ।

मैंने दरवाज़ा खोला तो देखा फिर वही बच्ची ।

मैंने पूछा, “क्या बात है बच्चे?”

तो वो हांफते – हांफते कहती है, “बाबूजी! तुम पगार तो नहीं काटोगे ना?”

अमित सोनी

फोटो साभार: गूगल

http://www.satyodaya.com

 

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