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नींबू का करें इस्तेमाल, नहीं छू पायेगा जानलेवा वायरस…

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अगर आपके घर में नींबू है तो कोरोना वायरस से बिल्कुल भी डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि ये वायरस से लड़ने में बहुत ही कारगर साबित होगा ऐसा कहा जा रहा है।  हाथ धोने के लिए अगर आपके पास साबुन या सैनिटाइजर नहीं भी हो तो भी ये जानलेवा वायरस छू नहीं सकता। बस आपको बेहद आसान सा काम करना है. घर में आपको नींबू रखना है। 

डाक्टर भी मानते हैं नींबू और राख को सबसे सुरक्षित
पूर्व राष्ट्रपति के चिकित्सक और देश के जाने माने डॉक्टर मोहसिन वली का कहना है कि हाथ धोने के लिए अगर आप नींबू का इस्तेमाल करते हैं तो वायरस आपके करीब भी नहीं फटक सकता है। भारत में हाथ धोने के लिए नींबू का इस्तेमाल पुरातन काल से ही होता रहा है। बड़े बुजुर्ग भोजन से पहले या शौच के बाद भी घर में नींबू से हाथों को साफ करते थे। डॉ. वली ने आगे बताया कि हाथों को धोने के लिए इन पारंपरिक चीजों का इस्तेमाल भर से कोरोना वायरस के संक्रमण से बचा जा सकता है।

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भारतीय परिवारों के लिए वरदान है नींबू
मामले से जुड़े एक अधिकारी का कहना है कि देश में कोरोना वायरस फैलने के बाद ही अचानक बाजार में सैनिटाइजर की कमी हो गई है। लेकिन अभी भी आम लोग ये नहीं समझ पा रहे हैं कि कोरोना वायरस से बचने के लिए हाथ धोना अहम है, सैनिटाइजर या साबुन नहीं। यही वजह है कि ज्यादातर डॉक्टर बार बार हाथ धोने की सलाह दे रहे हैं। ऐसे में दूर-दराज और गांवों में, जहां सैनिटाइजर उपलब्ध नहीं होता है। ऐसे में आप नींबू का रस हाथों में मल कर धो सकते हैं। हाथों को साफ रखने का ये एक सटीक तरीका है।


एंटीमाइक्रोबियल है नींबू...
2017 में हुए एक शोध के मुताबिक बैक्टीरिया को मारने में नींबू काफी प्रभावशाली है। दि जरनल ऑफ फंक्शनल फूड्स में बताया गया है कि इकोलाई जैसे महामारी से लड़ने के लिए नींबू का रस काफी प्रभावी रहा। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर किसी भी संक्रमण के दौरान आपको सैनिटाइजर या साबुन नहीं भी मिलता है तो नींबू के रस से हाथ धोकर बीमारियों से बचा जा सकता है। जानकारों का कहना है कि हाथों को साफ करने के लिए सबसे पहले नींबू का रस को हथेली पर निचोड़ें। रस को दोनों हातों में अच्छे से मलें। इसके बाद चलते साफ पानी में दोनो हातों को अच्छे से धो लें। किसी साफ कपड़े से हाथों को सुखा लें। http://www.satyodaya.com

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एंटीबायोटिक्स से हो सकता है कोरोना का इलाज?, जाने क्या है पूरा मामला

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लखनऊ: कोरोना वायरस से बचने के लिए लोग कई तरह की सावधानियां बरत रहे हैं। वहीं, ऐसी भी अफवाहें कि एंटीबायोटिक्स से कोरोना वायरस के इंफेक्शन को रोका जा सकता है। शायद आप भूल रहे हैं कि एंटीबायोटिक्स सिर्फ बैक्टीरिया को मारता है न कि किसी वायरस और बैक्टीरिया दोनों अलग-अलग चीजें हैं और दोनों शरीर को अलग तरीके से नुकसान पहुंचाते हैं। एंटीबायोटिक्स वायरस को नहीं मार सकता है और COVID-19 एक वायरस है इसलिए एंटीबायोटिक्स से इसका इलाज नहीं किया जा सकता है।

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WHO के अनुसार, एंटीबायोटिक्स को कोराना वायरस से बचाव के लिए नहीं इस्तेमाल किया जाना चाहिए. ये सिर्फ बैक्टीरियल इन्फेक्शन के लिए किसी डॉक्टर की सलाह के बाद ही लेना चाहिए। हालांकि, अगर किसी व्यक्ति को कोरोना वायरस की वजह से अस्पताल में भर्ती कराया गया है तो उसे बैक्टीरियल इन्फेक्शन से भी दूर रखने के लिए एंटीबायोटिक्स दिया जा सकता है । http://www.satyodaya.com

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वैज्ञानिकों ने बताया, मानव शरीर से ऐसे लड़ता है कोरोना वायरस

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ऑस्ट्रेलिया में वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने इस बात की पहचान कर ली है कि मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कोरोना वायरस का मुकाबला कैसे करती है। यह शोध नेचर मेडिसीन जर्नल में प्रकाशित किया गया है। इस शोध में कहा गया है कि चीन समेत कई देशों में लोगों के कोरोनावायरस संक्रमण से उबरने की खबरें आने लगी हैं। ऐसे में शोधकर्ताओं ने यह पता करने का प्रयास किया कि आखिर मानव शरीर का सुरक्षा तंत्र इस वायरस से कैसे लड़ता है और कैसे उसे हरा पाता है।


शोधकर्ताओं का कहना है कि इस शोध का मकसद उन कोशिकाओं के काम के बारे में पता लगाना था जो इस वायरस को टक्कर दे रही हैं। उनका मानना है कि इससे वायरस के लिए वैक्सीन तैयार करने में मदद मिलेगी। चीन के वुहान शहर से शुरू हुआ कोरोना वायरस का संक्रमण 159 से अधिक देशों तक पहुंच चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वायरस से संक्रमित 1।84 लाख से ज्यादा मामलों की पुष्टि की जा चुकी है जबकि इस कारण 7,500 से भी ज्यादा मौतें भी दर्ज की गई हैं।

इस शोध में शामिल प्रोफेसर कैथरीन केडज़िएर्स्का के मुताबिक, यह एक बेहद महत्वपूर्ण खोज है क्योंकि हमें पहली बार शोध से यह पता चल पा रहा है कि हमारा शरीर (रोग प्रतिरोधक क्षमता) कोरोना वायरस से कैसे लड़ता है। मेलबर्न के पीटर डोहर्टी इंस्टीट्यूट फॉर इंफेक्शन एंड इम्यूनिटी के शोधकर्ताओं के इस काम की दूसरे कई शोधकर्ताओं ने भी तारीफ की है। एक शोधकर्ता ने इसे एक बड़ी सफलता बताया है।
शोध में क्या मिला?

एक ओर जहां कोरोनावायरस के संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं वहीं बहुत से लोगों ने इसके संक्रमण से मुक्ति भी पाई है। शोधकर्ताओं का कहना है संक्रमण हुए कई लोगों को क्वारेंटीन किया गया था लेकिन अब वो स्वस्थ होकर अपने घर लौटे हैं। 
ये अपने आप में बताता है कि मानव शरीर को रोग रक्षा प्रणाली को इससे लड़ना आता है। वो मानते हैं कि अभी तक इस पर विशेष तौर पर ध्यान नहीं दिया गया था।


अपने शोध के बारे में शोधकर्ताओं का कहना है कि यह पहला मौक़ा है जब रिसर्च के माध्यम से चार प्रकार की प्रतिरक्षा कोशिकाओं की पहचान की गई है, जो कोविड 19 से लड़ने में सक्षम पाई गईं। इन कोशिकाओं का पता एक संक्रमित महिला की जांच से किया गया।  उन्हें मामूली-मध्यम संक्रमण था और उसे इसके अलावा दूसरी कोई भी बीमारी नहीं थी। चीन के वुहान शहर की एक महिला को संक्रमण के बाद ऑस्ट्रेलिया के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। भर्ती कराये जाने के 14 दिनों के भीतर वो पूरी तरह स्वस्थ हो गईं।

प्रोफेसर केडजिएर्स्का ने बीबीसी को बताया कि उनकी टीम ने इस महिला की विस्तृत जांच की। उनकी जांच के केंद्र में इस महिला का इम्यून सिस्टम था। टीम ने अपनी जांच में यह पता लगाने की कोशिश की कि इस महिला का इम्यून सिस्टम कोरोना वायरस के संक्रमण पर किस तरह की प्रतिक्रिया करता है। वो बताती हैंजब महिला की स्थिति में सुधार आने लगा तो उसके खून के बहाव में कुछ विशिष्ट प्रकार की कोशिकाओं को देखा गया। ये कुछ उसी तरह की वही कोशिकाएं थीं जो इंफ्लूएंजा के मरीजों में ठीक होने से पहले दिखाई देती हैं।
यह कैसे मददगार है?

स्विनबर्न यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी में हेल्थ साइसेंस के डीन प्रोफेसर ब्रूस थॉम्पसन के मुताबिक़, ये शोध वायरस को पहचानने में मदद कर सकता है। प्रोफेसर ब्रूस के मुताबिक, जब आपको यह पता होता है कि विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं कब होंगी तो आपको ये पता लगाने में आसानी होती है कि आप इस वायरस और उसका काम करने के तरीके की पहचान करने के कितने करीब हैं। ऑस्ट्रेलिया के स्वास्थ्य मंत्री ग्रेग हंट का कहना है कि इस खोज से कोरोना वायरस के लिए वैक्सीन बनाने की दिशा में तेजी आएगी और जल्द से जल्द लोगों को इलाज मुहैया हो पाएगा।


प्रोफेसर केडजिएर्स्का का कहना है कि उनकी टीम का अगला कदम यह पता करना होगा कि जिन मामलों में संक्रमण काफी अधिक था उस समय प्रतिरक्षा प्रक्रिया क्यों कमजोर हो गई या क्यों नाकामयाब रही। उन्होंने कहा कि अब यह समझना जरूरी है कि जिन लोगों की मौत हुई उनके शरीर में किस चीज की कमी थी या क्या कमी थी या फिर क्या सिर्फ उन्हीं लोगों की मौत हुई जिन्हें कोई घातक बीमारी थी?अगर ये बातें स्पष्ट हो जाएगी तो यह समझना भी आसान हो जाएगा कि लोगों को सुरक्षित कैसे बचाया जाए। इस शोध के बाद से इस सेंटर (पीटर डोहर्टी इंस्टीट्यूट फॉर इंफेक्शन एंड इम्यूनिटी) को सरकार की ओर से तो अतिरिक्त आर्थिक सहायता दी ही गई है साथ ही दुनिया के सबसे धनी लोगों में शुमार ‘जैक मा’ ने भी सेंटर को अनुदान दिया है। http://www.satyodaya.com

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क्या है थायरॉइड, जानें लक्षण और उपचार से जुड़ी जरूरी कुछ बातें

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थायरॉयड की समस्या महिलाओं में बहुत ही आम हो चुकी है। जो अन्य कई बीमारियों की वजह है। आजकल ज्यादातर स्त्रियां थायरॉयड संबंधी समस्याओं से परेशान रहती हैं। क्योंकि इससे उनका शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। तो क्या है थायरॉयड, क्यों होती है। यह समस्या और क्या है? इसका इलाज, जानेंगे इससे जुड़ी जरूरी जानकारी। 

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क्या है थायरॉयड?

सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है। कि यह अपने आप में किसी बीमारी का नाम नहीं है। बल्कि यह थायरॉयड ग्लैंड की कार्यप्रणाली से जुड़ी समस्या है। चूंकि इसकी वजह से कई और स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए इसके प्रति सजगता ज़रूरी है। दरअसल यह ग्लैंड गले के निचले हिस्से में स्थित होता है। इसके निचले हिस्से में खास तरह के हॉर्मोन टी-3 और टी-4 का स्राव होता है। जिसकी मात्रा के असंतुलन का असर सेहत पर भी पड़ता है। इसे ऑटो इम्यून डिज़ीज़ कहा जाता है। जो मुख्यत: थायरॉयड ग्लैंड से निकलने वाले हॉर्मोन्स के असंतुलन के कारण पैदा होता है। इसके अलावा आनुवंशिकता, जन्मजात रूप से ग्लैंड की संरचना में कोई गड़बड़ी, एंटीबायोटिक्स या स्टेरॉयड दवाओं के साइड इफेक्ट्स से भी थायरॉयड ग्लैंड की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।  

क्या इसका उपचार संभव है?

अगर हाइपोथायरॉयडिज़्म की समस्या हो तो रोज़ सुबह खाली पेट इसकी दवाओं का सेवन ज़रूरी है। हाइपरथायराडिज़्म होने पर दवा नाश्ते के बाद लेनी चाहिए। अगर डॉक्टर द्वारा दवा की डोज़ में कोई परिवर्तन किया गया है। तो दो महीने के बाद जांच ज़रूरी है।  अगर ऐसा कोई बदलाव नहीं किया गया है। तो हर छह महीने के बाद जांच करवाएं। नियमित जांच एवं दवाओं का सेवन ही इसका एकमात्र उपचार है। गंभीर स्थिति में  आयोडीन थेरेपी दी जाती है। यह जीवनशैली से जुड़ी ऐसी समस्या है, जिसे आसानी से मैनेज किया जा सकता है।http://www.satyodaya.com

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April 1, 2020, 7:52 pm
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