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मंथन

जिनके अन्न के बिना 13 लाख बच्चे कुपोषण से मर जाते हैं उन ‘किसानों’ को मांगों के बदले मिलीं तो बस गोलियां!!

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देश की राजधानी के रामलीला मैदान में हो रहे किसान आंदोलन ने देश भर का ध्यान आकर्षित किया है। इस किसान आंदोलन में इकट्ठा हुए हजारों किसान संसद भवन तक मार्च कर रहे हैं। किसानों की मांग है कि उन्हें कर्ज से मुक्ति और कृषि उत्पाद लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य मुहैया कराया जाए। करीब 200 किसान संगठनों के आह्वान पर ये आंदोलन आयोजित किया गया है। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति द्वारा 29 और 30 नवंबर को आहूत संसद मार्च को वाम दलों सहित 21 राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल हुआ। इतना ही नहीं विद्यार्थी, डॉक्टर, वकील और दूसरे प्रोफेशनल्स भी इन किसानों का समर्थन कर रहे हैं।

बात सरकार को अपनी बात सुनाने की है। नहीं यहां हम सत्ताधारी सरकार की बात नहीं कर रहे यहां बात हो रही है हर उस पार्टी की जो कल सत्ता में थी, आज सत्ता में है और आगे सत्ता में होगी। किसान का देश के विकास और खुशहाली में कितना बड़ा हाथ है ये जानना हो तो उस घर में जा कर देखिए जहां इनके द्वारा उपजाया अनाज नहीं है। बच्चे खाने के बिना मर जा रहे हैं, किसान का उपजाया अन्न न मिलने से ही मध्यप्रदेश में 13 लाख बच्चों के कुपोषण से मर जाने का नया रिकार्ड बन जाता है। ये किसान ही है जिसने जीवन की मूल तीन जरूरतों में से एक बहुमूल्य जरुरत यानी रोटी का जिम्मा अपने सर उठा रखा है। इस अन्नदाता को जब कर्जे के डर से पेड़ों से लटक कर जान देनी पड़ती है तो खुद को समृद्ध देश का वासी कहने में शर्म सी आती है। लेकिन ये दोष किसका है ? सरकार का ? इस मौजूदा सरकार का ? नहीं आप गलत हैं यहां दोष केवल मौजूदा सरकार का ही नहीं बल्कि हर उस सरकार का है जिसने झूठे वादे और सपने दिखा कर इन मासूमों का वोट छीना।

किसान भले ही बच्चों की परीक्षा की चिंता करते हुए रात होने के बाद बिना शोर किए दबे पांव चले लेकिन किसान के इन खून से सने पैरों की परवाह करने वाला यहां कोई नहीं है। किसानों का इस तरह सड़क पर आकर रोना चिल्लाना सत्ता’धारी’ के लिए नया हो सकता है लेकिन सत्ता के लिए कतई नया नहीं है। किसान तो आजादी के पहले से अपने हाल का रोना रोता आया है। इसके रोने पर विपक्ष ने हर बार आंसू तो पोछे हैं लेकिन वही विपक्ष सत्ता को हाथ में लेते ही सबसे पहले इन्हें भूला। अभी तो किसान आंदोलन कर रहा है, इससे पहले तो किसान ने अपने आंदोलन के साथ साथ पुलिस की लाठियों और गोलियों से खुद को घायल भी क्या और अपनी जान भी गंवाई।

जलियांवाला कांड जैसा था मुलताई गोली कांड 

इतिहास के ज्यादा पन्ने न पलटते हुए बात यही कोई 1998 की चढ़ती जनवरी की करेंगे। स्थान था मध्यप्रदेश के बैतूल जिले का मुलताई क्षेत्र। गेरुआ रोग के साथ साथ बेमौसम की ज्यादा बरसात और ओलों ने सोयाबीन की पूरी फसल बर्बाद कर दी थी। किसानों ने गुहार लगाई मगर उनकी धीमी आवाज भला प्रशासन के कानों तक पहुंचे कैसे। उन्हें कोई चाहिए था जो उनकी आवाज को बुलंद कर सके। किसानों की आवाज बनें मुलताई के ही पूर्व विधायक डॉ सुनीलम, जो तब विधायक नहीं थे। सुनीलम ने भांप लिया कि ऐसे बात नहीं बनेगी।

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उन्होंने गांव गांव घूम कर किसानों को एकजुट करना शुरू कर दिया। नतीजन किसान संघर्ष समिति बनी सुनीलम इसके अगुवा हुए तथा अन्य किसान नेताओं को साथ लेकर मुलताई में महाविशाल किसान रैली निकली। महाविशाल इसलिए कि जहां मुलताई की जनसंख्या सन 2001 की जनगणना के अनुसार 21000 थी वहीं इस रैली में 22000 लोग जुटने की बात कही गई। 12 जनवरी को वह मुलताई तहसील जहां किसानों का धारणा चल रहा था उसे घेर लिया गया और बिना किसी पूर्व सूचना या घोषणा के लाठीचार्ज और आंसू गैस के बाद पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी। कहते हैं उस समय अखबारों ने इस घटना को जलियांवाला कांड से जोड़ा था।

बताया जाता है कि इसमें एक स्कूली बच्चे सहित पूरे 24 लोग मारे गए तथा 150 से ज्यादा घायल हो गए। बता दें कि उन दिनों मध्यप्रदेश में कांग्रेस का शासन था तथा दिग्विजय सिंह यहां के मुख्यमंत्री थे। किसानों पर हुए इस गोलीबारी कांड में घटना के 14 वर्ष बीत जाने के बाद यानी 2012 में फैसला आया। मुलताई जिला न्यायालय ने मुलताई गोलीकांड में हत्या के दोषी पाए जाने पर डॉ. सुनीलम सहित तीन लोगों को आजीवन कारावास एवं हत्या के प्रयास में सात-सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई।

मुलताई गोलीकांड में पुलिस ने विभिन्न धाराओं के तहत अलग-अलग 67 मामले दर्ज किए थे, जिनमें से तीन मामलों में मुलताई के अपर सत्र न्यायाधीश ने अपना फैसला सुनाया था। हालांकि मुलताई गोलीकांड मामले में डॉ सुनीलम को बरी कर दिया गया।

अन्य आंदोलन जहां किसानों ने खाईं गोलियां

इसके आलावा 2012 में महाराष्ट्र के सांगली में गन्ना किसानों के आंदोलन पर भी गोली चली थी, जिसमें एक किसान की मौत हुई थी। उस वक्त महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार थी और पृथ्वीराज चव्हाण सीएम थे।

अगस्त 2010 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ के टप्पल में किसानों के प्रदर्शन पर फायरिंग हुई थी, जिसमें तीन किसानों की मौत हुई थी। इसके बाद मई 2011 में भी गौतमबुद्धनगर के भट्टा पारसौल गांव में किसानों के प्रदर्शन पर पुलिस फायरिंग हुई थी, जिसमें 2 किसानों की जान गई थी। दोनों ही घटनाओं के वक्त यूपी की मुख्यमंत्री मायावती थीं।

अक्टूबर 1988 में यूपी के मेरठ में किसानों के आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग में 5 किसानों की जान गई थी। तब कांग्रेस के एनडी तिवारी मुख्यमंत्री थे। इस घटना के एक साल बाद 1989 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सत्ता चली गई थी।

मार्च 2007 में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानों पर पुलिस फायरिंग हुई थी, जिसमें 14 किसानों की मौत हो गई थी। उस वक्त लेफ्ट के बुद्धदेब भट्टाचार्य सीएम थे।

यहां किसान को वोट बीतने के बाद सिर्फ धोखा ही नहीं बल्कि गोली भी खानी पड़ी है लेकिन हासिल आज तक कुछ नहीं हुआ। हां ये बात भी जरुर ध्यान में रखी जाए कि जिन घटनाओं का ऊपर जिक्र किया गया है इनके घटने के बाद उस राज्य में तख्ता पलट निश्चित हुआ है।

साफ है कि कर्जमाफी जैसे चुनावी राहत से सरकार चाहे बन जाए, मगर किसानों का काम नहीं बनेगा। जरूरी है कि अब इस विषय पर सभी दलों द्वारा कोई ठोस कार्य रूप योजना बनाई जाए!

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रेशमी साड़ियां और सफेद कुर्ते पाजामे समय समय पर तमाशा दिखाएंगे और जनता….

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ममता सिंह

तस्वीर देखकर सोच रही कि ड्रीमगर्ल ने क्यों चुना होगा उस किसान के खेत-खलिहान को पोज़ देने के लिए …उन्होंने तो रानी,दासी,ताँगेवाली, मोटरकार वाली,पढ़ी-लिखी,अनपढ़ तमाम भूमिकाएं निभाई हैं फिर क्या ऐसा ख़ास रहा होगा इस भूमिका में…वह तो सक्षम हैं ,इससे शानदार दृश्य और लोकेशन  वह फ़िल्मसिटी में भी शूट करा सकती थीं पर नहीं आज उनकी भूमिका अभिनेता नहीं नेता की है सो सब लाइव होना चाहिए..एकदम टटका, खरा । बेचारी जनता इनकी रील लाइफ और रियल लाइफ दोनों में महज़ तमाशबीन थी, है और रहेगी..वह इनके हर एक्ट पर बस तालियां बजाएगी, इनकी तस्वीरें दीवारों पर चिपकाएगी।

यूँ तो नेताओं/अभिनेताओं को अपने घर-दुवार..खेत-खलिहान तक बुलाना जीवित किसानों के बूते में कहां…हाँ चुनावी साल हो तो मरे जवान और किसान की  कीमत जिंदा जवान-किसान से सौ गुना बढ़ जाती है…सांय-सांय करती नेताओं/अभिनेताओं की गाड़ियां,मीडिया के चीखते एंकर सब डेरा जमा लेते हैं…दो दिन बाद जाकर देखिये स्वयम आँसू पोछते चिंतित कम चकित अधिक, परिवारीजन ही बचे होते हैं, नेता और मीडिया उन्हें भूलकर अपने अगले टार्गेट की तरफ लपक लिए होते हैं।

वैसे इस भव्य तस्वीर में दर्ज़ कुछ मिनटों के तमाशे की साक्षी पीछे घूंघट में झांकती औरतों और जवान होने की दहलीज़ पर खड़े किशोर के जीवन में भला क्या बदला होगा…जैसे गांवों की रामलीला में राम-सीता, हनुमान-रावण की भूमिका निभाने वाले कलाकार अगली सुबह उन तस्वीरों को प्रणाम कर खेत जोतने, लकड़ी काटने, मजदूरी करने निकल पड़ते हैं जिनकी भूमिका रात उन्होंने निभाई थी, उसी तरह यह भी अगली सुबह तस्वीर के नेपथ्य में दर्ज़ अपनी भूमिका को प्रणाम कर बचा गेंहू काटने, मांडने, ओसाने में जुट गए होंगे..

पर क्या ड्रीमगर्ल की फरफराती रेशमी साड़ी की छुअन से उनका सूती घूंघट रेशमी हो गया होगा या वह किशोर मायानगरी पहुंचने के सपने इस महीन परिचय सूत्र के सहारे तय करने की सोच रहा होगा…क्या उसे लग रहा होगा कि इसी मुलाकात के हवाले मायानगरी का ऊंचा, चमकीला फाटक उसके लिए खुल जायेगा।

ड्रीमगर्ल का कौतुक,किसानों की बेचारगी,लोकतंत्र का सपनीला पर्व, नेताओं की गिरावट सब मिलाकर एक कॉकटेल है यह तस्वीर जो अब बरसों पृष्ठभूमि के किसान परिवार में देवी-देवताओं के साथ आले-ताखे-तख़्ते पर सजे बाबू, बाबा, काका, अम्मा की तस्वीरों के साथ सहेज दी जाएगी…उनके सपने बहुत रातों तक चमकीले रहेंगे भले ही ओसाये जाते गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य उनके सालभर पेट भरने,पिछले ऋण से उऋण होने,बच्चों की फीस, कपड़े, किताबें, खिलौने(आजकल यह लग्ज़री चीन की कृपा से गरीबों तक भी एकाध पहुंच ही जाती है) घर वालों की दवाइयां, साग भाजी के लिए अपर्याप्त हो, पर जादू के जोर से वही गेंहूँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की चक्की में पहुंचकर तिजोरी भरने के काम आता है जिसका प्रचार  मॉड्यूलर किचन में खड़ी ऐसी ही सुनहरी साड़ियों में लिपटी स्वप्न सुंदरियां करती हैं…घूंघट वालियां उन रोटियों की नरमाई-सफेदी को चकित-विस्मित हो देखती रहती हैं,उनके मरद रोटी से ज़्यादा रोटी का बखान करने वाली को ताकते रहते हैं..

पांच बरस बीतने के बरस फिर कोई रुपहली-चमकीली साड़ी किसानों के खेतों में दिखेगी…कई सफेद कुर्ते-पाजामे जवानों के घर रोता दिखेगा…जनता तमाशबीन थी..है..रहेगी। http://www.satyodaya.com

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मंथन

संगीत नाटक अकादमी अवार्ड्स पर जमी भ्रष्टाचार और अव्यवस्थाओं की धूल…

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अकादमी सम्मान का है बुरा हाल

लखनऊ। कला,संस्कृति के क्षेत्र में किसी भी राज्य में दिए जाने वाला संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त कलाकारों के लिये गौरव की बात होती है। जाहिर है कि सरकार द्वारा कला के विविध क्षेत्रों में दिए जाने वाला ये पुरस्कार सर्वोच्च है। नाट्य- संगीत- नृत्य से जुड़े कलाकार इस पुरस्कार को पाने में अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं। सम्मान कोई भी हो, यह जिस कलाकार को प्राप्त होता है, उसकी मेहनत, ईमानदारी और अपने क्षेत्र में किये गए कार्य का प्रतिफल होता है। कलाकारों को सम्मानित करने का मतलब ही यही है, की उसके कला क्षेत्र किये गए कार्य का मूल्यांकन करना और कला के सरोकारों के प्रति उसकी जिजीविषा को सम्मानित करना। उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी इस कार्य को पूरा करती है। संगीत नाटक अकादमी की स्थापना भी कला के तमाम जन सरोकारों को लेकर की गई थी। कला के उनयन, संवर्धन, संरक्षण, प्रोत्साहन अकादमी के मूल स्वरूप में शामिल था।

फिलहाल बात अकादमी पुरस्कारों को लेकर है, तो यह ज़िक्र कर दूं की सन् 2009 से 2016 तक के अकादमी सम्मान सारी प्रक्रिया पूरी होने के बावाजूद नही बंट सके। पिछली सरकार गई और नयी सरकार आयी। नयी सरकार को आए भी राज्य में लगभग 02 साल होने को है। इन 02 सालों में सत्तासीन और उसके नौकरशाहों ने अकादमी पुरस्कार बांटे जाने को लेकर न कोई सक्रियता दिखाई, और न ही कोई कवायद की, बल्कि सन 2017 ओर 2018 की अकादमी पुरस्कार योजना पर काम करना शुरू कर दिया। कलाकारों से आवेदन आमंत्रित किये गये, और ये निर्णय लिया गया की इन दो सालों के ही पुरस्कार बाटें जायें। संगीत नाटक अकादमी ओर सांस्कृतिक कार्य विभाग की हम अगर योजनाओं और क्रियाकलापों पर गौर करें, तो सारी योजनाएं भ्रष्ट व्यवस्था की भेंट चढ़ गयीं हैं। कर्मचारी / सभापति /निदेशक /सचिव /मंत्री सब हैं, पर ये सफेद हाथी ज़्यादा हैं। सरकार कोई भी हो, भ्रष्ट व्यवस्था का खात्मा नही कर सकती। क्योंकि भ्रष्ट होने से ही व्यवस्थाएं भी चलती हैं। देखा जाता है की व्यवहार और कागज़ी कार्य में अर्श और फर्श का अंतर होता है। कलाकारों और साहित्यकारों के साथ यह दिक्कत है ( जो सच्चे हैं ) वह न गुणाभाग कर सकते हैं और न ही इस भ्रष्ट व्यवस्था में अपने को सटीक पाते हैं। जो कलाकरों के संगठन बने भी हैं, वह एक प्रकार कलाकारों को स्वर देने के लिये नक्कारखाने की तूती हैं। हां संगठन के नाम पर उनकी दलाली और धंधा ज़रूर चल रहा है। आंदोलन/धरना/ज्ञापन-कला जगत की किसी भी समस्या के लिये इन कला संगठनों का आयोजन फुस्स ही होता है।

संगीत नाटक अकादमी की स्थापना को लगभग पांच दशक होने को है। अकादमी का ध्येय ही कला के संरक्षण,प्रोत्साहन, सवंर्धन और कार्यक्रमों का संचालन था। साल के कुछ निश्चित और महत्वपूर्ण कार्यक्रम अकादमी द्वारा संचालित होते हैं। पर जो भी कार्यक्रम हैं वह निर्बाध रूप से जारी हैं, इस सवाल को लेकर अकादमी की कार्य प्राणलियों पर बहुत सारे प्रशनचिन्ह हैं। कला की त्रेमासिक पत्रिका “छायानट” शायद ही साल में एक बार निकल पाती हो। जबकी इसके लिये बाक़ायदा एक संपादक नियुक्त है। इसी प्रकार संभागीय नाट्य समारोह तो येन-केन प्रकारेण सम्पन हो जाते हैं, पर राज्य नाट्य समारोह हो ही नही पाते। अकादमी की रसमंच श्रृंखला नियमित नहीं है। प्रेक्षागृह खस्ताहाल है। इसी प्रकार अन्य योजनाएं या समारोह औंधे मुंह लटके पड़े हैं। कलाकारों को कार्यक्रम के मद में दी जाने वाली राशि भी दशकों से एक स्तरीय चली आ रही है। जब की महंगाई की दर में कई गुना इज़ाफ़ा हो चुका है।

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सरकार के पास कलाओं के विकास के लिये कोई कला नीति नहीं है। जब की कला के नाम पर करोड़ों का फंड होता है। यह फंड कहां लोप हो जाता है, सोचना और कहना दोनों ही बेमानी है। यह बानगी आकादमी पुरस्कारों पर भी लागू होती है। 10 हज़ार रुपए की राशि वाला आकादमी सम्मान फंड की बांट जोह रहा है। जबकि अकादमी सोलर लाइट लगवाने के लिये लाखों रुपए खर्च कर रही है। यह कला की विडम्बना ही है कि सन 1972 से दिया जाने वाला अकादमी सम्मान आज भी 10 हज़ार रुपए की धुरी पे चलयमान है। वहीं विपरीत में अन्य अकादमियों और संस्थानों में सम्मानों में दिया जाने वाला मान कई गुना बढ़ गया है। इन्हीं सब विसंगतियों और त्रासदियों को लेकर थियेटर एवं फ़िल्म वेलफेयर एसोसिएशन ने अभी हालिया धरना आयोजित किया। धरने के मार्फत आकादमी की अव्यवस्थाओं और कार्यगुज़ारियों के खिलाफ तमाम मुद्दों को उठाते हुए संस्कृति मंत्री को ज्ञापन सौंपा। इन मुद्दों में अकादमी सम्मान की राशि पांच लाख किये जाने की मांग थी। ज़ाहिर है कि ये न्यायोचित मांग थी। पर यह भी कहना मुनासिब होगा की इस जंग लगी कांकस व्यवस्था में न पुरस्कार बटेंगे, न राशि में इजाफा होगा और न ही यह घटिया तंत्र कला और कलाकारों के प्रति जवाबदेह और जिम्मेदार होगा।http://www.satyodaya.com

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पुस्तक समीक्षा : बहुत से सवालों का जवाब है स्वाति गौतम का उपन्यास ‘चारू रत्न’

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पुस्तक समीक्षा ‘विवेक कान्त मिश्र’ द्वारा

स्वाति गौतम की पुस्तक ‘चारु रत्न’ प्रभात प्रकाशन से आ चुकी है। स्वाति जी इसके पहले विभिन्न पत्रिकाओं में छप चुकी हैं, लेकिन कहानियों के रूप में। उपन्यास के तौर पर चारु रत्न उनका पहला प्रयास है।

‘चारु रत्न’ की कहानी प्रारम्भ होती है बिलासपुर गांव से। कुंदन अपनी महत्त्वाकांक्षी मां सुधा की प्रथम संतति है। सुधा दिल्ली की शहरी पृष्ठभूमि से आती हैं जिनका विवाह उनके पिता द्वारा विजय (कुंदन के पिता) से किया गया है। विजय सरकारी नौकरी करते हैं। सुधा विवाह के बाद अपना स्वतंत्र अस्तित्व तलाशने हेतु नर्सिंग का कोर्स करती हैं। कुंदन को छोड़ने का निर्णय उनके लिए आसान नहीं था लेकिन उनकी महत्त्वाकांक्षा भी उनके लिए कम महत्वपूर्ण नहीं थी।

विजय, सुधा को नौकरी के लिए सहमति नहीं दे पाते। उनकी मां (कुंदन की दादी) पुरातन विचारों की महिला हैं, जो सुधा की अनुपस्थिति में कुंदन को पालती हैं।

सुधा, कुंदन के प्रति थोड़ी कठोरता रखती हैं। खुद को ग्रामीण पृष्ठभूमि में ढालते-ढालते उनकी दिल्ली की परवरिश कहीं गुम हो गई है और उसका स्थान बिलासपुर की ग्रामीण मानसिकता ने कुछ हद तक ले लिया है।

कालांतर में कुंदन की एक और बहन और दो और भाई जन्म लेते हैं। सुधा, कुंदन को कम-दिमाग समझती हैं। जिसका कारण मेरी दृष्टि में, यह है कि कुंदन अपने सहोदरों में सबसे बड़ी है और उससे भी बड़ी बात कि वह लड़की है। बड़े बच्चे पर माता-पिता का दबाव ज्यादा होता है, जिसके दो कारण मुझे समझ आते हैं। पहला यह कि उस समय माता-पिता खुद कम अनुभवी होते हैं, दूसरा उनमें शक्ति शेष होती है, जो उनकी दृष्टि में उनकी क्षमताओं का एक मिथ्या-भ्रम रचती है।

इन परिस्थितियों में कुंदन ‘क्विक रेस्पोंडेंट’ नहीं बन पाती। वह किसी निर्णय को अपने माँ की उचित-अनुचित की परिभाषा के दायरे में रख कर तौलती है।

सुधा का दृढ़ विश्वास है कि उसका स्व-अर्जित सुख अब सम्भव नहीं है। वह अपने बच्चों में अपने भावी जीवन के सुख की कल्पना पालती हैं। बच्चों की अच्छी शिक्षा को लेकर सुधा सचेत हैं, क्योंकि वे जानती हैं, भावी जीवन के सुखों की पूर्ति बच्चों की अच्छी शिक्षा से ही सम्भव है।

सुधा, कुंदन के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। वे मां भी हैं, इसलिए उनका कोमल हृदय कुंदन के प्रति वात्सल्य से हीन नहीं है, लेकिन सुधा जिस जीवन की कल्पना करती हैं, उसमें कुंदन ‘मिसफिट’ है। यह ‘मिसफिट’ ही दरअसल वह कारण है, जो सुधा के पूर्वाग्रह का मूल है और सम्भवतः ‘चारु रत्न’ लिखे जाने की वजह भी।

‘चारु रत्न’ ऐसा कथानक है, जिसने मुझे भारत के उस हिस्से की सैर कराई जो सदैव मेरे लिए कौतूहल का विषय रहा। मैं वर्षों तक खाप-पंचायतों के बारे में सोचता रहा हूं। बच्चियों को जन्म के समय ही पानी-भरे पात्र में डुबो कर अथवा अफीम पिला कर या गर्दन दबा कर मार देने की घटनाएं सुनना अजीब लगता था, पर जब दादी कहती हैं, ‘बेटियां तो किस्मत वालों की मरती हैं’ तो मुझे लगा, मेरे समस्त उत्तर मुझे मिल गए।

बाल-मनोविज्ञान की दृष्टि से कुंदन का पात्र सशक्त है। कुंदन अपने भाई से सावधान रहती है, क्योंकि वह उसकी गुड़िया की गर्दन जानबूझ कर तोड़ देता है। वह अपनी मौसी के प्रति, अपनी हमजोली के अनुभव सुनकर, दुराग्रह भी पालती है, लेकिन उनसे लिपट कर रोना भी वह नहीं भूलती। कुंदन के पास वे अनुभव भी हैं जो बहुधा स्त्री होने मात्र से किसी के साथ चिपक जाया करते हैं। बुरे स्पर्श को तो कुंदन समझती ही है, वह अच्छाई को भी समझती है।

पुस्तक की तीसरी खास बात बिलासपुर के लोकजीवन के सजीव चित्रण में है। कुंदन को बिलासपुर के लोकगीत याद हैं। उसे याद है, कुछ साल पहले तक नवविवाहिताएं किस पारंपरिक वेशभूषा में कौन से सामूहिक क्रिया-कलाप करती थीं। कुंदन को बचपन में गांवों में खेले उसके खेल भी अच्छी तरह याद हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘चारु रत्न’ को महज इसलिए भी पढ़ा और सहेजा जा सकता है।

विनय ‘चारु रत्न’ का सशक्त पात्र हो सकता था, पर नहीं हो पाया। क्या ही अच्छा होता अगर वह कुंदन के जीवन में दुबारा प्रवेश पाता और उसकी डायरी प्रकाशित करवाने का श्रेय उसे मिलता। मैं ऐसा सोचने ही वाला था कि मुझे ठहर जाना पड़ा। लेखिका सजग हैं। वे जानती हैं, कुंदन जिस मानसिक बुनावट की है, जिन परिस्थितियों ने उसे कुंदन बनाया है, उनमें किसी विनय का लौट कर आना, वह कभी स्वीकार न करती, खासकर तब जब अर्णव जैसा व्यक्ति उसका सपोर्ट सिस्टम हो।

‘सारा आकाश’ की कुछ पंक्तियों के भाव मुझे अर्णव के पात्र में समाहित मिले।

‘लड़की अपना सब कुछ छोड़ कर नए घर आती है, केवल एक भरोसे पर- उसका पति।’

अर्णव पौरुष की इस अपेक्षा पर पूरी तरह खरा उतरता है।

अंत में,

कुंदन कितनी मिसफिट है, सुधा का पूर्वाग्रह कितना सही है, दादी की भूमिका कुंदन के जीवन में क्या है और विजय वैसे क्यों हैं जैसे वे हैं, इत्यादि प्रश्नों के उत्तर आपको पुस्तक में मिलेंगे।

‘चारु रत्न’ निश्चित ही पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक है। बिना किसी खास तामझाम के, बिना क्लिष्ट दार्शनिक रूमानीपन के प्रयोग के भी, हृदय के गहनतम भाव उकेरे जा सकते हैं- इसे आप चारु रत्न पढ़ कर समझते हैं। पुस्तक ऐमेज़ॉन और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है। 216 पेज की किताब हार्ड बाउंड में है जिसकी कीमत 360 है। http://www.satyodaya.com

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