Connect with us

मंथन

‘विश्व ओजोन दिवस’ जब जागो तभी सवेरा, अब भी न जागना ला सकता है जीवन में अंधेरा…

Published

on

प्रकृति ने जब श्रृष्टि की संरचना की तब उसने अनेक गृह उपग्रह बनाए। इन्हीं तमाम गृह उपग्रहों में एक गृह है हमारी पृथ्वी। पृथ्वी प्रकृति की बने श्रृष्टि में इस तरह है जैसे नुकीले पत्थरों के बीच एक कोमल सा फूल। अब सोचने वाली बात है प्रित्थ्वी कोमल क्यों है! आपने एक गर्भवती महिला को देखा होगा। जब उसके अन्दर एक नन्हीं सी जान पल रही होती है तो डॉक्टर उसे अनेक प्रकार की हिदायतें देते हैं, एक तरह से उसके आस पास सुरक्षा घेरा बना दिया जाता है, दवाइयों से ले कर खाने पीने तक की हिदायतों के साथ। अब जब एक नन्हीं सी जान को अपने अन्दर समेटने से एक औरत इतनी सुकुमार हो सकती है तो भला पृथ्वी जो खुद में अपनी असंख्य औलादों को पाल रही है वो भला कोमल कैसे न हो। अब इस कोमल सी पृत्वी की सुरक्षा के लिए श्रृष्टि ने इसके ऊपर एक सुरक्षा कवच चढ़ा दिया जिससे सूर्य की हानिकारक पराबैगनी किरणों के कारण हमें नुक्सान न पहुंचे। उस सुरक्षा कवच को नाम दिया गया ओजोन परत। लेकिन हम इंसान तो अपने शारीर तक के बारे में सही से नहीं सोच पाते तो भला ओजोन परत के बारे में क्या सोचेंगे। मगर हमारे न सोचने से केवल हमें ही नहीं बल्कि बाकी के जीवजंतुओं और आने वाली नस्लों को भी भरी नुकसान उठाना पड़ेगा। ओजोन परत हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है इसी बात को समझाने के लिए पूरा विश्व हर साल 16 सितंबर को विश्व ओजोन दिवस या ‘ओजोन परत संरक्षण के रूप में मनाया जाता है।

धरती पर जीवन को पनपने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा है। इतिहास और भूगोल के अध्ययन से यह साफ है कि धरती पर जीवन की उत्पत्ति के लिए काफ़ी लंबा समय तय करना पड़ा है। लेकिन जो चीज़ इंसान को कड़ी मेहनत और प्रकृति से फल स्वरूप मिली है उसे आज खुद इंसान ही मिटाने पर लगा हुआ है। लगातार प्रकृति के कार्यों में हस्तक्षेप कर इंसान ने खुद को प्रकृति के सामने ला खड़ा किया है जहां प्रकृति उसका विनाश कर सकती है। जंगलों, वनों की कटाई कर असंतुलन पैदा किया जा रहा है। गाड़ियों ने हवा को प्रदूषित कर कर दिया है तो वहीं उस जल को भी इंसान ने नहीं बख्शा जिसकी वजह से धरती पर जीवन संचालित होता है। प्रौद्योगिकी के इस युग में इंसान हर उस चीज़ का हरण कर रहा है जो उसकी प्रगति की राह में रोड़ा बन रही है। इसी तरह इंसान ने अपने आराम और सहूलियत के लिए उस ओजोन परत को भी नष्ट करने की ठान ली है जो उसे सूर्य से निकलने वाली खतरनाक पराबैगनी किरणों से बचाती है। दिनों-दिन बढ़ रही औद्योगिक गतिविधियों के कारण आज हमारे जीवन को बचाने वाली ओजोन परत को खतरा पैदा हो गया है।

बहुत लोग ऐसे हैं जिन्होंने ओजोन लेयर के बारे में सुना तो है लेकिन जानते नहीं कि ये क्या है। असल में ओजोन एक हल्के नीले रंग की गैस होती है जो आक्सीजन के तीन परमाणुओं (O3) का यौगिक है। ओजोन परत सामान्यत: धरातल से 10 किलोमीटर से 50 किलोमीटर की ऊंचाई के बीच पाई जाती है। यह गैस सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों के लिए एक अच्छे फिल्टर का काम करती है। सूर्य से निकलने वाली खतरनाक किरणों से ओजोन परत हमें बचाती है। मगर इंसान द्वारा बरती जा रही लापरवाहियों के कारण जहरीली गैसें तैयार होती हैं जिस कारण ओजोन परत में एक छेद हो गया है और अब इस छेद को भरने के प्रयास हो रहे हैं।

यह जहरीली गैसें हम इंसानों द्वारा एसी और कूलर जैसे उत्पादों में इस्तेमाल होती हैं। अपना जीवन अधिक से अधिक आरामदायक बनाने के लिए हम दिन-प्रतिदिन प्रकृति के साथ जो छेड़छाड़ कर रहे हैं जिसके कारण ओजोन परत में छेद होगया। पिछले दो दशकों से समताप मंडल में ओजोन की मात्रा कम हो रही है। इसका मुख्य कारण रेफ्रिजरेटर व वातानुकूलित उपकरणों में इस्तेमाल होने वाली गैस, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन और हैलोन हैं। यह गैसें ऐरोसोल में तथा फोम की वस्तुओं को फुलाने और आधुनिक अग्निशमन उपकरणों में प्रयोग की जाती हैं। यही नहीं, सुपर सोनिक जेट विमानों से निकलने वाली नाइट्रोजन आक्साइड भी ओजोन की मात्रा को कम करने में मदद करती है। ओजोन की परत विशेष तौर से ध्रुवीय वातावरण में बहुत कम हो गई है। ओजोन परत का एक छिद्र अंटार्कटिका के ऊपर स्थित है।

ओजोन कैसे नष्ट होती है?

बाहरी वायुमंडल की पराबैंगनी किरणें सी।एफ।सी। से क्लोरीन परमाणु को अलग कर देती हैं।

मुक्त क्लोरीन परमाणु ओजोन के अणु पर आक्रमण करता है और इसे तोड़ देता है। इसके फलस्वरूप ऑक्सीजन अणु तथा क्लोरीन मोनोऑक्साइड बनती है-

Cl+O3=ClO+O2

वायुमंडल का एक मुक्त ऑक्सीजन परमाणु क्लोरीन मोनोऑक्साइड पर आक्रमण करता है तथा एक मुक्त क्लोरीन परमाणु और एक ऑक्सीजन अणु का निर्माण करता है।

ClO+O=Cl+O2

क्लोरीन इस क्रिया को 100 वर्षों तक दोहराने के लिए मुक्त है।

आमतौर पर ये पराबैगनी किरण (अल्ट्रा वायलेट रेडिएशन) सूर्य से पृथ्वी पर आने वाली एक किरण है जिसमें ऊर्जा ज्यादा होती है। यह ऊर्जा ओजोन की परत को नष्ट या पतला कर रही है। इन पराबैगनी किरणों को तीन भागों में बांटा गया है और इसमें से सबसे ज्यादा हानिकारक यूवी-सी 200-280 होती है। ओजोन परत हमें उन किरणों से बचाती है, जिनसे कई तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है। पराबैगनी किरणों (अल्ट्रा वायलेट रेडिएशन) की बढ़ती मात्रा से चर्म कैंसर, मोतियाबिंद के अलावा शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है। यही नहीं, इसका असर जैविक विविधता पर भी पड़ता है और कई फसलें नष्ट हो सकती हैं। इनका असर सूक्ष्म जीवाणुओं पर होता है। इसके अलावा यह समुद्र में छोटे-छोटे पौधों को भी प्रभावित करती जिससे मछलियों व अन्य प्राणियों की मात्रा कम हो सकती है।

तो जैसा की आपने पढ़ा कि ओजोन परत में छिद्र होने से हमें क्या नुकसान हो सकते हैं और हमारे लिए इसका क्या महत्व है। लेकिन दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हैं जो न ओजोन परत कि महत्व जानते हैं और न उन्हें इसके कम होने के बाद आने वाले नुकसान की कोई खबर है। ओजोन परत के इसी महत्व को ध्यान में रखते हुए पिछले दो दशक से इसे बचाने के लिए कार्य किए जा रहे हैं। लेकिन 23 जनवरी, 1995 को यूनाइटेड नेशन की आम सभा में पूरे विश्व में इसके प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए 16 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय ओजोन दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव पारित किया गया।

उस समय लक्ष्य रखा गया कि पूरे विश्व में 2010 तक ओजोन फ्रेंडली वातावरण बनाया जाए। हालांकि अभी भी लक्ष्य दूर है लेकिन ओजोन परत बचाने की दिशा में विश्व ने उल्लेखनीय कार्य किया है। ओजोन परत को बचाने की कवायद का ही परिणाम है कि आज बाज़ार में ओजोन फ्रेंडली फ्रिज, कूलर आदि आ गए हैं। इस परत को बचाने के लिए ज़रूरी है कि फोम के गद्दों का इस्तेमाल न किया जाए। प्लास्टिक का इस्तेमाल कम से कम हो। रूम फ्रेशनर्स व केमिकल परफ्यूम का उपयोग न किया जाए और ओजोन फ्रेंडली रेफ्रीजरेटर, एयर कंडीशन का ही इस्तेमाल किया जाए। इसके अलावा अपने घर की बनावट ओजोन फ्रेंडली तरीके से किया जाए, जिसमें रोशनी, हवा व ऊर्जा के लिए प्राकृतिक स्त्रोतों का प्रयोग हो।

प्रकृति ने हमें इतनी सुन्दर पृथ्वी दी और उसी के साथ ये दायित्व दिया कि हम इसे सुरक्षित रखें, ये ज्यादा मुश्किल नहीं है ये बस ऐसा है जैसे अपने घर को साफ रखना मगर हमारी नादानियों और हद से ज्यादा आरामपसंद होने की वजह से हमने अपने कल को असुरक्षित बना लिया। लेकिन कहते हैं जब जागो तभी सवेरा। देर अभी भी बहुत ज्यादा नहीं हुई है, हमें बस ये समझना है कि ये जो है सब हमारे अच्छे कल के लिए है।  http://www.satyodaya.com

Continue Reading
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

मंथन

रेशमी साड़ियां और सफेद कुर्ते पाजामे समय समय पर तमाशा दिखाएंगे और जनता….

Published

on

ममता सिंह

तस्वीर देखकर सोच रही कि ड्रीमगर्ल ने क्यों चुना होगा उस किसान के खेत-खलिहान को पोज़ देने के लिए …उन्होंने तो रानी,दासी,ताँगेवाली, मोटरकार वाली,पढ़ी-लिखी,अनपढ़ तमाम भूमिकाएं निभाई हैं फिर क्या ऐसा ख़ास रहा होगा इस भूमिका में…वह तो सक्षम हैं ,इससे शानदार दृश्य और लोकेशन  वह फ़िल्मसिटी में भी शूट करा सकती थीं पर नहीं आज उनकी भूमिका अभिनेता नहीं नेता की है सो सब लाइव होना चाहिए..एकदम टटका, खरा । बेचारी जनता इनकी रील लाइफ और रियल लाइफ दोनों में महज़ तमाशबीन थी, है और रहेगी..वह इनके हर एक्ट पर बस तालियां बजाएगी, इनकी तस्वीरें दीवारों पर चिपकाएगी।

यूँ तो नेताओं/अभिनेताओं को अपने घर-दुवार..खेत-खलिहान तक बुलाना जीवित किसानों के बूते में कहां…हाँ चुनावी साल हो तो मरे जवान और किसान की  कीमत जिंदा जवान-किसान से सौ गुना बढ़ जाती है…सांय-सांय करती नेताओं/अभिनेताओं की गाड़ियां,मीडिया के चीखते एंकर सब डेरा जमा लेते हैं…दो दिन बाद जाकर देखिये स्वयम आँसू पोछते चिंतित कम चकित अधिक, परिवारीजन ही बचे होते हैं, नेता और मीडिया उन्हें भूलकर अपने अगले टार्गेट की तरफ लपक लिए होते हैं।

वैसे इस भव्य तस्वीर में दर्ज़ कुछ मिनटों के तमाशे की साक्षी पीछे घूंघट में झांकती औरतों और जवान होने की दहलीज़ पर खड़े किशोर के जीवन में भला क्या बदला होगा…जैसे गांवों की रामलीला में राम-सीता, हनुमान-रावण की भूमिका निभाने वाले कलाकार अगली सुबह उन तस्वीरों को प्रणाम कर खेत जोतने, लकड़ी काटने, मजदूरी करने निकल पड़ते हैं जिनकी भूमिका रात उन्होंने निभाई थी, उसी तरह यह भी अगली सुबह तस्वीर के नेपथ्य में दर्ज़ अपनी भूमिका को प्रणाम कर बचा गेंहू काटने, मांडने, ओसाने में जुट गए होंगे..

पर क्या ड्रीमगर्ल की फरफराती रेशमी साड़ी की छुअन से उनका सूती घूंघट रेशमी हो गया होगा या वह किशोर मायानगरी पहुंचने के सपने इस महीन परिचय सूत्र के सहारे तय करने की सोच रहा होगा…क्या उसे लग रहा होगा कि इसी मुलाकात के हवाले मायानगरी का ऊंचा, चमकीला फाटक उसके लिए खुल जायेगा।

ड्रीमगर्ल का कौतुक,किसानों की बेचारगी,लोकतंत्र का सपनीला पर्व, नेताओं की गिरावट सब मिलाकर एक कॉकटेल है यह तस्वीर जो अब बरसों पृष्ठभूमि के किसान परिवार में देवी-देवताओं के साथ आले-ताखे-तख़्ते पर सजे बाबू, बाबा, काका, अम्मा की तस्वीरों के साथ सहेज दी जाएगी…उनके सपने बहुत रातों तक चमकीले रहेंगे भले ही ओसाये जाते गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य उनके सालभर पेट भरने,पिछले ऋण से उऋण होने,बच्चों की फीस, कपड़े, किताबें, खिलौने(आजकल यह लग्ज़री चीन की कृपा से गरीबों तक भी एकाध पहुंच ही जाती है) घर वालों की दवाइयां, साग भाजी के लिए अपर्याप्त हो, पर जादू के जोर से वही गेंहूँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की चक्की में पहुंचकर तिजोरी भरने के काम आता है जिसका प्रचार  मॉड्यूलर किचन में खड़ी ऐसी ही सुनहरी साड़ियों में लिपटी स्वप्न सुंदरियां करती हैं…घूंघट वालियां उन रोटियों की नरमाई-सफेदी को चकित-विस्मित हो देखती रहती हैं,उनके मरद रोटी से ज़्यादा रोटी का बखान करने वाली को ताकते रहते हैं..

पांच बरस बीतने के बरस फिर कोई रुपहली-चमकीली साड़ी किसानों के खेतों में दिखेगी…कई सफेद कुर्ते-पाजामे जवानों के घर रोता दिखेगा…जनता तमाशबीन थी..है..रहेगी। http://www.satyodaya.com

Continue Reading

मंथन

संगीत नाटक अकादमी अवार्ड्स पर जमी भ्रष्टाचार और अव्यवस्थाओं की धूल…

Published

on

अकादमी सम्मान का है बुरा हाल

लखनऊ। कला,संस्कृति के क्षेत्र में किसी भी राज्य में दिए जाने वाला संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त कलाकारों के लिये गौरव की बात होती है। जाहिर है कि सरकार द्वारा कला के विविध क्षेत्रों में दिए जाने वाला ये पुरस्कार सर्वोच्च है। नाट्य- संगीत- नृत्य से जुड़े कलाकार इस पुरस्कार को पाने में अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं। सम्मान कोई भी हो, यह जिस कलाकार को प्राप्त होता है, उसकी मेहनत, ईमानदारी और अपने क्षेत्र में किये गए कार्य का प्रतिफल होता है। कलाकारों को सम्मानित करने का मतलब ही यही है, की उसके कला क्षेत्र किये गए कार्य का मूल्यांकन करना और कला के सरोकारों के प्रति उसकी जिजीविषा को सम्मानित करना। उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी इस कार्य को पूरा करती है। संगीत नाटक अकादमी की स्थापना भी कला के तमाम जन सरोकारों को लेकर की गई थी। कला के उनयन, संवर्धन, संरक्षण, प्रोत्साहन अकादमी के मूल स्वरूप में शामिल था।

फिलहाल बात अकादमी पुरस्कारों को लेकर है, तो यह ज़िक्र कर दूं की सन् 2009 से 2016 तक के अकादमी सम्मान सारी प्रक्रिया पूरी होने के बावाजूद नही बंट सके। पिछली सरकार गई और नयी सरकार आयी। नयी सरकार को आए भी राज्य में लगभग 02 साल होने को है। इन 02 सालों में सत्तासीन और उसके नौकरशाहों ने अकादमी पुरस्कार बांटे जाने को लेकर न कोई सक्रियता दिखाई, और न ही कोई कवायद की, बल्कि सन 2017 ओर 2018 की अकादमी पुरस्कार योजना पर काम करना शुरू कर दिया। कलाकारों से आवेदन आमंत्रित किये गये, और ये निर्णय लिया गया की इन दो सालों के ही पुरस्कार बाटें जायें। संगीत नाटक अकादमी ओर सांस्कृतिक कार्य विभाग की हम अगर योजनाओं और क्रियाकलापों पर गौर करें, तो सारी योजनाएं भ्रष्ट व्यवस्था की भेंट चढ़ गयीं हैं। कर्मचारी / सभापति /निदेशक /सचिव /मंत्री सब हैं, पर ये सफेद हाथी ज़्यादा हैं। सरकार कोई भी हो, भ्रष्ट व्यवस्था का खात्मा नही कर सकती। क्योंकि भ्रष्ट होने से ही व्यवस्थाएं भी चलती हैं। देखा जाता है की व्यवहार और कागज़ी कार्य में अर्श और फर्श का अंतर होता है। कलाकारों और साहित्यकारों के साथ यह दिक्कत है ( जो सच्चे हैं ) वह न गुणाभाग कर सकते हैं और न ही इस भ्रष्ट व्यवस्था में अपने को सटीक पाते हैं। जो कलाकरों के संगठन बने भी हैं, वह एक प्रकार कलाकारों को स्वर देने के लिये नक्कारखाने की तूती हैं। हां संगठन के नाम पर उनकी दलाली और धंधा ज़रूर चल रहा है। आंदोलन/धरना/ज्ञापन-कला जगत की किसी भी समस्या के लिये इन कला संगठनों का आयोजन फुस्स ही होता है।

संगीत नाटक अकादमी की स्थापना को लगभग पांच दशक होने को है। अकादमी का ध्येय ही कला के संरक्षण,प्रोत्साहन, सवंर्धन और कार्यक्रमों का संचालन था। साल के कुछ निश्चित और महत्वपूर्ण कार्यक्रम अकादमी द्वारा संचालित होते हैं। पर जो भी कार्यक्रम हैं वह निर्बाध रूप से जारी हैं, इस सवाल को लेकर अकादमी की कार्य प्राणलियों पर बहुत सारे प्रशनचिन्ह हैं। कला की त्रेमासिक पत्रिका “छायानट” शायद ही साल में एक बार निकल पाती हो। जबकी इसके लिये बाक़ायदा एक संपादक नियुक्त है। इसी प्रकार संभागीय नाट्य समारोह तो येन-केन प्रकारेण सम्पन हो जाते हैं, पर राज्य नाट्य समारोह हो ही नही पाते। अकादमी की रसमंच श्रृंखला नियमित नहीं है। प्रेक्षागृह खस्ताहाल है। इसी प्रकार अन्य योजनाएं या समारोह औंधे मुंह लटके पड़े हैं। कलाकारों को कार्यक्रम के मद में दी जाने वाली राशि भी दशकों से एक स्तरीय चली आ रही है। जब की महंगाई की दर में कई गुना इज़ाफ़ा हो चुका है।

यह भी पढ़ें- इकाना स्टेडियम में नहीं लगेंगे चौके-छक्के, खामियों को देखते हुए प्रशासन ने जारी किया आदेश

सरकार के पास कलाओं के विकास के लिये कोई कला नीति नहीं है। जब की कला के नाम पर करोड़ों का फंड होता है। यह फंड कहां लोप हो जाता है, सोचना और कहना दोनों ही बेमानी है। यह बानगी आकादमी पुरस्कारों पर भी लागू होती है। 10 हज़ार रुपए की राशि वाला आकादमी सम्मान फंड की बांट जोह रहा है। जबकि अकादमी सोलर लाइट लगवाने के लिये लाखों रुपए खर्च कर रही है। यह कला की विडम्बना ही है कि सन 1972 से दिया जाने वाला अकादमी सम्मान आज भी 10 हज़ार रुपए की धुरी पे चलयमान है। वहीं विपरीत में अन्य अकादमियों और संस्थानों में सम्मानों में दिया जाने वाला मान कई गुना बढ़ गया है। इन्हीं सब विसंगतियों और त्रासदियों को लेकर थियेटर एवं फ़िल्म वेलफेयर एसोसिएशन ने अभी हालिया धरना आयोजित किया। धरने के मार्फत आकादमी की अव्यवस्थाओं और कार्यगुज़ारियों के खिलाफ तमाम मुद्दों को उठाते हुए संस्कृति मंत्री को ज्ञापन सौंपा। इन मुद्दों में अकादमी सम्मान की राशि पांच लाख किये जाने की मांग थी। ज़ाहिर है कि ये न्यायोचित मांग थी। पर यह भी कहना मुनासिब होगा की इस जंग लगी कांकस व्यवस्था में न पुरस्कार बटेंगे, न राशि में इजाफा होगा और न ही यह घटिया तंत्र कला और कलाकारों के प्रति जवाबदेह और जिम्मेदार होगा।http://www.satyodaya.com

Continue Reading

मंथन

पुस्तक समीक्षा : बहुत से सवालों का जवाब है स्वाति गौतम का उपन्यास ‘चारू रत्न’

Published

on

पुस्तक समीक्षा ‘विवेक कान्त मिश्र’ द्वारा

स्वाति गौतम की पुस्तक ‘चारु रत्न’ प्रभात प्रकाशन से आ चुकी है। स्वाति जी इसके पहले विभिन्न पत्रिकाओं में छप चुकी हैं, लेकिन कहानियों के रूप में। उपन्यास के तौर पर चारु रत्न उनका पहला प्रयास है।

‘चारु रत्न’ की कहानी प्रारम्भ होती है बिलासपुर गांव से। कुंदन अपनी महत्त्वाकांक्षी मां सुधा की प्रथम संतति है। सुधा दिल्ली की शहरी पृष्ठभूमि से आती हैं जिनका विवाह उनके पिता द्वारा विजय (कुंदन के पिता) से किया गया है। विजय सरकारी नौकरी करते हैं। सुधा विवाह के बाद अपना स्वतंत्र अस्तित्व तलाशने हेतु नर्सिंग का कोर्स करती हैं। कुंदन को छोड़ने का निर्णय उनके लिए आसान नहीं था लेकिन उनकी महत्त्वाकांक्षा भी उनके लिए कम महत्वपूर्ण नहीं थी।

विजय, सुधा को नौकरी के लिए सहमति नहीं दे पाते। उनकी मां (कुंदन की दादी) पुरातन विचारों की महिला हैं, जो सुधा की अनुपस्थिति में कुंदन को पालती हैं।

सुधा, कुंदन के प्रति थोड़ी कठोरता रखती हैं। खुद को ग्रामीण पृष्ठभूमि में ढालते-ढालते उनकी दिल्ली की परवरिश कहीं गुम हो गई है और उसका स्थान बिलासपुर की ग्रामीण मानसिकता ने कुछ हद तक ले लिया है।

कालांतर में कुंदन की एक और बहन और दो और भाई जन्म लेते हैं। सुधा, कुंदन को कम-दिमाग समझती हैं। जिसका कारण मेरी दृष्टि में, यह है कि कुंदन अपने सहोदरों में सबसे बड़ी है और उससे भी बड़ी बात कि वह लड़की है। बड़े बच्चे पर माता-पिता का दबाव ज्यादा होता है, जिसके दो कारण मुझे समझ आते हैं। पहला यह कि उस समय माता-पिता खुद कम अनुभवी होते हैं, दूसरा उनमें शक्ति शेष होती है, जो उनकी दृष्टि में उनकी क्षमताओं का एक मिथ्या-भ्रम रचती है।

इन परिस्थितियों में कुंदन ‘क्विक रेस्पोंडेंट’ नहीं बन पाती। वह किसी निर्णय को अपने माँ की उचित-अनुचित की परिभाषा के दायरे में रख कर तौलती है।

सुधा का दृढ़ विश्वास है कि उसका स्व-अर्जित सुख अब सम्भव नहीं है। वह अपने बच्चों में अपने भावी जीवन के सुख की कल्पना पालती हैं। बच्चों की अच्छी शिक्षा को लेकर सुधा सचेत हैं, क्योंकि वे जानती हैं, भावी जीवन के सुखों की पूर्ति बच्चों की अच्छी शिक्षा से ही सम्भव है।

सुधा, कुंदन के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। वे मां भी हैं, इसलिए उनका कोमल हृदय कुंदन के प्रति वात्सल्य से हीन नहीं है, लेकिन सुधा जिस जीवन की कल्पना करती हैं, उसमें कुंदन ‘मिसफिट’ है। यह ‘मिसफिट’ ही दरअसल वह कारण है, जो सुधा के पूर्वाग्रह का मूल है और सम्भवतः ‘चारु रत्न’ लिखे जाने की वजह भी।

‘चारु रत्न’ ऐसा कथानक है, जिसने मुझे भारत के उस हिस्से की सैर कराई जो सदैव मेरे लिए कौतूहल का विषय रहा। मैं वर्षों तक खाप-पंचायतों के बारे में सोचता रहा हूं। बच्चियों को जन्म के समय ही पानी-भरे पात्र में डुबो कर अथवा अफीम पिला कर या गर्दन दबा कर मार देने की घटनाएं सुनना अजीब लगता था, पर जब दादी कहती हैं, ‘बेटियां तो किस्मत वालों की मरती हैं’ तो मुझे लगा, मेरे समस्त उत्तर मुझे मिल गए।

बाल-मनोविज्ञान की दृष्टि से कुंदन का पात्र सशक्त है। कुंदन अपने भाई से सावधान रहती है, क्योंकि वह उसकी गुड़िया की गर्दन जानबूझ कर तोड़ देता है। वह अपनी मौसी के प्रति, अपनी हमजोली के अनुभव सुनकर, दुराग्रह भी पालती है, लेकिन उनसे लिपट कर रोना भी वह नहीं भूलती। कुंदन के पास वे अनुभव भी हैं जो बहुधा स्त्री होने मात्र से किसी के साथ चिपक जाया करते हैं। बुरे स्पर्श को तो कुंदन समझती ही है, वह अच्छाई को भी समझती है।

पुस्तक की तीसरी खास बात बिलासपुर के लोकजीवन के सजीव चित्रण में है। कुंदन को बिलासपुर के लोकगीत याद हैं। उसे याद है, कुछ साल पहले तक नवविवाहिताएं किस पारंपरिक वेशभूषा में कौन से सामूहिक क्रिया-कलाप करती थीं। कुंदन को बचपन में गांवों में खेले उसके खेल भी अच्छी तरह याद हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘चारु रत्न’ को महज इसलिए भी पढ़ा और सहेजा जा सकता है।

विनय ‘चारु रत्न’ का सशक्त पात्र हो सकता था, पर नहीं हो पाया। क्या ही अच्छा होता अगर वह कुंदन के जीवन में दुबारा प्रवेश पाता और उसकी डायरी प्रकाशित करवाने का श्रेय उसे मिलता। मैं ऐसा सोचने ही वाला था कि मुझे ठहर जाना पड़ा। लेखिका सजग हैं। वे जानती हैं, कुंदन जिस मानसिक बुनावट की है, जिन परिस्थितियों ने उसे कुंदन बनाया है, उनमें किसी विनय का लौट कर आना, वह कभी स्वीकार न करती, खासकर तब जब अर्णव जैसा व्यक्ति उसका सपोर्ट सिस्टम हो।

‘सारा आकाश’ की कुछ पंक्तियों के भाव मुझे अर्णव के पात्र में समाहित मिले।

‘लड़की अपना सब कुछ छोड़ कर नए घर आती है, केवल एक भरोसे पर- उसका पति।’

अर्णव पौरुष की इस अपेक्षा पर पूरी तरह खरा उतरता है।

अंत में,

कुंदन कितनी मिसफिट है, सुधा का पूर्वाग्रह कितना सही है, दादी की भूमिका कुंदन के जीवन में क्या है और विजय वैसे क्यों हैं जैसे वे हैं, इत्यादि प्रश्नों के उत्तर आपको पुस्तक में मिलेंगे।

‘चारु रत्न’ निश्चित ही पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक है। बिना किसी खास तामझाम के, बिना क्लिष्ट दार्शनिक रूमानीपन के प्रयोग के भी, हृदय के गहनतम भाव उकेरे जा सकते हैं- इसे आप चारु रत्न पढ़ कर समझते हैं। पुस्तक ऐमेज़ॉन और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है। 216 पेज की किताब हार्ड बाउंड में है जिसकी कीमत 360 है। http://www.satyodaya.com

Continue Reading

Category

Weather Forecast

October 7, 2019, 5:12 pm
Hazy sunshine
Hazy sunshine
31°C
real feel: 32°C
current pressure: 1010 mb
humidity: 48%
wind speed: 3 m/s WNW
wind gusts: 3 m/s
UV-Index: 1
sunrise: 5:31 am
sunset: 5:17 pm
 

Recent Posts

Top Posts & Pages

Subscribe to Blog via Email

Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.

Join 10 other subscribers

Trending